प्रश्नोत्तर P7-0146 · भाग 7
दूसरा संदेह यह है कि आपने मिस्त्री को डांटा। डांटने से मेरे अंदर संदेह पैदा हो गया कि गुरु ऐसे डांटते हैं। वह अच्छा नहीं लगा। गुरु को ऐसा क्रोध क्यों करना पड़ता है?
डांटेंगे नहीं, तो काम नहीं करेगा। पैसा देता हूं। फ्री में थोड़ी ना करवाते हैं काम। शौचालय बन रहा है। लोगों को बाहर जाना पड़ता है। अभी बारिश आ जाएगी, तो कैसे क्या होगा। फिर ये सब आए हैं, आप लोग आए हैं। किसके भरोसे आए हैं? मेरे भरोसे ना? तो यहां की व्यवस्था अगर नहीं रहेगी, तो आपको प्रॉब्लम नहीं होगी?
आप बताओ, क्या करें? उसकी आरती-पूजा करें? क्या करूं? आप ही बताओ। उसको पैसा दे रहा हूं, समय-समय पर पैसा दे रहा हूं। वो हमारे काम को कितना टाइम लगा दिया है। ये लोग देख रहे हैं। तो क्या करूं? अभी बारिश आ जाए, तो लोगों को बाहर जाने का कहां से, कैसे जाएंगे। और फिर कितनी प्रॉब्लम होगी इन लोगों को। ये लोग तो मेरे भरोसे यहां पर हैं ना।
जब काम करोगे, तो बहुत कुछ करना पड़ता है। और जब नहीं करोगे, निठल्ला रहोगे, तो एकदम सज्जन बन के जी सकते हो। जब आपको कुछ नहीं करना है, तो सज्जन रह सकते हो। मुझे सज्जन नहीं बनना है, और ना मुझे दुर्जन बनना है। मैं अपने काम के लिए कुछ भी कर सकता हूं। उससे मेरा व्यक्तिगत कुछ थोड़ी ना है। मैंने वो काम दिया है, और मैं उसका पैसा देता हूं, तो मेरा काम समय पर होना चाहिए। अगर गलती मेरी हो, तो बात अलग है। अगर मैं समय पर पैसा दे रहा हूं, और वह हमेशा कहता है कि इतने दिन में कर दूंगा, इतने दिन में कर दूंगा, तो आप बताओ, परेशानी लोगों को होगी। ये लोग हमारे भरोसे आते हैं। आप हमारे भरोसे आए। आज यहां ऐसी व्यवस्था है, तभी शांति से रह पाए। अगर यह नहीं होता, कंबल नहीं होते, चटाई नहीं होती, भोजन नहीं होता, तो आप कैसे रहते? दो दिन रहना कितना भारी पड़ता? पड़ता कि नहीं पड़ता? तो इसके लिए काम करना पड़ता है। जब काम करना पड़ता है, तो गुस्सा भी करना पड़ता है। हो सकता है मारपीट भी करनी पड़े।
आज हमारे देश के क्रांतिकारियों की बात करो। क्या उन्होंने गुस्सा करके कितनों की हत्या की? लेकिन आज वो पूजनीय हैं कि नहीं हैं? किसके लिए की? देश के लोगों को बचाने के लिए की। लेकिन उस बचाने में किसी को मारना भी तो पड़ा। देश को बचाने में, देशवासियों को बचाने के लिए, किसी को मारना भी तो पड़ा। अब लोग बोलते हैं, हम तो सज्जन हैं, मारे क्यों? तो फिर क्या हम ऐसे ही खड़े होते? कहीं गुलामी की जंजीर में जकड़े होते, गुलामी करते होते। तो भाई, जब काम करना पड़ता है, तो बहुत कुछ करना पड़ता है। ये बातों से बात नहीं बनती।
आप निठल्ले बन जाओ। सज्जन हो जाओ। कुछ मत करो। आपको क्रोध करने की जरूरत पड़ेगी क्या? अगर आपको कुछ ना करना हो, तो क्रोध करने की जरूरत नहीं। जब आप कुछ करोगे, तो उसमें संघर्ष होगा। लोग मिलेंगे, तो क्रोध करना पड़ेगा, क्योंकि वे क्रोध पर ही काम करने वाले हैं। मैं अपने काम के लिए कुछ भी कर सकता हूं। यह पिल्ले भी इसीलिए पाले हैं। ये भी सुरक्षा के मामले में काम आते हैं। ऐसे थोड़ी पाले हैं।
