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प्रश्नोत्तर — भाग 1

योगी रविकांत जी (गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 200 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।

गुरु जी, आत्मज्ञान के बाद आपने जो शाश्वत स्थिति महसूस की, क्या उससे पहले भी जीवन में कभी उसकी झलक या क्षणिक अनुभव हुआ था, या यह पहली बार ही घटा?

यह (सन्) 20 की जनवरी के बाद ही हुआ। बाकी बहुत अनुभव हुए, लेकिन वह अनुभव कुछ अलग ही था।

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मैं आपके बताए सत्कर्म ईमानदारी से कर रहा हूं, पर मन काम-भोग के लिए परेशान करता है। शरीर से कर्म नहीं कर रहा, पर मन उधर रहता है। क्या करूं?

बस जरूरतमंद की सेवा करो, सत्कर्म करते रहो, सत्संग सुनते रहो। धीरे-धीरे वह हट जाएगा। यह पुराना है — जितना आपने किया है, वे सब यादें आ रही हैं। कोई बात नहीं, धीरे-धीरे हट जाएगा।

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गुरु जी, (कुटिया में) बिजली से संबंधित कोई काम हो तो बताना; इस बहाने मुझे आपके साक्षात दर्शन का सौभाग्य होगा।

तो कैसे बताऊंगा? यहां बिजली का काम होगा — जब यह बन जाएगा तो वायरिंग होगी — पर आपका न नंबर है, न कुछ। अगर किसी को सेवा करनी है तो (चैनल पर दिया) मोबाइल नंबर है, उस पर मैसेज या फोन कर दे कि मुझे यह कला आती है, अगर अपनों की कुटिया में इसकी जरूरत हो तो मुझे बुला लेना; मैं सेवा देना चाहता हूं और अपनों की कुटिया में सेवा देकर अपने आप को सौभाग्यशाली समझूंगा। तब कोई आपको बुला सकता है, नहीं तो कैसे बुलाएगा?

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सत्संग सुनने के बाद समझदारी तो बहुत बढ़ गई, लेकिन समाज और परिवार से कनेक्ट होना मुश्किल हो रहा है।

कोई बात नहीं। आप ईमानदारी से अपना काम करो, बात खत्म। अपने से कनेक्ट रहो।

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आत्मदेह ब्रह्मचर्य (सच्चा ब्रह्मचर्य) क्या है?

ईमानदारी ब्रह्मचर्य है। ईमानदारी अपनाओ और आगे बढ़ो। अपना आत्मिक कल्याण करो।

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गुरु जी, कुछ दिन ईमानदारी से जीता हूं, फिर भूल जाता हूं।

ईमानदारी करना भूल जा रहे हो, बेईमानी करना नहीं भूल रहे हो। बेईमानी करना भूल जाओ ना।

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मैं पढ़ाई करना चाहता हूं, लेकिन मुझसे पढ़ाई नहीं हो पा रही। मैं निष्काम कर्म करना चाहता हूं, परिणाम की चिंता नहीं है; बस आगे कभी ग्लानि न हो।

अगर आप निष्काम सेवा भी करना चाहते हो, तो सक्षम होगे तभी करोगे ना — चाहे धन की सेवा हो, तन की सेवा हो, समझ की सेवा हो। सक्षम हुए बिना कैसे करोगे? तो अगर आप समय से पढ़ाई कर सकते हो तो करो।

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संत और योगी की साधना एक है या अलग-अलग? क्या दोनों का अनुभव एक ही होता है?

योगी योग को साधता है, अपने आप को साधता है, तो संत स्थिति में पहुंच जाता है। कली, फूल और फल अलग नहीं हैं; तीनों स्थितियां अलग हैं।

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आज आपसे मिलकर बहुत आनंद हुआ, धन्यवाद।

बस यही भाव है मेरा कि अगर आप मुझसे मिले हैं, तो आप अपने आप से मिल जाइए। और जब आप अपने आप से मिलेंगे, तब देखिए आपकी स्थिति क्या होगी। मुझसे मिलने का मतलब — मेरा भाव यही है कि आप अपने आप से मिलिए और आगे बढ़िए।

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गुरु जी, कभी-कभी अंदर से ऐसी तीव्र भावना (लहर) उठती है कि हमें वहां (कुटिया) जाना ही चाहिए — मैं बड़ा काम छोड़कर ऑटो किराए पर लेकर यहां आया। क्या यह हमारे पहले के कोई कर्म हैं?

हां, जरूर आपने ऐसी इच्छा बनाई है, इसीलिए आपके अंदर से ऐसे भाव उठते हैं, ऐसी लहर आती है कि जाना ही चाहिए। तुम्हारी इच्छा ही तुम्हें लेकर आई। उसके लिए तुमने भाव बनाया था कि मुझे साधना करनी है — तो साधना का स्थान मिल गया।

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गुरु जी, कभी लगता है कि मैं (साधना के लिए) वहां बैठा हूं और मेरी गाड़ी कोई दूसरा चला रहा है, या मेरी कमाई कम हो जाएगी जो किसी के काम आ सकती थी। क्या करूं?

कम कहां कमा रहे हो? आप अपने कल्याण के लिए तो जा रहे हो। अत्यधिक मेहनत कर दो ना — जितनी गाड़ी चलाते हो, ओवरटाइम कर दो, इतना करो कि अगर मैं सात दिन जाता हूं तो वे सात दिन मुझ पर भारी न पड़ें। तुम तो पास में हो, तो यह पक्का बना लो कि महीने में 7 दिन के लिए मैं (कुटिया) जाऊंगा, और उसके लिए कुछ घंटे ज्यादा मेहनत कर दूंगा, तो सात दिन निकल ही जाएंगे। बुद्धिमानी से चलना पड़ेगा।

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गुरु जी, आपकी दिनचर्या क्या है? उससे हम लोगों को प्रेरणा मिलेगी।

दिनचर्या देखनी है तो यहीं आ जाओ। दिनचर्या क्या है? बस काम करते रहना — यही मेरी दिनचर्या है।

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गुरु जी, क्या आत्मचिंतन का समय और स्थान निश्चित होना चाहिए?

अगर कर सकते हो तो करो।

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मुझसे पढ़ाई नहीं हो पा रही। मुझे लगता है कि जब मैं पढ़ाई करूंगा तो कुछ लोग मुझे नीचा गिराने की कोशिश करेंगे।

आप सिर्फ पढ़ाई करो ना। कौन आपको ऊंचा दिखा रहा है, कौन नीचा — उससे मुझे क्या मतलब? मुझे सिर्फ पढ़ाई करनी चाहिए, अपने लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ना चाहिए।

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गुरुदेव, अज्ञात के रास्ते पर भय क्यों लगता है? क्या अज्ञात रास्ते पर चलने के लिए समर्पण और श्रद्धा से बल मिलता है और भय का नाश होता है?

अज्ञात रास्ते पर इसलिए भय होता है कि पता नहीं आगे क्या होगा। अज्ञात रास्ते पर जाना भी चाहिए, लेकिन सामर्थ्यवान बनकर।

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नेगेटिव विचारों से कैसे बचें?

नेगेटिव वाला काम मत करो ना। नेगेटिव वाला काम मत करो और जीवन में आगे बढ़ो, अपना आत्मिक कल्याण करो।

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गुरु जी, क्या ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग दोनों एक साथ संभव हैं?

हां, संभव है। ईमानदारी, सत्कर्म अपनाओ, आगे बढ़ो।

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गुरु जी, अपने साथ ईमानदार कैसे रहें?

ईमानदारी वाले काम करो। सत्कर्म अपनाओ, आगे बढ़ो, अपना आत्मिक कल्याण करो।

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गुरु जी, यहां (हरियाणा की कुटिया की जगह पर) तो यमुना का पानी आ जाता है।

आने को कहीं भी आ जाएगा, लेकिन यहां नहीं आएगा, इसलिए यहां बनाया। बाढ़ का प्रकोप आएगा तो वह बात अलग है — बाढ़ में तो एक-दो किलोमीटर तक पानी जाता है। सामान्य पानी नहीं आने वाला, यह ऊंचाई पर है, सोच-समझकर बनाया है। मैंने गांव-गांव घूमकर जितनी हो सकती थी जगह देखी, और कुटिया के लिए सबसे अच्छी लोकेशन यही मिली। मैं कभी भी अपने संकल्प में समझौता नहीं करता। जब भी कार्य करता हूं तो पूरी तरह करता हूं।

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(आध्यात्मिक) यात्रा की शुरुआत कैसे करें?

यात्रा की शुरुआत करने के लिए आप समझिए कि आपको परिणाम क्या चाहिए, और फिर यात्रा करिए। लक्ष्य क्या है? उद्देश्य क्या है?

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गुरु जी, सादर चरण स्पर्श। आपकी एक बात बहुत सुंदर लगी — ‘जितनी बड़ी गठरी, उतनी बड़ी परेशानी’। मैं आपसे मिलने आना चाहता हूं, क्या आ सकता हूं?

मिलकर क्या करोगे? मिलने के पीछे कोई मकसद होना चाहिए। आज ही व्हाट्सएप पर एक संदेश आया कि हम आपके सान्निध्य में रहना चाहते हैं। मैंने पूछा, कितने समय से सुन रहे हो, क्या लाभ लिया? लाभ तो लिया। मेरे काम में क्या सहयोग किया? बोले, मैं सत्कर्म करता हूं, ईमानदारी से जीता हूं, मैंने मन आपको दे दिया। मैंने कहा, मन लेकर मैं तुम्हारा क्या करूंगा? ये बनावटी बातें छोड़कर सीधी बात करो — मेरे काम में कोई सहयोग दिया? बोले नहीं। तो मैंने कहा, तुम मेरे सान्निध्य के लायक ही नहीं हो। (सहयोग धन का या किसी कला-गुण से सेवा का हो सकता है — जैसे अभी यहां मिस्त्री की जरूरत है, कोई कहे मैं मिस्त्री हूं, तन से सेवा देना चाहता हूं, तो फटाफट आ जाओ।) जिसे लाभ हुआ और उसने काम में कोई सहयोग नहीं दिया, वह तो सान्निध्य में रहकर और नीचे ले जाएगा, क्योंकि वह सिर्फ उपयोग कर रहा है। 1 लीटर पानी हो — आप निकालते रहो, डालो नहीं, तो एक दिन खत्म हो जाएगा, खाली पात्र बचेगा। तुम लोग ऐसे हो कि जिसके जीवन में जाओगे, खाली कर दोगे। तो मैं कहना चाहता हूं कि आप दुखी क्यों हो, निराश क्यों हो? आपने जीवन भर लोगों को बस खाली किया है। देना भी पड़ा तो ज्यादा पाने के चक्कर में दिया। इसीलिए दुखी हो, क्योंकि उनकी बद्दुआ लगी। तुमने यह नहीं सोचा कि जितना लिया है, उससे ज्यादा दूं। काश तुम्हारा गणित यह होता, तो तुम दुखी, निराश, असहाय नहीं होते। तुमने यही सीखा कि मुझे फ्री में चाहिए, और दूंगा तब जब कोई ऑप्शन नहीं होगा — मजबूरी में देते हो। दुकानदार की नजर हट जाए तो बिना पैसा दिए निकल जाओगे। अपनी स्थिति को बदलो। जीवन में किसी से कुछ ले रहे हो, तो उससे ज्यादा देना सीखो। जिससे लाभ ले रहे हो, उसे ही नहीं दे पा रहे, तो सत्कर्म क्या करोगे? बातों से बात बनने वाली नहीं है। प्रत्यक्ष में जियो और आगे बढ़ो, अपना आत्मिक कल्याण करो। मैंने आप लोगों के लिए अपनों की कुटिया में व्यवस्था कर दी है, वहां जाकर साधना करो। सान्निध्य का चक्कर छोड़ो, पहले सान्निध्य में रहने लायक तो बनो। आपकी योग्यता क्या है? योग्यता से ही तो परमात्मा मिलता है। इस दुनिया में शरीर की बनावट, रूप-रंग, धन, समझ — सब आपकी योग्यता के अनुसार ही तो मिला है। तो पहले देखो — क्या मैं सान्निध्य के लायक हूं? जिसका सान्निध्य चाहता हूं, उसके लिए मैंने क्या किया? मेरा यही कहना है — अपने अंदर यह भाव पैदा करो और कर्म में अपनाओ कि मैं जितना लूंगा, उससे ज्यादा ही दूंगा, सामने वाले को कभी कम नहीं दूंगा।

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गुरु जी, मैं आपसे मिलने आना चाहता हूं। क्या आ सकता हूं?

वही तो मैं पूछ रहा हूं — मिलकर क्या करोगे? अभी मैं बैठकर सत्संग नहीं कर रहा कि आपको सत्संग सुनाऊंगा। हां, साधना करनी है तो आलपुरा अपनों की कुटिया चले जाओ; यहां भी अभी आकर व्यवस्था देख सकते हो, या कुछ दिन बाद यहां आकर साधना करना। लेकिन अगर मेरे सान्निध्य में रहना चाहते हो, तो सान्निध्य का मतलब क्या समझते हो? जिसके सान्निध्य में रहना चाहते हो, उसके लिए क्या करोगे?

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गुरु जी, मैं विचलित रहता हूं।

विचलित तो रहोगे ना, जब कुछ करोगे ही नहीं। बाहर की चीजें बढ़ती जा रही हैं और सिर पर बोझा बढ़ता जा रहा है, क्योंकि कुछ बोझा उतार तो रहे नहीं, सत्कर्म में तो लगा नहीं रहे। तो विचलित नहीं होगे तो क्या होगे? अभी तो विचलित हो रहे हो — गिर मत जाना, नहीं तो पूरा बोझा भी नीचे गिरेगा और तुम भी गिर जाओगे।

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गुरु जी, जब आपके पास सांसारिक कुछ बचा ही नहीं, तो आपको क्या धोखा देंगे? ऐसे लोग आपके पास टिकेंगे ही नहीं।

हां, क्या टिकेंगे — मैं रखूंगा ही नहीं; हम पास आने ही नहीं देते। ये साधक हैं, ये सेवक हैं, जो पास रहते हैं (और ये वफादार कुत्ते हैं)। तो भाई, कुछ करो; बातों से बात बनने वाली नहीं है। देखना यह है कि मैं किसी के पास रहना चाहता हूं, तो क्या मैंने उसे मजबूती दी?

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गुरु जी, हम आदिवासी परंपरा से, बलि परंपरा से जुड़े हैं। (क्या बलि देनी चाहिए?)

नहीं, बलि तो देनी ही नहीं चाहिए; बलि गलत है। आप अपनी समझ को विकसित करो। किसी जीव की हत्या हमें नहीं करनी चाहिए। और जिसके लिए बलि दे रहे हो, वह भी बड़ा नाराज हो जाता है। तो मैं आप लोगों से यही कहूंगा कि जरा समझो, अपनी समझ को विकसित करो, अंधविश्वास में मत जियो।

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मन बहुत परेशान करता है।

(मन) तब परेशान करेगा ही; कुछ (सत्कर्म) करोगे तो परेशान नहीं करेगा।

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(भक्त:) आपको जो देते हैं, वह सहयोग, दान या सेवा नहीं है — वह तो (आपके ज्ञान के) उपयोग की भरपाई है।

हां, वही तो मैं कहना चाहता हूं। फिर भी मैं उसे सहयोग का ही नाम देता हूं, कि चलो कोई बात नहीं भाई, आपका भी उद्धार हो, आपका कल्याण हो।

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मैं क्या करूं? भय और चिंता में फंस गया हूं।

अब क्या बताऊं, कैसे बताऊं? इतनी देर से बता रहा हूं, समझ में नहीं आया? (क्या) सिर पत्थर पर पटक दूं, तब समझोगे?

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गुरु जी, आपके ज्ञान से यही समझ आता है कि यह समझ का मार्ग है, पर हमारे गुरु जी खेचरी मुद्रा सिखाते हैं और कहते हैं कि इससे आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान सब हो जाएगा। क्या करूं?

तो सीख ले ना, यहां क्यों पड़ा है? जब गुरु जी कहते हैं, तो सीख ले खेचरी मुद्रा — जीभ खींचकर बाहर निकाल, फिर घुमाकर अंदर डाल। जब तुम्हारे गुरु जी कहते हैं कि खेचरी मुद्रा से आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान सब हो जाएगा, तो कर ले ना, हमसे क्या पूछते हो? अगर आप हमसे पूछ रहे हो, तो इसका मतलब संशय है। जब गुरु जी कह रहे हैं तो कर लो, करके देख लो, जीवन दांव पर लगा दो — ऐसे भी जीवन में क्या हो रहा है? आप लोग समझो, प्रत्यक्ष में जीना सीखो। अगर कल्याण चाहते हो, तो उस कल्याण के लिए कुछ करना होगा, क्योंकि कुछ करके फंसे हो तो कुछ करके ही निकलोगे। इस लॉजिक को समझो। कोई आधार होगा, बेस होगा; बिना आधार के कुछ भी मत बोलो। कर्म के सिद्धांत को समझो।

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संत जी, मेरे मन के विकार नष्ट नहीं हो रहे, मैं परेशान हो गया हूं। मन निर्मल हो जाए, इसके लिए क्या करूं?

मन गंदे कर्मों से भरा है ना, तो निर्मल होने के लिए कर्म करो। ऐसे नहीं हो जाएगा कि दुष्कर्म-कुकर्म करके हमने अपने आप को अपवित्र कर लिया, अब कुछ ऐसा उपाय बताओ कि हम निर्मल हो जाएं। निर्मल होने के लिए काम करना पड़ेगा। हम अपवित्र हुए हैं तो हमने अनेकों के दिल दुखाए हैं, अनेकों को लूटा है, बेईमानी की है, सताया है — तब आज घुटन में हैं। तो आप जरूरतमंद की सेवा करो; उसकी अंतरात्मा से आशीर्वाद निकलेगा, तब जाकर कल्याण संभव है।

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महाराज जी, आपके वीडियो देखते ही आनंद की स्थिति होती है, लेकिन वीडियो हटते ही वही व्यावहारिक जिंदगी।

तो जितना सुन रहे हो, उसे व्यवहार में उतारो ना। अनेकों को सताया है, इसलिए उनकी बद्दुआ से दुखी हो। अब अनेकों लोगों का भला करना होगा, तभी हमारा भला होगा।

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गुरु जी, आज तो आप दुर्वासा ऋषि हो गए (बहुत क्रोध में बोले)।

बनना पड़ेगा ना। जब लोग मिलावटी बातें करेंगे, तो बनना पड़ेगा। तपस्या करके यहां तक आए हैं; घास छीलकर नहीं आए कि गेरुआ पहन लिया और किसी संप्रदाय के सहारे यहां तक आ गया। अपने बलबूते पर यहां आया हूं। आज मैंने प्रत्यक्ष ज्ञान पाया है और लोगों को प्रत्यक्ष ज्ञान दे रहा हूं, तो इसके लिए मैंने मेहनत की है। किसी संप्रदाय के द्वारा खड़ा नहीं हुआ, कोई बैक सपोर्ट नहीं मिला; संघर्ष करके यहां तक आया हूं। प्रत्यक्ष बोलता हूं, तो प्रत्यक्ष में मेरा जीवन है।

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आप जैसे संतों की सेवा करें और उससे परमात्मा-प्राप्ति की इच्छा रखें, तो यह स्वार्थ है या निःस्वार्थ?

