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प्रश्नोत्तर — भाग 11

योगी रविकांत जी (गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 200 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।

(कुटिया में साधिका) मैंने आपकी वीडियो में सुना था कि ब्रह्म परमात्मा की यात्रा करेगा। तो क्या आत्मा ब्रह्म है?

इस वीडियो को फिर से सुन लो। ब्रह्म परमात्मा की यात्रा करते हैं — कौन? ब्रह्म। आप बोल रहे हो कि वीडियो में आया कि जो ब्रह्म है वो आत्मा है; नहीं, आत्मा नहीं। भ्रम, पूर्णब्रह्म, पारब्रह्म — जो मैंने अब तक समझाए हैं — वे बहुत उच्चतम जीव हैं।

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क्या शब्द को ही ऊर्जा कहते हैं? चेतना एक ऊर्जा है, एक शब्द है — ऐसा मैंने अब तक समझा है।

शब्द को ऊर्जा नहीं कह रहे हैं। शब्द समझने वाले के पास ऊर्जा है। अगर शब्द बोल दें और आपके समझ में ही नहीं आए, तो उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? दो व्यक्तियों से कुछ कहा जाए, एक के समझ में आ जाए और एक के नहीं — तो मूल समझने वाला है। अगर समझने वाले में समझ नहीं है, तो शब्द उसके किसी काम के नहीं। आप समझते हो, इसलिए (बात) गहरी है; हम कितना भी गहरा बोलें, समझ ही नहीं आए, तो आपके लिए गहरा थोड़ी ना है।

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मैं समझ गई हूं, फिर मेरा वैसा ही रहने का मन करता है, वैसे ही लोग और वैसा ही माहौल चाहिए। जब वह नहीं मिलता, तो मैं बहुत परेशान और बेचैन हो जाती हूं।

अब यहां तो आप जैसा चाहती हैं, वैसा है। तो रुक जाओ। तुझे क्या चाहिए? वह मिल गया, हां या ना? हां, तो मत जा फिर। फर्ज छोड़ के फर्ज का दिखावा मत करो। जब तुझे मिल गया, तो रुक जा, बात खत्म कर।

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2005 से साधना कर रही हूं। अब मैं अपने आप में संतुष्ट और स्थित कैसे रहूं? अंदर से सब समझती हूं।

"चाहिए" का भाव छोड़। "चाहिए" शब्द भी कहां से पैदा हुआ? इच्छा से; यहीं से शब्द का जन्म हुआ। "चाहिए" हटा दे, तो शब्द भी खत्म। समझ तो सब गई है, कर क्या रही है वह मायने रखता है। ऐसा ना हो कि समझते-समझते ही (जीवन) खत्म हो जाए और कर ना पाए, क्योंकि परिणाम करने का मिलेगा, समझने का नहीं। जब तू समझ लिया, तो उसे अपने जीवन में उतारेगी, उसमें जीना शुरू करेगी, तब वह उपलब्धि होगी।

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अगर मैं (पुरुष) होती, तो कब का घर छोड़ के भाग जाती। (महिला शरीर में समाज का डर लगता है।)

अच्छा एक बात बता — पुरुष में भाग सकती है, महिला में क्यों नहीं? कितने पुरुष वहीं जूते खा के पड़े हैं। मीराबाई तो महिला शरीर में ही निकल गईं। महिला-पुरुष का नाम मत बदनाम करो; शरीर को कमजोर मत बनाओ कि महिला का शरीर कमजोर है, पुरुष का ताकतवर। महिला में वह ताकत है कि अगर अपने पे आ जाए तो राक्षस को भी भगवान बना सकती है। मैं नर्मदा तट पे 2019 से घूम रहा हूं; यहां छोटी-छोटी बच्चियों को मां स्वरूप देखते हैं। अब तुझे ऐसी जगह मिल गई जहां घर से भी ज्यादा सुरक्षा है; तो अब जितनी कमियां होंगी, तेरी होंगी, क्योंकि प्रकृति ने तुझे जगह भी दे दी, ज्ञान भी दे दिया; अब सारी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है।

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हमारे अंदर ही परमात्मा है, आत्मा भी है और मन भी। अगर हम अपनी आत्मा को समझ गए, तो मन तो हट ही जाएगा; फिर हम और परमात्मा एक ही हो जाएंगे — क्या यह सही बात है?

परमात्मा ना पूरे ब्रह्मांड में है, ना तेरे अंदर है। "सर्वव्यापी" का मतलब — जैसे एक बल्ब से उजाला आया, तो उजाला सर्वव्याप्त है, बल्ब थोड़ी ना सर्वव्याप्त है। तो यह सृष्टि परमात्मा से है, इसलिए कहा गया है परमात्मा सर्वव्याप्त है; इसका मतलब यह थोड़ी ना कि परमात्मा मैले में भी है। यही भ्रांतियां हैं जो हमें लपेट के रखी हैं — कभी कहते हैं परमात्मा ढूंढने जा रहे हैं, कभी कहते हैं परमात्मा मेरे अंदर है, तो ढूंढ किसको रहे हो? अगर परमात्मा तेरे अंदर है, तो तू परमात्मा से भी ज्यादा ताकतवर होकर कैसे भटक गई? बाहर की चीजें तुझ पर काम कर गईं और परमात्मा की ऊर्जा तुझे बचा नहीं पाई? परमात्मा से सृष्टि है, सृष्टि से हम हैं। मैंने इस सृष्टि में आकर अपनी दुनिया बसा ली, और उसमें बहुत बेईमानी कर दी। अब अपनी दुनिया छोड़ के जब मैं परमात्मा की सृष्टि में आऊंगा, तो आत्मज्ञान होगा। फिर बचा यह पिंड; जब इस पिंड से मानसिक रूप से छूट जाऊंगा (मर जाऊंगा, ऐसा नहीं), तब ब्रह्म का ज्ञान हो जाएगा। यह यात्रा है।

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(कुटिया में साधक) सात दिन बाद मैं अपने संसार में चला जाऊंगा। वहां रहकर साधना करूं, तो मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरी स्थिति कहां तक पहुंची है?

जब आप जाओगे, तो हर तरह के लोग मिलेंगे, हर तरह की बातें होंगी — कोई आपके तरीके से बात करेगा, कोई आपके विरोध में। उसी समय आपकी स्थिति का आपको पता चलेगा। अंदर से प्रतिक्रिया उठेगी, लेकिन बाहर से मत देना — यह याद रखना। अंदर से प्रतिक्रिया आखिरी तक उठती है, जब तक अवधूत स्थिति नहीं होती, जब तक "चाहिए" में रहोगे। अवधूत स्थिति हो जाती है तो बाहर से भी और अंदर से भी प्रतिक्रिया उठना खत्म हो जाता है। बस एक ही काम करना — अपनी आत्मरक्षा करते हुए, वह प्रतिक्रिया जिससे आप गिरते हो, बाहर से देना बंद कर देना। जैसे आदमी नशा करते हुए पैदा नहीं हुआ; बाद में किया। समझ आया तो छोड़ दिया, अब उसकी याद सताती है, पीड़ा होती है; लेकिन जब वह शरीर से नहीं करता, तो एक समय आता है कि मानसिक भी छूट जाता है। तो जितनी भी गंदी आदतें हैं, समाज में जाकर मत करना; अपने आप को समझा लेना कि मुझे निकलना है, मुझे ईमानदारी से जीना है।

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घर में जब कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं, तो मुझे बोलना पड़ता है, और मैं सटीक बोलती हूं, बिना लाग-लपेट के। अगर कोई हमारे बच्चों को फंसा रहा है तो बोलना फर्ज बनता है। पर सामने वाले को और बच्चों को भी बुरा लग जाता है कि तुम इतना खराब बोल देती हो, और मैं बुरी बन जाती हूं।

तो फिर, चोर को अगर पकड़वा देगी तो चोर के लिए तो बुरी हो ही जाएगी ना।

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मेरे साथ बहुत शोषण भी हुआ है। मान लो सत्य को बहुत कूट-कूट के पीटा गया।

सत्य नहीं कूटा गया। एक समय था जब बेईमानी (हम भी) कर रहे थे; अब छोड़ के हटना चाहते हैं, तो जिन लोगों के साथ बेईमानियां की थीं, वे कूट रहे हैं। सत्य नहीं कूटा। तेरा परिवार तेरा ही किया है; अब तू छूटना चाह रही है, तो अभी तेरी कुटाई हो रही है।

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मैं तो अब सच पर चल रही हूं। लेकिन उन लोगों को कैसे समझाऊं कि तुम ऐसा ना करो?

अब तुम्हें समझ में आ गया, उन्हें नहीं समझ में आया, तो उनको छोड़ दो। छोड़-छाड़ के निकल लो। और अगर वहां कुचल-कुचल के रखा जा रहा है, तो मत रहो ना; यहां तो जगह मिल गई ना।

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हमारी जो प्रतिक्रियाएं मन में चलती हैं — कुछ नेगेटिव, कुछ बेकार — जिन्हें हम एक्शन में नहीं लेते, क्या उनसे भी कर्म बनते हैं?

अगर आप शरीर से नहीं करते हो, तो नहीं। वे फिर भी चलती रहती हैं, क्योंकि वे आपकी आदतें हैं; आपने कभी ना कभी उसको किया था, तभी विचार में आती हैं। जैसे आप बाजार जा रहे हो, समोसा बड़ा बढ़िया दिखा; आपने कहा चलो मानसिक खा लो, शरीर से मत खाना — तो क्या बिल देना पड़ेगा? बिल तब दोगे जब शरीर से खाओगे। इस फार्मूले को समझो — बड़ा आसान है निकलना, अगर आप चाहते हो। पहले जरूरत आई, फिर शरीर से किया, शरीर ने उसका सुख लिया, स्वाद लिया, बाद में वह मानसिक में घुसा। अब शरीर से देना बंद करते हो तो मानसिक पीड़ा, बेचैनी होती है। तो पहले शरीर से छोड़ो, बाद में मानसिक भी छूट जाएगा। गड़बड़ यह होती है कि हम शरीर से करते हुए मानसिक छोड़ना चाहते हैं — वह कभी नहीं छूटेगा। और समझ कर छोड़ो: पहले समझना पड़ेगा कि मेरी यह आदत गलत है, इससे बाहरी लाभ भले हो, मैं मानसिक गिर रहा हूं। किसी के कहने पर, बिना समझे छोड़ोगे, तो जिंदगी भर उसके लिए रोओगे, छोड़ नहीं पाओगे।

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अगर कोई हमारे अगेंस्ट कुछ कर रहा है, तो मुझे एक्शन तो लेना पड़ता है; फिर मन की प्रक्रिया बहुत स्पीड पकड़ लेती है। क्या करें?

उसके अगेंस्ट मत करो ना। अपनी आत्मरक्षा करो। आप ईमानदारी से एक्शन लो, फंसोगे नहीं। अगर कोई चालाकी करके फंसाने की कोशिश करता है, तो आप मत फंसो; ऐसे लोगों के साथ क्यों रह रहे हो?

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हम ऐसे लोगों के साथ रहते नहीं, पर समाज में रहते हैं तो ऐसे लोग मिल ही जाते हैं।

यही तो बात है — हम जैसे हैं, वैसे लोग मिलते हैं। दोस्त भी अगर होंगे तो आपके जैसे ही होंगे; एक राजकुमार का दोस्त राजकुमार ही बनता है। इस दुनिया में सबकी अपनी-अपनी दुनिया है, और हमारी दुनिया में वही है जैसा मैं हूं; रास्ते में भी मुझसे वही लोग मिलते हैं। अगर आप सोच रहे हो कि ऐसे लोग ना मिलें, तो अपनी आदत बदलो।

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(साधक बीच में बात काटकर बोलने लगे, तब गुरु जी ने सुनने के बारे में समझाया।) सत्संग में कैसे सुनें?

