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प्रश्नोत्तर P7-0189 · भाग 7

इस वक्त इस दुनिया में सबसे कठिन कार्य क्या है?

किसी को लगता है बच्चों को संभालना, पढ़ाई-लिखाई, काम-धंधा। नहीं, यही सब लगता है। लेकिन इस समय हमारे लिए दुनिया का सबसे कठिन कार्य है ईमानदारी। कठिन था, नहीं, लेकिन हमने कर लिया ईमानदारी। इसके अलावा आपने कठिन से कठिन कार्य करने में सफलता पा ली। इसको छोड़कर कोई कहता है मैं सत्तर प्रतिशत हूं, कोई कहता है मैं निन्यानवे हूं, कोई कहता है मैं इतना प्रतिशत। लेकिन तुम कहते हो मैं सत्तर प्रतिशत ईमानदार। या तो तुम ईमानदार हो या बेईमान हो। अगर तुम निन्यानवे भी कह रहे हो तो तुम सिर्फ बेईमान हो, ईमानदार एक प्रतिशत भी नहीं हो। बहुत सीधी बात है। तो इस समय हमारे लिए दुनिया का सबसे कठिन कार्य ईमानदारी है। पूजा, भक्ति, साधना, तपस्या खूब हो रही है। लेकिन हमारा मूल स्वभाव ईमानदारी थी, वह नहीं हो रहा है, और यही मूल है। आज हम इतनी बेईमानी की गहराई में चले गए हैं कि कभी-कभी बेईमानी भी हमें ईमानदारी लगती है। और ईमानदारी से ही आप इस भवसागर को पार करोगे। सत्कर्म की भी जरूरत इसलिए है क्योंकि बेईमानी करके आप बहुत लोगों की बद्दुआ ले चुके हो, इसलिए सत्कर्म की जरूरत आपके कल्याण के लिए है। आप यह मत समझना कि उसको आपकी जरूरत है। आप नहीं पूरा करोगे तो कोई और कर देगा। आप यह मत समझना कि मुझे मौका मिला है और मैं नहीं करूंगा तो वैसे ही रहेगा। नहीं, आप नहीं करोगे तो कोई और करेगा। आप लाइन में थे इसलिए आपको मौका मिला। जैसे टिकट की लाइन में हों तो मौका इसलिए मिला कि आप लाइन में थे, लेकिन काउंटर जाने के बाद बोल रहे हो, नहीं मुझे नहीं लेना है, तो ठीक है, साइड हटो, पीछे कोई खड़ा है। ऐसे ही सत्कर्म है। आप साइड हटो। आपने कभी कहा था कि मुझे सत्कर्म का मौका दो, मैं भी सेवा करना चाहता हूं। लेकिन सेवा के नाम पर ज्यादातर क्या होता है। शुरुआत सेवा से होती है, लेकिन मेवा खाने में समय नहीं लगता, क्योंकि सेवा करने में लोग सपोर्ट करते हैं। सेवा करने वाला एक घर बनाने में पूरी जिंदगी लग जाती है। लेकिन अगर कोई समाज की सेवा का आश्वासन लोगों को देता है तो कई आश्रम बना लेता है। लोगों ने सहयोग किया कि इसमें सहयोग करने से मेरा भी कल्याण होगा। तो आपको यह देखना है। करने वाले ने तो कर दिया। जिसके द्वारा यह कार्य हो रहा है, अगर वह ईमानदार है तो वह भी तर जाएगा, लोग भी तर जाएंगे। और वह अगर बेईमान होगा तो उसका पतन हो जाएगा, सहयोग करने वाले तर जाएंगे। जिसने जैसा किया है उसे परिणाम मिलेगा। परिणाम हमेशा अकेले भोगना पड़ता है। चाहे आप कुछ भी करते हो, आप मत समझना मेरे साथ मेरी मां जाएगी, पति जाएगा, बीवी जाएगी, बच्चे जाएंगे। सब लात मार देंगे। जब तक जवानी है, जब तक काम के लायक हो, पापा, मम्मी, पति, पत्नी, जब तक जवानी है, जब तक लायक हो। अगर जवानी भी हो और निठल्ले हो तो किसी काम के नहीं, फिर जूते खाओगे, घर में ही शब्दों के जूते। और कमजोर रहोगे तो और भी मारेंगे। तो मैं यह कह रहा हूं कि कुछ धन के चक्कर में, इन झूठे रिश्तों के चक्कर में, क्योंकि जरूरत के