नहीं, वैसा कर्म करना पड़ेगा ना। आप ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग अपनाओगे, तो यह हो ही जाएगा — आत्मज्ञान हो ही जाएगा।

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गुरु जी, मेरे माता-पिता शैतानी स्वभाव के हैं, बेईमानी और मतलब वाले हैं; मेरा दम घुटता है।

सामर्थ्यवान बनो और दूर हट जाओ, और क्या बोलूं? अगर आपको ऐसा लग रहा है, तो ऐसे लोगों से दूर हो जाओ।

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आध्यात्मिक जीवन में उतार-चढ़ाव क्यों होता रहता है?

जीवन में आप कोई भी लक्ष्य लो, जब उस तरफ बढ़ते हो तो उतार-चढ़ाव होता है। जब पहुंच जाओगे, तो उतार-चढ़ाव खत्म हो जाएगा। लक्ष्य तक पहुंचने के पहले उतार-चढ़ाव होता ही होता है — चाहे सांसारिक कोई काम करो, जब तक पूरा काम नहीं होगा, तब तक ‘कहीं यह न हो जाए, कहीं वह न हो जाए’। और परिणाम आ जाएगा, बात खत्म।

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गुरु जी, आपके चैनल कौन-कौन से हैं?

देखो, बहुत लोगों ने चैनल खोले हैं। मेन चैनल मैं चलाता हूं — ‘आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान सत्संग’ और ‘आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान योगी’। ये दो चैनल विशेष रूप से मैं खुद चलाता हूं; बाकी अन्य चैनल बहुत लोगों ने खोले हैं।

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गुरुदेव, ईश्वर को याद करके बहुत रोना आता है।

कोई बात नहीं। बस यही भाव रखो कि मैं इस दुख के भवसागर से कैसे निकल जाऊं, और इसके लिए जो भी मुझे करना होगा, मैं तैयार हूं, करूंगा। कैसे राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, ‘मेरा’ और कर्ता के भाव से मैं अपने आप को निकाल लूं, कैसे भी इस दलदल से निकाल लूं — बस यही भाव बनाया करो। जब भी आंसू आएं, यही भाव बनाओ कि हे परमात्मा, इस दुनिया को चलाने वाली कोई भी शक्ति हो — इसके पीछे किसी का तो हाथ है, कोई तो है — मुझे इतनी शक्ति प्रदान करें कि मैं कुछ करके यहां से निकल जाऊं। मैं अपनी पूरी ताकत अपने आप को निकालने में लगा दूंगा। मुझे अपना कल्याण करना है। मुझे मानव तन का मतलब समझ में आ गया है — इस तन के द्वारा उस परम सत्ता से मिलना है जहां से मैं हूं, जिससे मेरा अस्तित्व है; बनाए हुए अस्तित्व से अपने आप को मुक्त कराना है। मैं कैसे भी अपने आप को इस दलदल से निकाल लूं — बस यही भाव रखा करो।

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गुरु जी, मोक्ष प्राप्ति का मार्ग क्या है?

मोक्ष का मतलब लेन-देन से मुक्त होना; तभी मोक्ष होगा। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग — यही मार्ग है, यह आपको निकाल देगा। बस अपना उद्धार कर लो। अपनी ताकत अपने लिए लगा दो, कैसे भी अपना कल्याण कर लो।

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2010 में (किसी ने) आपसे कहा था कि आप दुर्वासा जैसे हैं।

2010 में जब मैं साधना करता था, तो लोग मुझे दुर्वासा ही कहते थे; 2011 तक कहते थे। धीरे-धीरे मैंने अपने आप में बदलाव किया, और जितनी मुझे ऊर्जा मिली, मैंने सात्विक कर्म में लगा दी, जरूरतमंद के लिए लगाई। अभी भी मैं वही करता हूं।

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गुरु जी, दीक्षा क्या है?

दीक्षा का मतलब — एक गुरु आपको ज्ञान देना चाहता है कि आपका कल्याण हो जाए; शब्द देना चाहता है कि आप इसे अपनाकर अपना कल्याण कर लो।

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गुरु जी, मुझे आपका सत्संग बहुत अच्छा लगता है और मैं उसे अपने चरित्र में उतारना चाहती हूं।

‘उतारना चाहती हूं’ — अभी तक नहीं उतारा? काश यह लिखा होता कि आपका सत्संग मुझे बहुत अच्छा लगता है और मैं आपके सत्संग में जीती हूं। अभी उतारना चाहते हो — एग्रीमेंट करवाओगे? लिखा-पढ़ी करवाओगे? कब उतारोगे, अगले जन्म में? उतार लो।

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गुरु जी, संकल्प शक्ति कैसे बढ़ाएं?

संकल्प शक्ति बढ़ाने के लिए आप सामर्थ्यवान बनें।

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गुरु जी, (लाइव चैट में) मेरे लिखे शब्दों में त्रुटि हो गई; मैं आपसे क्षमा चाहती हूं।

शब्दों में त्रुटि मत करो ना। सोच-समझकर बोलो। जितनी जरूरत है उतना बोलो; जरूरत से ज्यादा क्यों बोलते हो, क्यों फेंकते हो? जितना कर सकते हो, उतना बोलो। क्षमा की जरूरत नहीं है। अगर त्रुटि हो गई तो अभी लाइव में फिर से लिखकर बदल दो। कुछ भी भेजने से पहले पढ़ना चाहिए, क्योंकि आपने भेजा तो सामने वाला वही पढ़ेगा। कोई बात नहीं, त्रुटियां हो जाती हैं — करने वाले से ही त्रुटि होती है। अभी कुछ समय बाकी है, लिख दो; ऐसा न हो कि समय निकल जाए। यह समय किसी का इंतजार नहीं करता।

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गुरुदेव, जैसे नाली का कीड़ा बार-बार नाली में ही जाता है, वैसे ही आपका सत्संग सुनते रहने के बाद भी मैं बार-बार संसार के भोगों में फंस जाता हूं। खुद को कैसे सुधारूं, यह कैसे पक्का करूं?

कुछ समय अपनों की कुटिया में आकर अपने कल्याण के लिए साधना करो, तो धीरे-धीरे मार्ग मिल जाएगा। फिर आप वहां (भोगों में) नहीं जाओगे।

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गुरु जी, राग-द्वेष बहुत परेशान करते हैं। इनसे मुक्ति कैसे मिले?

इनसे मुक्ति तब मिलेगी, जब आप योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करोगे। जितनी आपकी सामर्थ्य है, उसमें जीने की शुरुआत करो। और अगर आपको कुछ और चाहिए और आपकी सामर्थ्य नहीं है, तो सामर्थ्य बढ़ाओ और आगे बढ़ो। राग-द्वेष नहीं होगा।

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गुरु जी, मैं अपने मूल विभाग में ट्रांसफर लेना चाहता हूं।

तो ले लो ना भाई, हम कोई रोक रहे हैं?

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(साधक:) मेरी (आत्मिक कल्याण की) इच्छा तो काफी है। लग रहा है कि जो रास्ता चाहिए था, वह अब मिल जाए।

तब लग जा, मेहनत करनी पड़ेगी इसमें। कोई भी कार्य हो, परिणाम तक ले जाने में मेहनत करनी पड़ेगी। जब सुनने और समझने में ही इतना आनंद आता है, प्रसन्नता होती है, तो जब उस परिणाम तक पहुंचेगा तब क्या होगा? उस परम आनंद तक पहुंचने के लिए पागल बनना पड़ेगा। उसके लिए अथाह मेहनत करनी पड़ेगी।

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योगी जी, आपकी मेहनत रंग ला रही है।

एकदम, मेहनत रंग लाती है। अगर आप किसी भी फील्ड में सामर्थ्यवान होकर कार्य करते हैं, तो आपकी मेहनत रंग लाएगी ही लाएगी, क्योंकि पहुंचाने का पूरा तरीका आपके पास है। इसलिए मैंने 12 साल घोर तपस्या की — घोर ही बोल सकता हूं, कल्पना से भी परे, जिस स्थिति में मैंने जिया है। मैं एक तरह का पागल ही हो गया था — प्रत्यक्ष ज्ञान को प्राप्त करना, उस स्थिति में पहुंचना कि कुछ न होने के बाद भी व्यक्ति आनंद में रहता है, वह क्या है? और वह मेरे पास ही है तो मैं उससे कैसे वंचित हूं? मैं महात्माओं को देखता था, जिनकी उपलब्धि हुई थी; उनका इतिहास पढ़ता था। मैं यही कहता था कि मुझे कब यह प्राप्त होगा? क्योंकि जब तक यह प्राप्त नहीं होगा, कोई मतलब नहीं है — चाहे रिद्धि हो, सिद्धि हो, नाम हो, शोहरत हो, पैसा हो — जीवन में उसका कोई सार नहीं है। मैंने कहा, मेरे जीवन में कुछ भी हो जाए, पर यह पक्का होगा। इसके लिए मैंने अथाह मेहनत की, अथाह संघर्ष किया — अथाह मतलब जिसका कोई अंत नहीं। मैंने कहा, जब मैं पूरी तरह सामर्थ्यवान बन जाऊंगा तब काम करूंगा। क्योंकि जब किसी भी फील्ड में आपको 101% आता है, तो आप बहुत लोगों को सिखा पाओगे और वे सीख पाएंगे। आधा-अधूरा ज्ञान है तो उन्हें क्या सिखाओगे? वे कहीं न कहीं आकर रुक जाएंगे, क्योंकि तुम्हें ही लक्ष्य तक पहुंचने का पूरा रास्ता मालूम नहीं है।

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भाव को शुद्ध कैसे करें?

भाव को शुद्ध करने के लिए आपको निष्काम सेवा करनी पड़ेगी। निष्काम सेवा से भाव की शुद्धि होती है।

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योगी जी, सभी लोगों से लगाव छूट रहा है; केवल आपका सत्संग सुनने और आपके साथ रहने की इच्छा रहती है। यह क्यों हो रहा है? लेकिन मुझ पर तीन बेटियों की जिम्मेदारी है। क्या करूं?

कोई बात नहीं, जिम्मेदारी निभाओ। साल में एक महीना (कुटिया में) रहो, और जब जिम्मेदारी निभा लो तो पूरी तरह अपनों की कुटिया में आ जाओ। आपको मेरे साथ रहने की इच्छा इसलिए हो रही है कि आप अपने साथ होना चाहते हो। सत्संग सुनने की इच्छा इसलिए हो रही है कि यह सत्संग आपको आपसे मिलाने का प्रयास कर रहा है, आपको सहायक हो रहा है। इसके द्वारा आप उस परम स्थिति को उपलब्ध होना चाहते हो। आपको अपना साथ समझ में आ रहा है, तो ठीक है। आप अपना कर्तव्य, अपनी जिम्मेदारी निभाओ, लेकिन जैसे ही जिम्मेदारी निभ जाए, पूरी तरह निकल लो। हां, साल में एक महीना तो पक्का दो — अपनों की कुटिया में आओ, एकांत में रहो, साधना करो, तपस्या करो, कुछ भी हो जाए। तभी आप पूरी जिम्मेदारी निभाकर निकल सकते हो। अगर सोचो कि एक ही बार 60 साल में आऊंगा, तो 60 साल में रोगी बनकर घूमोगे, कुछ होगा नहीं, शरीर जर्जर हो जाएगा।

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गुरु जी, मैं दिल्ली में रहता हूं। हरियाणा में (कुटिया) कौन सी जगह है? मैं आपसे आकर मिलना चाहता हूं।

पहले यह बताओ — मिलना क्यों चाहते हो? क्या मुझे बहुत समय से सुनते हो? उसका लाभ लिया, आपके जीवन में बदलाव आया, तो आपने मेरे काम में क्या सहयोग किया? मुझे सहयोग की जरूरत नहीं है, लेकिन मेरे काम में क्या सहयोग किया? और अभी मेरे पास मिलने का समय नहीं है। आप अपनों की कुटिया आलपुरा जाकर पूरी साधना कर सकते हो। यहां भी इस स्थिति में रह सकते हो तो आकर रहो। लेकिन यह मत सोचो कि आने के बाद मुझसे बातचीत होगी, सत्संग होगा — हो भी सकता है, नहीं भी, क्योंकि मैं अपने काम में बहुत व्यस्त हूं।

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गुरु जी, कोई असहाय व्यक्ति है, दोनों हाथ-पांव से विकलांग है; वह सहन कर रही है, पर लोग जानबूझकर तकलीफ दे रहे हैं। क्या करें?

तकलीफ मत लो भैया। आलपुरा चले जाओ और अपने कल्याण के लिए साधना करो।

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गुरु जी, आपसे दूर होकर भी आपके पास कैसे रहें?

बस (मेरे) शब्दों में जियो, और क्या करोगे।

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मैं कुछ दिनों से आपकी बातें सुन रहा हूं और बच्चों व पत्नी को बताता हूं, तो वे मुझे पागल और पुराने विचारों का कहते हैं।

कोई बात नहीं। आपको अच्छा लग रहा है, आपको लग रहा है कि इससे मेरा कल्याण होगा, तो आप करो और आगे बढ़ो।

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गुरु जी, कार्यक्षेत्र में कोई बेमतलब कुछ बोलकर चला जाता है, तो भीतर ही भीतर बेचैनी और घुटन होने लगती है। इससे कैसे बचें?

यही तो बात है — देखना है कि कहीं न कहीं आप कमजोर हो, इसलिए वह ऐसे बोल रहा है। अपने आप को मजबूत बनाओ। जब आप कमजोर बनकर काम करते हो — चाहे आर्थिक, चाहे शारीरिक, चाहे मानसिक — तो लोग आपको कुछ भी बेमतलब बोलकर चले जाएंगे। तो सामर्थ्यवान बनिए, यह बहुत जरूरी है। सामर्थ्यवान बनकर कार्य करेंगे तो कोई बोलने से पहले सोचेगा, क्योंकि उसे पता है कि यह व्यक्ति जवाब देगा, और अच्छे तरीके से देगा। देखिए, आलपुरा में भी मैंने सामर्थ्यवान होकर कार्य किया, तभी कर पाया; और यहां भी सामर्थ्यवान होकर कार्य करने आया, तभी कर पा रहा हूं। सामर्थ्यवान होकर काम करोगे तो फटाफट काम होगा और कोई बोलेगा भी नहीं। अगर कोई बोल रहा है, तो इसका मतलब कहीं न कहीं आप कमजोर हो। अपनी कमजोरी को दूर करो।

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चिंतन और चिंता का अर्थ क्या है?

चिंतन का मतलब — आप निकलना चाहते हो कि मैं इस भवसागर से कैसे निकल जाऊं। दुख, घुटन, बेचैनी, व्याकुलता, उदासी; आखिर में निराशा, कुछ हाथ नहीं लगता; पहले मिलता है, बाद में छूट जाता है — तो मैं इससे निकल जाऊं, यह चिंतन है। और चिंता का मतलब है — क्या होगा, कैसे होगा, क्या करूं, कैसे कुछ प्राप्त कर लूं, कैसे मान-शोहरत, नाम, पैसा कमा लूं — यह चिंता है। अब देखना यह है कि आप चिंतन में हो, चिंता में हो, या चिंतन और चिंता दोनों से मुक्त होकर उस परम आनंद को उपलब्ध हो गए हो।

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आपको सुनता हूं तो लगता है कि आपके पास हूं; हर स्थिति में आपको देख पाता हूं, चारों तरफ आप ही दिखते हैं। क्या यह भ्रम है?

आप शब्दों में जी रहे हो ना, तो जिसके शब्द हैं वह दिखेगा। आप जिसके भी शब्दों में जियोगे, उसे अपने पास ही पाओगे।

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गुरु जी, क्या सहजता ही परमात्मा है?

सहजता परमात्मा कैसे हो सकती है? सरलता, सहजता, आनंद — ये परमात्मा कैसे हो सकते हैं?

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गुरु जी, आप कहते हैं चिंतन करना है, चिंता नहीं। क्या चिंतन से भी मुक्त होना है?

हां। चिंतन से तब मुक्त होंगे जब अपने आप को निकाल लोगे। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, ‘मेरा’ और कर्ता के भाव से अगर आप मुक्त हो गए, तो चिंतन से भी मुक्त हो जाओगे।

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गुरु जी, विषयों से कैसे मुक्त हों? क्या किसी विधि द्वारा उन्हें छोड़ सकते हैं?

नहीं, विधि द्वारा नहीं छोड़ सकते। विषय समझ के द्वारा पकड़े, तो समझ के द्वारा ही छूटेंगे। विधियां कैसे छुड़ाएंगी? क्या किसी विधि के द्वारा विषय को पकड़े हो? अपनी समझ से विषय को पकड़े हो, तो समझ से ही विषय छूट जाएगा।

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गुरु जी, सरलता किसे कहते हैं?

अगर आप किसी व्यक्ति के हित के लिए कार्य कर रहे हो, तो आप सरल हो। सरल का मतलब यह नहीं कि कोई कुछ भी बोले और वह चुपचाप बैठा है — ‘भैया देख कितना सीधा-सादा है’; कोई गाली दे दे तब भी न बोले, कोई कुछ भी नुकसान कर दे तब भी न बोले। यह सरलता नहीं है। सरलता का मतलब है कि वह लोगों के हित के लिए काम करता है; उसके लिए लड़ भी जाता है, झगड़ा भी कर लेता है, किसी के हित के लिए कुछ भी कर सकता है। समाज हित के लिए कार्य करने वाला, अगर उसे युद्ध भी करना पड़े तो युद्ध भी करेगा — वह सरल व्यक्ति है, सहज व्यक्ति है, महान व्यक्ति है। समाज में मैंने देखा कि लोग कायरता को भी सरलता बोल देते हैं — ‘अरे भाई बड़ा सरल व्यक्ति है’। तो भैया, कायरता को सरलता मत बोलो।

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गुरु जी, मुझे मानसिक कमजोरी, हर बात का डर और अति-विचार (ओवरथिंकिंग) से बहुत तकलीफ होती है; लगता है कुछ हो जाएगा। कोई एक उपाय बता दीजिए।

बस मजबूत बनने का प्रयास करिए। मानसिक कमजोरी क्यों आती है? क्या सोचते हो? डर किसका है? तो अपनी समझ को विकसित करो। सत्संग को अच्छे तरीके से सुनो, पुराने वीडियो खूब सुनो। और समय मिले तो अपनों की कुटिया में आओ।

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गुरु जी, क्या किसी गंदी आदत के बारे में गहराई से चिंतन करने से उस आदत से मुक्त हो सकते हैं?