पहले पूरी बात सुनो, समझो। बीच में मत टपका करो। सुनो, गुनो (मतलब समझो), और फिर ढूंढो, फिर बोलो। गलती क्या है? हम कुछ कह रहे हैं, लेकिन तुम सुने नहीं, ढूंढने लगे — तो बात थोड़ी समझ में आएगी। और अगर आप किसी को सीनियर समझ रहे हो, तो पहले उसकी पूरी बात सुननी चाहिए, बीच में कभी नहीं बोलना चाहिए; यह हमारी आदत बहुत गंदी है। तुम क्या बोल सकते हो, मुझे अच्छी तरह पता है, क्योंकि मैं भी वहां था; बस बोलने का तरीका अलग होगा। तो पहले सुनना सीखो — सुनो, समझो, और फिर बोलो।

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गुरु जी, मुझे कई साल से कभी-कभी ओंकार की धुन आती है। फिर विकार वगैरह आते हैं तो चली जाती है, फिर महीनों बाद आ जाती है। अभी रात को 2 घंटे तक चली, मैं बैठा सुनता रहा। उसका क्या करूं?

क्या करोगे? मूल पे काम करो। ओंकार की धुन — इस धुन से मुक्त हो जाओ। क्योंकि अगर आप बाहर का कुछ सुन रहे हो, तो सुनने वाला और जहां से सुनाई दे रहा है, दोनों अलग हैं। जब तक आप बाहर की कामनाओं में हो, तब तक ऐसे ही भटकते रहोगे। अगर इस भवसागर से निकलना चाहते हो, तो आत्मदर्शन करो; सुनने की इच्छा का त्याग करो, नहीं तो धुन के चक्कर में जिंदगी चली जाएगी। इतना सुन लिए, क्या हुआ? 15 साल चले गए ना धुन के चक्कर में। धुन जिसके द्वारा आ रही है, वह द्वार एक दिन बदल जाएगा, खत्म हो जाएगा — फिर आप पगला जाओगे, क्योंकि धुन के आदी हो जाओगे। अभी कुछ दिन पहले मेरी आवाज कैसी निकल रही थी, आज कैसी निकल रही है; अंदर वाला वही है, लेकिन जिसके द्वारा निकल रहा था, वही खराब हो गया। अगर मैं इच्छा रखूं कि पुरानी आवाज ही ठीक थी, तो मुझे दुख होगा। तो बाहर से कुछ नहीं चाहिए; नहीं तो आत्मदर्शन नहीं होगा, और ऐसे ही अनेक पिंड धारण करते रहोगे। धुन का चक्कर छोड़ो।

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क्या आंखें हमारी सबसे बड़ी दुश्मन हैं, जिनसे लालच आता है?

महात्मा के पास क्या आंखें नहीं होतीं? सबके पास होती हैं। आंखें तो सहायक हैं। किसी भी इंद्री का दोष नहीं है; दोष उसके पीछे वाले का है। तुम आदत के गुलाम हो, तो आंखें दोषी नहीं। रस किसमें है, पता है? मेरे तरीके में; और किसी में रस नहीं है। रस क्या है? राग और द्वेष। अपने तरीके से हुआ तो राग — रस मिल गया; नहीं हुआ तो द्वेष — (उसमें भी) रस मिल गया। सारा खेल इसी पे है। क्या महात्माओं के बच्चे नहीं हुए? कृष्ण, राम, गुरु नानक के बच्चे नहीं हुए? रस अपने तरीके की अनुकूलता में है। तुम अपना तरीका छोड़ दो, फिर तुम कुछ भी करो, तुम्हें किसी में रस नहीं मिलेगा, फंस ही नहीं सकते। इसलिए मैंने बहुत सरल शब्दों में अध्यात्म को उतार दिया — "अपना तरीका"; गांव का साधारण आदमी भी समझ लेगा।

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घर पे मन नहीं लगता, यहां (कुटिया) आने का मन करता है; और यहां आकर फिर भागने का मन करता है।

एक-आध हफ्ते के लिए अपने आप को रोको ना। जगह भी है, एकांत भी है।

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अध्यात्म में हमारा पहला कदम है, बहुत डर लगता है — जैसे केजी वन में एडमिशन लेने वाला बालक घबराता है, कि कहीं गलती ना हो जाए।

यहां तो कोई गलती हो ही नहीं सकती। यहां कोई डांटता नहीं; यहां गलती को सुधारा जाता है। ऐसा ना हो कि यह डर आपको कभी रुकने ना दे; गलती होने दो, आओ, सात दिन रहो, कुछ समझो। यहां किसी से आपस में बात नहीं करनी है, अपना बनाना-खाना है, तो गलती क्या होगी? यहां सब स्वतंत्र हैं, किसी के अधीन जीवन नहीं है। कोई यह भी नहीं कहेगा कि स्वाद सही नहीं है, क्योंकि आपको ही बनाना-खाना है, और अपने हाथ की जली रोटी भी अच्छी लगती है। जब खुद बना के खाओगे, तो घर जाओगे तो पत्नी की भी इज्जत करोगे। यहां गलती होगी तो आपको नहीं निकाला जाएगा, आपकी गलती को निकाला जाएगा; कोई गलती बताएगा तो गलती निकालने के लिए, आपको गिराने के लिए थोड़ी ना।

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आपके प्रवचन सुनकर लगता है कि बाकी सब झंझट, दिखावा, बहकावा है। यहां ना जात है, ना धर्म, ना गरीब-अमीर, कोई भेदभाव नहीं — सिर्फ मानव है। ऐसा क्यों?

मानव जैसा पैदा होता है, यहां वैसा ही है; यहां किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होता। इतने लोग यहां बैठे हैं, किसी को किसी की जात का पता नहीं, मुझे भी पता नहीं, और पता भी नहीं करना है। मैंने इस स्थान पर कुटिया का निर्माण इसलिए किया कि आप मूल की यात्रा करो। मूल की यात्रा कौन करेगा? जिसे सब छोड़ना है। और जब मैं सब छोड़ने के लिए तैयार हो गया, तो अब मैं कौन सी जात का, कौन सी पांत का — सब खत्म हो गया। यहां चाहे राजा आए चाहे रंक, एक जैसे बैठेंगे। कोई कुर्सी पर बैठा है तो शरीर की जरूरत की वजह से।

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कोई साधक पहले सब कुछ ठीक से समझकर यहां आया, फिर भी बाद में भ्रमित क्यों होता है? क्या उसके पाप कर्म हैं, या वह अभी कुछ गलत कर रहा है?

इसलिए कि जहां वह गया है, उसके बताए हुए शब्दों का पूरी तरह पालन नहीं कर रहा, उसमें जी नहीं रहा; वह खुद कुछ अपना मिला रहा है। जैसे ही उसने अपना मिलाया, भ्रमित हो जाएगा, क्योंकि उसकी (गुरु की) बातें कुछ और कहेंगी और मेरी कुछ और। कोई पुराने पाप कर्म नहीं। अगर आप कहीं हो और वह कहीं, तो जरूर उसकी बातें आपसे अलग हैं, तभी तो वह वहां है और तुम यहां; वहां तक पहुंचने के लिए तुम्हें अपनी समझ छोड़नी पड़ेगी, बिना अपनी समझ छोड़े तुम वहां कभी नहीं पहुंच सकते। अगर मैं अपनी वही समझ वहां भी मिलाऊंगा, तो वहीं चला जाऊंगा जहां था, या उससे नीचे। अगर कुछ बातें विपरीत लगें, तो पूछना चाहिए कि वह कहना क्या चाहता है।

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मुझे पता है कि कुछ भी विपरीत लगे तो गुरु जी से पूछना अनिवार्य है। पर कभी लगता है, पहले खुद समझूंगा, फिर पूछूंगा।

अगर तुझे लग रहा है कि तू समझ सकता है, तो समझ। लेकिन तेरे समझने में और कोई परेशान ना हो।

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मान लीजिए हम न्यूट्रल हो गए, प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया; फिर भी कर्म तो करना है, और कर्म करेंगे तो प्रतिक्रियाएं तो आएंगी। और जो चीज बार-बार की है, दिमाग उसी लूप में स्पीड से रिपीट करता है। क्या करें?

गंदी आदतों की प्रतिक्रिया नहीं देनी है; आत्मरक्षा करनी है। अभ्यास करके (वह आदत) ऑटोमेटिक मोड बन गई है। प्रतिक्रिया मत दे — ऑटोमेटिक मोड टूटेगा, थोड़ी अपनी शक्ति इधर लगानी पड़ेगी कि नहीं करनी।

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मुझमें उतावलापन है। घर में कोई बात हो रही हो, तो मैं उसे होने ही नहीं देती, पहले से ही सही कर देती हूं; सामने वाले को मौका नहीं देती। फिर उन्हें लगता भी नहीं कि मैंने सही किया, शाबाशी भी नहीं मिलती। बहुत कोशिश करती हूं शांत रहने की, पर हो नहीं पाता।

तो जाने दे, उनको करने देना। तू मत करना। यह मान का चक्कर है — शाबाशी चाहिए। (हंसते हुए) तो एक काम कर, जब किया कर तो वीडियो बना लिया कर, और उनको दिखाया कर कि देखो मैंने बचा लिया।

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मैंने घर वालों से कहा है कि मेरे लिए किसी प्लॉट में एक कुटिया बनवा दो, उसमें रहकर साधना करूंगी।

अगर तेरे घर वाले कुटिया बना के दे देंगे, तो उसमें साधना नहीं हो पाएगी। साधना हमेशा "तेरा" में होती है, "मेरा" में नहीं; नहीं तो राजा-महाराजा अपना घर छोड़ के क्यों जाते? ध्यान रखना — जब तक आत्मज्ञान ना हो, अपनी कुटिया बना के कभी मत रहना, कुछ नहीं होगा; क्योंकि तुम्हारा अहंकार यही सोचेगा — ये मेरा घर, ये बेड, ये पर्दे; वहां सब कुछ आपके तरीके से होगा, और आपके तरीके से आपका पतन के अलावा कुछ नहीं होगा। इसलिए कहा गया है जीवंत गुरु ढूंढो; जब उसके तरीके में रहोगे, तो वह डांट के रखेगा — चल उठ, वहां बैठ; बुरा लगेगा, तब अपनी स्थिति का पता चलता है। "मेरा" में कोई नहीं कहेगा। अष्टावक्र ने राजा जनक का सिंहासन ही छुड़वा दिया — चल मेरे साथ, तेरे राज्य में नहीं, सही ज्ञान तुझे वहां होगा जहां तेरा अधिकार नहीं। आश्रम में राजा-रंक एक ही जगह बैठते हैं, क्योंकि वहां सब एक समान हैं; जहां राजा-रंक अलग बैठें, समझ लेना वह जीवंत, आत्मज्ञानी गुरु नहीं है। इसलिए मैंने 12 साल तक अपने लिए कभी कुटिया, कभी झोपड़ी नहीं बनाई — कभी मंदिर में रहा, कभी पेड़ के नीचे, कभी नर्मदा किनारे, कभी श्मशान में सो गया।

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कितने उम्र तक के बच्चे यहां (कुटिया में) आ सकते हैं? मेरे बच्चे 13-14 साल के हैं, उनकी छुट्टियां हैं।

अगर वे इस नियम में रह सकते हैं, तो ला सकते हो, लेकिन नियम यही रहेगा, पक्का। और जैसे ही स्कूल खुले, पहले यहां से ले के चले जाना है। अकेले बच्चे नहीं आ सकते; साथ में रहना पड़ेगा, और इसी नियम में रहना पड़ेगा।

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(कुटिया में साधक) मैंने एक साथी साधक को सलाह दी थी कि आंख थोड़ा बंद करके बैठा करो, ताकि बाहर से रसपान कम हो। क्या यह गलत था?

