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प्रश्नोत्तर P7-0191 · भाग 7

एक साधक दो-तीन महीने पहले वीडियो देखकर आया। पहले और लोगों के प्रवचन जंच नहीं रहे थे। आपका वीडियो पहले अटपटा लगा, फटे वस्त्र में बैठे किसी को सवाल पूछते देखा, आगे निकल गया, फिर लौटकर पूरा सुना तो लगा यही आत्मकल्याण का रास्ता है। पत्नी रोकती थी, बच्चों की शादी के बाद साथ चलने की बात हुई। दादी की गति देखकर लगा कि बच्चों के लिए कमाते रहने के बाद भी वही गति हो सकती है। संसार सबको लात मारता है, फिर भी लोग संसार के लिए पागल हैं। वह पूछता है, संसार में रहते हुए कर्म कैसे करें कि जीवन आत्मकल्याण की ओर जाए?

पूरी तरह नियम में रहना। नियम में रहने वाले का ही उद्धार होगा। और नियम तोड़ने वाला नीचे जाएगा। याद रखना। तो नियम में ही रहना। बगल वाला रह रहा है कि नहीं, उससे तुम्हें मतलब नहीं है। तुम्हें सिर्फ किससे मतलब है? एक अपने आप से, और एक जिसके पास आए हो उससे। बस। तो उसके बनाए हुए नियम में रहो। बस उसी में कल्याण छिपा हुआ है। देख, ईमानदारी और सत्कर्म और सत्संग। अब सत्कर्म क्या है? जरूरतमंद की सेवा। और एक, जहां से मैं लाभ ले रहा हूं उसको सहयोग करूं। जैसे यहां से कितने समय से वीडियो सुन रहा है? लगभग तीन महीने। अब तीन महीने में कुछ तो लाभ लिया होगा ज्ञान का। बहुत लाभ। तो जिसका ज्ञान ले रहा है वह व्यक्ति भी काम कर रहा है। तो देख, उसको क्या सहयोग दिया, उसके काम में हमने क्या सहयोग दिया। जिस लायक मैं हूं, चाहे एक रुपया, चाहे सौ रुपए, जिस लायक मैं हूं वहीं से सहयोग करूंगा ना। एक तो सामने वाले की जरूरत, और अपनी योग्यता। तो मेरे काम में भी सहयोग करना। किया कि नहीं? अभी तक किए नहीं। बस करते रहना। हर महीने, जैसे तुम अपने बच्चों के लिए निकालते हो, क्योंकि मैं भी तो समाज के लिए काम कर रहा हूं। अगर मैं यह काम नहीं करता, सिर्फ वीडियो बनाता, तब जरूरत नहीं थी। तब तो अपने पेट के लिए चाहिए था, तो इतना मेहनत कर लेता, कहीं भी मिल जाता। लेकिन अब काम लाखों से, हजारों से, लाखों-करोड़ों का है। तो देखना यह है कि मैं इनके काम का लाभ ले रहा हूं और यह समाज के लिए काम कर रहे हैं, दिख भी रहा है। तो मुझे भी, मेरी जितनी योग्यता है, मुझे भी हर महीने सहयोग करना चाहिए। अगर मैं सिर्फ वीडियो बनाता, ये सब काम नहीं करता, तब कोई जरूरत नहीं थी। तब तो वीडियो देखने से मिल जाता। हमको पता नहीं था कि कैसे हम क्या सहयोग करें। लेकिन जब से आप श्रीलंका गए थे, वहां से लाइव हुए, वहां से बाली गए, वहां भी लाइव देखे। तो उस समय सुनने से क्या फायदा होगा? जैसे हम सेवा करें, हमको अगर करें तब ना हम और कुछ आगे बढ़ेंगे। वही तो हमको लगा। तो हम फिर लिख के भेजे कि हमको कैसे सहयोग करें। तो आप बोले कि जाओ चैनल पर जाओ, इसमें व्हाट्सएप दिया हुआ है, स्कैनर दिया हुआ है। स्कैनर से हम अपना योगदान दिए। हां, हर महीने, जिस लायक आप हो, जहां से आप हो वहां से करो जरूर। यही