प्रश्नोत्तर P1-0071 · भाग 1
गुरु जी, मैं शरीर को सुंदर बनाकर और ज्ञान के द्वारा मान-सम्मान, प्रभाव और नाम पाने की इच्छा में लिप्त हो गया हूं। छोड़ने का संकल्प लेता हूं, फिर वहीं चला जाता हूं, और करने के बाद दुख होता है।
बस सत्संग सुनो, इससे आपको सहायता मिलेगी और धीरे-धीरे अपने आप को निकाल पाओगे। देखो मान की इच्छा क्यों है? जिससे मान की इच्छा रख रहे हो, क्या वह रहेगा? क्या उसे खुद इज्जत पाने की इच्छा नहीं है? तो ऐसे लोगों से क्या इज्जत पाना, जो खुद इज्जत के लिए घूम रहे हैं।
तो मान के लिए नहीं — आप जरूरतमंद की सेवा करिए। ईमानदारी से जीवन जियो। अपनी जरूरत को समझो, अपने कर्तव्य को समझो, अपनी जिम्मेदारी को समझो कि मुझे मानव शरीर मिला है तो क्या है। कुछ जिम्मेदारियां बचपन से मिल जाती हैं, पैदा होते ही हम लेते हैं। जितनी भी जिम्मेदारियां हैं, कर्तव्य हैं, उन्हें ईमानदारी से निभाते हुए आगे बढ़ो, अपना कल्याण करो। कोई भी जिम्मेदारी, कोई कर्तव्य छोड़कर भागो मत। जीवन में जितना मिला, जितना आपने लिया, उसको पूरा करो और आगे बढ़ो। यही नीति है और यही नीति आपको आगे ले जाएगी।
छोड़-छोड़कर भागोगे तो छोड़ने का दोष लगेगा। अगर कोई कार्य आपको नहीं करना है तो हाथ में मत लो, क्योंकि हाथ में लेकर नहीं किया तो उसका दोष लगेगा। इससे अच्छा बोल दो, भैया हम नहीं कर सकते, बात खत्म। और अगर किसी से कुछ लिया है तो देना सीखो, नहीं तो लो मत। लो ही मत, तो देने की बारी नहीं आएगी।
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