आपको सिर्फ अधिकार मिला है अपने लिए, कि अपना कल्याण कैसे कर लो। जैसे ही तुम किसी और में लगे — आंख बंद करो, खोलो, ऐसी मुद्रा में बैठो — आप फंस गए, आपकी यात्रा वहीं रुक गई। मान लीजिए आप कार से जा रहे हैं और एक साइकिल वाला हैंडल छोड़ के चला रहा है; आपने तुरंत कार रोकी — स्पीड किसकी कम हुई? आपकी। बात कहने के लिए उसे भी रोकना पड़ेगा; अब दोनों रुक गए। और उसने कह दिया — तू कौन है रे, ज्यादा ज्ञान मत ठोक; तो समय भी गया, एनर्जी भी गई, और आप मायूस होकर चल दिए, जिस तेजी से जा रहे थे वह भी गई। इसलिए लक्ष्य तक बिना पहुंचे किसी से बात ना करो। जीवंत गुरु के अलावा किसी से सलाह लिया या दिया — दोनों स्थिति में आपकी स्पीड कम हो जाएगी, हो सकता है यात्रा ही छूट जाए। जीवंत गुरु लक्ष्य पे है; उससे बात करोगे तो वह कहेगा और तेज कर। तो जीवन में याद रखो — ना सलाह दो, ना लो।

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मैं आपको सुन रहा हूं, पर 100% वर्तमान में नहीं हूं; आपके शब्दों को दिमाग अपने हिसाब से प्रोसेस करता रहता है। जब शांत होने की कोशिश करता हूं तो एकदम जीरो हो जाता हूं, फिर काम करने में दिक्कत होती है। मन हमेशा प्रतिक्रिया मोड में ही क्यों रहता है?

आप सत्संग सुनो, उन शब्दों को अपनाओ, उसमें जियो, परिणाम आएगा। परिणाम तुम अपने तरीके से मत चाहो, नहीं तो परेशान हो जाओगे। तुम सोच रहे हो कि मैं यहीं हूं तो कहीं विचार ना आए — वह आएगा, आने दो। आप यहां की बातें समझो। हमें किसी में नहीं जीना है, मुझे अपने आप में होना है। जहां विचार जा रहा है, जाने दो; रोकने का प्रयास कभी मत करना। अभी एक ही महीना हुआ है; और सुनो, बारीकी से समझो — हमें तो प्रत्यक्ष ज्ञान को खोजने में ही कितने साल लग गए।

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एकांत में बैठता हूं तो पहले कुछ मिनट आंखें खुली रहती हैं, फिर आंखें बंद करता हूं तो 15 मिनट बाद नींद आने लगती है। इसका क्या करूं? कहीं कुछ गलत तो नहीं?

कोई बात नहीं, आने दे। यहां नींद के लिए लोग गोलियां खाते हैं। आ रही है तो आने दे, नींद को तोड़ मत। अपने को कुछ प्राप्त थोड़ी ना करना है; जितना प्राप्त है, उसे छोड़ना है। बचपन से हमें सोने कहां दिया गया — 4 बजे उठो, 5 बजे उठो; कभी यह भी पूरा हो जाएगा, तो नहीं लगेगी। बस सारे कामों से निवृत्त होकर बैठा करो; अगर कोई काम बाकी है और सो गए, तो गुस्सा आएगा।

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सोचता कौन है — मन या हम? आंतरिक बात कौन करता है?

आपके पास जितनी जानकारियां हैं — कुछ प्रत्यक्ष, कुछ प्रत्यक्ष नहीं — आपकी वे जानकारियां और आप खुद बातें करते हो। वे जानकारियां अनेक लोगों से, अनेक जगह से मिली हैं, एक ही लक्ष्य की अनेक जानकारियां अनेक तरीके की। तो आप, आपकी जानकारी, और जानकारी के पीछे के लोग मिलकर हमेशा बातें करते रहते हैं। जैसी आपके पास जानकारी होगी, वैसा ही आप सोचोगे।

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"कुछ नहीं चाहिए" वाले साधक की स्थिति क्या होती है?

"कुछ नहीं चाहिए" एक स्थिति है। पहले "कुछ नहीं चाहिए" का भाव बनाओ, और धीरे-धीरे जब जरूरत में जीने लगोगे, तो एक समय ऐसा आएगा कि "कुछ नहीं चाहिए" स्थिति में आ जाओगे।

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अपने तरीके को छोड़ने के लिए — जहां "मेरे" का भाव है, वहां क्या छोड़ना है?

उनसे अपने तरीके से पाने की इच्छा का त्याग करना है। आप सीधा उनको नहीं छोड़ सकते, क्योंकि आप उनके पास गए हो तो कुछ उम्मीद में गए हो। बंधन और आसक्ति तब होती है जब आपको उनसे अपने तरीके से मिल जाता है, और नहीं मिलता तो द्वेष होता है। तो मिला-जुला के अपना तरीका हमें छोड़ना है।

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इस जन्म में चाहे जितना भी बुरा कर्म हुआ हो, क्या मेरा कल्याण संभव है?

कर्म के हिसाब-किताब का कोई पता नहीं, क्योंकि आपको भी याद नहीं है कि आपने क्या-क्या किया है। पर आत्मज्ञान संभव है। आत्मज्ञान इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि आप राग-द्वेष से मुक्त नहीं हो पा रहे; राग-द्वेष से मुक्त हो जाओगे, बस। आगे राग-द्वेष बनाना बंद करो, और पिछला जितना है, जब एकांत में बैठोगे तो दिखेगा — उसका सामना करो: इस व्यक्ति से राग हुआ तो क्यों हुआ, द्वेष हुआ तो क्यों हुआ, वजह क्या थी, किस कारणवश मैं फंस गया, उसकी यादें मुझे क्यों सता रही हैं। यह अपने आप से पूछना है, और राग-द्वेष से अपने आप को छुड़ाना है।

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निष्काम कर्म आनंद में ले जाता है, या गुरु आनंद में ले जाते हैं?

गुरु एक मार्ग है और निष्काम कर्म एक सहयोग है। तो दोनों की जरूरत है।

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"मैं ही करता हूं, मैं ही कर रहा हूं" — ऐसा मुझे क्यों फील होता है?

इसलिए कि आपको लग रहा है मैं कुछ हूं, और आप कुछ बनना चाहते हो; जब तक बनने की भावना अंदर है, तब तक लगता है मैं कर रहा हूं। अपनी समझ से देखो — कर्ता तो आप हो नहीं; स्थिति-परिस्थिति, जरूरत में आप करते हो। भूख लगी, भोजन कर लिया — लगता है मैं खा रहा हूं; पर पेट भरने के बाद खाकर बताओ — जबरदस्ती करना पड़ेगा, घुटन, बेचैनी, अशांति होगी। प्यास बुझ गई, फिर पानी पीकर बताओ। कोई भी कार्य आप जरूरत में करते हो, तो कर्ता कहां हुए? जरूरतें करवा रही हैं। कर्ता तो मान बैठे हो — यही अज्ञानता है; और इसलिए मान बैठे कि आपको साबित करना है कि मैं कुछ हूं।

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सब में गोविंद क्यों नजर नहीं आता?

पहले गोविंद का अर्थ समझो — गोविंद क्या है, कौन है। सब गोविंद हो ही नहीं सकते। सब एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन सब एक ही नहीं हैं। अगर एक ही होते तो द्वंद्व क्यों पैदा होता, द्वैत कहां से आता, राग-द्वेष क्यों होता? तो सब गोविंद कैसे नजर आएंगे?

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क्या हम सभी जीव ब्रह्म ही हैं?

नहीं, हम सब जीव ब्रह्म नहीं। अगर मैं खुद ब्रह्म होता, तो भटकता क्यों? अपने आप से खुद प्रश्न करो। और अगर ब्रह्म भटक जाए, तो फिर वह ब्रह्म कैसा? वह भटकेगा कहां?

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मेरा शरीर विकलांग है, इसलिए (कुटिया) आ नहीं सकती, पर आने का बहुत भाव है। कृपा कर दीजिए।

आप देखिए आप क्या कर सकते हो। आप सत्संग सुनिए; जहां भी हो, अपना कल्याण करो, कल्याण के लिए काम करो।

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सबसे जरूरी आत्मिक कल्याण है, यही मेरे जीवन का लक्ष्य हो — इस पर सबसे ज्यादा फोकस कैसे रहे? लगता है, बाद में कर लेंगे।

अगर आपको लगेगा कि जीवन में सबसे जरूरी यही है, तो फोकस हो जाएगा, कर लोगे। अभी आपके लिए यह जरूरी नहीं है। जिस दिन जरूरी होगा, कर लोगे।

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दुकानदार मेरे ₹50 देना भूल गया; मैंने मांगे फिर भी नहीं दिए, वह कहता है दे दिए। क्या कर्म-बंधन हो गया?

देने वाला कह रहा है दे दिया, तो छोड़ दो। आपके पास प्रूफ क्या है, सिद्ध कैसे करोगे? हाथ में लेते वक्त ही गिनना था। अगर एक घंटे बाद कह रहे हो कि नहीं दिया, तो सिद्ध करो; सिद्ध नहीं कर पा रहे, तो इसका मतलब वह सही है। समझ लो कहीं गिर गए होंगे — बात खत्म।

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मैं परमात्मा से एक होना चाहता हूं। विचार, अपेक्षा और वासना में क्या अंतर है, और एकांत में साधना करते हुए इनका कैसे उपयोग करूं?

आप जिसके साथ एक होना चाहते हो, देखिए कि क्या वह भी आपके साथ एक होना चाहता है। हम कहीं ना कहीं जबरदस्ती प्रयास कर रहे हैं।

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मैं सरकारी पशु अस्पताल में काम करता हूं; मेरा काम है गाय-भैंस को कृत्रिम गर्भाधान के समय शिकंजे में नियंत्रित करना, जिससे पशु बहुत डरता है। क्या यह काम सम्यक आजीविका में आ सकता है?

है तो अप्राकृतिक। इसी को वासना कहते हैं — ज्यादा पाने के चक्कर में, अपने तरीके से पाने के चक्कर में, धीरे-धीरे हम लोग राक्षस बनते जा रहे हैं; प्राकृतिक रूप से यह गलत है। अगर इंसान को यह अपने साथ करवाना हो, तो करवाएगा क्या? आप उसके साथ इसलिए कर रहे हो क्योंकि वह पशु है। तो आप खुद डिसाइड करो — जो अपने साथ चाहते हो, वही दूसरों के साथ करो।

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क्या क्रोध में प्रतिक्रिया देना जरूरी है या नहीं?

उचित तरीके से दीजिए।

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किसी ने मुझे अंदर से पीड़ा दी, उसे भूल नहीं पा रहा, वह बार-बार दर्द देती है। क्या उपाय करूं?

