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प्रश्नोत्तर P9-0099 · भाग 9

सिद्धियां होती हैं, तो क्या करें? सिद्धि करनी है क्या, और सिद्धियों के चक्कर में पड़ना क्या है?

भाई, कार्य से आत्मिक हो, तो क्या कर ले बे सिद्धि। सिद्धि करना है तुम्हें, तो क्या कर ले। आप जब उस मार्ग में जाना। क्योंकि पूछने में भी तो समय बर्बाद कर रहा है। मैं बताऊंगा, सिद्धियां होती हैं, तो क्या करेगा। सिद्धि करेगा? मैं कह रहा हूं, होगा नहीं। आप क्या चाहते हो, वह है या नहीं, वह पक्का करो। जब तुम चाहते ही नहीं हो, जिस मार्ग में जाना ही नहीं, तो आप उस मार्ग की बात क्यों करते हो। मैं कह दूं, सिद्धि है या नहीं, उससे क्या हो जाएगा। सिद्धि करो, तो बताओ। तो फिर बात बने। और मैं सिद्धियों वाला, मैं सिद्धि का मार्ग बताता ही नहीं। तो जितने सिद्ध लोग हैं, चला जा कामाख्या। तो हमारी की न। माई, बहन, सुन। तब तो समझ में आए, सिद्धि है कि न। का, जा वहां। सिद्धियों की जगह जा। देखो कैसे। तो गाली दें। इतनी गंदी-गंदी गालियां देते हैं, आप सोच भी नहीं सकते। हमारे साथ। अरे, वह तो उनका परिणाम भी तो कामना वाला है न। वह तो भोगते भी हैं। सड़ के मरते हैं। अरे, मैं आपको बताऊं। मैं कामाख्या जा रहा था, ट्रेन में। एक लड़का मिल गया मेरे साथ। मेरा एक सेवा करने वाला था, कि मतलब सामान बांध देना। हम तपस्या करते थे, तो उसको लेकर जा रहा था। अब वह मिल गया। तो रात को हम कालभैरव का मंदिर था, श्मशान था। वहीं रुके थे। कामाख्या मंदिर के थोड़ा आगे है। तो रुके थे। तो एक बाबा आया। अब एक हाथ। न पी के। एकदम रात की। मैं तो डायरेक्ट बात करता हूं। हम तो डायरेक्ट। ट्रेन में जाते हैं। हमारी सीट रिजर्व हो जाती। यह डायरेक्ट हमारा है। अब इतना हाकने लगा, कि मेरे साथ रहने वाला कहा कि नहीं, जा, आशीर्वाद ले ले। कहा। हम कहे, ले ले। हां। न लेबे, पछतावे है। अगर नहीं लोगे। मेरे साथ कोई रहता है न, कहता है कि मैं जाऊं, मैं जा। क्योंकि मुझे मालूम है, कुछ नहीं है। लेकिन तुझे यह बात नहीं मालूम है न। तू जिंदगी भर पछताएगा। गए, पांव छुए। बाबा आशीर्वाद देन। अब बाबा आशीर्वाद देन। हमको तो हंसी आ रही थी। मैं समझ गया था। इसके बाद सुबह हुई। सुबह हुई। हम कामाख्या मंदिर का दर्शन करने जा रहे थे। रास्ते में एक दुकान थी। वहां खड़े हुए। वह निकल गया, बनारस का। बनारस का निकल गया। अपने गांव के बगल का। अब उससे हमारी बातचीत होने लगी। तो ट्रेन में मिलने वाला लड़का भी वहीं, कुछ वहीं बिजनेस करता था, और वह आ गया था। गधे-गधे पर माल बेचता था। अब मिलना हमारा हो गया। अरे महाराज जी। आप। हम कहे, हां। बोला, अरे चाय-चाय पिए, नाश्ता कर। नहीं, नहीं, नाश्ता-वास्ता नहीं करेंगे। कहे, नहीं, नाश्ता करिए। ए, इधर आ रे। अब आया, दौड़ा-दौड़ा। अब वह आदमी कौन था। वही बाबा। अब मुझे इतनी हंसी आ रही है। मेरी हंसी नहीं रुक रही। जैसे ही बाबा को दौड़ते हुए देखा। ओ। तो अब मेरी हंसी। इतनी हंसी आ रही है कि मैं दबा रहा हूं। मतलब रात को कह रहा है, मेरी सब चलती है। उसका वह। ऐसे ही