हां, अगर समझकर करोगे। समझकर करना पड़ेगा ना। अब कोई मशीन बिगड़ गई है और तुम कहो कि मैं चिंतन करके इसे बना लूंगा — थोड़ी ना बना पाओगे। जिसको बनाना आता है, उससे सीखना पड़ेगा, और वह जैसा कह रहा है उस पर चिंतन करना पड़ेगा कि मैं जल्दी से जल्दी कैसे सीख लूं। वह कह रहा है याद रख, तो याद रखना — यह चिंतन है। चिंतन का मतलब यह नहीं कि बस बैठ गए। सीखने के बाद आप मेहनत करिए, तब परिणाम आएगा।

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क्या आत्मिक चिंतन में बैठना जरूरी है?

एकदम जरूरी है, बैठना ही जरूरी है, कंपलसरी है। नहीं तो ऐसे ही पूछते-पूछते, बोलते-बोलते जीवन हाथ से चला जाएगा। जरूरी नहीं होता तो लोग एकांतवास में क्यों जाते? जितने भी महापुरुष हुए, एकांतवास में गए, तभी तो अपने आप को समझ पाए, अपने आप को निकाल पाए। पहले समझना है, फिर एकांतवास में जाकर चिंतन करना है कि मैं अपने आप को इस भवसागर से कैसे निकालूं, फिर उसके बाद काम करना है। तो सब जरूरी है।

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योगी जी, मैं कामनाओं और विचारों में लिप्त हूं। कैसे निकलूं?

बस समझकर निकलो। आकर साधना करो।

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महाराज जी, मुझे कल (भविष्य) की चिंता रहती है। क्या करूं?

कल की चिंता इसलिए रहती है कि कोई बैक सपोर्ट नहीं होगा, सब आपको ही करना पड़ रहा होगा। तो कल के लिए व्यवस्था कर लो, कल की चिंता मत करो। इतनी मेहनत करो कि जब तक जियो, सब व्यवस्था कर लो।

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गुरु जी, डर किसे होता है — मन को या शरीर को?

न मन को होता है, न शरीर को होता है — आपको होता है।

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मैं पढ़ने बैठता हूं और हॉर्न की आवाज आ जाए या कोई खांस दे, तो पढ़ाई से मन हट जाता है और गुस्सा आ जाता है। उपाय बताएं।

उपाय यही है कि अपनी नासमझी को हटाइए। कोई खांसा तो स्वाभाविक खांसा; किसी ने हॉर्न बजाया तो जरूरत में बजाया होगा। तो आपको क्या करना है? आप अपनी पढ़ाई करो ना भैया। इसमें समझ की जरूरत है। अपनी समझ को विकसित करो। अगर चाहते हो कि कोई खांसे ना, तो कहीं जंगल में जाकर पढ़ो। समाज में रहोगे तो आवाजें तो आएंगी ना।

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गृह क्लेश कैसे खत्म हो?

जरूरत में जीना चालू कर दो, गृह क्लेश खत्म हो जाएगा। जरूरत से ज्यादा, योग्यता से ज्यादा मांग है, तभी घर में क्लेश है। तो जरूरत में जियो, अपने सामर्थ्य को समझो, आगे बढ़ो, अपना कल्याण करो।

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ओवरथिंकिंग (अति-विचार) से कैसे बचें?

आप देखो कि मुझे ओवरथिंकिंग करनी क्यों पड़ रही है? क्या उसके पीछे कोई कारण है, कोई बात है? क्या मैं किसी को कुछ दिखाना चाहता हूं? किसी से इज्जत पाना चाहता हूं, मान-प्रतिष्ठा पाना चाहता हूं? क्यों?

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गुरु जी, मैं शरीर को सुंदर बनाकर और ज्ञान के द्वारा मान-सम्मान, प्रभाव और नाम पाने की इच्छा में लिप्त हो गया हूं। छोड़ने का संकल्प लेता हूं, फिर वहीं चला जाता हूं, और करने के बाद दुख होता है।

बस सत्संग सुनो, इससे आपको सहायता मिलेगी और धीरे-धीरे अपने आप को निकाल पाओगे। देखो मान की इच्छा क्यों है? जिससे मान की इच्छा रख रहे हो, क्या वह रहेगा? क्या उसे खुद इज्जत पाने की इच्छा नहीं है? तो ऐसे लोगों से क्या इज्जत पाना, जो खुद इज्जत के लिए घूम रहे हैं। तो मान के लिए नहीं — आप जरूरतमंद की सेवा करिए। ईमानदारी से जीवन जियो। अपनी जरूरत को समझो, अपने कर्तव्य को समझो, अपनी जिम्मेदारी को समझो कि मुझे मानव शरीर मिला है तो क्या है। कुछ जिम्मेदारियां बचपन से मिल जाती हैं, पैदा होते ही हम लेते हैं। जितनी भी जिम्मेदारियां हैं, कर्तव्य हैं, उन्हें ईमानदारी से निभाते हुए आगे बढ़ो, अपना कल्याण करो। कोई भी जिम्मेदारी, कोई कर्तव्य छोड़कर भागो मत। जीवन में जितना मिला, जितना आपने लिया, उसको पूरा करो और आगे बढ़ो। यही नीति है और यही नीति आपको आगे ले जाएगी। छोड़-छोड़कर भागोगे तो छोड़ने का दोष लगेगा। अगर कोई कार्य आपको नहीं करना है तो हाथ में मत लो, क्योंकि हाथ में लेकर नहीं किया तो उसका दोष लगेगा। इससे अच्छा बोल दो, भैया हम नहीं कर सकते, बात खत्म। और अगर किसी से कुछ लिया है तो देना सीखो, नहीं तो लो मत। लो ही मत, तो देने की बारी नहीं आएगी।

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गुरु जी, मन में बुराई आ रही है — लालच, काम-वासना। क्या करूं?

तो (वह) मत करो ना। आने दो, करो मत। आने दो, करो मत।

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क्या चेतना ही परमात्मा है?

जरा ऊपर उठो। अपनी समझ को विकसित करो।

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गुरु जी, लोग इज्जत देकर गुलाम बना लेते हैं, या हम उनके गुलाम बन जाते हैं। अब क्या करें?

आप देखो, इज्जत दे और ले क्यों रहे हो? दोनों में देखो — क्या आप उस लायक हो, और जिसे आप इज्जत दे रहे हो, क्या वह उस लायक है?

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गुरु जी, अगर (हरियाणा) कुटिया का काम पूरा हो गया हो तो 20 तारीख को आ जाऊं? मैं आपके पास आकर आपके नियम में रहना चाहता हूं।

पहले यह बताओ — करते क्या हो, और आपने इस काम में सहयोग क्या दिया? अगर आप सत्संग के द्वारा लाभ ले रहे हो, तो क्या सहयोग दिया? और इस कुटिया में आओगे तो किस उद्देश्य से आ रहे हो? जब बन जाएगी तो कभी भी आ सकते हो। तो यह देखना है कि मैं लेना चाहता हूं, तो मेरे पास देने के लिए क्या है, या बस लेना ही चाहता हूं।

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परिवार में रहकर आत्मचिंतन कैसे करें?

आत्मचिंतन तो कहीं भी होगा, जब समझ विकसित होगी।

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गुरु जी, कौन सी शर्तें पूरी होने पर हम स्थायी रूप से अपने आप में स्थिर हो जाते हैं?

उम्मीद से मुक्त होने पर।

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जब अपने आप में (ध्यान में) होता हूं तो दिमाग में बहुत सारे ख्याल आते हैं और मैं डिस्टर्ब होता हूं। उन्हें कैसे कंट्रोल करें?

कंट्रोल मत करो, क्योंकि वे अतीत की घटनाएं हैं। तो आप देखो कि अतीत की घटनाएं इतना परेशान क्यों कर रही हैं।

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सहयोग से आपका मतलब क्या है?

सहयोग से मतलब यही है कि अगर आपने किसी से कुछ लिया है, तो आप उसे सहयोग करो। इसे सहयोग भी नहीं बोलेंगे, क्योंकि अगर आप कुछ लेते हो तो आपका कर्तव्य है, दायित्व है, जिम्मेदारी है कि मैं भी उसे कुछ दूं। आपके पास धन है, तन है, समझ है — क्या दे सकते हो? और मेन बात, उसकी जरूरत क्या है, यह देखना है। क्योंकि अगर आप लेते ही रहोगे, तो धीरे-धीरे दब जाओगे।

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गुरु जी, जरूरत में जीने के भाव में लगातार कैसे बना रहूं? कभी-कभी भाव छोड़कर कर्म में लिप्त हो जाता हूं और बेईमानी हो जाती है। मार्गदर्शन करें।

बेईमानी एकदम न करें। ईमानदारी पकड़ लें, ईमानदारी को कतई न छोड़ें, और आगे बढ़ें। अगर आप किसी से कुछ भी लेते हो — जैसे एक विद्यार्थी शिक्षक से शिक्षा लेता है, तो शिक्षा के बदले उसे मूल्य देता है, पैसा देता है, क्योंकि उस शिक्षक का भी तो जीवन है; उसे भी कपड़े चाहिए, भोजन चाहिए, व्यवस्थाएं और साधन चाहिए; उसकी भी जिम्मेदारियां और कर्तव्य हैं। तो आप किसी से भी कुछ लेते हो, तो देखो कि मैं क्या दे सकता हूं।

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क्या श्रमदान ही सहयोग है?

हां, श्रमदान सहयोग है — अगर सामने वाले को श्रमदान की जरूरत है। जरूरत ही नहीं है तो श्रमदान देकर क्या करोगे? (जरूरत हो तो) श्रमदान भी सहयोग है।

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गुरु जी, मुझे डर लग रहा है कि यह सब मैंने क्या कर लिया — अब मैं अंदर से देख पा रहा हूं कि फंस गया हूं।

ठीक है, निकलो — निकालो अपने आप को।

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गुरु जी, आज मेरी 10,500 सैलरी आई; अब जरूरत पूरी हो रही है और मेरी कुछ सहयोग करने की इच्छा है। मार्गदर्शन करें।

इसमें मार्गदर्शन क्या करें? इसी चैनल पर मोबाइल नंबर है, उसके व्हाट्सएप पर स्कैनर है — सारी व्यवस्थाएं हैं, जाकर उसमें सहयोग करो।

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योगी जी, क्या मैं पूरी ईमानदारी धारण करूं, ताकि कोई गलती का चांस न रहे?

ईमानदारी धारण करो। अगर ईमानदारी धारण करते हो तो आपका कल्याण संभव है।

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समझ विकसित करने के लिए प्रयास कैसे करें?

समझ विकसित करने के लिए जिसकी समझ विकसित है, उसके पास जाकर समझना पड़ेगा। वह तरीका बताएगा। ऐसे बैठे रहोगे तो समझ विकसित नहीं हो जाएगी। आप देखो किस फील्ड में समझ विकसित करना चाहते हो — गणित, हिंदी, इंग्लिश, विज्ञान — तो वैसे शिक्षक के पास जाना पड़ेगा। विज्ञान में समझ चाहिए और चले जाओगे हिंदी के शिक्षक के पास, तो कुछ नहीं होगा। तो पहले पक्का करो कि आप चाहते क्या हो, फिर ऐसा शिक्षक ढूंढो। अगर आप अपना आत्मिक कल्याण करना चाहते हैं तो उसे गुरु बोलते हैं, और किसी विषय में समझ विकसित करना चाहते हैं तो शिक्षक बोलते हैं।

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एक जिज्ञासु (खोजी) के लिए सब चीजों की जानकारी होना कितना जरूरी है? आजकल इंटरनेट, YouTube, ChatGPT/AI से कुछ भी पूछ लो, जवाब मिल जाता है। तो क्या यह जानकारी लगातार ग्रहण करते रहना सही है, या एक समय पर उस पर पूर्ण विराम लगा देना सही है?

आप इस बात को पहले समझ लीजिए — AI के पीछे भी आदमी ही है। वह एक सिस्टम है, उसमें लोग अपलोड करते हैं; वह जानकारी सही भी हो सकती है, गलत भी। आपने कहा कि AI से कुछ भी पूछ लो, बता देगा — ऐसा नहीं है। एक बार पूछो, मेरा नाम क्या है? इस समय मैं कहां हूं? यह तुम्हारे अलावा कोई नहीं बता सकता। उसमें एक सीमित जानकारी है, जो अनेक लोग मिलकर अपलोड करते हैं। तो आपको यह समझ में आना चाहिए कि जो प्रश्न किया, उसका उत्तर सही है या गलत। और सही-गलत तभी बता पाओगे जब खुद को उस बात का ज्ञान हो; अनजान चीजों में उस पर निर्भर होकर कभी सही रास्ते पर नहीं पहुंचोगे। आप Google मैप का उपयोग करते हो — कितना घुमा देता है! कई बार पुल होता ही नहीं और वह कुदा देता है, कितनी मौतें हो जाती हैं; गली में ले जाता है और गली बंद मिलती है। उस समय कौन काम आता है? जीवंत व्यक्ति। क्या आप ऑफिस से घर कभी Google के सहारे जाते हो? जब आपको नहीं पता होता, तब Google का सहारा; और जहां Google भी फेल है, वहां जीवंत आदमी चाहिए। एक बार मैं इंदौर से मुंबई जा रहा था। मुझे छोड़ने आया व्यक्ति अपने भाई से ऑनलाइन पता कर रहा था कि ट्रेन एक नंबर प्लेटफॉर्म पर खड़ी है, जबकि वहां थी नहीं। काउंटर पर पूछा तो उन्होंने दूसरा नंबर बताया। मैंने कहा, मेरी बात मानोगे या ऑनलाइन की? हम दौड़कर गए, ट्रेन छूटने वाली थी, मैंने दौड़कर पकड़ ली। तो इन सबके पीछे आदमी ही है, और जानकारी सही भी हो सकती है, गलत भी। इसलिए जीवन में जीवंत व्यक्ति चाहिए। आपके हर प्रश्न का जवाब कभी भी सोशल मीडिया नहीं दे सकता; उसमें सीमित जानकारी अपलोड है और वह बदलती रहती है। जो रास्ता बता रहा है, वह किसी ने बंद कर दिया, तो भी जब तक अपडेट नहीं होगा, वही रास्ता बताता रहेगा। जब मुझे जरूरत थी तब अपलोड नहीं हुआ, और जब हुआ तब मैं नहीं हूं। और एक बात बताऊं — आपको यह देखना है कि जाना कहां है; मुझे सिर्फ वहीं का पता चाहिए। पहले पक्का करिए कि मुझे जाना कहां है, पहले पते मत ढूंढिए। पते ढूंढ रहे हो, इसका मतलब लक्ष्य ही नहीं है। और पते इतने हैं, और बदलते रहते हैं — 20 साल पहले का भारत का नक्शा उठा लो, क्या वे जगहें, वे रास्ते वैसे ही मिलेंगे? मैं जैसे-जैसे आगे जाऊंगा, पीछे सब बदलता रहेगा, लेकिन मैं लक्ष्य तक पहुंच जाऊंगा। जिस पते से आप जा रहे हो, वह भी नहीं रहेगा; लक्ष्य तक पहुंचते-पहुंचते वह खत्म भी हो जाएगा, लेकिन आप लक्ष्य तक पहुंच जाओगे। बस इतना याद रखो कि जाना कहां है। अगर इस बिंदु को पकड़ लिया, तो दुनिया की कोई ताकत आपको रोक नहीं सकती; हर ताकत आपकी मदद करेगी।

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जब पता चल जाए कि मुझे कहां जाना है, तो क्या मैं अलग-अलग बहुत सारी जानकारियां इकट्ठा करूं या नहीं?

जरूरत क्या है? जानकारी लेकर करोगे क्या — कचरा करोगे? आपको जहां जाना है, वहां का पता लो ना।

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वहां (लक्ष्य) के पते भी तो मुझे बहुत अलग-अलग तरीकों से मिल सकते हैं; मैं उसमें भी कन्फ्यूज हो जाऊंगी।

पहले यह पक्का करिए कि आपको जाना कहां है। फिर आपकी क्षमता कैसी है — कोई प्लेन का सफर बताए, कोई ट्रेन का, कोई बैलगाड़ी का, कोई बस का, कोई पैदल, कोई एकदम तीखा रास्ता बता दे। और समझने की क्षमता भी आप में होनी चाहिए — वह किस भाषा में, कैसे बता रहा है। हो सकता है वह सही पता बता रहा है, लेकिन वह भाषा ही आपको नहीं आती, तो आप आगे जा ही नहीं सकते।

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क्या मैं जानकारियां इकट्ठी करती रहूं, या मुझे एक पगडंडी दिखाइए कि उस पर चलूं?

बस इतना करो कि यह बताओ जाना कहां है। सब अलग-अलग अपना काम कर रहे हैं, अलग-अलग काउंटर पर बैठे हैं। तो पहले यह पता करो कि जाना कहां है, और उस काउंटर पर चले जाओ।

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लेकिन योगी जी, अध्यात्म में भी ‘काउंटर’ बहुत हैं — बहुत आश्रम हैं, बहुत प्रतिस्पर्धा है। कहीं जाओ तो उनके नियम में रहो, उनकी माला रटो, तिलक लगाओ, बड़ की 11-21 परिक्रमा करो — पैर दुखने लगते हैं, पर कुछ अनुभव नहीं होता। बहुत जिंदगी ऐसे ही ट्राई एंड टेस्ट में निकल गई। तो क्या बार-बार ऐसे ही ट्राई एंड टेस्ट करती रहूं?

