प्रश्नोत्तर P9-0010 · भाग 9
आत्मज्ञान की खोज की जरूरत क्यों पड़ी? कृपया इस विरोधाभास को स्पष्ट करें।
आत्मज्ञान की खोज की जरूरत इसलिए पड़ी कि जहां मैं था, वह मुझे नहीं चाहिए था। नाम, शोहरत, पैसे, वह सब मुझे नहीं चाहिए था। चाहे वह परिवार था, मोह था, मेरे लोग थे, वह मुझे नहीं चाहिए था। तो मुझे क्या चाहिए था? उसकी मैं खोज करूं, आखिर मुझे क्या चाहिए? सीधा मैं आत्मज्ञान की खोज में नहीं निकल गया।
एक परमात्मा-सत्ता के बारे में सुना था। भगवान के बारे में सुना था। देवी-देवताओं के बारे में सुना था। तो वहां से मेरी यात्रा शुरुआत हुई। ऐसा नहीं कि हम सीधा आत्मज्ञान की खोज में निकल गए। जब मैं खोज में निकला, चाहे वह तंत्र हो, चाहे मंत्र हो, मंत्रों का उच्चारण करना, उससे शक्तियां मिलेंगी, उससे समाज का उद्धार कर सकते हो, और उन मंत्रों के द्वारा भगवान से भी मिला जा सकता है। फिर ऐसे खोज करते-करते पता चला कि जीवन में सबसे जरूरी अगर कुछ है, तो आत्मज्ञान, आत्म का ज्ञान, स्वयं का ज्ञान। उसके लिए मुझे हर जगह से निकलना पड़ेगा, जहां-जहां, जिसके लिए मैं कुछ करना चाहता हूं। तो सीधा आत्मज्ञान की खोज नहीं हुई। धीरे-धीरे हुआ। पहले तो दो हजार ग्यारह में यह हुआ, कि अब क्या चाहिए मुझे?
क्योंकि नाम, शोहरत, पैसे, जितनी मेरी सामर्थ्य थी, जितने के लायक मैं था, जितना मुझे चाहिए था, मिल गया था। तो मुझे उसमें रस नहीं आ रहा था। तो मैंने देखा कि आगे क्या है, इसके आगे क्या है। यह कमाना-खाना, इसके आगे भी कुछ है। क्योंकि मुझे न प्रॉपर्टी बनानी थी, न मुझे परिवार बसाना था। मुझे ऐसा कुछ करना नहीं था। मुझे कुछ संचय नहीं करना था, अपने लिए कुछ बनाना नहीं था। तो मैंने कहा, इसके आगे क्या? क्योंकि मैंने धन कमा के देख लिया, मैं संसार में जी कर देख लिया, तो मुझे वहां रस नहीं आया। तो हमने कहा, इसके आगे क्या? इसके आगे परमात्मा है, देवी है, देवता है, अनंत शक्तियां हैं। तो क्यों नहीं इनकी खोज की जाए। तो मैं उस खोज में निकल गया, और वह खोजते-खोजते आज मैं यहां हूं।
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वीडियो: Live के प्रश्न और उत्तर स्वयं के सामर्थ को जांच कर आगे बढ़े । #योगी · 2026-06-05