प्रश्नोत्तर P1-0091 · भाग 1
गुरु जी, जब हमारा स्तर ऊपर उठने लगता है तो लगता है कि हम यहां से निकल जाएंगे, और जब गिरते हैं तो आत्मविश्वास टूट जाता है। लगता है कि हमसे नहीं हो पाएगा, लोग जाने नहीं देंगे, कहीं न कहीं फंसा लेंगे। क्या करें?
कोई फंसा नहीं सकता। इस दुनिया में जीवात्मा ऐसी है कि कोई किसी को फंसा नहीं सकता। जैसे कोई भी वस्तु सदैव के लिए कोई रख नहीं सकता, वैसे ही जीवात्मा को कोई फंसा नहीं सकता। वह कभी फंस ही नहीं सकती। बस अपनी मौज में घूम रही है — लालच में, लोभ में, कामनाओं में, कुछ करने में घूम रही है। कोई किसी को फंसा नहीं सकता, उलझा नहीं सकता। अगर कोई कह रहा है मैं उलझ गया, इसका मतलब उस उलझने में उसे कुछ मिल रहा था। वहां फंस गया, मतलब फंसने में कुछ मिल रहा था।
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