रिश्ते हैं। यह कोई रिश्ते नहीं हैं। आज हमें एक मैसेज आया, फेसबुक पर पुराना। दोस्त तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन फिर भी हम पढ़ रहे थे तो हमारी जान-पहचान हुई थी। हमारे गांव के बगल के ही थे। बहुत समय से हमारे फेसबुक पर कमेंट कर रहे थे, मैं जवाब नहीं दे रहा था। वह विदेश रहते हैं, अभी भारत आए हैं, तो मिलना चाह रहे थे। मैंने नंबर दे दिया। उन्होंने कॉल किया। बात करते-करते, वो लाखों रुपए महीने कमाते हैं, उन्होंने कहा कि आप हमारे मित्र हैं। मैंने कहा, देखो, यह कहना बड़ा आसान है। क्या तुमने मित्रता को निभाया? एक बार मुझे जीवन में जरूरत पड़ी, जब मैंने उनसे कहा तो मना कर दिया, और वह उस लायक थे। मैंने कहा, रिश्ते बनाना आसान है, निभाना नहीं। क्या मैं उस रिश्ते को ईमानदारी से निभा रहा हूं? तो हमने कहा, मित्र वगैरह नहीं, मित्र की पहले परिभाषा समझो। आप पढ़ाई-लिखाई में प्रोफेशनल हो, वह सिर्फ पैसा कमाने के काम आता है। व्यावहारिक जगत में आपको सिर्फ आपका व्यवहार काम आता है, आपके संस्कार काम आते हैं। आप यह मत समझना कि आपने पीएचडी कर लिया तो आपका कल्याण हो जाएगा। हो सकता है अनपढ़ अपना कल्याण कर ले। जैसे कबीर क्या थे? अनपढ़ ही थे। कालिदास कौन से ग्रेजुएट थे? आज उनको लोग फॉलो कर रहे हैं, उनसे कुछ सीख रहे हैं। तो मैंने कहा, तू पढ़ाई-लिखाई छोड़। तू ग्रेजुएट है, लाखों कमाता है। तू एक काम कर, पढ़ाई-लिखाई छोड़। तुझसे मेरी समझ बहुत आगे निकल चुकी है। और रही बात, तू मेरे मित्र के लायक नहीं, क्योंकि मित्र की परिभाषा यही है कि एक-दूसरे को जिस लायक मैं हूं साथ देना, जरूरत पड़ने पर। वो तो तुमने किया नहीं। मेरे तरफ से कोई कमी है तो बता। तब तो दोनों एक ही जैसे हैं। मेरे तरफ से कोई कमी है तो बता। एक बार मैं तुझे मित्र बोल सकता हूं, लेकिन तू नहीं बोल सकता। मैं इसलिए बोल सकता हूं कि मैं खरा उतरा हूं। लेकिन मैं तुझे मित्र लायक नहीं समझता, कि तू उस लायक नहीं है। मेरा यह कहना है, कोई भी रिश्ते हैं, ईमानदारी से निभाओ। किसी रिश्ते को बनाओ तो ईमानदारी से निभाओ। और मूल अपना कल्याण करो। कल्याण सबसे जरूरी है। लोग कहते हैं देश संविधान से चलता है। लेकिन संविधान लिखने वाले, भीमराव अंबेडकर जी ने संविधान को लिखा। आज उनके द्वारा लिखे गए संविधान से देश की कानून-व्यवस्था में उपयोग हो रहा है। वो भी आखिरी में बौद्ध धर्म को अपनाए। लोग बड़े आसानी से कह देते हैं, आत्मिक कल्याण के लिए किसी गुरु के शरण में जाना ही पड़ेगा। तो आखिर उन्होंने अपनाया। लोग तर्क दे देते हैं, देश संविधान से चलता है। लेकिन आत्मिक कल्याण संविधान से थोड़ी ना होगा। देश चलेगा। एक नियम है, एक सिस्टम है, एक रूल है, देश का अनुशासन है। जिस देश में हमें रहना है, हम अगर संवैधानिक तौर-तरीके से रहेंगे तो हम सुरक्षित रहेंगे। लेकिन मेरा आत्मकल्याण थोड़ी ना होगा। आत्मकल्याण के लिए किसी गुरु के शरण में जाना पड़ेगा। आप देखो, जिन्होंने संविधान लिखा वो भी गए, बौद्ध धर्म को अपनाया। क्यों अपनाया? क्या जरूरत थी? वो तो योग्य थे, ग्रेजुएट थे, विदेश पढ़ के आए थे। उनको क्यों जरूरत