आप कितनी बार उसी को ट्राई एंड टेस्ट करोगे? एक बार करने के बाद आगे निकलो ना, बार-बार उसी को मत करो। ऐसे तो जाना ही पड़ेगा, एक-एक को छांटना पड़ेगा। देखना यह है कि आप एक के पास कितनी देर रुकते हो, और क्यों रुके हो — वहां कुछ हो भी रहा है या नहीं। मैं अपनी एक घटना बताता हूं, आप इससे कुछ सीख सकते हो। जब मैं खोज में था, एक माता जी ने कहा कि आप ओंकारेश्वर के एक आश्रम जाओ, वे आपको बताएंगे। मैं गया तो वे व्यक्ति नहीं थे। कोठारी ने कहा कि भोजन करना है तो खाकर सो जाओ। मैंने पूछा, वे कब आएंगे? बोले, नहीं पता। मैंने कहा, जब वे हैं ही नहीं और कब आएंगे यह भी नहीं पता, तो मैं यहां रात क्यों गुजारूं? मुझे खोज करनी है, और यहां मेरी खोज रुक गई है। तो मैंने उस आश्रम में न खाया, न सोया; मैं ठंड के महीने में रात भर नर्मदा तट पर बिना बिस्तर के रहा। अगर मैं वहां रात बिता लेता — वे आते भी नहीं, जवाब भी नहीं मिलता — तो इसका मतलब मैं खोजी नहीं हूं, कहीं न कहीं भोगी हूं, अपने शरीर को सुरक्षा दे रहा हूं। मेरे कपड़ों की हालत देखकर और सामान न होने से, पैसे होने के बाद भी मुझे कोई कमरा नहीं देता था, तो रातें तट पर गुजारनी पड़ती थीं। एक रात मैं इतना कांप रहा था कि हिम्मत छूट गई; गणपति मंदिर में मूर्ति के पीछे टाइल्स पर जाकर सोया, पर डर था कि सुबह पुजारी आकर उल्टा-सीधा बोलेगा। फिर एक होटल गया, कहा पैसे दूंगा, आईडी भी है — बोला लगेज कहां है? कमरा नहीं दिया। रात भर तड़प-तड़पकर इंतजार करता रहा कि कब सूरज उगेगा, कब धूप होगी। तो कहने का मतलब — आप कितने तत्पर हो। एक-एक को छांटना पड़ेगा। आप जहां हो, वहीं से चलो; लोग मिलते जाएंगे, छूटते जाएंगे। देखना यह है कि आप जिसके लिए गए हो, वही बात करते हो या समय बर्बाद कर रहे हो। मैंने जब संन्यासी जीवन अपनाया, तो तीन दिन ही आश्रम में रहा और फैसला ले लिया; उसी आश्रम में लोग 30 साल बाद भी फैसला नहीं ले पा रहे। आपको यह देखना है कि जिस उद्देश्य से गए हो, क्या उसकी पूर्ति हो रही है। हो रही है तो रुको, नहीं तो आगे जाओ।

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गुरु जी, जब हमारा स्तर ऊपर उठने लगता है तो लगता है कि हम यहां से निकल जाएंगे, और जब गिरते हैं तो आत्मविश्वास टूट जाता है। लगता है कि हमसे नहीं हो पाएगा, लोग जाने नहीं देंगे, कहीं न कहीं फंसा लेंगे। क्या करें?

कोई फंसा नहीं सकता। इस दुनिया में जीवात्मा ऐसी है कि कोई किसी को फंसा नहीं सकता। जैसे कोई भी वस्तु सदैव के लिए कोई रख नहीं सकता, वैसे ही जीवात्मा को कोई फंसा नहीं सकता। वह कभी फंस ही नहीं सकती। बस अपनी मौज में घूम रही है — लालच में, लोभ में, कामनाओं में, कुछ करने में घूम रही है। कोई किसी को फंसा नहीं सकता, उलझा नहीं सकता। अगर कोई कह रहा है मैं उलझ गया, इसका मतलब उस उलझने में उसे कुछ मिल रहा था। वहां फंस गया, मतलब फंसने में कुछ मिल रहा था।

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गुरु जी, उठते-बैठते, सोते-जागते, काम में, सुख और दुख में — सबसे ऊंची स्थिति क्या है?

बस किसी में लिप्त न होना। निर्लिप्त होकर काम करना। चाहे सुख हो चाहे दुख हो, अपने आप को देखना। उस सुख में लिप्त नहीं होना, उस दुख में लिप्त नहीं होना।

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गुरु जी, मेरा अपनी पत्नी से झगड़ा हो जाता है। मैं ज्यादा करना भी नहीं चाहता, फिर भी झगड़ा हो जाता है और बाद में अफसोस होता है। मार्ग दिखाएं।

झगड़ा इतना कर लो कि झगड़े के लिए कुछ बचे ना। जैसे कोई चीज आपको अखर रही है तो उसमें इतनी आग लगा दो कि वह जलकर राख हो जाए, और राख कभी जलती नहीं। तो इतना झगड़ा कर लो कि झगड़े के लिए कुछ बचे ना। हां, अगर आसपास लोग हैं तो चिल्लमचाली मत करना कि पड़ोसी परेशान हों; दूर चले जाना जहां कोई न हो। ज्यादातर क्या होता है कि अगर कोई हमसे प्रेम करता है तो हम ओवर कॉन्फिडेंस में उसको ही जलील करते रहते हैं, बेइज्जत करते रहते हैं। लेकिन प्रेम करने वाला तो प्रेम ही करेगा, वह प्रेम करते-करते खत्म हो जाएगा। कोई ज्यादा केयर करे, देखभाल करे, तो हम उसे ही उल्टा-सीधा जवाब देते रहते हैं। फिर एक दिन वह या तो साथ छोड़ देगा या जिंदगी से चला जाएगा, फिर अफसोस होता है। तो देखो कहीं ऐसा तो नहीं है। बहुत सोच-समझकर जीवन जियो। मैं पहले भी कहा हूं — प्यार से इतना प्यार कर लो कि प्यार किसी से प्यार करने लायक ना रहे। तो झगड़े से इतना झगड़ा कर लो कि झगड़ा किसी से झगड़ा करने लायक ना रहे। आखिर तक करना — निपटा देना या निपट लेना, मतलब झगड़े से। यह रोज-रोज का कोई मतलब थोड़ी ना है। बातों को समझना। इस तरीके से बैठकर आपस में बातचीत कर लो कि आखिर झगड़े का विषय क्या है? कारण क्या है? हम क्यों झगड़ा करते हैं? क्या हम झगड़ा करने के लिए मिले हैं? आप बहुत समझदार बनते हो, बहुत पढ़े-लिखे हो, तो आप सोचोगे मेरे झगड़े का कारण क्या है। तो आप देख पाओगे कि झगड़ा बेमतलब का हो रहा है। तो वह चीजें छोड़ो और आगे बढ़ो। मेरा यह कहना है।

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गुरुदेव, आप कब तक यमुनानगर में रहेंगे?

जब तक अपनों की कुटिया यहां पूरी तरह बन जाएगी, सुरक्षित हो जाएगी, तब तक मैं यहां रहूंगा, और आता-जाता रहूंगा।

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कोई व्यक्ति कुछ गलत बोलता है तो मुझे बहुत गुस्सा आता है। मुझे क्या करना चाहिए?

उसे उचित तरीके से जवाब देना चाहिए, अपने सामर्थ्य को बढ़ाते हुए। सामर्थ्य है तो जवाब दो। सामर्थ्य नहीं है तो सामर्थ्यवान बनकर जवाब दो।

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गुरु जी, दोनों कुटियाओं (मध्य प्रदेश और हरियाणा) का नियम एक ही रहेगा?

दोनों कुटिया एक ही व्यक्ति के द्वारा निर्माण हुई हैं, तो नियम तो एक ही रहेगा। अगर दो व्यक्ति होते तो अपने-अपने नियम बनाते। मध्य प्रदेश, हरियाणा — नियम एक ही रहेगा, उद्देश्य भी एक ही है।

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गुरु जी, यहां (कुटिया) का रास्ता बहुत दुर्गम है, ढूंढने वाले ही पहुंच सकते हैं।

यहां का रास्ता तो बड़ा आसान है। रास्ता कभी दुर्गम नहीं होता। आपकी क्षमता कहां है? लोग चांद तक चले जा रहे हैं। अगर आप आना चाहते हो तो दुर्गम नहीं है।

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गुरु जी, क्या आपके यहां (कुटिया में) आकर रह सकते हैं? वहां क्या कर सकते हैं?

यहां आकर साधना कर सकते हो।

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गुरु जी, आपको इतना ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ?

साधना करके, तपस्या करके। और अभी भी — यहां के लोग देख रहे हैं — मेरी उंगलियों से, पैरों से खून निकल रहा है, इतना काम करने में घिस गया है।

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गुरु जी, मैं आगे नहीं बढ़ पा रहा हूं। लोग मुझसे ज्यादा (बुरा) करते हैं, समझ नहीं आता क्या करूं; मैं किसी को मारना (नुकसान पहुंचाना) नहीं चाहता। कृपा करें, मार्गदर्शन करें।

क्या कृपा करूं? अपना कल्याण करो भाई। अपने कल्याण में लग जाओ। ईमानदारी और सत्कर्म अपना लो।

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ऐसे लोगों (जो बुरा करते हैं) से जी भर गया हो तो क्या करें?

छोड़ दो सबको और खुद सामर्थ्यवान होकर जियो।

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अगर कोई कहता है कि मैं किसी से प्रेम करता हूं, तो प्रेम की परिभाषा क्या है?

प्रेम की परिभाषा यही है — उसको कुछ भी जरूरत है और अगर आपके पास है, तो पहले वो, बाद में तुम। जिसके प्रति प्रेम है, पहले वो। अगर एक रोटी है तो पहले वह खा ले, बाद में मैं; मैं तो भूखा भी सो जाऊंगा। उसका होना जरूरी है। पहले वह, बाद में मैं — यही प्रेम की परिभाषा है।

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गुरु जी, देह भाव से मुक्ति कैसे मिलेगी?

देह भाव से मुक्ति तब मिलेगी जब कोई कामना नहीं होगी, कोई इच्छा नहीं होगी, कोई उम्मीद नहीं होगी, कुछ करने को नहीं रहेगा।

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प्रणाम गुरु जी। मेरी कोई भी बात किसी को पसंद नहीं आती। क्या करूं?

कोई बात नहीं। आपको आपकी बात पसंद आती है ना। आप अपना काम करो। आपको पता होना चाहिए कि मैं सही हूं।

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गुरुदेव, मैं जरूरत में जीता हूं। पर पिताजी के पास पैसा है फिर भी वे पैसे के लिए लालायित रहते हैं, और पत्नी की जरूरत तो पूरी कर लेता हूं पर उसकी इच्छाएं पूरी नहीं कर पाता। क्या करूं?

जरूरत पूरी करो। बात खत्म।

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अध्यात्म में इच्छाएं (इच्छा शक्ति का भटकाव) कैसे जाएंगी?

जरूरत में जीना चालू करो — ईमानदारी के साथ, सत्कर्म के साथ।

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गुरु जी, मैं आपको काफी समय से सुन रहा हूं, लेकिन इस यात्रा में रुक जाता हूं। लोग लड़ना चाहते हैं और मुझे लड़ाई बिल्कुल पसंद नहीं। क्या करूं?

मत लड़ो, अपना काम करो।

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गुरु जी, मैं आपका लाइव सत्संग नहीं सुन पाता, इसलिए चिंता होती है। लगता है मुझसे कोई गलती हुई है, इसलिए ईश्वर नाराज है।

अभी लाइव ही तो चल रहा है। आप लाइव ही तो सुन रहे हो।

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मैं अपने दो बच्चों को अकेले संभालती हूं; परिवार वाले कोई साथ नहीं देते। क्या करूं?

कोई बात नहीं, मेहनत करो, आगे बढ़ो। खुद को सामर्थ्यवान बनाओ — हर तरीके से: धन से, तन से और समझ से। तभी आप समाज में कुछ कर पाओगे। अगर आप समझ से ताकतवर हो पर धन-तन से नहीं, तो कुछ नहीं कर पाओगे। तन से बहुत ताकत है लेकिन धन भी नहीं, समझ भी नहीं, तो भी कुछ नहीं कर पाओगे। धन से, तन से और समझ से आप ताकतवर रहोगे, तभी आप जीवन में कुछ कर सकते हो।

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घर का वातावरण बहुत उग्र है, जीवन लापरवाह होता जा रहा है। कोई सही मार्ग दिखाता भी है तो भी कुछ सूझता नहीं। क्या करूं?

तो आ जाओ अपनों की कुटिया में, कुछ दिन रहो और साधना करो।

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आपसे मुलाकात कैसे हो सकती है?

जहां मैं हूं वहां आ जाओ। पता भी तो है।

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गुरु जी, भविष्य में कुछ बुरा या नुकसान होने का डर बना रहता है। क्यों?

जरूर कहीं न कहीं तुम कमजोर हो।

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गुरु जी, बुराई करने वाले तो राम में भी बुराई ढूंढ लेते हैं। (ऐसे लोगों का क्या करें?)

बुराई ढूंढ लेते हैं, लेकिन बुराई सिद्ध तो नहीं कर सकते। बुराई ढूंढने से क्या होगा? जब सामने वाला बुराई करेगा नहीं, तो उसे सिद्ध तो नहीं किया जा सकता।

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निंदा करने वालों के बीच कैसे बचे रहें, जबकि कर्म-धर्म उन्हीं के साथ निभाना है?

निंदा वाला काम मत करो। अगर कोई निंदा कर रहा है तो करने दो, आप अपना काम करो। आप देखो मैं क्या कर रहा हूं — उससे परिणाम आने वाला है। किसी के निंदा करने से परिणाम नहीं आएगा।

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गुरु जी, मैं दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी कर रहा हूं। आपको सुनने से मुझे कॉन्फिडेंस आता है।

एकदम, मुझे सुनो, प्रत्यक्ष ज्ञान को समझो, और जहां हो वहां उन्नति करो, आगे बढ़ो।

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गुरु जी, यदि कोई लड़ाई में प्रतिक्रिया दे, तो क्या हमें भी प्रतिक्रिया देनी चाहिए?

उचित तरीके से दो ना। उचित तरीके से दो।

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मुझे लग रहा है कि लड़की ने मुझे हमेशा के लिए छोड़ दिया है। क्या करूं?

छोड़ दिया तो वो खत्म। तब क्या करना है? क्यों पीछे पड़ा है?

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गुरु जी, ग्रंथों की बातें और कहानियां समझ आती हैं, लेकिन जब राम या अर्जुन बाण मारते थे तो क्या सच में उनसे आग और पानी निकलता था? कभी-कभी यह बात झूठ लगती है।

अब इसके लिए तो राम से मिलना पड़े, अर्जुन से मिलना पड़े। पानी निकलता था, आग निकलती थी — हमें क्या पता। आप देखो, कागज का बम जैसा बनाया जाता है; उसको जलाने से या पटक देने से आग निकलती है। तो उस तीर में कुछ ऐसा बनाया गया होगा। अभी देखो ना, दूर से गोला फेंकते हैं और वहां जाकर गिरते ही आग पकड़ लेता है। तो ऐसी व्यवस्था होगी।

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गुरु जी, आपके पैर, कान, हाथ में इतनी तकलीफ है — अब भी आप इतने कष्ट और दुख क्यों सह रहे हैं?

सह इसलिए रहे हैं कि अगर सहेंगे तभी काम कर पाएंगे। आज स्थिति यह है कि पैर इतने सड़ गए हैं कि चला भी नहीं जाता — यहां रहने वाले भी देखते हैं। कुछ दिनों से उसमें गरम-गरम घी लगा रहे हैं तो आराम मिल रहा है। सहना पड़ेगा ना। अगर आपको कुछ करना है तो सहना पड़ेगा।

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गुरु जी, कभी-कभी बहुत टेंशन होता है। क्या करूं?

क्या करोगे? टेंशन होने दो। अपना काम करो।

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अगर मेरी पत्नी नहीं सुधरी तो मैं क्या करूं?

बस अपनों की कुटिया आ जाना। और क्या करोगे — आप सुधर जाओ। कम से कम अपना कल्याण तो कर लो।

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गुरु जी, क्या भक्ति मार्ग से नहीं पहुंचा जा सकता?

भक्ति मार्ग से पहुंचा जा सकता है, ऐसा नहीं है कि नहीं। लेकिन आप कर क्या रहे हो? भक्ति में भी आप क्या कर रहे हो? क्या आप पूरी तरह ईमानदार हो, सत्कर्मी हो, सत्संगी हो? फिर भक्ति भाव से पहुंच जाओगे। इष्ट भी मदद करता है।

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मन की इच्छाओं का त्याग करने की कोशिश तो करता हूं, लेकिन बार-बार नाकाम होता हूं। क्या करूं?

सत्संग सुनते रहो।

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घर (संसार) छोड़ना पड़ता है, या अपने आप छूट जाता है?

समझते-समझते सब छूट जाता है। आप छोड़ नहीं सकते। अगर आप छोड़ोगे तो आसक्ति रहेगी, बंधन रहेगा। जैसे-जैसे समझोगे, छूट जाएगा। जैसे देखिए, बालक का जन्म होता है। पहले वह कुछ भी उठाकर मुंह में डालता है; धीरे-धीरे समझ बढ़ती है तो वह छूट जाता है। फिर खिलौना खेलने लगता है; खिलौना टूट जाए तो रोने लगता है। उसे बड़ी कार दो, बड़ा घर दो, महल दो — खुश नहीं; एक खिलौना ला के दे दो तो खुश हो जाता है। फिर जैसे-जैसे उसकी समझ विकसित होती है, खिलौना सामने पड़ा रहता है, कोई मतलब नहीं। फिर बड़ी गाड़ियों में, घरों में फंस जाता है। फिर जैसे-जैसे समझ बढ़ती है, इससे भी छूट जाता है। लेकिन एक बात बताऊं — यह शरीर बड़ा होने से नहीं होता। बहुत लोगों की समझ विकसित नहीं होती तो 20–30 साल में भी खिलौना खेलते रहते हैं, क्योंकि शरीर तो बड़ा हो गया लेकिन समझ विकसित नहीं हुई। जैसे-जैसे समझ विकसित होगी, सब छूटता जाएगा और आप उस परम स्थिति को उपलब्ध हो जाओगे। आप कहीं लिप्त हो, तो कहीं न कहीं आपकी समझ विकसित नहीं हुई, इसलिए लिप्त हो। समझ विकसित होगी तो अपने आप छूट जाएगा, छोड़ना नहीं पड़ेगा। तो समझ विकसित करो।

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गुरुदेव, आप घर क्यों छुड़वा रहे हैं? परिवार वाले कहां जाएंगे? क्या अपनी जिम्मेदारी से भागना चाहिए?