देखो कि पीड़ा देने वाले के साथ आपने (कोई गलत) काम किया था — हां या ना? किया था, तो बात खत्म, इसलिए पीड़ा दिया उसने। अगर नहीं किया था, तो वह व्यक्ति मौजूद हो तो उससे जाकर पूछिए कि आपने मुझे पीड़ा क्यों दी, क्या कारण था, कौन-सा ऐसा अपराध मैंने कर दिया था; मैं नहीं समझ पा रहा, आप मुझे बताने की कृपा करें।

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क्या शोषण करने वाले को जीव कहते हैं? जब हमारा शोषण करने का भाव समाप्त हो जाएगा, तो क्या जीव भाव भी समाप्त हो जाएगा?

हां। शोषण तभी तक होता है जब आपको अपने तरीके से चाहिए। अपने तरीके का त्याग करो, शोषण आप कर ही नहीं पाओगे।

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मैं सभी लेनदेन और वासनाओं से मुक्त होना चाहता हूं, लेकिन अंदर से भोग और भोजन को भोगने की प्रबल इच्छा बनी हुई है। मेरे लिए क्या आज्ञा है?

जरूरत में उपयोग करें।

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लेनदेन खत्म होते ही भोगने की इच्छा अपने आप खत्म हो जाएगी, या उसके लिए अलग से प्रयास करना पड़ेगा?

प्रयास करना पड़ेगा — अपने तरीके से (किया हुआ) लेनदेन खत्म करना पड़ेगा, तब जाकर भोगने की इच्छा खत्म होगी।

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किसी पदार्थ को भोगने की इच्छा उसकी कीमत देने के बाद छूटती है, या उसे समझने के बाद?

समझने से।

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हमने जितना गड्ढा खोदा है, उसे भरते ही क्या हमारी प्यास बुझ जाएगी, या उसके बाद भी और मेहनत करनी पड़ेगी?

आप जितना गड्ढा खोदे, वह भर दो, तो आप उसी केंद्र में आ गए ना — बात खत्म हो जाएगी।

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(कुटिया में साधक) हमें पता नहीं कि आत्मज्ञान, निर्वाण, मोक्ष क्या है। आत्मज्ञान से हमें क्या हासिल होगा, और उसके बाद जीवन कैसा होगा? सरल भाषा में बताइए।

आत्मज्ञान से जितना हासिल है, सब खत्म हो जाएगा — मानसिक; क्योंकि हमारे पास जो कुछ भी है, उस पर मानसिक बंधन है। इतना पक्का पता है कि जिसे मैं भोग रहा हूं, उसे पहले किसी और ने भोगा है, बाद में कोई और भोगेगा, चाहे यह शरीर तक। तो हमें कुछ मिलने वाला नहीं है। हमने दूसरे के चक्कर में आकर अपने आप को खो दिया; अब मुझे खुद "मैं" चाहिए। व्याकुलता, घुटन, बेचैनी, राग, द्वेष, मोह, आसक्ति — ये किसी के कारण हैं; कर्म तुम्हारे द्वारा हुआ, लेकिन जिस तरीके से किया वह गलत था, उससे राग-द्वेष हो गया — वहीं से अपने आप को छुड़ाना है। आत्मज्ञान में आपको आपके अलावा कुछ नहीं मिलने वाला। आप अकेले हो जाओगे, भीड़ में रहकर भी अकेले रहोगे, क्योंकि भीड़ तभी तक अच्छी लगती है जब तक हम रसपान करते हैं; आत्मज्ञान की तरफ बढ़ने वाला जिंदा लाश हो जाता है, आपके पास कुछ नहीं रहेगा। (और उस दिन मैंने आपसे इसलिए बात नहीं की, क्योंकि एकांत में घुटन के समय किसी से बात कर लोगे तो वहां से वापस आ जाओगे और सारी मेहनत खत्म हो जाएगी; उस समय आपको आपकी जरूरत है।)

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जब हम संसार में रहकर फंसे हैं, तो क्या मां-बाप सबको छोड़कर यहां आ जाना जरूरी है, या वहीं रहकर काम करें?

यह आपको देखना है कि मेरे जीवन में क्या जरूरी है; फैसला आपको लेना है। ऐसा नहीं कि जिन लोगों से राग-द्वेष हुआ, वे वहीं हैं — जीवन में जितने लोगों से राग-द्वेष हुआ है, क्या उन्हें पृथ्वी पर खोज सकते हो? रास्ते में, ट्रेन में, बस में राग-द्वेष हो गया; नाम भी नहीं पता। तो देखना है कि मैं कहां रहकर मेरा कल्याण होगा। यहां रहोगे तो 24 घंटे आत्मिक कल्याण को दोगे; घर पर रहोगे तो 24 घंटे नहीं दे सकते। अगर आपकी जिम्मेदारी, कर्तव्य, दायित्व है, तो उसे निभाते हुए करो; और नहीं है, तो यहां चले आओ। यह फैसला आपको करना होगा।

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अगर घर-परिवार छोड़कर यहां आ जाएं, तो कितने साल में (आत्मज्ञान) होगा ही होगा?

मेरे कहने से मत छोड़ना, नहीं तो जिंदगी भर पछताओगे। यह आपकी चाल के ऊपर है। जैसे विद्यालय में रह रहे हो पर पढ़ ही नहीं रहे, तो क्या होगा? यहां रहकर दृश्य में फंसे घूम रहे हो, तो नहीं होगा। यहां के नियम में पूरी तरह रहोगे, तो होगा ही होगा। दुनिया में कहीं भी, जिस क्षण आप राग-द्वेष से मुक्त हो जाओगे — पिछले से, और आगे बनाना बंद — उसके बाद अवधूत स्थिति हो जाएगी, फिर आज्ञा चक्र खुलता है, और उसके बाद कुछ ही महीनों-दिनों में आत्मा का बोध हो जाएगा। अब आप राग-द्वेष से कितने समय में मुक्त होते हो, यह आपके ऊपर है — चाहे एक दिन में, चाहे 100 साल में भी नहीं।

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इसका क्या पैमाना है कि हमें पता चले कि अब हम राग-द्वेष से मुक्त हो गए?

आपकी यादें रहेंगी, उसमें राग-द्वेष नहीं रहेगा, एक मुस्कान रहेगी। जैसे किसी से झगड़ा हुआ, उसे देखते ही गुस्सा आता था; जब समझौता हो गया, गले मिल लिए, तब देखते हो तो कुछ नहीं रहा — पता है लड़ाई हुई थी, द्वेष था, पर अब उसे देखकर मुस्कुराते हो, वह निकल गया। जिस क्षण आप राग-द्वेष से मुक्त होगे, यह आपको ही पता चलेगा, किसी और को नहीं।

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मुझे घर वालों की याद आती है। अगर उस समय मेरा भाव हो कि चली जाऊं, मिल लूं, बात कर लूं, बेचैनी हो — और अगर याद तो आए पर मुझे पता हो कि मेरा लक्ष्य क्या है — इन दोनों में क्या फर्क है?

(पहली स्थिति में) बेचैनी आ रही है, दुखी हो रही हो, तो उसमें राग और द्वेष है, अभी है। और पिछला राग-द्वेष सिर्फ घर वालों से नहीं, बहुत लोगों से है; जब आप एकांत में जाते हो, तो वे घटनाएं याद आती हैं जो तुम भूल गए हो। दुनिया के किसी कोने में रहो, जिस क्षण आप राग और द्वेष से मुक्त होगे, उसके बाद अवधूत स्थिति हो जाएगी।

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अगर किसी ने ऐसे कर्म किए हों जिनकी सजा से वह बच गया और अब उसे याद भी नहीं था, पर एकांत में बैठकर सब याद आ रहे हैं — तो वह उन कर्मों से कैसे बचे? क्या सत्कर्म करे?

बच नहीं सकता; प्रकृति किसी ना किसी तरीके से (हिसाब करेगी)। पश्चाताप की आग लगेगी — पश्चाताप भी एक भोग है; आत्मग्लानि, घुटन, बेचैनी — वह भी एक सजा है, और सबसे तगड़ी सजा है। अगर पश्चाताप की आग लगी रही और कहीं रसपान नहीं किया, तो जल्दी से जल्दी वह खत्म हो जाएगा। अगर कहीं रसपान कर लिया, अपने आप को लुभावनी चीजों में फंसा लिया, तो वह आग बुझ गई।

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आप कहते हो कि जिसकी भी भक्ति करेंगे, वह हमें आत्मज्ञान नहीं करा सकता; तो फिर भक्ति मार्ग का फायदा ही क्या है?

वह आत्मज्ञान नहीं करा सकता। लेकिन जब आप उस लेवल पर हो जाओगे, "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओगे, यह स्थिति पक्का बनाने के लिए तैयार रहोगे, तो वह किसी ना किसी गुरु से मिला देगा — जैसे रामकृष्ण परमहंस को मां काली ने तोतापुरी को उनके दरवाजे पर भेज दिया। अगर आप योग्य हो जाओगे, तो इष्ट इतना करता है — वह करवा नहीं सकता, लेकिन गुरु से मिलन करा देगा। और आप अपने भरोसे चलो — अभाव में मत चलो, कुभाव में मत चलो, स्वभाव में चलो।

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मैंने आपकी एक वीडियो में सुना कि 12 साल लगते हैं, और यह भी कि किसी को एक साल में भी हो सकता है। तो कितना समय लगेगा?

आप किसी से यह मत कहो कि कितने समय में हो जाएगा। मैं जब चला था, मैंने कभी किसी से नहीं पूछा कितना समय लगेगा, क्योंकि मेरी जिम्मेदारी थी, मैं अपनी जिम्मेदारी पे निकला। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि व्यक्ति अगर अपने स्वभाव से पूरी तरह लग जाए — व्याकुलता से, तड़प से, जैसे भोग की तरफ आकर्षित होता है — तो कुछ ही वर्षों में हो जाएगा; मेरी समझ से पूरी तरह लगने के बाद 12 साल फाइनल है। अभी तो आप लगने की प्लानिंग कर रहे हो; आप लग जाओ। मैं लोगों से यही पूछता था — आप इस मार्ग में चले हैं, तो आपके साथ क्या हुआ, उससे मुझे प्रेरणा मिलेगी; कितने जन्म लगेंगे, यह पूछने नहीं आया था, क्योंकि मैं फाइनल कर चुका था कि यह मेरा आखिरी जन्म है। आत्मज्ञान है, यह पक्का है; मैं फंसा हूं, यह भी पक्का है; तो मैं दूसरे पर क्यों थोपूं — ताकि बाद में कहूं कि आप बोले थे इतने साल? पूरा रिस्पॉन्स खुद पे लो। मैं 2011 में चला; पूरी तरह चला; कभी पश्चाताप नहीं हुआ, कभी रोटी-कपड़ा-मकान नहीं सोचा, क्योंकि जहां था वहां दुख ही था। अगर आप पूछ रहे हो कितने साल में होगा, तो इसका मतलब आप वहां छोड़े नहीं हो, और प्लानिंग है कि इतने साल में नहीं हुआ तो वहीं चला जाऊंगा।

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अगर कोई 20 साल यहां रहे और (आत्मज्ञान ना हो), तो 60 के बाद वापस संसार में क्या मिलेगा? अपने ही नहीं पहचानेंगे।

अध्यात्म में, आत्मज्ञान की तरफ वही बढ़े जिसे ना तो कुछ चाहिए, ना कुछ करना है। अगर कुछ बाकी है तो भोग लो; अगर नहीं भोगोगे, तो यहां रहकर भी वहीं हो, और 60 साल बाद वहीं लौटोगे, क्योंकि कुछ बाकी है। जब कुछ ना हो करने को, अपने आप को मरा समझ लो कि भोग-विलास, मान-सम्मान सब करके थक गया, तब इस मार्ग में आना, ताकि पछतावा ना हो। यह "कुछ नहीं चाहिए" की यात्रा है; पछतावा तो तब होगा जब कुछ चाहिए।

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एक तरफ मेरे कुकर्मों का इतना बोझ है कि चाहती हूं कोई इसे हटा दे; दूसरी तरफ कहीं ना कहीं मैं रसपान भी दोबारा चाहती हूं। मैं इतनी शातिर हो गई हूं कि आपको भी घुमा देती हूं। सच्चा वैराग्य मुझमें कैसे आए?