पड़ी? क्योंकि उन्हें भी लगा कि मेरा आत्मिक कल्याण किसी गुरु के शरण में जाने से ही होगा। मैं बाहरी तो कुछ कर चुका हूं, लेकिन अंदर के लिए मुझे किसी के शरण में जाना पड़ेगा। अब वो शरण गुरु का होगा। पढ़ाई-लिखाई हमें अंदर साथ नहीं दे सकती। पढ़ाई-लिखाई सिर्फ बाहर की व्यवस्थाओं के लिए है, पैसा कमाने के लिए, देश चलाने के लिए। लेकिन आत्मिक कल्याण के लिए किसी गुरु के शरण में जाओ। और गुरु कौन? गुरु ज्ञान का प्रतीक है। नामधारी ऐसे गुरु नहीं। आज सट्टा देने वाले को भी गुरु कह देते हैं। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। जिसके शब्दों के द्वारा मेरा आत्मिक कल्याण होगा, जिनके शब्दों के द्वारा मैं इस जाल से छूट पाऊंगा। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरे कर्ता के भाव से मैं छूट पाऊंगा। ऐसे गुरु के सानिध्य में। और यह मुझे समझना पड़ेगा कि जब मैं किसी के शरण में जा रहा हूं तो मुझसे क्या बातचीत कर रहा है, शब्दों के द्वारा क्या दे रहा है। ये शब्द लेकर मैं समाज में उलझूंगा या समाज से सुलझूंगा। इतना समझ अपने में भी होना चाहिए। अरे भाई, किसी ने तलवार दे दिया, चलाना तो सीखोगे तब ना चलाओगे। बड़ी-बड़ी तलवार लेने से थोड़ी ना, किताब लेने से थोड़ी ना। ऐसे ही शब्द का उपयोग कैसे, कहां करना है। जैसे गुरु बताता है कि तलवार को कैसे चलाना है, तलवार को किस जगह कैसे उपयोग करना है, सामने वाला कैसे प्रहार करेगा और तुम्हें कैसे रोक के कैसे जवाब देना है। तो वैसे गुरु सिखाएगा कि इन शब्दों का उपयोग कहां करना है। नहीं तो क्या ये शब्द वहां नहीं हैं क्या? किताबों में नहीं भरे हैं क्या? हम जितना घुमा के फिरा के बोल रहे हैं, क्या यह शब्द किताबों में नहीं है? लेकिन किताबों में तरीका नहीं है। तलवार चलाने का तरीका किताबों में नहीं है। किसी गुरु के सानिध्य में रहकर आपको सीखना पड़ेगा। तलवार आप बाजार से खरीद सकते हो, सिखाना बाजार से नहीं खरीद सकते। दुकान पर मिलता है क्या? जीवंत गुरु चाहिए। वो जीवंत गुरु यह सिखाएगा किस तरीके से कौन से शब्द का कहां उपयोग करना है। और जब आप उसके सानिध्य में रहोगे, अब एक ही दिन गए, तलवार ले ली, बोलो आज सिखा दो, बस आज के बाद नहीं आऊंगा, तलवार हाथ में रह जाएगी, चलाना कभी नहीं आएगा, युद्ध के मैदान में मार दिए जाओगे। गुरु के सानिध्य में आपको रहना पड़ेगा, समर्पण से। तो गुरु अगर कोई शब्द दे रहा है तो उन शब्दों को कैसे, कहां उपयोग करना है, जब उसके सानिध्य में रहोगे, उसकी जीवन-शैली देखोगे, उसका जीवन जीने का तरीका देखोगे, तब समझ में आएगा। आप अगर किसी स्थान पर रह रहे हो तो सिर्फ गुरु को देखो। तुम्हें उसके अलावा कोई दिखना ही नहीं चाहिए। और किसी के आचरण को धारण ही मत करो। सिर्फ एक को देखो, गुरु को, क्योंकि वो मुक्त है। और अगर तुम अपने आसपास और कुछ दिख रहा है तो तुम जिज्ञासु नहीं हो। और किसी की बात सुनाई देकर तुम उस बात में जा रहे हो तो तुम गुरु के सानिध्य में फिर नहीं हो। तुम्हें गुरु के अलावा कोई दिखना ही नहीं चाहिए। भीड़ में होकर भीड़ को मत देखो। सिर्फ आप केंद्रित रहो। गुरु कैसे जी रहा है, गुरु क्या