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प्रश्नोत्तर P1-0138 · भाग 1

अष्टावक्र ने राजा जनक से कहा — न यह सत्य है, न वह सत्य है; सत्य तुम हो; जो है वह तुम ही हो, बाकी सब बनाया हुआ है। तो उस (सत्य) में निरंतर कैसे रहें?

उस सत्य में निरंतर तभी रह सकते हैं जब... अभी तो यह शब्दों का ज्ञान है कि यह न सच है, न वह सच है, सत्य तुम हो। अभी तो मैं कहीं लिप्त हूं। जहां मैं लिप्त हूं, वहां से जब मैं पूरी तरह निकल जाऊंगा, निवृत्त हो जाऊंगा — मैं प्रवृत्ति में फंसा हूं, निवृत्त हो जाऊंगा — जब मैं अपने आप में स्थिर हो जाऊं। अभी तो मैं अनेक पिंडों में, अनेक वस्तुओं में घुसा हूं; उनसे मेरी इच्छा है। मुझे खुद नहीं पता मैं कितने पिंडों में फंसा हूं। तो मैंने परिवर्तनशील को धारण कर लिया, और जैसे-जैसे वह परिवर्तित होता है, वैसे-वैसे मेरा स्वभाव, भाव परिवर्तित होता रहता है। क्योंकि मैं जिसको पकडूंगा, जैसा वह रहेगा, वैसा तो मैं भी रहूंगा। इसीलिए हमारी स्थिति हर रोज, हर क्षण एक जैसी नहीं रहती, बदलती रहती है — क्योंकि मैंने परिवर्तनशील को धारण किया है। जब तू परिवर्तनशील को छोड़ देगा, तब तू सत्य में स्थिर हो जाएगा।

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