(आपने) सब कुछ नहीं रखा; उतना ही रखा जितने में अच्छे दिख सको — सब कुछ रख देते तो घुटन भी नहीं रहती। एक बार अपनी समझ से ज्ञान को समझ लिया और ज्ञान को, और जहां से ज्ञान निकल रहा है उस परमात्मा को समर्पण कर दिया, तो फिर रसपान की बातें खत्म; अब क्या होगा, वह जानेगा। भागो मत; वह जैसा बता रहा है, वैसा करते जाओ, उसमें जियो, पलायन मत करो। अगर आप उतना ही कर रहे हो जितना वह कह रहा है, तो पूरी जिम्मेदारी उसकी हो जाएगी; और अगर विपरीत कर रहे हो, तो दंड के अधिकारी आप हो, और जिसके लिए आए हो वह होगा भी नहीं। आप दो तरफ चलना चाहते हो — वह भी ना छूटे और यह भी मिल जाए — यह नहीं हो सकता; आपको उसमें पूरी तरह जीना पड़ेगा, पूरी तरह नियम में रहना पड़ेगा। समर्पण के बाद (संशय भरे) प्रश्न नहीं उठते।

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मैं समर्पण करके अपने प्राणों की बाजी लगाने जा रही हूं; यह बहुत बड़ा रिस्क है।

कोई रिस्क नहीं है, ना प्राणों की बाजी है। आप जिस जिंदगी में थे, वहां से थक चुके हो, और वहां से निकलने के लिए उससे ज्यादा कुछ चाहिए। अगर वहां सुकून-आनंद होता, तो आप वहां से हटते ही नहीं; वहां घुटन, बेचैनी, धोखा, पश्चाताप मिला, तो निकलकर कहीं और जा रहे हो — प्राणों की बाजी कहां हुई? जब तक मूल तक नहीं पहुंचोगे, अपने आत्मतत्व में स्थिर नहीं होगे, तब तक ज्यादा के चक्कर में ही भागते रहोगे। रिस्क तब होता जब आप नीचे जाते — पर नीचे जाने में भी आपको रस आता है। रिस्क तो अगर इस दुनिया में किसी का है, तो गुरु का है — जो आपके लिए जंगल में बैठा है, आपके साथ ही उसका जीवन जा रहा है, बच्चों की तरह हर व्यवस्था दे रहा है, फिर भी कभी बोलता नहीं।

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जीवन भर मुझे बदले में कुछ ना कुछ मिलता रहा — मां-बाप की सांत्वना, प्यार। यहां अकेले का मार्ग है; गुरु जी भी बात नहीं कर रहे और कुकर्म भी सता रहे हैं। मां के सामने 10 मिनट मुंह लटका के बैठ जाता तो वह मना लेती।

मां-बाप ऐसा इसलिए करेंगे क्योंकि आपके द्वारा उन्हें कुछ मिलेगा — आपका कुल, खानदान, नाम, शोहरत; आपके द्वारा वे अपने "मैं" को खड़ा करते हैं। लेकिन गुरु को तुमसे कुछ नहीं चाहिए, आपके नाम से भी उसका लेना-देना नहीं। वह तभी आपसे बात करेगा जब उसे लगेगा कि आपको उसकी सख्त जरूरत है; टाइम पास के लिए नहीं मनाएगा — यहां मनाना और रूठना नहीं है। उसे पता है कि बात करेगा तो आपका स्तर गिर जाएगा, इसलिए बात नहीं कर रहा। आप अपनी समझ से आगे बढ़ो। आश्वासन मांग रहे हो, इसका मतलब अब आप मेहनत नहीं करना चाहते, सामना नहीं करना चाहते, आश्वासन पाकर अपना रसपान करना चाहते हो — यह चालाकी नहीं चलेगी।

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मैं दोबारा इस धरती पर नहीं आना चाहता। लेनदेन पूरा कर दिया है, बस एक लास्ट बाकी है; फिर उसके बाद (यहीं रहूंगा)। तो क्या फिर नहीं आऊंगा?

नहीं आने के लिए अपना लेनदेन पूरा करो। बाकी, मैं तो आपको कहूं कि अपने भरोसे से चलो, अपनी समझ से। अगर आप मुझसे भरोसा दिलवा रहे हो, तो मतलब मुझे समझे ही नहीं; मुझे समझ गए होते तो मुझसे भरोसा भी नहीं मांगते। ज्ञान से कल्याण होगा, यह शरीर से तो होगा नहीं; मेरे द्वारा जो बोला जा रहा है, उसको समझोगे तभी कल्याण होगा। दूसरा आपकी सहायता कर रहा है, यही धन्यवाद है। मैं भी तो आपके लिए जंगल में बैठा हूं — मैं किससे भरोसा मांगूं?

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डॉक्टर या शिक्षक को अपने काम का कुछ मूल्य मिलता है। गुरु को तो कुछ नहीं चाहिए, फिर वह दिन-रात एक पागल की तरह इतनी मेहनत क्यों करता है? उसे क्या मिलता है?

डॉक्टर को पैसे मिल रहे हैं, शिक्षक को भी, वे अपना परिवार चला रहे हैं। गुरु को कुछ नहीं मिल रहा, और उसे कुछ नहीं चाहिए — वही तो गुरु है। वह "ना मिलने" में पूरी तरह हो गया है, तभी गुरु स्थिति होती है, तभी आत्मज्ञान को उपलब्ध होता है; अगर एक पॉइंट भी कुछ चाहिए, तो आत्मज्ञान नहीं है। वह अपने आप में स्थिर हो चुका है, किसी के द्वारा उसे कुछ नहीं मिलने वाला। इसीलिए गुरु को श्रेष्ठ, महान बोला गया — वह "कुछ नहीं चाहिए" में काम करता है; बाकी इस पृथ्वी पर जितने पद हैं, सब "कुछ चाहिए" में काम करते हैं।

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जब हम नियम तोड़कर यहां से भाग जाते हैं, तो क्या गुरु को दुख होता है?

नहीं, वह दुख-सुख से परे है। उसे बस यह होता है कि देखो, कल्याण कर सकता था, फिर निकल गया; फिर कभी करेगा। उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा — तुम चाहे आओ चाहे जाओ। नियम में रहो तो भी तुम अपने लिए कर रहे हो, नहीं रहो तो भी तुम्हारे लिए ही है।

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भक्ति मार्ग में गुरु को रिझाने की बात आती है। शिष्य गुरु को कैसे रिझाए — क्या बस इतना कि उसके बताए नियमों में पूरी तरह उतर जाए?

गुरु क्या रीझेगा? गुरु तो पहले से पहुंच गया है। वह ऐसे लोगों के इंतजार में है जिन्हें निकलना है। अगर आप निकलना चाहोगे, तो निकालने में वह आपकी सहायता करेगा। आप निकलो चाहे ना निकलो, उसे कुछ ना चाहिए, ना मिलने वाला है। वह ना रीझता है, ना दुखी होता है; समझाने के बाद भी कोई अपना रस लेने जा रहा है, तो जाने देगा। इसलिए अपनी समझ से आगे बढ़ो; आश्वासन किसी से मत लो, और गुरु आश्वासन कभी नहीं देगा — वह कहेगा, तुम्हें करना पड़ेगा, मैं पूरी तरह हूं, बस मुझ पर संशय ना करना।

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गुरु जी को कैसे पता चलता है कि साधक (मानसिक रूप से) कहां है, सही है या चालाकी कर रहा है?

एक शिक्षक जो पढ़ाता है, उसे बच्चों के बारे में जानकारी हो ही जाती है कि किसका लेवल क्या है; पढ़ाते-पढ़ाते पूरा पता चल जाता है। आपको भी पता है, उसे भी पता है। अपना भाव चेक करते रहना — इसमें ईमानदारी आपको ही रखनी है।

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यह मार्ग हमने पहली बार देखा है — कुछ करना ही नहीं, बस खाओ, लेटो, किसी से बात नहीं करनी। इसमें इंतजार करना सबसे मुश्किल लगता है। क्या इसी में कल्याण है?

पड़े रहने में ही आपका कल्याण है। और उस पड़े रहने में चिंतन करो; चिंता ना हो। चिंता हो, तो गुरु के समक्ष अपनी बात रखो, लेकिन गुरु का इंतजार करो। गलती यह है कि गुरु को हम अपने तरीके से बुलवाना चाहते हैं। काश गुरु तुमसे खुद बोले — वह दिन लाओ; ऐसे जिज्ञासु बनो कि वह खुद आपके पास आए।

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पहले वीडियो में देखा था कि आप आसानी से सबसे बात करते थे, खूब प्रश्नोत्तरी होती थी। अब इतना स्ट्रिक्ट माहौल क्यों है?

पहले था, लेकिन लोगों का ऐसा बर्ताव रहा कि मुझे ऐसा करना पड़ा। एक बार एक महिला-पुरुष बोले, बहुत इमरजेंसी बात एकांत में करनी है; मेरे पास 16-18 घंटे सत्संग से समय नहीं था, फिर भी नहाने जाते समय मिला — बोले, मेरी भैंस बहुत बीमार है, रखूं कि बेचूं? एक साधक ने चावल चढ़े हुए बुलाया और सलाह दी कि यहां दान पात्र रखो; मैंने कहा, परमात्मा भी आकर कह दे तो दान पात्र नहीं रखूंगा, जिसके लिए आए हो वह करो। लोगों को हमने खूब समय दिया, पर लोगों ने दुरुपयोग किया। पर उस परेशानी में भी मेरे मुखारविंद से ज्ञान ही निकला, वीडियो बने, लाखों लोगों को लाभ हो रहा है — गंगा से गंगाजल ही निकलेगा; मेरा ज्ञान कुएं की तरह है, जब तक कोई निकालेगा नहीं, सोते से और पानी नहीं आएगा। लेकिन अब वीडियो बन चुके, वीडियो बनाने का भाव खत्म हो गया। अब भाव यह है कि मुझसे सिर्फ जिज्ञासु बात करे।

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कान में झींगुर-सा बजता रहता है, यह क्या है?

डॉक्टर से इलाज कराओ, कोई रोग भी हो सकता है।

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मैं आपके बताए शब्दों में जी रही हूं, लेकिन कुटिया की कुछ घटनाओं के कारण भ्रमित हो गई हूं। स्पष्ट करना चाहूं, तो क्या आपको बुरा लगेगा?

ना मुझे बुरा लगेगा, ना अच्छा। आपको ज्ञान से मतलब है कि घटनाओं से? गलती यही होती है कि हम घटनाओं को पकड़ लेते हैं, हमें ज्ञान पकड़ना चाहिए। संत जनाबाई गोबर के उपले के लिए लड़ रही थीं; घटना पकड़ोगे तो कहोगे इनकी परम स्थिति नहीं हो सकती, पर उन्होंने बताया कि मेरे उपलों से "विट्ठल-विट्ठल" की आवाज आएगी। जब मैं काम करूंगा तो घटनाएं होंगी — शरीर थकेगा, विरोध होगा; सामना मुझे ही करना पड़ेगा, आपको नहीं करने दूंगा, क्योंकि आप करोगे तो राग-द्वेष में फंसोगे, मैं करूंगा तो निर्लिप्त रहूंगा। कुछ नहीं करूंगा तो कोई घटना नहीं होगी, पर आपको लाभ भी नहीं मिलेगा। अर्जुन को सिर्फ चिड़िया की आंख दिखी — आप अपना लक्ष्य देखो। किसी का कांटा निकालना है तो उसकी पीड़ा देखकर नहीं निकलेगा; कभी-कभी सज्जन को भी दुर्जन बनना पड़ता है, काम के लिए। जो अपनी समझ से ज्ञान को समझकर आए हैं, वे कभी भ्रमित नहीं हो सकते; घटनाएं देख रहे हो, इसका मतलब आपका लक्ष्य ही नहीं है।

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ईश्वर ने मनुष्य जाति को ही इतनी प्रगति क्यों दी?