बुला। ए, यहां इधर आ रे। दौड़ा-दौड़ा। एक हाथ। फटाक। अब मेरे साथ वाला भी देख के भौंचक्का। अब मेरी हंसी तो रुक नहीं रही है। वह रात का आशीर्वाद ले रहा था। अब मेरी हंसी तो रुक नहीं रही। वह बैठ के वहीं भीख मांगता था। अब मेरी। वह काला कपड़ा पहना था। बाल थोड़ा बढ़ गए थे। तो अब मेरी हंसी रुक नहीं रही है। अब बोला, ए जा, चाय-समोसा ले के आ। अब वह दौड़ा-दौड़ा ऐसे गया। उसका दौड़ना भी गजब था। आया, चाय-समोसा ले के। अच्छा, बचा हुआ तू रख ले। चल जा। अब वह चला गया। अब मुझे क्या चाहिए समोसा। मुझे तो हंसी आ रही है। आशीर्वाद दे रहा है। तो यह स्थितियां हैं। मेरा यह कहना है कि बहुत समाज में भ्रांतियां हैं। मैं तो इतना भी कहता हूं कि आप समझे, तभी माने। मेरी भी बात मत मानना। क्योंकि हो सकता है, यह भी मेरा एजेंट हो। रख लेते हैं न लोग। हो सकता है मैं। अरे, आज के डेट में। दो। हम बताते हैं। हमारे यूपी में एक जन हैं। तो वह बाहर से जब मिलने आते हैं न, तो लड़कियों को सौ रुपये दे-दे। कहे, जब हमसे मिलवे, तो हम रास्ते से जाओ, तो लेट ही आए। तू प्रणाम। सौ रुपये दे। अब सौ रुपये मिले बिना, कोई एक बार लेटे में, तो आदमी का क्या करे। अब कोई उनसे मिलने आता था। जितनी लड़कियां हैं, सौ-पचास के लालच में लेटी हैं। तो अब सामने वाले को लग रहा है कि यार, यह तो महान व्यक्ति है। महान थोड़ी न है। उसके लिए शब्द नहीं है। क्या इतना गंदा है। लेकिन क्या करोगे। तो मैंने अपने आपको। आप हमारे वीडियो में देखोगे। हमने बहुत कहा है कि जब आपको समझ में आए, आप तब आगे बढ़ना। मेरे बताए मार्ग पर। नहीं तो हो सकता है कि तू आकर्षण में बढ़ जाए। और जितने जन, सौ-पचास हैं, सबके रखे हुए आदमी। हमारा एजेंट ही होता है। ऐसा मैंने खुद देखा है। तो इसीलिए मैं कहता हूं कि भैया, मुझ पर विश्वास न करना। यह प्रत्यक्ष ज्ञान है। अगर आपको ज्ञान समझ में आए, तो ज्ञान समझ कर आगे बढ़ना। मत, उनको देखना। आदमी तो रख लेता है न। आदमी बिकता नहीं है क्या। लोग झाड़ू, आश्रम का झाड़ू-पोछा कराए, बिना चेला बना देते हैं। कंठी पहना देते हैं। दिखता नहीं है। आदमी तो। अब सावधान कैसे होगे। कि आप जिसके लिए मेरे पास आए हो, वह बात करो। जैसे तुमने कहा, सिद्धियां होती हैं। अब आपको सिद्धि तो करना नहीं है। का करें, पूछते हो। लेकिन न। एक जानकारी और ले लो। बातचीत। आप मेरे पास जिस उपदेश को ले आए हो, उस पर बात करो। सिद्धियों के लिए थोड़ी न आए हो। लेकिन नहीं, सिद्धि होती है कि नहीं होती। तो कौन हो, बता दे। का कर। ऐसे जानकारी चाहे। तब सिद्धि हो। अब सिद्धि न हो। थोड़ी सिद्धि हो, तब तो आगे ले जा। न तो सिद्धि हो, चलो, तो सिखाई। यह सब के चक्कर में न पड़ो। देखिए, सिद्धियों की व्याख्या महापुरुषों ने भी तो की है। कि रिद्धि-सिद्धि के चक्कर में न पड़ना। बोला है न। बहुत महापुरुष बोले हैं न। रामकृष्ण परमहंस ने बोला। बहुत लोगों ने। स्वामी विवेकानंद से पूछा था, तुझे। मेरे पास बहुत शक्तियां हैं। तुझे चाहिए क्या, रिद्धि-सिद्धि। स्वामी विवेकानंद ने क्या कहा, कि क्या उससे परमात्मा