प्रश्नोत्तर P1-0146 · भाग 1
मैं दूसरे संत के प्रवचन भी सुनता हूं, उनसे भी समझ आता है। क्या ईमानदारी और सत्कर्म के साथ वह भी साथ लेकर चल सकता हूं?
चल सकता है। देख, गुरु ज्ञान का प्रतीक है। निकलने के लिए जहां से भी ज्ञान मिल रहा है, उसे लेकर आगे बढ़ जाना चाहिए। ज्ञान किसी एक का होता नहीं है। जैसे हम रास्ते में निकलते हैं, पानी नहीं है तो किसी से मांगकर पी लेते हैं, प्यास तो बुझती है। यह थोड़ी ना कसम खाएंगे कि उसी नल का पानी पियूंगा — तब तो प्यासा मर जाऊंगा। जहां से भी ज्ञान मिले, लो और आगे बढ़ो; जहां से भी सीखने को मिले, सीखो और निकलो। गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है, और ज्ञान एक ही होता है, दो नहीं। जैसे पानी तरह-तरह के होते हैं, लेकिन काम एक ही करते हैं — प्यास बुझाते हैं। बाद में कभी समस्या नहीं होगी। बस यह है कि एक होता है गंदा पानी, एक शुद्ध पानी — तो जिससे सीख रहे हो, कोई गलत तो नहीं सिखा रहा, आप गलत तो नहीं सीख रहे, यह देखना है।
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