यही गड़बड़ है कि आप अपने आप को मनुष्य समझते हो। 84 लाख (योनियां) बोली गई हैं, इतने शरीरधारी जीव इस पृथ्वी पर हैं। यह शरीर मानव का है, आप मानव नहीं हो; आपको यह मानव शरीर मिला है। हो सकता है आप इसमें योग करके ना निकल पाओ, भोग-भोजन में लिप्त रहो, तो अगला शरीर पशु का, भोग-भोजन का मिल जाए।

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आप कहते हैं हम पैदा नहीं होते, जीव पैदा होते हैं, हम पर तीन गुण चिपकते हैं। और बुद्धि को राजसिक कहा गया है। तो क्या ये गुण बुरे हैं?

चिपकाया कौन है? आप ही ना। तमोगुण हो, रजोगुण हो, सतोगुण — चिपकाया हमने, तो निकालना भी पड़ेगा; जब तक उसमें हैं, जन्म-मरण है। बुद्धि गलत कहां है? यह हाथ ना गलत है, ना सही; उपयोग कहां कर रहे हो? किसी कमजोर को बिना मतलब मार रहे हो तो गलत, और उसके सुधार के लिए मार रहे हो और आपका अधिकार है, तो सही — मार दोनों स्थिति में रहे हो। जहर से दवाइयां भी बनती हैं। उपयोग का भाव क्या है, यही मुख्य है — कर्म के पहले और कर्म के बाद के भाव से फल का निर्णय होता है, सिर्फ कर्म से नहीं।

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भाव कैसे जागृत करें? मैं स्वार्थ की आदत में जी हूं; जरूरत आते ही ऑटोमेटिक स्वार्थ का भाव आता है। उसे कैसे बदलूं?

भाव जागृत करना ही नहीं है; जरूरतें भाव पैदा कर देती हैं। कर्म वैसा करो। जैसे भूख लगी, भोजन परोस दिया गया — तो शरीर की जरूरत देखो, स्वाद मत देखो; जैसा भी बना है, उसको ग्रहण कर लो। आप स्वाद में फंस जाते हो; और स्वाद अपना-अपना है — जो आपके लिए अच्छा, किसी के लिए बुरा।

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बच्चों को स्कूल में ही आध्यात्मिक शिक्षा दी जाए, या मां-बाप छुट्टियों में उन्हें ऐसी जगह लाएं, तो उनमें दूसरों को समझने की शक्ति आएगी। ऐसा क्यों नहीं होता?

कमी बताना बहुत आसान है; उस कमी को दूर करने के लिए आपने जीवन में क्या काम किया? पहले आप कल्याण कर लो। अगर लग रहा है कि बहुत लोग पढ़ना चाहते हैं पर कोई पढ़ाने वाला नहीं, तो आप शिक्षक बन जाइए — लेकिन पढ़ाना तब चालू करोगे जब उस योग्य होंगे। कहने से अच्छा है करने में लग जाओ। मुझे कमी दिखी, तो मैंने उसके लिए काम किया, और आज मैं यहां हूं; मैं घर से बातें ही करता रहता, तो किसी को लाभ मिलता क्या? बातें करना, कमी बताना इस दुनिया में सबसे आसान है, और उसमें हम अपने आप को महान समझते हैं; आपकी महानता तब है जब आप उस कमी को दूर करने का प्रयास करो। परिणाम करने वाले को मिलेगा।

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कभी-कभी साधना में मन निराश होता है; तब अंदर से आवाज आती है, "चिंता मत करो, मैं यहां हूं।" इसे मैं ब्रह्म का संकेत मानता हूं। सही मार्ग दिखाइए।

बस ईमानदारी, सत्कर्म करो और आगे बढ़ो।

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आध्यात्मिक मार्ग पर चलने के लिए युवा अवस्था से ही जाना होगा, या 50-60 के बाद भी संभव है?

हां, युवा अवस्था से ही समझना चाहिए, युवा अवस्था से ही आध्यात्मिक मार्ग में जाना चाहिए।

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रसों से हमेशा के लिए मुक्त कैसे हों?

बस "अपने तरीके से चाहिए" उसका त्याग करके जरूरत में जीना चालू कर दो।

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विचार, वासना और कल्पना में क्या अंतर है, और एकांत में साधना में इनका कैसे सदुपयोग करें?

कल्पना भी अगर कुछ है, तो उसका बेस-आधार है। तो आपको यह देखना है कि मुझे क्या चाहिए — यह आपको पक्का करना पड़ेगा।

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"मन मरा ना माया मरी, मर-मर गया शरीर; आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर" — आप अपने वक्तव्य में समझाएं।

मैं क्या समझाऊं, वे समझा के ही गए हैं। उसकी व्याख्या भी तो उन्होंने की होगी; वहां जाकर व्याख्या पढ़ लेना। कोई श्लोक है तो उसके नीचे व्याख्या भी होती है, आगे-पीछे पढ़ लेना।

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मुक्त व्यक्ति की क्या अवस्था होती है?

बस "कुछ नहीं चाहिए" में हो जाता है। कुछ नहीं चाहिए — वही तो मुक्त है।

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किसी ने बताया कि शिवलिंग प्रतीक है — परब्रह्म हम हैं और माया ने उसे चारों तरफ से घेरा है; जब माया को समझ जाता है तो हंसता है कि मैं परब्रह्म में ही था। क्या यह सच है?

हमें यह देखना है कि मैं राग-द्वेष में घिरा हुआ हूं। पहले राग-द्वेष से अपने आप को छुड़ाने का प्रयास करें, फिर देखें क्या होता है। राग-द्वेष पकड़ोगे तो बहिर्मुखी होगे, छोड़ोगे तो अंतर्मुखी — बहुत साफ-सुथरी बात है। काम कैसे करना है: राग-द्वेष किस कारण से हुआ, वह देख लेना। कोई विचार या याद पीड़ा दे रही है, तो देखो क्यों आ रही है, मुझे तो कुछ नहीं चाहिए — क्यों, क्यों, क्यों करके जाइए। राग-द्वेष एक वृक्ष की तरह है; पत्ते, टहनियां पकड़कर धीरे-धीरे जड़ तक जाओ और वहां से काट दो, तो कुछ दिन बाद वृक्ष सूख जाएगा; जब तक जड़ तक नहीं जाओगे, कभी टहनी, कभी डाली, कभी तना काटोगे, और तने से भी बहुत वृक्ष बन जाएंगे। घुटन होती है तो आप उससे निकलने का एक ऑप्शन निकाल लेते हो — नहीं, उसकी गहराई में जाओ कि इस घुटन, बेचैनी, याद, आसक्ति, उदासी के पीछे वजह क्या है। इसलिए एकांत में विचारों से मुक्त होने का प्रयास ना करें; विचारों को देखना, और कोई विचार ले जाए तो जाना। संसार में भोग गलत तब है जब गलत तरीके से — झूठ बोलकर, बहला-फुसलाकर — कर रहे हो; भोग की जरूरत आपको नहीं, शरीर को है; शरीर की जरूरत के लिए करो तो देखो करने में ईमानदारी है। बस — ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन है।

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मैंने कभी जरूरत में किसी के पैसे धोखे से छीन लिए थे; आज समझ आया कि गलत था। अब उस भाव में जाकर उसे कैसे ठीक करूं? क्या उसके बदले कई गुना सत्कर्म में लगा दूं तो वह कट जाएगा?

जब वहां जाओगे तो पश्चाताप में जाओगे; देखो आपका जाने का भाव क्या है। जब पश्चाताप की आग लग जाएगी, तो वह उसे जला देगी; लेकिन जाना आपको अंत तक है — यह बीज वृक्ष बन गया है, अब जड़ों तक जाना पड़ेगा। सत्कर्म तो अपने आप मिलता है; सत्कर्म से आत्मिक चिंतन में अपने आप को छुड़ाने का बल मिलता है। आप चाहे पूरा (कई गुना) दे दो, ऐसे नहीं होगा। पश्चाताप होगा, फिर निकलने के लिए जो करना है वह खुद आएगा। जैसे दो व्यक्ति आपसे गलती करके सॉरी बोलें — एक फॉर्मेलिटी में, एक आत्मिकता से — तो क्षमा उसे करोगे जिसे सच में गलती का एहसास हुआ; फॉर्मेलिटी वाले पर तो और गुस्सा आएगा। तो देखना है कि पश्चाताप की आग लगी कि नहीं।

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मेरा मन अचानक बहुत उद्विग्न हो जाता है, घुटन या पश्चाताप में चला जाता है, जबकि कोई घटना याद भी नहीं। क्या उस घुटन से भागूं नहीं, उसी में रहूं?

उसका सामना करो कि घुटन का कारण क्या है, कहां से हुई। पहले तो आप घुटन भी भूल गए थे जब कहीं और लगे थे; अब एकांत में कम से कम घुटन का सामना तो करना पड़ा। वही आपको ले जाएगा; घुटन का कोई बेस-आधार है, ऐसे घुटन नहीं आ सकती। उस घुटन को पकड़ के आप (जड़ तक) जा सकते हो, छोड़ के नहीं, क्योंकि घुटन ही आधार है, आखिरी तक जाने का बेस है।

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लगता है मेरे कर्मों का कोई पश्चाताप बाकी है; क्या ऐसा कोई साधन है कि सारी सजा एक बार में काट लूं?

कोई साधन है कि आपके सामने खूब भोजन रख दिया जाए और आप एक ही बार में खा लो? नहीं ना। तो ऐसा कोई साधन नहीं है। धीरे-धीरे आप चलते रहो।

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बचपन की कई बातें बड़े होकर भूल जाते हैं, पर कुछ चीजें 15-20 साल बाद भी नहीं निकलतीं; कहीं दिख जाएं तो और ज्यादा होता है। वे कब खत्म होंगी?

वह आपके हिसाब से खत्म नहीं होगी। आपको लग रहा है वह छोटी चीज है; जैसे एक करोड़पति ने किसी के ₹2 छीन लिए, और पता चला कि वे ₹2 उसकी पूरी जिंदगी की कमाई थे — आप 2 लाख भी दे दो, उसकी घुटन आपका पैसा नहीं भर पाएगा। अपने से किसी की तुलना मत करिए। और ध्यान रखिए — जहां आप जलील हुए, वहां बदले की भावना अभी भी है; लेकिन जिसे आपने जलील किया, उसका क्या? इसमें हम स्वार्थी हो जाते हैं। जितनों को इंसल्ट किया, क्या उन्हें ढूंढ पाओगे? नहीं; तो प्रकृति को समर्पण कर दो, जैसे हिसाब-किताब करना होगा, कर लेगी।

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मैं किसी को कुछ समझाती हूं, वह नहीं मानता तो द्वेष हो जाता है। क्या मुझे बोलना ही नहीं चाहिए, चुप हो जाऊं कि जो हो रहा है होने दो?

