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प्रश्नोत्तर P11-0080 · भाग 11

किसी ने बताया कि शिवलिंग प्रतीक है — परब्रह्म हम हैं और माया ने उसे चारों तरफ से घेरा है; जब माया को समझ जाता है तो हंसता है कि मैं परब्रह्म में ही था। क्या यह सच है?

हमें यह देखना है कि मैं राग-द्वेष में घिरा हुआ हूं। पहले राग-द्वेष से अपने आप को छुड़ाने का प्रयास करें, फिर देखें क्या होता है। राग-द्वेष पकड़ोगे तो बहिर्मुखी होगे, छोड़ोगे तो अंतर्मुखी — बहुत साफ-सुथरी बात है। काम कैसे करना है: राग-द्वेष किस कारण से हुआ, वह देख लेना। कोई विचार या याद पीड़ा दे रही है, तो देखो क्यों आ रही है, मुझे तो कुछ नहीं चाहिए — क्यों, क्यों, क्यों करके जाइए। राग-द्वेष एक वृक्ष की तरह है; पत्ते, टहनियां पकड़कर धीरे-धीरे जड़ तक जाओ और वहां से काट दो, तो कुछ दिन बाद वृक्ष सूख जाएगा; जब तक जड़ तक नहीं जाओगे, कभी टहनी, कभी डाली, कभी तना काटोगे, और तने से भी बहुत वृक्ष बन जाएंगे। घुटन होती है तो आप उससे निकलने का एक ऑप्शन निकाल लेते हो — नहीं, उसकी गहराई में जाओ कि इस घुटन, बेचैनी, याद, आसक्ति, उदासी के पीछे वजह क्या है। इसलिए एकांत में विचारों से मुक्त होने का प्रयास ना करें; विचारों को देखना, और कोई विचार ले जाए तो जाना। संसार में भोग गलत तब है जब गलत तरीके से — झूठ बोलकर, बहला-फुसलाकर — कर रहे हो; भोग की जरूरत आपको नहीं, शरीर को है; शरीर की जरूरत के लिए करो तो देखो करने में ईमानदारी है। बस — ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन है।

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वीडियो: 18 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी #योगी · 2026-01-18