आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P9-0180 · भाग 9

जिन गुरु ने आरंभ में ध्यान का मार्गदर्शन दिया था, उन्होंने कहा था कि न आत्मा का ध्यान करना है, न परमात्मा का ध्यान करना है। यह बात क्लियर नहीं हुई। ऋषिकेश, गंगोत्री, फिर कोरोना, वेदांत श्रवण के बीच साधना बिगड़ गई। पहले तीन-तीन घंटे एक आसन में बैठ लेता था, पद्मासन भी सिद्ध हो गया, फिर मन डिस्टर्ब हो गया। ना आत्मा का ध्यान, ना परमात्मा का ध्यान, इसका क्या अर्थ है? और आसन सिद्ध करने से क्या होता है?

न आत्मा का ध्यान करना है, न परमात्मा का ध्यान करना है। आपके द्वारा क्या हो रहा है, उसका ध्यान रखना है। बस। क्या हो रहा है, आपके द्वारा क्या हो रहा है, उसका ध्यान करना है। अब आपने कहा कि मैंने यह आसन सिद्ध कर लिया। लेकिन इस आसन से होगा क्या। मान लीजिए आप कहीं जाकर जंगल में गड्ढे खोद रहे हो। आप एक साल बोलो कि बाद में मुझे पेमेंट चाहिए, तो कोई देगा? आप जहां गड्ढों की जरूरत थी, वहां जाके खोदते, तो पेमेंट वहां मिलता है। एक साल के बाद आप प्रकृति को बोल रहे हो पैसा दो, किसी को बोल रहे हो कि पैसा दो। तो आपका गड्ढा खोदने का पैसा मिलेगा क्या। आपने तो और नुकसान कर दिया। वहां जरूरत ही नहीं थी। कोई जानवर जाके गिरेगा, उसका भी दोष लगेगा। तो गड्ढा कहां खोदना है, यह किसी जीवंत गुरु से जाके पूछो। कौन सा पद्मासन लगाऊं, कौन सा आसन लगाऊं, उस आसन में लगा के करूं क्या। यह बताओ। व्यक्ति धीरे-धीरे अहंकारी हो जाता है, कि मैंने चार घंटे का आसन सिद्ध कर लिया। इससे क्या अच्छा हुआ। चार घंटे तू बैठ गया। क्या हुआ। बैठकर किया क्या। कुछ नहीं। उल्टा मन डिस्टर्ब हुआ। आप किसी कंपनी में चले जाओ और बोलो कि मैं तो महीना भर बैठा रहा आपकी कंपनी में। तो क्या पेमेंट मिलेगा। काम से मिलेगा। वह भी उसके तरीके से काम करना पड़ेगा, जिसके द्वारा पेमेंट चाहिए। तो किसी जीवंत गुरु के शरण में जाओ। वह आपको मार्ग बताएगा। उस मार्ग के द्वारा आपका कल्याण होगा। बस आप रहिए। आप इतने वीडियो सुन रहे हो। मुझे जब-जब लगेगा आपको क्या जरूरत है, मैं खुद दूंगा। जैसे एक मां होती है, अपने बच्चे को कब क्या देना है, कौन सी दवा देना है, वह बच्चे को टेंशन नहीं रहता। मां को रहता है। अगर आप मेरे सानिध्य में आ गए हो तो मेरी जिम्मेदारी। अगर एक मां अपने बच्चे को सही से न पाले तो वह मां कहलाने लायक नहीं होगी। उसको दोष भी लगेगा। अगर आप मेरे सानिध्य में आ गए हो तो बात खत्म हो गई। आप बस आ गए। बस बात खत्म। अब कब आपको क्या देना है, वह मेरा काम है। आपका काम नहीं है। आपका काम बस आना था। और मैं समय पर नहीं दूंगा तो गुनहगार मैं हूंगा, तुम नहीं। जैसे एक मां के द्वारा बच्चों का जन्म हो जाए, अगर वह सही से न पाले तो दुनिया उसे गाली देगी। देगी न। अगर आप किसी जीवंत गुरु के शरण में चले गए हैं तो उसकी जिम्मेदारी है। वह कब क्या करवाना है, वह जाने। उसका काम जाने। क्योंकि आपको नहीं पता है कब आपको क्या चाहिए। जैसे बच्चे जब भी मांग करते हैं तो देखो, उनको नुकसान वाली चीजें ही मांग करते हैं। चॉकलेट की मांग करते हैं। उससे उनका दांत सड़ जाता है। अनेक तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं। लेकिन मां उतना ही देती है जितने में स्वस्थ रहें। अगर उनके ऊपर छोड़ दें तो क्या करेंगे, पता है? दांत एक-दो नहीं सड़ेगा, पूरा सड़ जाएगा। बच्चे हमेशा अपने नुकसान वाली चीजें मांगेंगे। तो साधक क्या सोचते हैं कि बस पहुंचे, शक्तिपात कर दो। क्या भैया, तू रह। उस गुरु की जवाबदारी है जिसके शरण में तू गया है। वह कब किसको क्या देना है, वह देखेगा। अब लोग प्रश्न कर देते हैं, स्वामी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने तुरंत करा दिया, सबको क्यों नहीं करा दिया। और स्वामी विवेकानंद जब पहुंचे तो बोले, तेरा मैं इंतजार कर रहा था। क्या उसके पहले उनके पास शिष्य नहीं थे? थे न। स्वामी विवेकानंद की योग्यता थी। उस योग्यता को उन्होंने प्रणाम किया। वह योग्यता का पता स्वामी विवेकानंद को भी नहीं था। किसको था? रामकृष्ण परमहंस को था। इसलिए तो उन्हें प्रणाम किया। और मां से प्रार्थना करते थे, उसे भेजो। सबको क्यों नहीं करा दिया छूकर? लेकिन सबको ऐसा नहीं दिया। जितने शिष्य थे, सबको दिया, जैसी जिसकी योग्यता, जैसी जिसकी सामर्थ्य। तो आप आए हो। जब मुझे लगेगा कि अब आपको क्या देना है, मैं दूंगा, अपने आप दूंगा। क्योंकि मैं नहीं दूंगा तो जिम्मेदार मैं रहूंगा। मां बच्चे का अगर सही से लालन-पालन न करे तो उसकी क्या स्थिति होगी, भोगना पड़ेगा न उसको। तो आप अगर मेरे शरण में आ गए हो तो जिम्मेदारी मेरी है, तुम्हारी नहीं।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: लाइव सत्संग अपनों की कुटिया में प्रश्न और उत्तर #योगी · 2026-07-16