आपको देखना है कि आप किस अधिकार से बोल रहे हो — हमारा अधिकार क्या है, पावर क्या है। अगर अधिकार और पावर है, तो बदलने का प्रयास करो; अगर अधिकार नहीं, सिर्फ बोलना है, तो बोल के हट जाओ, क्योंकि प्रयास में आपको तकलीफ होगी। अगर मेरे पास कोई समझ है, तो बोल देना चाहिए, चुप नहीं रहना चाहिए। जैसे (यहां मिस्त्री) बात करना बंद नहीं कर रहे थे, मैंने कह दिया खुलकर बोलो — अब मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं; प्रॉब्लम तभी तक थी जब तक उम्मीद थी कि ये चुप हो जाएंगे। तो अपनी बात रख दो; समझ गया तो ठीक, नहीं समझा तो भी ठीक, बात खत्म।

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घर-परिवार या ग्रुप में किसी को बार-बार बोलते हैं, वह समझता नहीं, और उसे हटा भी नहीं सकते। बहुत गुस्सा आता है। क्या करें?

मान लीजिए आपकी उंगली में कैंसर हो गया — या तो ठीक कराओगे, या कटवा दोगे; रखोगे तो नहीं, क्योंकि पूरा शरीर खत्म कर देगा। तो अगर वह समझता है तो साथ रखो, नहीं समझता है तो या तो उस जगह को आप छोड़ दो या उसे छुड़वा दो; और कोई रास्ता नहीं है, सिर्फ घुटन का है। त्याग ही परम सुख है — समझा तो ठीक, नहीं समझा तो त्याग कर; हो सकता है आपका त्याग ही उसे समझा दे। अगर मौकापरस्ती में साथ रह रहे हो, तो बात अलग है — फिर घुटन में जियो।

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इस रास्ते पर चलते-चलते अगर प्राण छूट जाएं या गुरु का साथ छूट जाए, तो फिर क्या होगा? और बुद्ध ने तो पुनर्जन्म को मना किया था।

बस जहां हो, वहीं से (अगली) यात्रा शुरू होती है। बुद्ध ने कहा पुनर्जन्म नहीं होता, तो बहुत लोगों ने कहा होता है — किसकी बात मानोगे? कबीर ने कहा पत्थर पूजने से हरि मिले तो मैं पहाड़ पूजूं, पर मीराबाई को, रामकृष्ण परमहंस को मिल गया। बहुत तरह की बातें हैं। किसी चक्कर में ना पड़कर अपने चक्कर में रहो कि मेरा कल्याण कैसे हो। पुनर्जन्म होता हो या नहीं, मुझे क्या मतलब? मैं इसी जन्म में अपना कल्याण क्यों ना कर लूं — खत्म बात।

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कई संस्थाओं में गुरु के जाने के बाद उनके शब्दों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। अगर ऐसा हो, तो क्या करना चाहिए?

गुरु ज्ञान का प्रतीक है। अगर वह गुरु शरीर छोड़ दे, तो जिसके द्वारा ज्ञान निकल रहा है, उससे ज्ञान लेके आगे बढ़ो। अगर आपका नल खराब हो गया, तो क्या आप दूसरे के नल से पानी नहीं पी सकते? प्यास बुझानी है — आपको पानी की जरूरत है या नल की? तो फिर खोज करो। आपकी योग्यता, सामर्थ्य होगी तो मिल जाएगा, नहीं है तो नहीं मिलेगा।

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अगर कोई ईमानदारी और सत्कर्म पर चल रहा है, पर आपसे प्रश्न नहीं कर पा रहा, तो क्या उसे आत्मज्ञान नहीं होगा?

क्यों नहीं होगा? अगर ईमानदारी-सत्कर्म से उसका पूरी तरह जीवन है, तो आत्मज्ञान उसी समय पक्का हो गया, होगा ही होगा। जिसके बताए मार्ग पर वह ईमानदारी से चल रहा है, वही उसके सारे प्रश्नों को अंत में खत्म कर देगा — जैसे आदि शंकराचार्य का एक शिष्य प्रश्न नहीं कर पाता था, लेकिन उसकी व्याकुलता ऐसी थी कि गुरु ने उसके सारे प्रश्न खुद गिरा दिए; उसमें पात्रता थी।

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जिनको आत्मज्ञान हो चुका है, क्या उन्हें भी क्रोध आता है?

क्रोध नहीं आता, वे क्रोध से परे हैं; लेकिन काम के लिए क्रोध करना पड़ता है। जैसे शिक्षक विद्यार्थी पर, मां बेटे पर क्रोध करती है — क्रोध ना करे तो वह समझेगा नहीं। क्रोध एक ऊर्जा है। आत्मज्ञानी आपके कल्याण के लिए क्रोध करते हैं; अपमान किया जाएगा तब पता चलेगा कि आपमें अहंकार कितना है, अपमान का कितना असर है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह में से आत्मज्ञानी में लोभ, मोह और मद (कुछ होने का अहंकार) नहीं रहता; क्रोध नहीं रहेगा तो समाज के लिए काम ही नहीं कर पाएगा।

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बचपन में मेरे घर एक "पागल" संत आते थे, सिर्फ मुझसे अकेले में नॉर्मल बात करते थे। मैंने पूछा किस पंथ से हैं, तो बोले "परमहंस अवस्था"। इसका क्या मतलब है? और उन्होंने मुझे ही क्यों चुना?

परमहंस स्थिति मतलब अपने आप को (सबसे) निकाल लिया था; और जब अपने आप को निकाल लिया, तो कोई संप्रदाय, परंपरा — सबसे वह निकल गया, परंपरावादी नहीं रह जाता। आपको चुना होगा क्योंकि आपकी पात्रता होगी, आपकी जिज्ञासा होगी।

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भाव ऐसा बन रहा है कि आप मुझमें समा जाओ और मैं आपमें खो जाऊं; आप ही आप रहें और मैं खत्म हो जाऊं।

भाव तो यह भी बन सकता है कि मैं राजा बन जाऊं, लेकिन भाव से नहीं होगा; राजा तक पहुंचने के लिए काम करना पड़ेगा। आप तब खत्म होंगे जब आपको कुछ नहीं चाहिए; उस स्थिति के लिए काम करो।

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आत्मज्ञानी तो सबसे मुक्त हो गया, उसे कुछ नहीं चाहिए; फिर वह किस आधार पर संसार में रहता है?

कुछ रहता ही नहीं। वे जिज्ञासु का इंतजार करते रहते हैं, बस; काम पकड़ लेते हैं, नहीं तो रुकेंगे कैसे? आधार-बेस चाहिए ना।

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ब्रह्म को अविकारी कहा जाता है, और चराचर जगत पूर्ण रूप से ब्रह्म है; जीव इंद्रिय और अंतःकरण से विकारी है — तो ब्रह्म अविकारी कैसे हुआ?

जैसे बल्ब से उजाला है, और उजाले में बल्ब नहीं है; उजाले में आप कुछ भी करो, क्या उजाला गंदा होगा? प्रकाश को कोई आंच नहीं आएगी। इसलिए ब्रह्म से यह जगत है, ब्रह्म से आप हो, पर जगत में ब्रह्म नहीं है। या तो इस जगत को पकड़ोगे, तो ब्रह्म से दूर हो गए; ब्रह्म को पकड़ोगे, तो जगत से दूर हो गए। जब तक अपने तरीके से चाहिए, तब तक आप जगत को पकड़े हो; जब अपने तरीके से मुक्त हो गए, तो आपने ब्रह्म को पकड़ लिया।

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अगर सभी बच्चों को आत्मज्ञान में लगा दिया जाए, तो क्या देश की टेक्नोलॉजी पीछे नहीं चली जाएगी?

नहीं, बहुत आगे चली जाएगी, क्योंकि सबसे ज्यादा काम और समय अगर कोई देता है तो आत्मज्ञानी। तब आप देश के लिए काम करोगे; अभी तो सिर्फ अपने लिए काम कर रहे हो, एक तरह से देश को खोखला कर रहे हो — पकड़े जाने का डर है, इसलिए पूरी तरह नहीं कर पा रहे। आत्मज्ञानी को कुछ नहीं चाहिए, वह आपके लिए काम करता है; अगर सब ऐसे हो जाएं, तो स्वर्ग यहीं उतर आएगा।

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आप कहते हैं प्रेम किया नहीं जा सकता, वह घटित होता है। तो क्या संसार में किसी ने किसी से प्रेम किया ही नहीं? क्या मीरा का मूर्ति के प्रति प्रेम, प्रेम नहीं था?

शुरुआत जरूरत में होती है; प्रेम में (बाद में) वह हो जाता है। अगर सोचो कि मैं इनसे प्रेम करूं, तो कभी नहीं होगा; वह हो जाएगा। मीरा का भाव प्रेम का था, पर उन्हें भी ज्ञान चाहिए था — बाद में संत रविदास जी को गुरु बनाया; इसका मतलब कुछ उन्हें चाहिए था। ज्ञान के बाद आदमी प्रेम में हो जाता है, तब उसका जीवन समाज के लिए होता है, और वह सबके लिए एक जैसा हो जाता है। प्रेम कब घटता है? जब कुछ नहीं चाहिए। शुरुआत हम "कुछ नहीं चाहिए" से कर सकते हैं, प्रेम तक पहुंच सकते हैं।

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कहानी है कि किसी ने जीवन भर जो भी किया, पर अंतिम क्षण में (बच्चे "नारायण" का नाम लेते हुए) भाव आ गया तो उसे वही गति मिल गई। क्या पूरी जिंदगी कुछ भी करके अंतिम क्षण के भाव से वह प्राप्त हो जाता है?

नहीं, ऐसा संभव नहीं। भाव, फिर कर्म, फिर परिणाम। सिर्फ भाव से कुछ नहीं होने वाला — भाव से राजा बनते तो सब बन जाते। कर्म के पहले भाव बनता है और कर्म के बाद भाव बनता है, उससे फल का निर्णय होता है; भाव हुआ, कर्म ही नहीं हुआ, तो उससे क्या परिणाम आएगा?

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नींद क्या है? इसमें जीव और मन की क्या अवस्था रहती है? और स्वप्न क्या है?

स्वप्न मतलब आपकी ही रचना है, आपके द्वारा ही देखा जा रहा है; और नींद शरीर का आराम है। आप देखो कल्याण कैसे होगा; ऐसे प्रश्नों में ना उलझो तो अच्छा है, जिनके जवाब का कोई मतलब नहीं — जैसे बाल काले क्यों हैं, पत्ता हरा क्यों है।

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आपने एक वीडियो में कहा था कि मैं लोगों की गठरी देख पाता हूं। क्या आप हम सबकी गठरी देख पाते हो?

मैं भी वहीं से आया हूं। एक जगह सब थे, मैं भी वहीं था, और मैं निकल गया, एक जगह पे आ गया; तो उस जगह आप हो, तो आपकी गठरी मैं देख ही पाऊंगा ना। आप जिससे पीड़ित हो, मैं भी कभी उसी पीड़ा में था।

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बाहर से हम बहुत कुछ दिखाते हैं, पर अंदर जो चलता है वह हमें पता है। अंदर का भाव और बाहर का भाव एक जैसा कैसे करें?

आप देखिए कि आपको करना क्या है, आप चाहते क्या हो — यह पक्का करो, और उसके लिए काम करो। हर भाव पे काम भी मत करो, क्योंकि भाव तो देश-काल, स्थिति-परिस्थिति में, कभी घटनाओं को देखकर बन जाता है। सोचो कि इस भाव वाला कर्म करेंगे तो परिणाम क्या मिलेगा; जब तक परिणाम का पता ना हो, तब तक काम मत करो।

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निकलने का भाव तो बना लिया, पर क्या इस मार्ग में बीच-बीच में बीमारी आ जाती है?