वही बात मैं कह रहा हूं कि जब कोई आपको सता रहा है, आपको समझ नहीं रहा, परेशान कर रहा है, लज्जित कर रहा है, बेइज्जत कर रहा है, जूते मार रहा है — तो ऐसे व्यक्ति के साथ रहकर क्या करोगे? वो परिवार है क्या?

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गुरुदेव, मैं काम, क्रोध, मद, लोभ — इन चारों में फंसा हूं। निकलने का प्रयास कर रहा हूं, लेकिन निकल नहीं पा रहा।

आइए, कुछ दिन अपनों की कुटिया में रहो, साधना करो।

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गुरु जी, आप सुबह और शाम को किस समय लाइव आते हैं?

कुछ बोल नहीं सकते। सुबह लेते हैं, शाम-रात को लेते हैं, दोपहर को कभी भाव हुआ तो ले लेते हैं। कोई तय समय नहीं दे सकते। आप चैनल खोलो — होम, वीडियो, शॉर्ट और लाइव है — लाइव में जाकर जो वीडियो बन गया है वह देख लिया करो।

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गुरु जी, आप एक अच्छा एडिटर रख लें जो आपके वीडियो अच्छे से एडिट करे और थंबनेल वगैरह लगाए।

बहुत लोग चैनल बनाए हैं, बहुत लोग इन वीडियो को एडिट करके अपलोड करते रहते हैं। मैं जैसा करता हूं, खुद करता हूं। यह चैनल मैं खुद चलाता हूं।

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गुरु जी, मन की इच्छाओं का त्याग कैसे करें? बार-बार भूल जाता हूं।

जरूरत में जियो। ईमानदारी, सत्कर्म अपनाओ और आगे बढ़ जाओ।

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गुरु जी, यह मार्ग बहुत कठिन लगता है।

फंसे हो इसलिए कठिन लगता है; कठिन है नहीं। समझो और आगे बढ़ो।

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गुरु जी, आचरण क्या है?

आचरण मतलब आप जिसमें जी रहे हो, वही आचरण है।

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मैं शराब पीना छोड़ना चाहता हूं। एक-दो महीने छोड़ देता हूं, पर परेशान होता हूं तो ज्यादा पी लेता हूं। क्या करूं?

अब क्या करोगे? कर ही तो रहे हो — पी रहे हो, और क्या कर गए?

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गुरु जी, एक साल पहले मेरे पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। मेरे दो बच्चे हैं (17 और 20 साल के)। गांव बिहार में है, मैं महाराष्ट्र में अकेले बच्चों के साथ रहती हूं और बहुत घुटन होती है।

सत्संग सुनो, आगे बढ़ो। अपना कल्याण करो, सामर्थ्यवान बनो। और क्या करोगी, बताओ।

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गुरु जी, ईमानदारी से काम तो करता हूं, पर साहस की कमी है, बहुत डरपोक हूं। क्या करूं?

सामर्थ्यवान बनो।

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गुरु जी, कल्याण की जरूरत क्यों है?

इसलिए कि अगर हम दुख में फंसे हैं — अफसोस है, बेचैनी है, पीड़ा है, घुटन है, उदासी है — तो कल्याण की जरूरत है। और अगर यह नहीं है, तो भाई आप जहां हो खुश हो। अगर कोई फंसा है तो उसे निकलने की जरूरत है। लेकिन जो फंसा ही नहीं है, उसे कोई निकालेगा तो भी नहीं निकलेगा, क्योंकि वह फंसा ही नहीं है।

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दुख कैसे दूर होगा?

दुख वाला काम मत करो, तो दुख नहीं होगा।

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गुरु जी, कभी अपने आत्मबोध का अनुभव बताइए।

मैं बताया हूं। इसी चैनल पर पीछे के वीडियो देखो, आपको पता चल जाएगा।

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अष्टावक्र ने राजा जनक से कहा — न यह सत्य है, न वह सत्य है; सत्य तुम हो; जो है वह तुम ही हो, बाकी सब बनाया हुआ है। तो उस (सत्य) में निरंतर कैसे रहें?

उस सत्य में निरंतर तभी रह सकते हैं जब... अभी तो यह शब्दों का ज्ञान है कि यह न सच है, न वह सच है, सत्य तुम हो। अभी तो मैं कहीं लिप्त हूं। जहां मैं लिप्त हूं, वहां से जब मैं पूरी तरह निकल जाऊंगा, निवृत्त हो जाऊंगा — मैं प्रवृत्ति में फंसा हूं, निवृत्त हो जाऊंगा — जब मैं अपने आप में स्थिर हो जाऊं। अभी तो मैं अनेक पिंडों में, अनेक वस्तुओं में घुसा हूं; उनसे मेरी इच्छा है। मुझे खुद नहीं पता मैं कितने पिंडों में फंसा हूं। तो मैंने परिवर्तनशील को धारण कर लिया, और जैसे-जैसे वह परिवर्तित होता है, वैसे-वैसे मेरा स्वभाव, भाव परिवर्तित होता रहता है। क्योंकि मैं जिसको पकडूंगा, जैसा वह रहेगा, वैसा तो मैं भी रहूंगा। इसीलिए हमारी स्थिति हर रोज, हर क्षण एक जैसी नहीं रहती, बदलती रहती है — क्योंकि मैंने परिवर्तनशील को धारण किया है। जब तू परिवर्तनशील को छोड़ देगा, तब तू सत्य में स्थिर हो जाएगा।

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कभी-कभी मुझे लगता है कि मैंने (सब) छोड़ दिया।

लगता है ना कि छोड़ दिया। छोड़ दिया होता तो सत्य में स्थिर हो जाता ना। लगना और होना — दोनों में फर्क है। लगता है छोड़ दिया, लेकिन छोड़ा नहीं है। तो मुझे हर जगह से अपने आप को छुड़ाना पड़ेगा। इसीलिए तो मैं कहता हूं कि जरूरत में जियो, क्योंकि तुम सीधा नहीं छोड़ सकते — तुम किसी कामना में उसमें घुसे हो। जब तक वह कामना और इच्छा नहीं हटेगी, तब तक उस पिंड से, उस वस्तु से तुम निकल नहीं सकते। तो वह कामना मेरे अंदर क्यों आई? कहां से आई? वजह क्या बनी? क्या मेरी जरूरत थी? अगर कोई पिंड मुझे परेशान कर रहा है, तो आखिर मैं उसमें घुसा क्यों? मुझे गहराई से यह देखना है। जिस कारण से मैं घुसा हूं, वह कारण देखना है, और फिर अपने आप को निकाल लेना है। जब समझोगे तो निकल जाओगे; अगर समझोगे नहीं तो निकल नहीं पाओगे।

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गुरु जी, पता नहीं चलता कि मैं किस-किस से निकल चुका हूं, किससे निकल रहा हूं, और मैं कहां हूं।

यह धीरे-धीरे आत्मिक चिंतन करेगा, या दूर जाएगा, तो पता चलेगा। जैसे अब यहां आया है, तो देख कौन सी याद तुझे खींच रही है। मुझे वापस क्यों जाना है? अगर मैं आगे जा रहा हूं, तो मुझे पीछे जाना क्यों पड़ रहा है? तो पीछे जरूर मैं कहीं घुसा हूं।

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लेकिन गुरु जी, जब तक शरीर रहेगा, कुछ न कुछ जरूरत तो रहेगी।

एक होती है जरूरत — जरूरत मैंने पूरी की और मैं वापस आ गया। जैसे तूने ट्रेन का टिकट लिया, यहां तक आया; जैसे ही स्टेशन आया, उस सीट को छोड़ दिया, क्योंकि तूने जरूरत में उसे पकड़ा था और तय कर लिया था कि यहां से यहां तक मेरी सीट है। बीच में कोई छुड़ाता तो तू नहीं छोड़ता, किसी का अधिकार भी नहीं था। पर देखो कैसे तू उस सीट को छोड़कर चला आया। क्या उस सीट की याद है? क्या फिर उस पर जाना चाहता है? नहीं। बीच के स्टेशनों पर भी खाने-पीने उतरा होगा, लेकिन सीट थोड़ी छोड़ी, क्योंकि आगे जाना था; अपनी जरूरत के लिए उतरा और खाना-पीना लेकर अंदर हो गया। तो मुझे यह देखना है कि आखिर मुझे पीछे क्यों जाना पड़ रहा है? उसके पीछे कारण क्या है — मान के चक्कर में जा रहा हूं या जरूरत में? अगर जरूरत में जा रहा हूं तो जरूरत पूरी करके वापस आ जाऊं। अपने आत्मिक कल्याण के लिए देखना है कि मैं किसी पिंड में, किसी वस्तु में घुसा हूं तो क्यों घुसा हूं, और मुझे पीछे क्यों जाना पड़ रहा है। पीछे ही तो बंधन है।

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कहा जाता है कि द्रष्टा होने से सब निर्विकार हो जाता है। पर हर समय द्रष्टा भाव नहीं रहता — यह क्या है?

अभी मैं (कहीं) द्रष्टा भाव में हूं — मतलब मैं कहीं द्रष्टा हूं और कहीं लिप्त हूं। जहां मैं लिप्त हूं, उसे छोड़ना है।

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सत्य में स्थिर होने का मतलब क्या है? क्या कुछ घटित होगा, या बस ‘तुम रहो’?

देख, तू कुछ भी खाता-पीता है तो उसका अलग ही स्वाद होता है; यहां आया तो अलग भाव हो गया, घर पर था तो अलग भाव था। तो जब सत्य में स्थिर होगा, कुछ तो होगा — ऐसा थोड़ी ना है कि कुछ घटित नहीं होगा। वह क्या है, वह तो जब उसमें स्थिर होंगे तो पता चल जाएगा। जब आप सत्य में स्थिर होगे, तो वह घटित हो जाएगा।

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(साधना में) चल तो रहा हूं, लेकिन पता नहीं चल रहा कि कहां तक पहुंचा।

इसमें भी तो मालूम पड़ता है कि मैं कहां-कहां लिप्त हूं। अगर इस पर काम करोगे तो देखोगे कि पहले से आसक्ति कम हुई, पहले से समझ विकसित हुई। पहले इस व्यक्ति में, इस वस्तु में ज्यादा आकर्षण था, मोह था, लोभ था — अब कम हो गया; अब मैं जरूरत में उपयोग कर रहा हूं। तो धीरे-धीरे समझ में आता है, यह भी पूरा दिखता है। देखना आना चाहिए।

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अभी विपरीत लिंग के शरीर के प्रति कुछ आकर्षण है। वह कैसे जाएगा?

वह ऐसे जाएगा — देखो, क्या तुम्हारी जरूरत है? अगर तुम्हारी, शरीर की जरूरत है, तो ईमानदारी से उसे भोगो; या फिर समझकर छोड़ दो कि मेरी जरूरत नहीं है। छोड़ तो दिया, लेकिन (आकर्षण) आ जाता है — मतलब इच्छा अभी भोगने की है। मैंने जबरदस्ती छोड़ा है, लेकिन कामना भोगने की है। तो अब देखो, उससे छूटोगे कैसे — भोगकर छूटोगे या समझकर छूटोगे? यह आपको देखना है।

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मैं दूसरे संत के प्रवचन भी सुनता हूं, उनसे भी समझ आता है। क्या ईमानदारी और सत्कर्म के साथ वह भी साथ लेकर चल सकता हूं?

चल सकता है। देख, गुरु ज्ञान का प्रतीक है। निकलने के लिए जहां से भी ज्ञान मिल रहा है, उसे लेकर आगे बढ़ जाना चाहिए। ज्ञान किसी एक का होता नहीं है। जैसे हम रास्ते में निकलते हैं, पानी नहीं है तो किसी से मांगकर पी लेते हैं, प्यास तो बुझती है। यह थोड़ी ना कसम खाएंगे कि उसी नल का पानी पियूंगा — तब तो प्यासा मर जाऊंगा। जहां से भी ज्ञान मिले, लो और आगे बढ़ो; जहां से भी सीखने को मिले, सीखो और निकलो। गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है, और ज्ञान एक ही होता है, दो नहीं। जैसे पानी तरह-तरह के होते हैं, लेकिन काम एक ही करते हैं — प्यास बुझाते हैं। बाद में कभी समस्या नहीं होगी। बस यह है कि एक होता है गंदा पानी, एक शुद्ध पानी — तो जिससे सीख रहे हो, कोई गलत तो नहीं सिखा रहा, आप गलत तो नहीं सीख रहे, यह देखना है।

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मैंने एक संत से सुना कि जो ‘मैं हूं’ का अनुभव है, उसमें स्थित रहो, स्थिर रहो। लेकिन जब मैं कहीं लिप्त हूं, तो स्थिर कैसे रहूंगा?

एक रबड़ उस पेड़ से बंधा है। मैं उसे वहां से छुड़ाए बिना खींचकर ला रहा हूं, तो कब तक खींचे रहूंगा? मेरी ताकत खत्म होगी, रबड़ वहीं चला जाएगा। आप (ऐसे) स्थिर नहीं रह सकते। स्थिर तब हो जाओगे जब जहां लिप्त हो, वहां से निकल जाओगे। केवल समझकर (मानकर) आप स्थिर नहीं हो सकते; छुड़ाकर, छूटकर स्थिर हो सकते हो। तो ऐसा कुछ करो कि जहां मैं बंधन में फंसा हूं, वहां से छूट जाऊं।

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आंख बंद करके जब ऊर्जा को महसूस करता हूं और मन-बुद्धि शांत हो जाती है, तो सोचता हूं कि वही मैं हूं। लेकिन फिर (उठते ही) वहीं (संसार में) चला जाता हूं। इसका क्या मतलब?

जहां लिप्त हो, वहां से छुड़ाओ। मूल की यात्रा करो — मैं मूल की यात्रा बताता हूं कि तुम निकल जाओ। तुमने क्या किया? तुम वहां लिप्त हो, और समझ से अपने आप को स्थिर किया; फिर तुम्हें लग रहा है मैं ही सत्य हूं, सब मिथ्या है। बाद में जैसे उठे, वहीं चले गए। जब छोड़ दो, तब स्थिर रहोगे। मैं कहां-कहां और कितना लिप्त हूं, यह दूर जाने से पता चलता है; घर में रहकर पता नहीं चलेगा। नहीं तो मैं इतनी मेहनत क्यों करता? देख, यहां आने में क्या स्थिति है, रोड कितना खराब हो गया है, अब इसको बनवाना पड़ेगा। अगर घर में होता तो मैं भी कहीं आराम से पड़ा रहता और लोगों को बता देता कि आराम से घर में रहकर करो। यहां धन भी लग रहा है, तन की मेहनत भी, समझ भी — सब खर्च हो रहा है। तू यहां आया तो तेरे भी पैसे लगे। अगर घर में ही होता तो दोनों का खर्च बचा देता। तो अपनों की कुटिया में आओ, जितना आपके पास समय हो, ज्यादा से ज्यादा समय दो। तब आपको कुछ समझ में आएगा।

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मैं एक संत से मिला और बताया कि गुरु जी के पास जाकर साधना करूंगा। उन्होंने कहा कि दो मार्ग हैं — पूरी तरह छोड़कर जा सकते हो, या घर में रहकर कर सकते हो; तुम्हारी मां के प्रति आसक्ति और चिंता है, उधर चले गए तो वह चिंता नहीं छोड़ेगी और सिद्धि नहीं मिलेगी, इसलिए कर्तव्य-जिम्मेदारी निभाते हुए आगे बढ़ो। इस पर आप क्या कहेंगे?

अगर कोई जिम्मेदारी है, आप पर कोई निर्भर है और आपने उसे आश्वासन दिया है, तो उसे पूरा करते हुए आगे बढ़ो। लेकिन एक समय ऐसा आएगा कि आपको पूरी तरह निकलना पड़ेगा। और उपलब्धि तभी होगी, जब शारीरिक और मानसिक — दोनों तरह से पूरी तरह छूट जाएगा। तभी सत्य में स्थिर हो पाओगे।

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गुरु जी, यह तो विरोधाभासी हो जाएगा — क्या कोई संत घर-परिवार में रहकर भी सिद्धि प्राप्त कर सकता है?

किसका? कोई नाम लो। राजा जनक — वे बचपन से शास्त्रार्थ करवाते थे, बचपन से लगे थे, और सत्य तक पहुंचने के लिए उन्होंने सब कुछ दे दिया, अंत में सब कुछ छोड़ दिया, अष्टावक्र के साथ चले गए। अष्टावक्र ने तो जबरदस्ती भेजा कि जाओ राज्य संभालो, वे तो वापस ही नहीं आ रहे थे — पूरी तरह छोड़ दिया था। लोग उदाहरण देते हैं कि बहुत से संत घर में रहकर भी उपलब्ध हुए। तो आप देखो, उन्हें बच्चों-पत्नी से मतलब नहीं था। घर में खाने को नहीं था, बच्चे भूखे मर रहे थे, न पढ़ाई न लिखाई — कोई मतलब ही नहीं था; इस स्थिति में रहते थे। किसी का भी नाम ले लो — घर में राशन है कि नहीं, कोई मतलब नहीं; बहुतों ने बाद में संन्यास लिया। तो मैं यह कहना चाहता हूं कि भैया, एक समय ऐसा आएगा कि निकलना पड़ेगा। घर में हो भी, तो घर से कोई मतलब नहीं, कोई लेना-देना नहीं।

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गुरु जी, जब से समझना शुरू किया, भविष्य की चिंता थी — सुरक्षा, जीवन चलाने और समाज में चलने के लिए (धन की) जरूरत पड़ेगी। अब कम हो गई है, लेकिन है।

अभी तो तुम्हें नहीं होनी चाहिए; अपनों की कुटिया में सब उपलब्ध है। ऐसी कोई शर्त थोड़ी ना है कि सब कुछ छोड़कर आओ, तभी रहोगे। तुम दो बार आए, वहां रहे, जितने दिन रहे सारी व्यवस्था मिली। अपनों की कुटिया बन गई है, तो टेंशन नहीं लेनी चाहिए — कभी भी आ सकते हो, कभी भी रह सकते हो। तुम अपनी मां की सेवा करो, और जितना समय बचे, ज्यादा से ज्यादा यहां दो। करना पड़ेगा; करने से ही कुछ होगा।

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आप कहते हैं कुछ करने से होगा, लेकिन कई वीडियो में यह भी कहते हैं कि आखिर में ‘कुछ नहीं करने’ में आना है। यह कैसे?