क्रोध वाली बात समझ में आ गई? करना पड़ता है। जब काम करना है, तो करना पड़ता है। काम नहीं करना है, तो ऐसे ही पड़े रहो। तब तुम्हें गुस्सा करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।
आज देखो, इतना सब जल रहा है। कितना लाइट का बिल आएगा, कितना खर्च है। ऐसे ही चल रहा है क्या? लोग बड़ा आसानी से लिख देते हैं, आपको पैसे की क्या जरूरत है? मुझे जरूरत नहीं। लेकिन आज इतनी यहां व्यवस्था फैल रही है। कल ही प्रोफेसर जी से बात हो रही थी, कि यह जितना फैलेगा, उसके पीछे उतना खर्च भी तो फैलेगा। जितना फैलाव होगा, एक बल्ब जलेगा तो एक बल्ब का बिल आएगा। दो होंगे तो दो का आएगा। जितना बढ़ता जाएगा, बिल भी बढ़ता जाएगा। यह जितना फैल रहा है, उतनी मानसिक मेहनत बढ़ती जाती है। शारीरिक मेहनत तो मैंने कर ली। मानसिक मेहनत बढ़ती जाती है। जैसे घर के सारे सदस्य बड़े आराम से सोते हैं, लेकिन गार्जियन से पूछो, उसकी क्या हालत है। वैसे ही आश्रम चलाने वाले को पता है, उसकी क्या हालत है। यह कहना बड़ा आसान है, आपको क्या चाहिए, आपको क्या जरूरत है। हमें जरूरत नहीं। लेकिन हम कुछ कर रहे हैं, उसमें तो जरूरत है।
इसलिए लोगों से कहता हूं कि भाई, जितने लोग मेरे काम का उपयोग करते हो, धन की सेवा दो। नहीं तो मेरे काम का उपयोग करना बंद कर दो। तब काम फैलेगा ही नहीं, और जरूरत ही नहीं होगी। तो हमने उसको काम के लिए डांटा। और मैं अपनी जगह सही था, क्योंकि मैं उसे समय पर पेमेंट करता हूं। मैं फ्री में काम थोड़ी ना ले रहा हूं। ऐसा नहीं कि तू सेवा करेगा, तू इतना कम कर दे, आश्रम है।
मैं आपको बताऊं। एक दिन सामान लेने धामनौत, यही जगह है, एक व्यक्ति आया था। सामने वाले ने उसे कुछ चार सौ रुपए दिए थे। मुझे भाड़ा कम लगा। मैंने दो सौ रुपए उसे अपनी जेब से दिए। और मैंने फोन करके उस दुकानदार से कहा कि मैंने दो सौ इसे एक्स्ट्रा दिए। क्यों दिए? क्योंकि वह भूल में आ गया था। उसे पता नहीं होगा। रास्ता ऐसा खराब है। चार सौ तो पास से ही लोग लेते हैं। वह दूर से आया था, तो मैंने दो सौ दिए। मैंने उससे पूछा, कितना ज्यादा चाहिए? उसने बताया, तो मैंने दो सौ दिए। तो मैं गलत ना करता हूं, ना सहता हूं। उसके लिए चाहे मुझे मारपीट करनी पड़े, तो मैं तैयार हूं।
और जब से मैं यहां हूं, तब से मेरा सत्संग भी चलता है, मैं आश्रम का काम भी करता हूं, व्यवस्था भी करता हूं, और झगड़े भी चलते रहते हैं। ऐसे थोड़ी ना है कि यहां कुछ नहीं होता। पुलिस की गाड़ी आकर गई। कितनी धमकियां आकर गईं। जान से मारने की धमकी आकर गई। यह सब चल रहा है। तुम तो कुछ नहीं देखे। तुम तो यह डांटना देखे। यहां तो इसको तोड़ने के लिए क्या-क्या, कितने लोग आए। पुलिस की गाड़ियां आईं। जान से मारने की धमकी मिली। बहुत कुछ होता है, जब आप कुछ काम करोगे तब।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 12 अप्रैल 2026, अपनों की कुटिया में सत्संग समझो #योगी · 2026-04-12