कह रहा है, गुरु का आचरण कैसा है, गुरु हमें बता क्या रहा है। हमें जीवन जीने के लिए देखो, जैसे विज्ञान है। हम जब कोई काम करेंगे तो विज्ञान का सहयोग लेना पड़ेगा। विज्ञान क्या है? जब आप कुछ करते हो तो आप वो विज्ञान ही हो, क्योंकि आप कुछ अलग तरीके से करना चाहते हो। मिस्त्री ने छत पर चढ़ने की सीढ़ी बना दी, विज्ञान ही तो है। आपने गेहूं से रोटी बना के खा ली, तो विज्ञान ही तो है। आपको अगर कुछ करना है तो विज्ञान का भी सहयोग लेना पड़ेगा। सिर्फ जीने के लिए नहीं। जीने के लिए तो पशु विज्ञान का उपयोग नहीं ले रहे हैं। क्या वे नहीं जी रहे हैं? पशु थोड़ी ना विज्ञान का उपयोग कर रहे हैं। जंगल में इतने जीव-जंतु जी रहे हैं, क्या विज्ञान का उपयोग कर रहे हैं? वो तो जी रहे हैं। लेकिन वह जी रहे हैं, कुछ कर नहीं पा रहे हैं। वह सिर्फ भोग, भोजन और बच्चे पैदा करना, कोई कर्म नहीं कर पा रहे हैं। जब आपको समाज के लिए काम करना है तब आपको विज्ञान का सहयोग लेना पड़ेगा। और विज्ञान का योगदान हर व्यक्ति का है, क्योंकि हर व्यक्ति कुछ नया करता ही है, कुछ नए तरीके से करता ही है। हर व्यक्ति जितना बताया गया उतना नहीं करता, कुछ अलग करता है। अच्छे से मैं कैसे कर सकूं, यही विज्ञान है। तो मेरा यह कहना है। तब मैंने उसको बोला जिन्होंने मुझे मित्र बोला। मैंने कहा कि देखो, आप पढ़ाई-लिखाई को साइड में रखो। आप पढ़ाई-लिखाई करके पैसा कमाए हो। जब आत्मिक कल्याण होगा, तो वहां आपका संस्कार काम आएगा, आपका व्यावहारिक जीवन काम आएगा। आपने किस तरीके से जिया है वो काम आएगा। आपका पढ़ाई काम नहीं आएगा। पढ़ाई का काम समाज तक, व्यवस्था तक है। आज देखो, कई सौ वर्ष पहले के लोगों को लोग फॉलो कर रहे हैं। वो अनपढ़ थे। क्या उन्होंने पा लिया, क्या समझ लिया, अपने स्तर को कहां ले गए कि आज भी उनकी बातें हो रही हैं, कालिदास की, कबीर की। अगर आप बाहरी जगत से देखोगे तो पढ़े-लिखे नहीं। लेकिन राजा भी उनके यहां जाकर मस्तक टेकते थे। क्या था उनके पास? वह अपने को अपनी समझ से कहां ले गए और कैसे ले गए, किस तरीके से जीवन जिया कि वो उस स्तर पर पहुंच गए। वो थी ईमानदारी और सत्कर्म, और गुरु का अनुसरण। हम जब किसी गुरु के शरण में गए तो उसके अलावा मुझे कोई नहीं दिखना चाहिए। हमें उसके ही संस्कार ग्रहण करने चाहिए, उसके ही आचरण ग्रहण करने चाहिए। हमें उसको देखना चाहिए। मुझे थोड़ा सा सेवा का मौका मिला, मैं उसमें राग-द्वेष पैदा कर रहा हूं। और वह पूरे सिस्टम को चलाते हुए एकदम शांत, ऐसे पड़ा है पागल की तरह। मुझे थोड़ा सा सेवा का अवसर मिला अपने आप को संवारने का, तो हम कुछ लोग मिलकर वही राग-द्वेष पैदा कर लिए, वही सब आपस में गिरा लिए। और वो पूरा सिस्टम चला रहा है और एकदम आराम से, आनंद से पड़ा है। सोचो, मुझे बस तिनके जितनी सेवा मिली, वो भी तुम्हें तारने के लिए मिली है, तो मैं उसमें भी मिलकर राग-द्वेष पैदा कर रहा हूं। और वो पूरा सिस्टम कैसे चला रहा होगा, और हंसता पागल की तरह पड़ा रहता है। क्या पा लिया? कुछ तो पाया, सब कुछ पाया। कि यार पागल की तरह पड़ा है और ऐसे चल रहा है। और मैं एक घर चलाने में एकदम परेशान रहता