तो सत्कर्म है। अगर कोई व्यक्ति किसी के काम से मुझे लाभ हुआ, अगर मैं उसे सहयोग करके ताकतवर बनाऊंगा तो मेरे लिए और कुछ कर सकता है ना वो। तो बिना लिए जब इतना कर दिया, तो जब मैं दूंगा तो क्या करेगा वो। जब उस व्यक्ति ने बिना लिए मेरे लिए इतना कर दिया जिससे मेरे जीवन में बदलाव हो गया, तो अगर मैं उसे ताकतवर बनाऊंगा तो फिर वह तो मेरे लिए और करेगा ना। आज जैसे आकर यहां कितने आनंद से रह रहे हो। कोई कमी है? कोई कमी इसलिए नहीं कि लोग सहयोग दे रहे हैं। और मैं उन्हीं लोगों से बोलता हूं जो लोग मेरे काम का लाभ लेते हैं। काम का लाभ नहीं ले रहे हैं तो वह तो सहयोग ना करें, क्योंकि वह करने के बाद फिर पछताएंगे, क्योंकि मिलेगा कुछ नहीं। हां, जितने लोग काम का लाभ ले रहे हैं, मैं उनसे यही कहना चाहता हूं। जितने लोगों को भी लग रहा है कि नहीं, इनके काम से मुझे लाभ हुआ, तो सहयोग करना चाहिए। कोई भी हो दुनिया का, सिर्फ मैं नहीं। एक होता है वीडियो बना देते हैं। तो उन्हें आप अगर नहीं सहयोग करोगे तो वीडियो देखने से ही उनको मिल जा रहा है। लेकिन अगर वीडियो बनाने के अलावा वह और भी काम कर रहा है, तो उसमें अर्थ लग रहा है। अब यहां क्या, करोड़ों का खर्च है। तो करोड़ों चैनल से थोड़ी ना आ रहे हैं। इतना वह थोड़ी ना है। तो करोड़ों का काम लोगों के सहयोग से होगा ना, क्योंकि वह बाहर काम कर रहा है। उस बाहर काम में उसे सहयोग करो। और वो आप ही के लिए तो कर रहा है भाई। ज्ञान आपने सुना, आपको समझ में आया, तो आज जगह पर व्यवस्था है, तभी तो आकर सुकून से, आनंद से रह रहे हो। अगर ये व्यवस्था नहीं होती, पेड़ के नीचे रहना होता, थोड़ी ना आप इतने आनंद से रह पाते। अगर भोजन नहीं होता, व्यवस्था नहीं होती, तो आप इतने समय से यहां रह पाते क्या? भाग जाते ना, क्योंकि भूख है ना, पेट है। धर्म भी तभी समझ में आता है जब पेट में रोटी होती है। तन पर कपड़ा होता है, बिस्तर होता है। तभी धर्म समझ में आता है। तभी सत्कर्म समझ में आता है। तभी सेवा, तब सब समझ में आता है। लेकिन तन पर कपड़े ना हों, पेट में रोटी ना हो, रात को बिस्तर ना हो, तो आपको लगता है कुछ समझ में आएगा? कुछ नहीं समझ में आएगा रे। समझ में तब आएगा जब शरीर की जरूरत की पूर्ति होगी, तब वहां सारी बात समझ में आएगी। अब शरीर की जरूरत की पूर्ति ही नहीं हो रही तो कुछ फिर समझना भी नहीं है। पहले तो शरीर, जब साधन ही खत्म होने वाला है जिससे मैं समझना चाहता हूं। यही जब खत्म हो जाएगा तो समझने की क्षमता कहां है? तो इसलिए हर महीने, जैसा भी आपका इनकम हो, हर महीने जिसके भी काम से मैं लाभ ले रहा हूं, अगर वह बाहर का कुछ काम कर रहा है तो उस कार्य में सहयोग करो। वही सत्कर्म है। और अपनी योग्यता के अनुसार, अपनी सामर्थ्य के अनुसार। पीछा मत छुड़ाना। अपने सामर्थ्य के अनुसार।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 19 अप्रैल 2026, इस वक्त इस दुनिया में सबसे कठिन कार्य क्या है ? #योगी · 2026-04-19