मिलेगा। तो बोले, नहीं। वह बाधा है। तो होती है, तभी न बोला। लेकिन मुझे देखना है कि मेरा आत्मिक कल्याण कैसे होगा। सिद्धियां, रिद्धियां, नर्क की द्वार हैं। क्या है नर्क। नर्क की द्वार। समझे। तो ऐसे, भैया, आराम से। अपना आत्मिक कल्याण भी न आए है। आत्मिक कल्याण कर। यह सब कहानी इसलिए तुम्हें बता रहा हूं, कि आकर्षण में मत आना। मेरे भी मत आना। तुम्हें ज्ञान समझ में आए, तो ज्ञान ले। अपना कल्याण करना। और पता चले कि न समझ में आया, तो अवतार हुआ, तो पुनः भी न हुई है। मैं तो इसीलिए तो मैं कहता हूं कि मुझ पर कभी भरोसा मत करना। विश्वास मत करना। क्योंकि तुम जहां-जहां विश्वास किए हो, वहीं तो ठगे गए हो। तुम अगर अपनी समझ से समझोगे, तो तुम्हें कोई ठग नहीं सकता। और तुम किसी के आकर्षण में आओगे। जैसे मैं। मैं दीक्षा लिया, तो बहुत पछताया। क्योंकि दीक्षा लेने से पहले लोगों ने मुझे बता दिया, यह साक्षात शंकर है। यह। हम कहा, साक्षात शंकर। जब मिल गया, तो ले लेती। लेकिन लेने के बाद हमारी एनर्जी डाउन हो गई। क्या हुई। इसका पता मुझे चला, जब मेरा वह माला हटा, तो मेरी एनर्जी फिर हाई हो गई। क्योंकि मैं दीक्षा लेने के पहले ही आठ महीने का व्रत था। और बहुत साधना की थी। त्राटक साधना। वाममार्गी साधना। बहुत साधना की थी। रात-दिन काली मां, कालभैरव की साधना करता था। अब उस ऊर्जा का उपयोग कहां करूं, वह मुझे नहीं मालूम था। ऊर्जा तो खूब आ गई। अब जैसे एक बालक को दो हजार का नोट मिल गया। जा, दुकान। कहे, चॉकलेट दे दे। नहीं। अब सामने वाला बेईमान है, तो कहेगा, ला, थैली में दे। ओ। अब उसको क्या पता, यह कितनी ऊर्जा है। वही हाल मेरी थी। ऊर्जाओं को मैंने ऐसे ही। ऐसे ही मेरा नाम दुर्वासा पड़ गया था। मैं कहता था, जा, तुझे कल कुत्ता काट लेगा। तो काट लेता था। तू बीमार हो जाएगा, तो बीमार हो जाता था। मेरा नाम दुर्वासा पड़ गया था। मुझे यह कहा जाता था कि तुम अब यह सब मत बोलो। मैं अब बाद में मैं पछताया, कि यार, यह क्या कर दिया। लेकिन अब ऊर्जा ही ऊर्जा मिल गई। लेकिन ऊर्जा का उपयोग कहां करना है, वह मुझे नहीं पता था। तो जैसा आचरण रहेगा, वही करेगा। तो तोड़-फोड़ करे, मजा आवे। अब कुत्ता काट ले। देखा, हमको बोले रहे न। चल, बीमार हो। कि ठीक। तो बट न। उसको उल्टा करेंगे, तब तो नहीं। तभी तो पता चलेगा, मेरे में ताकत है। अब के बीमार हो, तो के ठीक कर। तो दोनों के बतावे के। बाकी देख, हम। ताकत हो रही। क्योंकि अगर बीमार को ठीक करूंगा, तो ठीक वाला नहीं मानेगा। तो तुझे बीमार करना है मुझे। मैं ऑफिस में जिस कुर्सी पर बैठता था, मैं कहता था, अगर इस पर कोई बैठा, न, बीमार हो जाएगा। तो झाड़ू-पोछा वाले भी पछताते रहे थे। एक-एक मैनेजर। मैं नहीं था, तो वह बैठ गई। उसने जांच-नाच। और वह बीमार हो गई। वह बीमार भी। और उसकी बीमारी के बाद हमें बड़ी खुशी मिली। और न बीमार हो, तो हम तो बड़ा ज्यादा वह हुई। हम दुखी होते हैं न। देखिए, कभी-कभी न, कभी-कभी लोगों के दुख से हमें मजा आता है। मैं अपने को सत्य दिखाना चाह रहा था। कि मैं सत्य। और रोके रहे। का