हूं। दो-चार परिवार को पालने के लिए कितनी बेईमानियां कीं, कितनों को लूटा। और वो जंगल में मस्त पड़ा है और चल रहा है। क्या पाया उसने? कुछ तो पाया है। और मैं उसी आश्रम में, उसी कुटिया में एक सेवा में राग-द्वेष पैदा कर रहा हूं, और वो पूरा चलाते हुए भी एकदम आनंद से है, कुछ कह ही नहीं रहा। तो तुम उस स्तर पर तब पहुंचोगे जब उसके आचरण को अपनाओगे। एक डॉक्टर बनना है तो डॉक्टर का आचरण अपनाना पड़ेगा। इंजीनियर बनना है तो इंजीनियर का आचरण अपनाना पड़ेगा। उसी तरीके से पढ़ाई-लिखाई करनी पड़ेगी। अगर आप किसी को देखे हो और सोच रहे हो मैं भी ऐसा बन जाऊं, तो उसने जैसे-जैसे किया है वैसे-वैसे करोगे तभी बन पाओगे। करना पड़ेगा। अक्ल लगाने की जरूरत है। आप समझो अपने आप को। आप जिसके लिए बेईमानी कर रहे हो, करने की जरूरत ही नहीं है। ये रिश्ते सिर्फ जरूरत के हैं। आप अपनी समझ को विकसित करो। और आप अगर किसी भी रिश्ते में जी रहे हो, चाहे वो गुरु और शिष्य का रिश्ता हो, चाहे पत्नी और पति का रिश्ता हो, चाहे मां-बाप का रिश्ता हो, चाहे बाप-बेटे का रिश्ता हो, आप उस रिश्ते को ईमानदारी से निभाओ। चाहे वो मित्र का रिश्ता हो। अगर किसी को दोस्त बोल रहे हो तो फिर वो दोस्ती निभाओ। दोस्ती की परिभाषा समझो, मित्रता की परिभाषा समझो। बस कुछ भी बोल दिया। बोल-वचन से पेट थोड़ी भरता है। आपके घर कोई आ जाए, आप किसी घर चले जाओ और बढ़िया-बढ़िया बोल-वचन मारो और गद्दा लगा दो, क्या नींद आएगी? फिर वहां दोबारा जाना चाहोगे? पूरा परिवार खा-पी के सो जाए और तुम्हें गद्दा लगा दे, तो क्या दोबारा वहां जाओगे? तो मेरा यही कहना है कि भाई, किसी भी रिश्ते को अगर आप बता रहे हो तो आप पहले उस रिश्ते की परिभाषा समझो। हवा-हवाई में सिर्फ रिश्ते उछल रहे हैं। यह देखना बड़ा जरूरी है। तो मेरा यही कहना है कि सबसे कठिन हमने बना दिया ईमानदारी को। ईमानदारी अपना लो। और जहां भी जिस उपदेश से गए हो, जिस उपदेश से मिलना हुआ है, उसी उपदेश पर काम करो, उसी के लिए काम करो। आप उसी पर काम करो जिसके लिए गए हो। और काम करना है तो फिर और जगह चले जाओ, जहां जैसी व्यवस्था है वहां वैसा काम करो। अगर कोई जगह बनाया गया है तो उस जगह पर वही काम करो। अगर वह काम नहीं करना है, अगर कुछ और करना है तो उस जगह चले जाओ। भाई, आप बियर बार में जाके राम-राम कहोगे तब भी लोगों को तकलीफ है। और पीने वाला मंदिर में आ जाए तो भी तकलीफ है। राम-राम कहना है तो मंदिर जाओ, एकांत जाओ। और दारू पीना है तो बार में जाओ या कोई ऐसी जगह जाओ, तुझे कोई नहीं बोलेगा। लेकिन तुम उल्टा चाल चलते हो, सबको परेशान कर रहे हो। अब जगह है। यहां पतन की भी जगह है, उद्धार की भी जगह है। दोनों जगह हैं, जाओ। लेकिन अब उद्धार वाली जगह पर आकर तुम और लोगों का पतन करना चाहते हो। खुद तो सही चाल चल नहीं रहे हो। तो एक काम करो, पतन वाली जगह पर चले जाओ। तुम संसार में खूब बातचीत करो, तुम्हें कोई रोकेगा ही नहीं। वहां लोग इंतजार कर रहे हैं। तुम दुनिया में कहीं भी चले जाओ, तुम्हें कोई ना कोई मिल ही जाएगा तुम्हारे जैसा बातचीत करने वाला। तो साधना के स्थान पर आए हो, इतनी तो ईमानदारी