हां, कुछ नहीं करने में आ जाओगे, लेकिन करके ही तो आओगे। निकलने के लिए करना पड़ेगा। मैं करके फंसा हूं, तो करके ही निकलूंगा। तो एक समय ऐसा आएगा कि कुछ नहीं करने में आ जाऊंगा। लेकिन सीधा कुछ नहीं करने में बैठ जाऊं, ऐसा संभव नहीं है। कुछ करके ही कुछ नहीं करने में आऊंगा।

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गुरु जी, ‘कुछ करके’ का मतलब — क्या-क्या करना है?

ईमानदारी, सत्कर्म, जरूरतमंद की सेवा — अपने धन से, तन से, अपनी समझ से समाज सेवा में लगा देना। क्योंकि बेईमानी हमने समाज से ही की है। तो जब समाज से बेईमानी की है, तो समाज के लिए जरूरतमंद की सेवा करूंगा, तो मेरा (कर्म) कटेगा।

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‘कुछ नहीं करने’ (की अवस्था) में आना कब समझ में आएगा?

वह तो आ ही जाएगा। जब आपका (करना) पूरा हो जाएगा, तो वह समझ में आ जाएगा।

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कामना ही बंधन है। अगर कोई समझकर सारी कामनाएं, सब कुछ छोड़ दे, तो?

छूट गया या छोड़ दिया — यह देखना है। छोड़ दिया मतलब छूटा नहीं है; छूट जाना चाहिए। छोड़े हो, इसका मतलब कहीं न कहीं जबरदस्ती है। छूट गया मतलब — अब मेरे सामने भी रहे तो कोई मतलब नहीं।

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क्या मन के विलुप्त होने पर (मन के न होने पर) ही ज्ञान घटित होगा?

जब तक कुछ चाहिए, तब तक तो मन है ही। ‘चाहिए’ में मन है। ‘चाहिए’ से मुक्त हो गए तो बात खत्म — फिर मन है या नहीं है, हमें क्या मतलब।

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जब घर में कमरे के अंदर रहता हूं तो कुछ नहीं चाहिए, चुपचाप बैठा रहता हूं। लेकिन बाहर घूमता हूं तो कोई दृश्य, कोई वस्तु दिखाई देती है और मन वहां चला जाता है।

मन तो अंदर था तब भी वहीं जाना चाहता था, लेकिन उसे मौका नहीं मिल रहा था तो अतीत में जा रहा था। जब मौका मिला तो उसका रस लेने लगा। तुम ही तो हो जो मन के द्वारा रस ले रहे हो। कुछ समय बाद समझ में आ जाता है कि सब कुछ परिवर्तनशील है, तो फिर ठीक हो जाता है। लेकिन कुछ क्षण के लिए भी गया, तो इसका मतलब उसे भोगना चाहते हो। धीरे-धीरे समझो, धीरे-धीरे आत्मिक चिंतन करो, धीरे-धीरे करके निकलो — फिर कुछ नहीं करने में आ जाओगे।

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गुरु जी, एक आदमी का पैर टूट गया है, लेकिन वह गलत आदमी है। क्या उसकी मदद करनी चाहिए?

अगर वह गलती छोड़ने के लिए तैयार है, तो मदद करनी चाहिए। उससे शर्त करो कि भाई, मैं तुम्हारी मदद तब करूंगा जब तुम गलत काम करना छोड़ोगे। अगर वह तैयार है तो करो, नहीं तो छोड़ दो।

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मुझे आलस बहुत आता है, कुछ काम करने का मन नहीं करता।

आलस तभी आता है जब आपको सब कुछ अपने आप मिल जाता है, नहीं तो दौड़कर करते। ठीक है, यहां (कुटिया) आ जाओ, मैं आलस से मुक्त कर दूंगा।

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गुरु जी, कर्ता का भाव जन्म से होता है या बाद में आता है?

कर्ता का भाव तो जब आप करोगे, तब आएगा ना। कर्ता का भाव तभी आता है जब आप करोगे।

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परिक्रमा करनी चाहिए या नहीं? और करनी चाहिए तो परिक्रमा क्यों की जाती है?

परिक्रमा करनी चाहिए या नहीं, यह आपके ऊपर है। परिक्रमा इसलिए करते हैं कि राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, ‘मेरा’ और कर्ता के भाव से मैं मुक्त हो जाऊं — अपनी समझ को विकसित करने के लिए। अगर आप इसके लिए परिक्रमा कर रहे हैं, तो कर सकते हो। वह आपके ऊपर है।

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समझ कैसे विकसित करें?

यह अच्छा प्रश्न है। समझ तब विकसित होगी जब जिसकी समझ विकसित हुई है, उसके साथ रहोगे। अब कोई कहे मैं शिक्षा कैसे लूं — तो किसी शिक्षक की शरण में, पढ़ाने वाले के पास जाना पड़ेगा। अगर आप अनपढ़ का साथ कर लोगे, तो वह थोड़ी ना आपको शिक्षित कर देगा।

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गुरु जी, आपने चिंतन बताया है। उसके अलावा किसी और साधना में बेईमानी, लालच नजर आता है और मैं भ्रमित हो जाता हूं। पर सत्कर्म और ईमानदारी को मूल रखता हूं।

बस इसी को रखो और आगे बढ़ो। अपना कल्याण करो।

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जरूरत में रहते हुए भी — मान लीजिए मुझे फॉर्च्यूनर, किसी स्थान या पद की जरूरत है — उसमें रहते हुए अहम भाव को कैसे अलग रखें, कि मैं उससे जुड़ा नहीं हूं, और यह अहंकार न आए कि मैंने इतना इकट्ठा कर लिया तो समाज में मेरा रुतबा बढ़ गया? उन सुविधाओं से अपने आप को डिटैच कैसे रखें?

आपने अपनी जरूरत के अनुसार जिया और ताकत एकत्रित की — चाहे शरीर की हो, समझ की हो, या वैभव की। तो यह समझना है कि मेरे पास इतनी शरीर की ताकत, समझ का बल था कि जितना मैंने सोचा था उससे ज्यादा मैंने अपनी क्षमता के अनुसार एकत्रित कर लिया। तो मुझे क्या करना चाहिए? अपनी जरूरत की पूर्ति करते हुए, जितनी मेरी ताकत है, उसे सत्कर्म में लगा देना चाहिए। तब अहम भाव खड़ा नहीं होगा। अगर आपने सत्कर्म में नहीं लगाया, तो उस ताकत से आपका अहम भाव खड़ा होगा, क्योंकि वह खर्च नहीं होगी। तो अपनी ताकत को खर्च करो — अपनी जरूरत, और फिर सत्कर्म, जरूरतमंद की सेवा में लगाओ। जब जरूरतमंद की सेवा करोगे तो आपका आत्मिक स्तर बढ़ेगा, समझ विकसित होगी, लोगों का आशीर्वाद मिलेगा। अपनी ताकत का सदुपयोग करो, सत्कर्म करो, तो आपका अहम भाव खड़ा ही नहीं होगा।

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समाज में जिसके पास सारी सुविधाएं हैं, उसे ही सही उदाहरण माना जाता है कि ऐसा बनना चाहिए; हम उसे उसकी संपत्ति से जज करते हैं। तो क्या हमें खुद को वैसा बनाने की कोशिश करनी चाहिए, या यह समझ बनानी चाहिए कि उसने ऐसा क्यों किया?

आप देख रहे हो कि समाज में जो लोग मजबूत हैं, सामर्थ्यवान हैं, ताकतवर हैं, आप उनकी तरह बनना चाहते हो। तो इस दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति कौन है? महात्मा — जहां राजा भी सिर झुका देते हैं। तो आप महात्मा क्यों नहीं बनते फिर?

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मैं कैसे कहूं कि महात्मा अमीर है? जब मेरी समझ उस स्तर की होगी — जैसे अष्टावक्र गीता में राजा जनक ने सब कुछ दांव पर लगाकर ज्ञान लिया — तब कहूंगा। अभी तो मैं टपरी पर खाने वाला हूं; होटल दिखता है तो मुंह में पानी आता है। मेरे अनुसार तो वही आदमी अमीर हुआ ना।

अब देखिए, यहां दौड़ है। अगर आप अपनी तुलना किसी और से कर रहे हो, तो आपको देखना है कि अपनी समझ से आप किससे अपनी तुलना कर रहे हो। फिर उसके जैसी मेहनत करो, उसके जैसे अपने आप को काबिल बनाओ। आपकी तुलना किससे है — वह आप देखो।

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जैसे ही मेरा पड़ोसी कुछ नया करता है, मैं अपने आप लो फील क्यों करने लगता हूं? क्या मैं उस प्रतिस्पर्धा से हट ही जाऊं? पर मैं उसी समाज का हिस्सा हूं और मुझे वहीं रहना है।

देखिए, जब आपके पास उससे अच्छा था, तो आपको लग रहा था मैं शांति से रह रहा हूं। आप शांति से नहीं रह रहे थे, आप मान में, दिखावे में रह रहे थे कि मेरे पास उससे ज्यादा है, यह मुझसे कमजोर है। शांति उसकी कमजोरी से मिल रही थी। जैसे ही वह आपसे बड़ा हुआ, वही शांति अशांति में बदल गई। जितने लोगों के साथ मैं दौड़ कर रहा हूं, एक न एक दिन वे आगे-पीछे छूट जाएंगे। हर आदमी देखे तो बीच में खड़ा है; कोई यह नहीं कह सकता कि मैं सबसे नीचे हूं या सबसे ऊपर, क्योंकि सबसे नीचे या सबसे ऊपर गया तो दौड़ से ही गया — दौड़ हमेशा बीच वाला करता है। अगर मैं इनसे आगे जाता हूं तो इनके आगे भी लोग हैं। जिससे मैं तुलना कर रहा हूं, क्या वह फाइनल व्यक्ति है? ऐसा तो है नहीं। अंबानी का नाम लिया — उनसे ऊपर भी विश्व में कितने हैं, कितने उद्योगपतियों का तो नाम भी नहीं पता। हो सकता है जितने देश गिने गए हैं, उससे ज्यादा देश इस पृथ्वी पर हों — खोज से पहले लगता था इतने ही हैं, खोज हुई तो बढ़ गए। तो कहां तक दौड़ करोगे? और जिनके साथ दौड़ रहे हो, क्या वे रहेंगे? तो मुझे अपने मकसद को समझना चाहिए कि मेरे जन्म का उद्देश्य क्या है। मुझे किसी से कंपटीशन ही नहीं करना। तुलना करने वाला व्यक्ति जिंदगी भर परेशान रहता है। मुझे तुलना क्यों करनी पड़ रही है? इसका मतलब मेरा कोई व्यक्तिगत लक्ष्य नहीं है; दूसरों को देखकर मैं जी रहा हूं, तभी तो तुलना है। क्या मैं इतना भी नहीं समझ पाया कि मुझे जीवन जीने के लिए क्या-क्या चाहिए, मेरी जरूरत क्या है? तो मुझे तुलना से हटना पड़ेगा, क्योंकि जिसके साथ मैं तुलना कर रहा हूं, क्या वह फाइनल व्यक्ति है?

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हम उल्टा यही सोचते रहते हैं कि पड़ोसी क्या सोचेगा — हमारी चाल के बारे में क्या सोच रहा होगा, हम कौन सी सब्जी किस थैली में ला रहे हैं।

वो भी यही सोच रहा है। क्योंकि आप उसके बारे में सोच रहे हो कि मंडी से यह किस रेट से खरीद रहा है, शाम को जाकर गली-सड़ी सब्जी लाता है — तो वह भी आपके बारे में यही सोच रहा है। तो आप उसके बारे में सोचना बंद कर दीजिए, कुछ दिन में वह आपके बारे में सोचना बंद कर देगा, क्योंकि जब प्रतिक्रिया नहीं मिलेगी तो वह भी सोचना बंद कर देगा। वह इसलिए सोच रहा है कि आप सोच रहे हो, आप इसलिए सोच रहे हो कि वह सोच रहा है — जिंदगी भर एक-दूसरे को परेशान करते रहोगे। तो कम से कम आप बंद कर दो। और आप यह सोचो कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है, मुझे क्या चाहिए। अगर कुछ चाहिए तो उसके लिए काम करना पड़ेगा।

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भारतीय माता-पिता का भी एक मुख्य वाक्य होता है — ‘लोग क्या कहेंगे’। इस पर क्या कहेंगे?

सही बात है। यह बात मुझे भी सुनने को मिलती थी — लोग क्या कहेंगे। तो मेरा एक ही कहना था कि लोगों को जो भी कहना हो कहें, मुझे तो सिर्फ अपना काम करना है। लोग क्या कहेंगे, उससे मुझे क्या मतलब? क्योंकि मैं लोगों के लिए थोड़ी जी रहा हूं; पहले तो मैं अपने लिए जी रहा हूं। जब मुझसे कुछ बचेगा, तभी मैं लोगों के लिए कर पाऊंगा। ‘लोग क्या कहेंगे’ — यह कमजोर व्यक्ति की भाषा है। मैं दुनिया से नहीं हूं, दुनिया मुझसे है। मैं हूं तो ही दुनिया है; मैं खत्म तो दुनिया खत्म। और मैं जिंदगी इसलिए काट रहा हूं कि ये क्या सोचेंगे — क्या ये मेरे साथ जाने वाले हैं? तो मुझे सिर्फ इतना सोचना है कि मुझे क्या करना है। और जैसा मैं करूंगा, वैसा ही लोग सोचेंगे।

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यह देश पहले अंग्रेजों का गुलाम रहा; वह दासता मुझमें इतनी है कि घर में भी सोचता रहता हूं कि सामने वाला क्या सोच रहा है। पति-पत्नी आपस में सोचते हैं कि यह मेरे बारे में क्या सोच रही थी, मेरा फोन तो नहीं देख लिया, नोटिफिकेशन तो नहीं पढ़ लिया। मैं इतना संकीर्ण हो गया हूं कि अपनी जिंदगी खुलकर भी नहीं जी पा रहा।

खुलकर इसलिए नहीं जी पा रहे कि कहीं न कहीं आप कमजोर हो, आपकी अधीनता है। नहीं तो खुलकर कह दो — भैया, मैं तो ऐसा ही हूं, ऐसे ही जीना चाहता हूं। लेकिन आप इसलिए नहीं बता पा रहे कि आप वह भी करना चाह रहे हो; उनके बिना भी नहीं चलेगा, इसके बिना भी नहीं चलेगा। टूट-टूटकर जिंदगी जी रहे हो — 5 ग्राम इधर से, 5 ग्राम उधर से। इसलिए आप अपने आप में पूरे नहीं हो। जितनी मेरी जरूरत है, उतने में जियूं — पहले एक बार उतना कर लूं। आप देखो कि फाइनली सच में मुझे क्या चाहिए, और जो चाहिए उसके लिए लगातार काम करो। कुछ भी चाहिए तो काम तो करना पड़ेगा। पहले पता करना पड़ेगा कि मुझे जाना कहां है, फिर यात्रा करनी पड़ेगी। ऐसे कैसे हो सकता है कि जाना कहां है यह बाद में पता करेंगे? पर ऐसा ही तो हो रहा है — कभी इसमें लिप्त, कभी उसमें लिप्त, ऑप्शन में जिए चले जा रहे हैं। मेरे पास पते इकट्ठे हो रहे हैं, और पतों का अंत नहीं है, क्योंकि जिस घर का पता ले रहे हो, कुछ साल बाद मालिक बदल जाता है, नक्शा बदल जाता है। जिस इंसान के पास रहना चाह रहे हैं, वह दूर से जितना अच्छा लगता है, पास रहो तो लगता है कि इसने जिंदगी नरक कर दी। शहर से लोग गांव जाते हैं — वाह, वाह! एक हफ्ते बाद — चलो यहां से, घुटन हो रही है। दादी दिख जाती है — कितनी प्यारी है! दो दिन रहो तो बस। अमीर आदमी कभी झोपड़ी में, गांव में जाता है तो कैसी बातें करता है, लेकिन जब वहां रहना पड़े — चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात। उसी में हमारी जिंदगी है, हर रिश्ते में भी यही है। कहीं न कहीं हम अपने आप को बहला-फुसला रहे हैं। हमारे पास पते खूब हैं, पर मुझे कहां जाना है यह नहीं पता। बस यह पता लगा लो कि मुझे जाना कहां है — बात खत्म हो जाएगी और तुम वहां पहुंच जाओगे। तुम्हारे अंदर वह क्षमता है।

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गुरु जी ने बताया था कि लोग आवरण देखकर आपसे जुड़ना चाहते हैं; कोई यह नहीं सोचता कि असल में व्यक्ति कौन है और क्या सोचता है। आप ‘ठीक’ शब्द के प्रयोग की बात करते हैं — उसके पीछे क्या सोच है? और (समय आदि का) अनुमान लगाना कहां तक ठीक है?