करे। कामना चाहत। यह भी तो गलत है न। तो यह, भैया, एक काम करो। जिसके लिए आए हो, वही बात करो। किसी के प्रभाव में मत आओ। भीड़ के चक्कर में मत आओ। समझा था कि नहीं। भीड़ के चक्कर में मत आओ। अब हम दीक्षा ले ली। शंकर का अवतार ले तो लिया। लेकिन जैसे ही लिया, तो मुझे लगा कि मैं डाउन चला गया। मूड चला गया। फिर जब वह मेरा कंठी उतरा, तब मेरी ऊर्जा फिर जली। टूट गया। और मैंने उसे पहना नहीं। और मुझे पता चल गया था। पता चल गया। तो फिर अब निकल भी नहीं सकते। धीरे-धीरे ही तुम फिर उठोगे। तो लोगों के आकर्षण के चक्कर में मत पड़ो। जिसके लिए गए हो, बस वही बात करो। और खुद समझो। आकर्षण में मत आओ। किसी के आकर्षण में मत आओ। हो सकता है, अगर एक लाख की भीड़ हो, तो एक लाख के एजेंट उसके हों। आप कभी भी अपनी समझ से आगे बढ़ो। वह एक लाख को समझा पा रहा है, और सब समझ रहे हैं। कह रहे हैं, नहीं, मुझे समझ, और तुम्हें नहीं आया। तो उस एक लाख के भेड़ की भीड़ की वजह से मत टिको। तुम आगे बढ़ो। कहां बढ़ो? जहां तुम्हें समझाया जा सके। जहां तुम समझ सको। जहां तुम्हारा उद्धार हो। और उद्धार तुम्हारा वहीं होगा, जब तुम अपनी समझ से समझोगे तब। समझा था कि नहीं? न आपको उसका आश्रम देखना है, न तो उसके यहां भीड़ देखना है, न तो उसका रहन-सहन देखना है, न तो उसकी तपस्या से मतलब है। मेरा काम सिर्फ मेरे काम से मतलब है। इतने मतलबी बन जाओ। और जब उसके द्वारा आपका उद्धार होने लगे, तो आप देखो कि यह व्यक्ति मेरे काम आ गया। क्योंकि मैं बहुत दिनों से भटक रहा था। और मुझे यह समझ में आ गया कि इसकी, इसने कुछ ताकत दी। और उस ताकत का उपयोग करके मेरा स्तर उठ रहा है। यह बात का मुझे पता है। तो आपके पास भी कोई ताकत है, तो उसके काम में हाथ बढ़ाओ। यह जरूर करो। इतने मतलबी मत जाओ, कि हम ताकत ले के चल दिए। नहीं। फिर वह ताकत का दुरुपयोग करोगे। क्योंकि एक तरह से तुमने चोरी की न। उसने तुझे ताकत दी। उस ताकत के लिए उसने तप-तपस्या की होगी, मेहनत की होगी। तो जब तुमने लिया, तो तुम्हें यह देखना है कि तुमने लिया, तो दिया क्या। तुम किस लायक थे। इसीलिए तो कहा गया है न। मित्र के यहां, कहीं मेहमानी जाओ, गुरु के यहां कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए। यहां तक कि कहा गया है कि कुछ नहीं, अगर आपके पास है, तो पत्ते ही ले लो। कुछ नहीं है। कुछ ऐसे पत्ते होते हैं, जैसे तुलसी के। बहुत ऐसे पत्ते होते हैं, स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। कुछ ऐसे पत्ते ले लो, तब जाओ। और उस पेड़ से कहो कि मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है। और मैं। और देखा, अगर सूखा, गर्मी, महीना बाद पानी डाल दो। और कह दे, यह पत्ता मैं ले के जा रहा हूं। मुझे जरूरत है। जीने का तरीका बदलो। पहले तो मानव बनो। हम दानव हो गए हैं, कि बस आओ, ले लो, ले लो। अरे भाई, तुमने दिया क्या। लो, लेकिन दो भी तो।

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वीडियो: लाइव के प्रश्न और उत्तर अपना स्वयं का कल्याण कैसे करें ? #योगी · 2026-06-06