रखो कि मैं जिसके लिए आया हूं, जितने क्षण में हूं, मैं वही करूं। नहीं तो चला जाओ, और जाके खूब जितना प्रपंच करना है बाहर करो। लोग तो इंतजार कर रहे हैं। इसलिए मैं बता रहा हूं कि आप वहां गिरे तो यहां उठ जाओगे। आश्रम, कुटिया इसलिए बनाया गया है। लेकिन अगर यहां से गिरे तो फिर कहां जाओगे? अगर यहां बेईमानी कर ली तो फिर तुम्हारा क्या होगा, तुम सोच भी नहीं सकते। आप एक घर बनाए, कुछ बच्चों को पढ़ा रहे हो, खिला रहे हो, पूरी जिंदगी लग गई इस बनाने में। एक व्यक्ति का पूरा जीवन लग गया है। वो जता नहीं रहा है। तो इसका मतलब यह नहीं कि आप कुछ भी करोगे। और यह मत समझना कि आप आड़ी-तिरछी बात करो, उसे पता नहीं। तुम कहीं भी बात करो, उसे चेहरा देख के पता चलता है कि तुम क्या कर रहे हो। इतना अनुभव उसके पास हो गया है, क्योंकि तुम्हारी समझ से बहुत आगे निकल गया है। जैसे जानवर के व्यापारी देख के बता देते हैं गर्भवती है कि नहीं। वो गर्भ के समय वहां नहीं थे, लेकिन पेट देख के बता देते हैं गर्भ है कि नहीं। कुछ लक्षण होते हैं। वैसे ही अगर दो साल के बाद भी गुरु आए तो साधक को देख के बता देगा कि दो साल तक इसने क्या किया। क्योंकि सुधार देखेगा। एक डॉक्टर की तरह पेशेंट को देखेगा। अगर दवा देकर गया है तो वो दोबारा आएगा तो पता चल जाएगा कि राहत में है कि नहीं। अगर कोई भी काम करता है व्यक्ति, और उसमें वह जानकार पूरी तरह है, पूरी तरह सक्षम है, तो वह आपको देख के बता देगा। जांच की जरूरत थोड़ी ना है। तो मेरा यही कहना है कि आप जहां हो, जिस रिश्ते में हो, जहां भी हो, आप जिसके लिए हो वही काम करो। अगर आप देखोगे तो आप फालतू, पूरा दिन-रात, काम कम और बर्बाद ज्यादा करते हो। बेमतलब की बातें करते हो, गपसड़ मचाते हो, जिसका जीवन में कोई मतलब ही नहीं है। आप समझो, आप जैसा बातचीत करते हो वैसा कर्म होने लगता है, फिर वैसा आप बनने भी लगते हो। तो अपनी समझदारी से रहो। और जिस उपदेश को ले आए हो उस पर पूरी तरह काम करो। मत घूमो और मत लोगों को घुमाओ। नहीं तो फिर जिंदगी, एक दिन ऐसे शरीर छूटेगा, कहां जाओगे, कुछ है तो पता ही नहीं। इतना तो पता है कि इतना गलत कर दिया हूं कि बुरा ही मिलेगा, अच्छा तो नहीं मिलेगा। अब मुंह के चक्कर में आकर तो अभी भी संभल जाओ। अभी भी मौका है। आज जिस उपदेश को ले आए हो पूरी तरह काम करो। बगल वाला कर रहा है या नहीं कर रहा है, उससे लेना-देना आपका नहीं है। उसका लेना-देना उसके पास है जिसके पास वो गया है। आप वो मत संभालो कि यह नहीं कर रहा है। तुम कर रहे हो क्या? वो नहीं कर रहा है, जिसके पास गया वो देखेगा, तुम क्या देखोगे? लेकिन हम इसी चक्कर में पड़ जाते हैं कि यार यह नहीं कर रहा है। तो तुम कर रहे हो क्या? कहां कर रहे हो? अगर तुम करते तो वह कहां दिखता तुम्हें? उसको तो वह दिखेगा जिसके शरण में आया है। या तो आपको जवाबदारी देकर गया हो, तब आप देखो। नहीं तो आप जिसके लिए आए हो वो करो, जिससे आपका उद्धार हो, जिससे आपका आत्मिक कल्याण हो।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 19 अप्रैल 2026, इस वक्त इस दुनिया में सबसे कठिन कार्य क्या है ? #योगी · 2026-04-19