‘ठीक’ शब्द का प्रयोग तब करना चाहिए जब हम लेन-देन कर रहे हैं। जैसे कोई मुझे भोजन करा रहा है — कैसा बना? ठीक। ‘ठीक’ न अच्छा होता है, न बुरा। अगर आप अच्छा कहेंगे तो उसका राग बढ़ेगा, और उसका बढ़ेगा तो आपका भी बढ़ेगा। बुरा कहेंगे तो द्वेष बढ़ेगा — उसने घंटों मेहनत की और आप कुछ मिनट में खाकर बोलोगे बुरा बना; बुरा बना भी हो, तो भी उसे तकलीफ होगी। ‘ठीक’ में न राग होता है, न द्वेष; कोई प्रतिक्रिया ही नहीं उठती — न तुम्हारी, न उसकी। तो ‘ठीक’ में तुम फंसोगे नहीं। इसे बहुत गहराई से समझना — प्रत्यक्ष ज्ञान का मूल सार यही है। ‘मैं’ से मैंने ‘मेरा’ बनाया — पहले जरूरत में बनाया। ‘मेरा’ में एक मेरे शरीर की ताकत, एक वैभव की ताकत, एक समझ की ताकत; फिर जिन लोगों को मैंने ‘मेरा’ बनाया, उनके शरीर, समझ और वैभव की ताकत मेरी ताकत हो गई। जब मैंने जरूरत में ‘मेरा’ बनाया, तो कोई अहम भाव नहीं था। फिर उसे मान, सम्मान, नाम, शोहरत, पैसे के लिए यूज करने लगा। झुंड की ताकत मिली, तो परम सत्य दब गया और मैंने अहम धारण कर लिया। अब अहम इतना खड़ा हो गया कि मैं खुद उससे ग्रसित हूं, परेशान हूं — मजबूत होते हुए भी निर्बल हो गया। क्योंकि जिनको मैं यूज कर रहा हूं, उनके लिए यूज भी होना पड़ेगा, नहीं तो वे मुझे नोच लेंगे। वे अनेक हो गए, मैं एक। पहले मजा आया कि इतने लोग मेरे लिए यूज हो रहे हैं; यह समझ नहीं आया कि वे इसलिए यूज हो रहे हैं कि जितना यूज हो रहे हैं, उससे ज्यादा तुम्हें यूज करेंगे। अब 100 लोग एक साथ तुम्हें नोचेंगे — बलि का बकरा। तो ‘मैं’ से ‘मेरा’, ‘मेरा’ से अहंकार — सुख-स्वाद के चक्कर में। अब लेन-देन में अच्छा नहीं भी है तो अच्छा बोलना पड़ता है; विरोधी बुरा नहीं है तो भी बुरा कहना पड़ता है। पब्लिक में काम करने वाला जिसके साथ खड़ा भी नहीं हो सकता, उससे गले मिलना पड़ता है; अथाह घुटन होती है, पर कह नहीं सकता, मुस्कुराकर टाल देता है, क्योंकि कह दे तो सब खत्म। धीरे-धीरे लोगों के प्रभाव में, नाम-शोहरत-पैसे के लिए हमने इतनी तकलीफ इकट्ठी कर ली कि जिंदगी नरक लगने लगी है, पर किसी से कह नहीं सकते। फंसने की दो ही स्थितियां हैं, ध्यान रखना — एक लेन-देन में (अच्छा-बुरा), और एक जब मैं काम करता हूं। काम मिला, परिणाम अभी आया नहीं, पर मैं ठोक देता हूं, स्टैंप मार देता हूं कि इतने बजे तक करके दे ही दूंगा। हो गया तो अहंकार खड़ा — देखो मैंने बोला था ना। नहीं हुआ तो सिर नीचा, और मैं सफाई दूंगा, जिम्मेदारी नहीं लूंगा — लाइट चली गई थी, पेन की स्याही खत्म हो गई, साधन खराब हो गया, ट्रैफिक लग गया। तो जब भी कोई काम करो, संभावना व्यक्त करो कि लगभग इतने बजे तक कर दूंगा, पक्का नहीं। कोई पक्का पूछे तो कह दो — पक्का नहीं है, क्योंकि इतने समय तक मैं जीवित रहूंगा या नहीं, यह भी मुझे नहीं मालूम। कभी समय का स्टैंप मत मारो; हो सकता है उससे पहले ही कर दूं। कहो कि मैं पूरी कोशिश करूंगा; अगर पूरा सिस्टम सही रहा तो मैं इतने समय में कर देता हूं। सिस्टम मेरे हाथ में नहीं है — न इस शरीर का सिस्टम, न जिन साधनों से काम करूंगा उनका। जब आप अनुमान लगाते हो, तो कर्ता का भाव प्रकट होता है — मैंने किया। और जब काम नहीं हो पाता, तो सफाई देते हो, किसी को मोहरा बनाते हो कि मैं तो कर देता, पर इसने नहीं किया। जैसे ही आपने किसी काम को समय में बांधा, या पक्का कहा कि परिणाम यही आएगा, आप वहीं फंस जाते हो। यह ‘मैं’ का चक्कर है — तुम अपने आप को सिद्ध करना चाहते हो कि मैं कुछ हूं, और इसका मतलब है कि अंदर से बहुत कमजोर हो, इसलिए इस काम के सहारे अपने आप को सिद्ध करना चाहते हो।

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(‘मुट्ठी में क्या है’ जैसे खेल के संदर्भ में) हमारे अंदर यह क्या बीमारी है कि हम हमेशा अपने आप को सिद्ध करने में लगे रहते हैं? हम ऐसा क्यों करते हैं?

इसलिए कि मैं उस मूल सत्ता से हूं। इसलिए यहां हर व्यक्ति अपने आप को सिद्ध करना चाहता है। आदमी को भी छोड़ो — हर जानवर, पशु-पक्षी अपने आप को सिद्ध करना चाहता है कि मैं हूं। देखो, जानवर जानवर को दबाते हैं — क्या कोई मतलब है? लेकिन वह भी सिद्ध करना चाहता है कि जो कुछ भी हूं, मैं हूं और तुमसे ज्यादा हूं। और यह तब तक करेगा, जब तक वह अपने मूल, उस परम आनंद, उस परम स्थिति को उपलब्ध नहीं हो जाएगा; तब तक ऐसे ही बेचैन बना रहेगा। या उसे परम स्थिति तक पहुंचने का मार्ग मिल जाए, तब वह छोड़ देगा — फिर अपनी एनर्जी फालतू सिद्ध करने में नहीं, परम स्थिति को उपलब्ध होने में लगाएगा। अगर मार्ग नहीं मिला है, तो समाज में अपने आप को सिद्ध करने में लगाएगा, क्योंकि उसे पता नहीं कि उसके पास अथाह ताकत है; वह उस ताकत का उपयोग कहां करे, अपनी ऊर्जा कहां लगाए — इसलिए बेचैन हो जाता है।

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आगे के कर्म तो (राग-द्वेष न बनाने से) नहीं बनेंगे, लेकिन पिछले कर्म कैसे कटेंगे? क्या उसके लिए सत्कर्म करना पड़ेगा?

आगे का फार्मूला तो मैंने बता दिया कि आगे राग-द्वेष कुछ नहीं बनने वाला, कर्ता का भाव प्रकट नहीं होगा — बात खत्म। लेकिन पिछले का नाश आपके सत्कर्म के द्वारा होगा।

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हम सामने वाले को भी जज करते हैं कि किस गाड़ी में आया, कैसा सूट-बूट है। यह एक तरह की बीमारी है। इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए?

आप देखो, क्या आपने कभी अपने से नीचे वाले को जज किया है? नहीं — उसे तो भाव ही नहीं देते; जज अपने से ऊपर वाले को करते हो। तो जब भी आप किसी को जज कर रहे हो, इसका मतलब तुम उससे कमजोर हो। आप मजबूत बनो। और यह देखना है कि जो वह कर रहा है, उसे उसकी जरूरत क्या है। आज मेरे पास फॉर्च्यूनर है, जबकि दो-तीन साल पहले मैं फटे कपड़ों में घूमता था — यह आज मेरी जरूरत है; अगर फॉर्च्यूनर न होती तो इतनी जगहें खोज नहीं सकते थे।

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मेरे अंदर जैसे कोई मशीन फिट हो गई है — तुरंत सोचने लगता हूं कि इसकी टी-शर्ट 100 की है या 500 की, कटिंग सड़क वाले से कराई या बड़े सैलून से, जूते असली प्यूमा के हैं या नकली, हैसियत तो लग नहीं रही। ट्रेन-बस में भी सामने वाले को उसके बैग से जांचने लगता हूं। पूरी एनर्जी इसी में चली जाती है। इस बीमारी का इलाज कैसे करूं?

इस बीमारी का यही इलाज है — मैं अपनी घटना बताता हूं। जब मैं फटे कपड़ों में भ्रमण करता था, तो कोई कुछ भी बोले कि मैंने यह कर दिया, वह कर दिया, मैं सुनता था, हां-हां करता था। एक महाराज जी बोले, कोई कुछ भी फेंकता है, आप हां करते हैं। मैंने कहा, अगर मैं सिद्ध भी कर दूं कि यह नहीं है, तो उससे क्या होगा? और सिद्ध करने में समय लगेगा। अगर वह फेंककर ही अपने आप को खड़ा करना चाहता है, तो कुछ तो (कमी) है। ‘ना’ कह देंगे तो क्या वह फेंकना बंद कर देगा? ऐसा तो है नहीं। और कोई फेंक भी नहीं रहा, फिर भी आप जांच रहे हो — इसका मतलब है कि आप अभी कमजोर और मजबूत के बीच में हो; न पूरी तरह कमजोर, न पूरी तरह मजबूत। तो मेरा यही कहना है कि अपनी समझ को विकसित करो। वहां यह विचार करो कि आखिर मैं इसे क्यों जांच रहा हूं? मुझे क्या मिलेगा? यह है तो क्या हो जाएगा, नहीं है तो क्या हो जाएगा?

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यह भी देखा गया है कि जो हमसे कमजोर होते हैं, उन्हें हम नहीं जांचते। (आपके सत्संग से समझ आया कि मुझे अपनी जरूरत देखनी चाहिए, दूसरों से तुलना में ऊर्जा बर्बाद नहीं करनी चाहिए।)

जो खिला नहीं पाएगा, उसके बारे में हम थोड़ी सोचेंगे कि वह पूछ ले; वह तो हमारी श्रेणी का है — भाई, तू भी इंतजार कर। जांचते उसे हैं जिससे उम्मीद होती है। आप एक दिन के भूखे हो और दो दिन का भूखा मिल गया, तो उससे तो पीछा छुड़ाओगे। जब भी आप किसी को जांच रहे हो, इसका मतलब आपमें कोई कमी है, आप उसे पूरा करना चाहते हो और उस व्यक्ति की तलाश में हो। बिना टिकट ट्रेन में चढ़ जाओ, तो हर सफेद-काले कपड़े वाला टीटी ही दिखता है; हर चढ़ने वाले को देखता है कि टीटी तो नहीं आ गया, और अगला स्टेशन आते ही उतर जाता है, भले वह टीटी न हो — क्योंकि उसकी कमी है, टिकट नहीं है। तो जब भी हम किसी को जांच रहे हैं, इसका मतलब मैं कुछ ढूंढ रहा हूं। अपने आप को सामर्थ्यवान बनाओ। जब से कुटिया बनाई है, मैं नहीं देखता कि कोई भोजन पूछेगा या नहीं; सोचता हूं कि कोई भूखा है तो मैं खिलाऊं। हर आने वाले से पूछता हूं; मेरा सबसे कहना है कि कोई भी आए, पहले उसे भोजन दो, पूछो — क्योंकि मैं भुक्तभोगी हूं। एक बार मैं और महाराष्ट्र के एक बाबा जी पहाड़ों में लगभग 20 किलोमीटर चलकर ठंड के महीने में एक गांव पहुंचे। उस गांव का नियम था कि भोजन मांगोगे तो बनाएंगे, और हम मांगने वाले नहीं थे। बाबा कुछ बिस्किट लाए — बिस्किट से पेट भरता है? रात करीब 9 बजे एक महिला आई — बाबा जी, भोजन किए हैं? उम्मीद की किरण फूटी। कहा, नहीं किए माता जी। बोली, बोले होते तो बना देते; ठीक है, आराम करिए। दोबारा भी यही हुआ। अब सोचिए उस समय क्या बीती होगी। अगले दिन रास्ते में कोई मिला तो बोला मेरा हाथ देखो। बहुत किलोमीटर चले; दोपहर बाद ऐसी स्थिति हो गई कि एक कदम नहीं चल सकते थे, शरीर ने साथ छोड़ दिया। नर्मदा किनारे जाकर लेट गया, पानी पिया, स्नान किया। पास के बंद आश्रम में थोड़े चावल, लटका पपीता, हल्दी-नमक मिला, तो खिचड़ी बनाकर खाई। आज हंसी आ रही है, पर सोचो उस समय क्या हुआ होगा। तो जब भी आप किसी को जांचते हो, इसका मतलब आपके अंदर कोई कमी है और लग रहा है कि यह पूरा कर देगा, इस उम्मीद में जांच रहे हो। अब यह देखना है कि वह सच में आपकी कमी है, या बस मान के चक्कर में बनाई हुई कमी है।

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तो क्या मान के चक्कर में ही हमने जरूरत से ज्यादा व्यवस्थाएं इकट्ठा करने की कोशिश की है, उसके पीछे भाग रहे हैं?

हां, ज्यादातर मान के चक्कर में। आप देखो तो आपने जरूरत से ज्यादा हासिल कर लिया, इतनी दौड़ लगाई — क्योंकि मेन दौड़ आपको योग की तरफ लगानी थी, और आपने भोग की तरफ इतनी दौड़ लगाई कि हद से ज्यादा हो गया, और हद से ज्यादा परेशानियां भी हो गईं। जितना सामान बढ़ेगा, उसकी सुरक्षा और देखभाल में भी तो समय देना पड़ेगा। मेरा लोगों से यह कहना है — देख लो शरीर ज्यादा से ज्यादा कितना चलेगा, और महीने का कितना खा सकते हो। अगर उतनी प्रॉपर्टी, उतनी सेविंग हो गई है, तो बंद करो और योग-साधना करो, अपने आत्मिक कल्याण में लग जाओ। लोग कहते हैं 60 के बाद निकलेंगे — 60 के बाद घुटने चलते नहीं, जहां जाओगे सबको शारीरिक-मानसिक परेशान करोगे, क्योंकि तुम एक रोगी व्यक्ति हो। 60 के बाद नया बदलाव कैसे होगा? बातों का इतना संग्रह हो जाता है और एनर्जी बचती नहीं; जिन इंद्रियों से लेन-देन कर रहे थे, सब कमजोर हो गईं; जब समझने की क्षमता थी, तब कुछ और भर लिया। रोज किसी बीमारी से जूझोगे — घुटना, कमर, गैस, आंख, कान — खुद उलझे रहोगे और लोगों को उलझाए रखोगे। मैं तो कह रहा हूं कि अध्यात्म बचपन से, कुमारावस्था से आना चाहिए, जब एनर्जी होती है; बच्चों को सिखाना चाहिए। उसी समय आप कुछ कर सकते हो — जज्बा होता है, आत्मविश्वास होता है। आर्मी 18 में भर्ती करती है और जल्दी रिटायर करती है; सरकार 60 में रिटायर कर देती है; 60 में कोई नौकरी पकड़ना चाहे तो चाहने से क्या होगा? यह हर जगह लागू होता है। अगर अध्यात्म में उस परम स्थिति को उपलब्ध होना चाहते हो, तो सबसे अच्छा समय है कुमारावस्था — 16-17-18 से; इसमें व्यक्ति लग गया तो परम स्थिति को उपलब्ध हो जाएगा। 60 में जिस साधन (शरीर) से साधना करनी है, वह उस लायक ही नहीं रहता — यह मैं सच्चाई बता रहा हूं। युवाओं को मैं यह सलाह नहीं दूंगा कि 60 के बाद आओ; कुमारावस्था में आओ। लेकिन कोई कहे कि 60 का हो गया, तो मैं कहूंगा — आओ, कम से कम अभी से शुरुआत करो।

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योगी जी, आपने एक रील में कहा था कि ‘नया भरना बंद कर दीजिए’। उसका मतलब क्या था — व्यवस्थाएं जोड़ना बंद कर दें, या मोह-माया छोड़ दें? अगर वह सब बंद कर दिया तो हमारी समझ कैसे विकसित होगी, हम अर्थव्यवस्था में योगदान कैसे देंगे?

मैंने कहा कि नया भरना बंद करो, पुराना खत्म हो जाएगा — यानी राग-द्वेष। राग-द्वेष में जो लेन-देन कर रहे हो, वह बंद करो। राग-द्वेष कब होता है? जब आप कमजोर होते हो — सामने वाला दे देता है तो राग, नहीं देता तो द्वेष। अगर आप सामर्थ्यवान हो, तो वह दे तो राग नहीं, न दे तो द्वेष नहीं; आपको कहीं और से मिल जाएगा, आपके पास अनेक ऑप्शन हैं। तो राग और द्वेष भरना बंद करो। इसका मतलब — अगर आपको कुछ चाहिए तो उस लायक बन लो; रिक्वेस्ट मत करो। जैसे मैं यहां काम कर रहा हूं — जो चीजें हम मूल्य देकर ला रहे हैं, अगर मैं रिक्वेस्ट करूं तो मुफ्त आ जाएं; लोग ऑफर भी दे रहे हैं, आकर अपना परिचय बता रहे हैं कि मुझसे भी कुछ सेवा ले लो। और आपके सामने मैं उन्हें मना कर रहा हूं — अपना परिचय अपने पास रखो। अगर मैं ले लूं, तो इस नियम से कभी काम नहीं कर सकता, क्योंकि उनका दबाव मुझ पर हो जाएगा। पहले सेवा देंगे, फिर जब चाहेंगे आएंगे, अपनी मनमानी करेंगे; उन्हें आपसे राग हो गया। और अगर आपने कहा नहीं, आप जाओ, तो वे द्वेषी, शत्रु हो जाएंगे। हो गया राग-द्वेष। जो देगा, वह दबाएगा भी, क्योंकि वह अपनी ताकत दे रहा है — परिचय हो, पद हो, सेटिंग हो। तो उसकी ताकत का उपयोग ही मत करो, तब राग-द्वेष होगा ही नहीं। तो जब भी कुछ करना हो, सामर्थ्यवान होकर करो। देखो, यहां किसी से राग-द्वेष है? एकदम खुला बोलते हैं — आओ, बिस्किट खाओ, यहां के नियम में बैठो। कमजोर बनकर काम मत करो; जीवन में कुछ करना है तो उस लायक बनकर करो। मैं जो काम कर रहा हूं, उसके 100 नहीं, 101% लायक हूं, तभी कर रहा हूं; क्योंकि काम के बाद परिणाम भी आएगा — मैंने संकल्प लिया तो उसका परिणाम भी आपने देखा। इस सृष्टि में बस एक गुरु ऐसा है, क्योंकि वह मुक्त है और आपको हर तरह से सामर्थ्यवान बनाना चाहता है। बाकी दुनिया में जो भी आपको कुछ देगा, उससे ज्यादा लेने का प्रयास करेगा, और उसी में राग-द्वेष होगा। तो राग-द्वेष भरना बंद करो, क्योंकि राग-द्वेष ही तो बंधन है, और यह तभी होता है जब आप कमजोरी में लेते हो।

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हर जगह तो मजबूत नहीं बन सकते। मैं बस इतना कर सकती हूं कि जितनी मेरी जरूरत है, उसी में जियूं; क्योंकि हर कमजोरी तो नहीं निकल सकती — मैं होड़ करती हूं, कल्पना करती हूं कि काश मेरे पास भी यह गाड़ी हो, ऐसा महल हो।

हां, जरूरत में जी लो। देखो, उस महल, उस गाड़ी की जरूरत है क्या? मिल जाएगा तो करोगे क्या, उसका उपयोग क्या करोगे? गाड़ी आएगी तो पोंछा ही मारोगे; कोई गिफ्ट में दे दे तो पेट्रोल कहां से लाओगे? एक दरिद्र को धन दे दो तो पगला के मर जाएगा, उसका उपयोग कैसे करेगा? किसी गरीब को एक-दो लाख कैश दे दो, तो वह सो नहीं पाएगा — डर लगेगा कि कहीं कोई छीन न ले।

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क्या कुटिया में दो दिन के लिए भी रहने आ सकते हैं?

दो दिन के लिए क्यों? आजीवन आओ।

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गुरु जी, मेरी बहन को आपसे मिलना है।

मिलके क्या करेंगे भैया?

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गुरु जी, मैं सद्गुरु के कहे अनुसार दिन में 14–20 माला जप करता हूं, लेकिन मन अभी भी अशांत है।

देखो, माला जपने के बाद करते क्या हो? बात यह है कि कर्म क्या है। अगर कर्म अशांति वाला है तो आप कितना भी माला जपो, कुछ नहीं होने वाला। क्या कर्म शांति वाला है? वो देखना है आपको।

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गुरु जी, (निर्माण में) बिजली के साथ लोहा लगा है, करंट का डर रहेगा।

डर तो है, क्या करें? अगर डर को सहारा दें तो काम नहीं कर पाएंगे। किससे डरें — जानवर से, सांप से, बिच्छू से, करंट से? हर स्थिति-परिस्थिति में जीना पड़ता है। डरने से काम नहीं होने वाला। आपको काम करना पड़ेगा। काम करके ही कुछ हो सकता है, बातों से बात बनने वाली नहीं है।

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योगी जी, आप इतनी तेजी से काम कराते हैं — आज (हरियाणा कुटिया का) पांचवां ही दिन है; जो भी काम लेते हो उसके पीछे पड़ जाते हो। बिना आराम किए इतनी स्पीड से कैसे कर लेते हैं?

इसलिए कि लोग लाभ ले पाएं। अगर एक दिन गैप करते हैं तो एक दिन का लाभ छूट जाएगा। जब मैं काम जल्दी करूंगा तो लोग उसका लाभ जल्दी ले पाएंगे; लेट करूंगा तो लाभ भी लेट ले पाएंगे। और पता नहीं किसके पास कितना दिन बचा है।

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जैसे इस नए लगाए पेड़ को सहारा, पानी और रोज सुरक्षा चाहिए, वैसे ही आपके सान्निध्य में रहते हैं तो अच्छा लगता है; पर दुनिया में लौटते ही बेईमानी, लालच, स्वार्थ जैसी बुराइयां फिर घेर लेती हैं। वहां मैं अपनी सुरक्षा कैसे करूं?

प्रत्यक्ष ज्ञान के द्वारा जो ज्ञान मिला है, उसमें जियो — वही आपकी सुरक्षा है। और जब समय हो तो जहां भी अपनों की कुटिया का स्थान है, वहां जाओ। अगर आप गृहस्थ जीवन में हो तो 12 महीने में कम से कम एक महीना दो, चाहे दो-दो हफ्ते करके। और अगर आप पूरी तरह खाली हो, तब तो अपनों की कुटिया में ही हो जाओ, वहीं साधना करो।

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अगर मेरे लिए कुटिया आना संभव न हो — जैसे इस पेड़ को पेड़ बनने तक डंडी का सहारा चाहिए — तो संसार में रहते हुए ज्ञान का वह सहारा मुझे कैसे मिले?

प्रत्यक्ष ज्ञान को अपनाओ। अगर आपने प्रत्यक्ष ज्ञान को समझ लिया है और आप उसमें जी रहे हो, तो आपकी सुरक्षा पूरी है।

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समझने के बाद भी कभी-कभी हम उसी गड्ढे में फिर गिर जाते हैं, तो क्या हमें बार-बार किसी (गुरु) की जरूरत पड़ती है?

हां, एकदम। इसीलिए मेरा कहना होता है कि जीवंत गुरु की जरूरत है। मैं बार-बार बोलता हूं कि इतिहास में जितने भी गुरु हुए, उन्होंने कहा कि जीवंत गुरु की जरूरत है। आपके पास ज्ञान है, तो भी एक जीवंत गुरु चाहिए। अगर आप गिरे हो, और शब्द देने वाला गुरु है, तो वह आपको संभालेगा — अगर आप उसके शब्दों में चल रहे हो।

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आपने कुटिया इतनी दूर, (गांवों से) इतनी दूरी पर क्यों बनाई?

जंगल में इसलिए बनाया कि आसपास गांव न हो। चाहे दिन हो या रात, आलपुरा में खड़े हो जाओ या यहां, आपको गांव की झलक भी नहीं मिलेगी — आधे किलोमीटर में ऐसा सुनसान बियाबान है। इसलिए कि हम आंखों, कानों, नाक, मुंह और स्पर्श के द्वारा जैसा पाते हैं, वैसा सोचने लगते हैं। तो हमने कहा, अब तुम्हें ऐसा सोचने का मौका ही न मिले — तुम खुद को देखो और प्रकृति को देखो। जंगल में आने का मतलब — शांति से बैठो, इसके अलावा कोई रास्ता ही नहीं। क्योंकि कोई मनोरंजन वाली चीज आंखों के सामने नहीं आएगी कि तुम उसमें लिप्त हो जाओ, कानों में ऐसी आवाज नहीं आएगी कि तुम उसमें लिप्त हो जाओ।

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आपने बात बता दी और समझ भी ली, लेकिन कुछ न कुछ संशय तो रह ही जाता है, जाता नहीं।

देखना है कि संशय कहां है। संशय चलने में है ना, मार्ग में तो नहीं? मार्ग में नहीं है, तो फिर संशय नहीं है। कहीं न कहीं मैं लिप्त हूं, अपनी किसी आदत से मजबूर हूं; मुझे वह आदत छोड़नी है। यह संशय नहीं है। संशय तो आपके अलावा किसी और पर होगा। आप पर आपको कभी संशय उठ ही नहीं सकता, क्योंकि आपको अपनी ताकत, अपनी समझ का सब पता है; आप कहां लिप्त हो, यह भी पता है। संशय सिर्फ एक जगह उठेगा — मार्ग पर। और मार्ग में कोई संशय नहीं है। तो कहीं न कहीं लिप्त हो, आपकी कोई कमजोरी है जिसे समझने के बाद भी छोड़ नहीं पा रहे हो। इसे संशय नहीं बोलेंगे।

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चलेंगे तो पहुंच ही जाएंगे, लेकिन चलेंगे कब? क्या उसके लिए किसी धक्के की जरूरत है? हमें तो महसूस ही नहीं होता कि हमारी यात्रा हो रही है।

धीरे-धीरे आप समझेंगे तो चल ही देंगे — और चल रहे हैं; समझने में ही चल रहे हैं। परिणाम तो क्षण में आता है। आप समझ रहे हैं, इसका मतलब चल रहे हैं। कम से कम यह तो पता चला कि मैं कहां लिप्त हूं, यह छूट नहीं रहा — इसका मतलब छोड़ने का प्रयास हो चुका है। ऐसा नहीं कि आपकी यात्रा नहीं हो रही। इसको और गहराई से समझ लो, आज एकदम क्लियर कर लो — जैसे-जैसे आप समझ रहे हैं, वैसे-वैसे यात्रा हो रही है। कैसे? क्योंकि मुझे पता चल रहा है कि कहां-कहां मैं लिप्त हूं, किन आदतों में फंसा हूं; और यह भी समझ पा रहा हूं कि अभी इसे छोड़ नहीं पा रहा। लेकिन इसका मतलब है कि मैं छोड़ सकता हूं, और कभी न कभी छोड़ दूंगा। अगर समझ में आ गया है, तो कभी न कभी छोड़ ही दोगे। मैं समझ गया कि मैं इसमें लिप्त हूं और छोड़ना चाहता हूं पर छोड़ नहीं पा रहा, कहीं न कहीं मुझे इससे नुकसान है — तो एक दिन ऐसा आएगा, आप उसे छोड़ दोगे।

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जिसमें मैं लिप्त हूं, उसे छोड़ना है; लेकिन जो रिश्ते हैं — जैसे मां-बाप — क्या उन्हें छोड़ना ठीक है?

रिश्तों में उम्मीद छोड़ना ठीक है, रिश्तों को नहीं। वह उम्मीद छोड़ो। रिश्ते छोड़ने से कुछ नहीं होगा। (उम्मीद छूटेगी तो) फिर वही होगा — जरूरत में जीना।

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जरूरत में जीना — पर जरूरत मेरी भी है और उसकी भी; दोनों की है। तब क्या?

जरूरत कभी एक की नहीं होती। अगर एक की हो और एक की न हो, तो सामने वाला तैयार नहीं होगा; तब जबरदस्ती करनी पड़ेगी — वह ताकतवर होगा तो आप नहीं पाओगे, आप ताकतवर हो तो छीन लोगे। जानवरों में आपने देखा होगा, ताकतवर जानवर खा लेता है, बचा हुआ कमजोर खाता है। और अगर दोनों की मर्जी है — अब देखो, एक मां को खुद भूख है, फिर भी बच्चों को भोजन करा देती है। क्यों? उसकी भूख भी है, ताकतवर भी है, लेकिन उसकी जरूरत है बच्चों को बचाना। इसलिए वह अपना भोजन छोड़ देती है। तो जरूरत में ही तो हम घूम रहे हैं।

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जब मैं पैसा, शोहरत, मान बढ़ाना चाहता था तो नहीं बढ़ रहा था और मैं ज्यादा परेशान था। अब मैं मान, पैसा, ऐश नहीं चाहता, लेकिन वह अपने आप बढ़ रहा है। इसमें क्या होता है?

जैसे आप व्रत रख लो — आपने भी महसूस किया होगा — कोई कह दे कि दो दिन से व्रत है, तो लोग आपको बहुत कुछ खिलाना चाहते हैं, क्योंकि आप छोड़े हो। सामान्य खाओ तो सामान्य खिलाएंगे। घर में कोई एक हफ्ते व्रत रखे, तो देखो उसकी किस तरह सेवा करते हैं, अलग-अलग तरह के व्यंजन बनाकर देते हैं। कोई कह दे कि छह महीने का निर्जला व्रत है, तब तो गांव टूट पड़ता है। मेरे यहां एक महिला साधना करने आई थीं, मेरे सान्निध्य में उन्होंने व्रत रखा, तो लोग आए कि दर्शन करना है। मैंने कहा, उनके दर्शन से क्या होगा? अभी तो वे लिप्त हैं, पता नहीं व्रत भी किस भाव से रखा है। तो जैसे आप छोड़ोगे, वे चीजें आपके पास और आएंगी। लेकिन मुझे ईमानदारी, सत्कर्म से रहना है। क्योंकि परीक्षा तभी होती है — जैसे कोई पद पर है, तो वह बेईमान है या ईमानदार, यह तब पता चलता है जब रिश्वत सामने आती है। तो आप छोड़ रहे हो, तो उसी समय पता चलेगा कि छोड़ने का नाटक कर रहे हो या सच में छोड़ रहे हो। आपकी बात बिल्कुल सही है — जैसे आप छोड़ोगे, लोग आपके पास और लेकर आएंगे।

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हमारे संकल्प में ऐसा भाव, इतनी दृढ़ता नहीं होती; संकल्प टूट जाते हैं। (आप संकल्प कैसे निभाते हैं?)

मैंने कहा ना, हम कर्ज लेकर भी करते हैं। मैंने कहा, जितना मैंने बोला है, वह करूंगा। आपके लिए मैं कर रहा हूं — आप मेरे साथ हैं तो भी करूंगा, आप मेरा साथ छोड़ दोगे तो भी आपके लिए करके ही जाऊंगा। मेरा यही कहना है कि मैंने जितना बोला है, मैं आपके लिए करके ही जाऊंगा। मैं पीछे नहीं हटूंगा। आप हटो, आप जानो।

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योगी जी, हमारी गाड़ी तीन दिन की बारिश से दलदल में फंस गई थी; फिर ट्रैक्टर ने उसे खींचकर निकाला। तो मेरा प्रश्न है — जहां हम कमजोर होते हैं वहां ताकतवर की जरूरत पड़ती है। आध्यात्मिक मार्ग में मुझे पावरफुल गुरु की जरूरत है, यह कैसे जानूं? बहुत लोग गुरु का टैग लगाए घूम रहे हैं, और हमारे प्रश्न भी अक्सर दिखावे के, किसी से सुने हुए होते हैं। मैं अपने आप को कैसे जांचूं कि मेरी अपनी ताकत खत्म हो गई है और अब मुझे ज्यादा ताकतवर की जरूरत है?

जब शुरुआत में आपकी गाड़ी फंसी तो आपने उसे निकालने का प्रयास किया — ऐसा नहीं कि फंसते ही छोड़ दिया। निकालने में वह और फंसती चली गई। और अगर निकालने का प्रयास नहीं करते तो पक्का भी नहीं होता कि फंस गई। फिर ऐसी स्थिति आई कि आपको पता चला कि अब मेरे द्वारा कुछ नहीं हो सकता। तो ऐसे ही हम भी आकर भवसागर में उलझ गए हैं, फंस गए हैं। आपने उस गाड़ी को तब छोड़ा जब आपको पता चला कि अब प्रयास करेंगे तो गाड़ी पलट भी सकती है। आपने बुद्धिमानी यह की कि पलटने के पहले छोड़ दिया। पलटने के बाद भी किसी के द्वारा निकल ही जाती, लेकिन बहुत टूट जाती, चोट लग जाती। तो अब देखना है कि आप किस स्थिति में गुरु के पास आए हो — फंसे हो, या अपने आप को पलट दिया है, टूट-टाट गए हो? अभी गाड़ी केवल फंसी थी, थोड़ी सहायता से निकल गई और अब खुद चलने लगी। अब वह खुद सक्षम है, किसी छोटी गाड़ी को भी निकाल सकती है, उसमें पावर है। लेकिन अगर पलट गई होती, टूट गई होती, तो निकल तो जाती, पर रिपेयर कराना पड़ता — बहुत ऊर्जा लगती, पैसे लगते। तो देखना है कि मैंने अपने आप को कितना उलझा-फंसा लिया है। अब मुझे निकलना है, तो गुरु का सहारा लेकर मैं निकल सकता हूं।

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(गाड़ी के उदाहरण के संदर्भ में) गृहस्थी में या संसार में रहते हुए मैं कैसे महसूस करूं कि मैं फंसा हूं और मुझे गुरु की मदद चाहिए?

देखना यह है — क्या मैं निराश हूं, दुखी हूं, उदास हूं, बेचैन हूं, घबराहट में हूं? सारी व्यवस्था होते हुए भी मुझे अच्छा नहीं लग रहा, ठीक नहीं लग रहा? और एक बात ध्यान देने की है। गाड़ी को पीछे से खींचा गया तो आपने भी रिवर्स गियर लगाया। अगर वह पीछे खींचता और कहता रिवर्स गियर लगा लो, लेकिन आप अपनी बुद्धिमानी ज्यादा दिखाकर आगे का गियर लगाकर आगे ही मारते, तो बहुत तकलीफ हो जाती। तो कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति आपको निकाल रहा है, तो उसके आदेशानुसार करो। अब अपनी ताकत मत दिखाओ, आपकी ताकत खत्म हो चुकी है। अब वह जैसे कह रहा है वैसे करो, उसी में आप निकल जाओगे। हां, एक बार यह देख लो कि निकालने वाले की ताकत क्या है।

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मुझे यह कैसे जांचना है कि मैं जिस (गुरु) के पास हूं, वह हर तरीके से सक्षम है या नहीं? क्या यह इससे पता चलेगा कि मेरी जिज्ञासाओं के उत्तर मुझे मिल रहे हैं या नहीं?

हां, उसके उत्तर से आपकी समझ विकसित हो रही है कि नहीं। उसकी ताकत का पता तब चलेगा जब आप अपने प्रश्न रखोगे और वह प्रत्यक्ष जवाब देगा, और आपके प्रश्न यूं ही हट जाएंगे, सारे संशय हट जाएंगे। प्रश्न हट जाएगा, तब वह आपसे ताकतवर है। आपके अंदर निकलने की ताकत भले न हो, लेकिन परखने की ताकत कहीं नहीं गई। आप मानव शरीर छोड़ो — ये जितने छोटे-छोटे जीव-जंतु हैं, देखो कैसे अपने से मजबूत से भागते हैं और अपने से कमजोर पर वार करते हैं। जांचने की क्षमता सबके अंदर है, इसके लिए सीखना नहीं है। जांचने की क्षमता आप में है, वह कहीं नहीं गई।

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गाड़ी में तो मुझे आभास हो गया था कि अब पलटेगी और जान का खतरा है। लेकिन संसार में रहते हुए यह कैसे महसूस करूं कि अब बस करो? जीवात्मा का स्वभाव ऐसा है कि हम आखिरी क्षण तक अपना ही नाश करते रहते हैं, छोड़ना जैसे सीखा ही नहीं।

जब तक ताकत खत्म नहीं हो जाएगी, तब तक वह अपने आप को फंसाता रहेगा, किसी की बात नहीं मानेगा। मानवता के नाते — अगर किसी की गाड़ी फंस गई और आप देख रहे हो कि वह निकाल रहा है, और आपको लग रहा है कि नहीं निकल पाएगी, तो एक बार बोल दो। कम से कम उसे यह तो पता चलेगा; और फंस जाएगा तो बोलेगा, काश पहले उसकी बात मान ली होती। तो मानवता के नाते हमारे सामने कोई फंस रहा है तो हमें बोल देना चाहिए।

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(जो व्यक्ति किसी की बात नहीं मान रहा और खुद को फंसाता जा रहा है) क्या उसके ज्यादा पीछे नहीं पड़ना चाहिए?

नहीं। आप ज्यादा पीछे पड़ोगे तो वह आप पर ही गुस्सा हो जाएगा। तो घर-परिवार या समाज में कोई ऐसा हो, तो अपनी सुरक्षा करते हुए उसकी एनर्जी खत्म होने का इंतजार करो। जब उसे पूरी तरह पता चल जाएगा कि अब मैं फंस गया, तब वह खुद निकलने का रास्ता खोजने लगेगा। और मेन बात — आपको समझ में आ गया है ना, तो सर्वप्रथम पहले अपने आप को निकाल लो। बात खत्म।

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(एक भक्त ने भाव से भोजन/प्रसाद भेजा जो सही व्यक्ति तक अपने आप पहुंच गया) योगी जी, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

यह भाव की बहुत बड़ी ताकत है। मैंने कहा था कि जो खाएगा खा लेगा, जिसका भाव उसमें होगा। तो देखो, उसका भाव था और पहुंच गया। भाव में ही ईश्वर का वास है।

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