बीमारी आपके ही कर्मों का परिणाम है; इलाज कराओ बढ़िया से।

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क्या भक्ति मार्ग से भी आत्मज्ञान मिल सकता है, जैसे मीराबाई को भक्ति करके?

हां, एकदम — अगर भक्ति मार्ग में कुछ नहीं चाहिए, तो।

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एक संत का बुरा करने वाला, और एक ईमानदार जीव का बुरा करने वाला — क्या दोनों का एक ही अंजाम होगा?

अगर वह (जीव) ईमानदार है, तो घुमा-फिरा के एक ही होगा। अगर वह भी बेईमान है, तो कुछ कम होगा।

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मेरे पति की सारी धोखेबाजी सामने आ रही है। साथ हूं, पर वे सुधरते नहीं। मार्गदर्शन दीजिए।

त्याग ही परम सुख है। अगर कोई सुधर रहा है तो ठीक है, नहीं तो उसको छोड़ दो।

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एकांत में बैठकर क्या और कैसा चिंतन करना चाहिए?

मैं कैसे निकल जाऊं इस भवसागर से — बस यही मुख्य बेस है, कि मैं कैसे छुटकारा पाऊं।

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मुझे लगता है हर रिश्ता स्वार्थ पर टिका है। क्या माता-पिता का रिश्ता भी? वे औलाद से बहुत अपेक्षा करते हैं — यह स्वार्थ है या प्यार?

जरूरत है। उन्होंने आपके लिए किया, तो उम्मीद रख रहे हैं कि आप उनके लिए भी करें।

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आपने ज्ञान कहां से लिया, कौन-सी मेथड है? आपका कोई गुरु भी नहीं दिखता।

फिक्स नहीं बोल सकता; यह प्रत्यक्ष ज्ञान की खोज हुई है, और यह इतिहास में सबसे अलग है, क्योंकि जब भी कोई ज्ञान लाता है तो इतिहास से अलग ही लाता है। मैंने बहुत शुरुआत की थी, लेकिन गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है — फिक्स मेरा कोई गुरु नहीं हुआ कि बोल सकूं मेरे गुरु ये हैं; पर अनेक लोग कहीं ना कहीं मेरे निमित्त बने, किसी ना किसी द्वारा कुछ ज्ञान मिलता गया। 2020 में मेरे प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए; मुझे खुद नहीं पता कहां हुआ, कैसे हुआ। लगभग 24 फरवरी 2020 से 1 जुलाई तक मैं अपने आप में ही पड़ा रहा, बाहर ही नहीं निकला, आसमान ही नहीं देखा — बस एक आसन था, उसी पे सोया रहता, वहीं भोजन मिल जाता था।

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उस स्थिति में क्या अपना और शरीर का पता रहता है?

शरीर का भान तो रहता है, तभी तो खा रहे हो। स्थिति यह रहती है कि शरीर में आसक्ति नहीं रहती, मोह नहीं रहता, बंधन नहीं रहता, और अपने आप में आनंद रहता है।

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क्या बिना गुरु के, खुद से स्वाध्याय करके — शास्त्र, महापुरुषों की जीवनी, उपनिषद पढ़कर — आत्मज्ञान नहीं हो सकता?

प्रयास कर लो। समय बचा तो गुरु खोज लेना। एक बार प्रयास कर लो।

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योग्यता का मतलब क्या है?

योग्यता मतलब आपकी सामर्थ्य — आपकी कैसी सामर्थ्य है।

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अवधूत स्थिति क्या है?

अवधूत स्थिति — जहां ना राग है, ना द्वेष, ना मोह, ना आसक्ति, ना इच्छा, ना अपेक्षा, ना ईमानदारी, ना बेईमानी, ना कोई खोज; बात ही खत्म।

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ब्रह्मज्ञानी संत को कैसे पहचानें? हम जान ही नहीं पाते कि यह संत भी हैं।

क्या जरूरत है पहचानने की? आप अपने आप को पहचानो, आप जिज्ञासु बनो, बस बात खत्म।

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क्या परम ज्ञान के मार्ग पर भाग्य पर भरोसा कर सकते हैं?

नहीं, आपको काम करना पड़ेगा। आप जितना काम करोगे, उतना मिलेगा।

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काम और क्रोध का आपस में क्या संबंध है?

क्रोध दो स्थिति में व्यक्ति करता है — एक अपनी इच्छा पूरी करने के लिए, एक सामने वाले के हित के लिए। और काम मतलब आप कोई काम करके परिणाम पाना चाहते हो, उसके लिए करते हो। काम में ही क्रोध का उपयोग होता है; अगर काम छोड़ दो, तो क्रोध आप कर ही नहीं सकते।

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आसक्ति को कैसे छोड़ें?

बस उससे लेने का भाव छोड़ दो। आसक्ति-बंधन उसी से है जिससे आपको आपके तरीके से कुछ मिलता है। लेने का भाव छोड़ दो, आसक्ति खत्म।

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विकसित देशों में कोई आत्मज्ञानी नहीं, सिर्फ टेक्नोलॉजी है, फिर भी वे आगे हैं; हमारे देश में बहुत आत्मज्ञानी हुए, फिर भी देश विकसित नहीं हुआ — क्यों?

इसलिए कि यहां आत्मिक शांति के लिए लोगों ने ज्यादा काम किया है; जिसके लिए आप काम करोगे, वही बढ़ेगा। उन्होंने पैसे के लिए, बाहरी चीजों के लिए काम किया, तो वह उनके पास है; लेकिन आज जितने विकसित देश हैं, उनकी मानसिक स्थिति बहुत खराब है, वे मानसिक पीड़ा में हैं। यहां के लोग आत्मिक कल्याण के लिए ज्यादा काम करते हैं, तो शांति में हैं।

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मन, वाणी और कर्म के शुद्धिकरण का क्या मतलब है?

आप ठीक तरीके से जीवन जियो। जैसा करोगे, वैसा बन जाओगे।

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(कुटिया में सेवक) मुझे अब कोई घुटन, बेचैनी नहीं; बस तब दुखी होता हूं जब मेरी वजह से आपको चिल्लाना पड़ता है — जैसे कल रात कुत्तों के लिए गेट नहीं खोला। मुझे पहले से लग रहा था कि आप बोलने वाले हैं, फिर भी नहीं उठा।

मैं यह कह रहा हूं कि तुम लोगों को किसी जीव की फीलिंग, दर्द क्यों नहीं दिखता? वह (जर्मन शेफर्ड) गेट की ओर मुंह करके इंतजार कर रहा था कि ये खोलेंगे और मैं जाकर विश्राम करूंगा; सुबह चिल्ला रहा था, तुम्हें आवाज नहीं गई। कोई अदृश्य थोड़ी ना है, प्रत्यक्ष है। यह लापरवाही है — सुधार करो; आप जवाबदार इंसान बनो। कोई बात नहीं, उस पर काम करो, अपने अंदर मानवता को जागृत करो; हम बहुत नीचे गिर गए हैं कि जीवों की फीलिंग नहीं समझ पाते, बस अपने आप से मतलब रहता है। (और जो मन कहता है कि दिखावे में ही सही, कर तो रहा हूं — कोई बात नहीं, लगे रहो, अपने आप को हमेशा लगा के रखो।)

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क्या मरने के बाद एक बार हम अपने स्वरूप को देखेंगे, पूर्ण होंगे? जैसे मुस्लिम कॉन्सेप्ट है कि मरने के बाद एक बार अल्लाह के सामने जाएंगे।

पूर्ण तो आप इसी शरीर में हो सकते हो, मरने के बाद थोड़ी ना। मरने के बाद तो जिस स्थिति में आप गए हो, अगला शरीर तैयार है। अल्लाह के सामने बनके क्या जाते हैं — हो सकता है राक्षस बनके जाएं। अगर सजा सुनाने के लिए दर्शन हो रहा है, तो वह दर्शन थोड़ी ना है; राजा किसी आदमी को मृत्युदंड सुना रहा है, तो क्या वह राजा का दर्शन हुआ? जैसा कर्म है, वैसा लेकर जाएगा; अपराधी जज के सामने अपराधी बनके ही जाएगा, समान नागरिक बनके नहीं।

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कहते हैं "ब्रह्म एक है, द्वितीय नास्ति"; फिर बताने वाला, सुनने वाला — हम तो अनेक हो गए। और गुरु ने चेतन, चेतना, चैतन्य कहा था — चेतन कौन है, समझ नहीं आता।

ब्रह्म एक है, हमारी बात थोड़ी ना हो रही है। नाश रूप का होता है, लेकिन रूप के पीछे भी तो कोई है। यहां बातें काम नहीं करेंगी; देखो ना — द्वेष के पीछे कौन है, द्वेष को समझने वाला कौन है? द्वेष अलग है, और समझने वाला अलग। शरीर चेतन है; आप चेतन के चक्कर में पड़ गए। आत्मा को भी चेतना कहा गया, समझ को भी चेतना कहा गया। कहने का मतलब, सबके पीछे आप हो; आप देखो आप क्या हो। अभी तो आप किसी के द्वारा अपने आप को देख पा रहे हो कि मैं यह हूं; जब द्वारा हट जाएगा, तब देख पाओगे कि आप क्या हो। पहले द्वारा तो हटाओ।

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कुछ गुरु धन, विद्या, मंत्र देते हैं, कथा-स्तोत्र से मोक्ष की बात करते हैं; क्या सिर्फ सत्कर्म से ही आत्मज्ञान हो जाएगा?

ईमानदारी, सत्कर्म।

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"मैं हूं" के भाव को हमेशा कैसे पकड़े रखूं?

तब पकड़े रहोगे जब किसी और को नहीं पकड़ना चाहोगे। यह हाथ कब तक पकड़े रहोगे? जब तक कुछ और नहीं पकड़ना चाहोगे; जैसे ही किसी और को पकड़ा, यह हाथ छूट जाएगा। उससे बेटर मिल गया तो निकल गया।

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आपका ज्ञान, भाव, स्थिति देखकर आंखों में आंसू आ जाते हैं — जैसे नर्मदा तट पर आपने कहा था "मुझे घर वापस जाना है"। क्या इसे अंतःकरण शुद्ध होने का लक्षण समझ सकते हैं?

वापस कौन जाना चाहेगा? जिसे कुछ नहीं चाहिए। और जिसे कुछ चाहिए, वह वापस थोड़ी जाना चाहेगा।

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मैं सही मार्ग पर हूं, मुझे कैसे पता चलेगा?

यह आप ही को पता चलेगा। आप गलत मार्ग पे हो, यह किसे पता चला था?

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आंख बंद करके बैठता हूं, लेकिन राग-द्वेष कुछ दिखता नहीं; यात्रा शुरू ही नहीं हो पा रही। क्या करें?

यात्रा तो शुरू करो, आपके ऊपर है। नहीं कर पा रहे, तो आ जाओ फिर।

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क्या सादगी से रहने वाला व्यक्ति ईमानदार होता है?

नहीं, जरूरी नहीं। ईमानदारी कर्म के प्रति क्या है, वह (देखना है); सादगी दिखावा भी हो सकती है।

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मैं ईमानदारी से जी रहा हूं और सत्कर्म भी कर रहा हूं; मेरी यात्रा शुरू हो जाए, ऐसा क्या करूं?

(अगर ईमानदारी से जी रहे हो और सत्कर्म कर रहे हो, तो) यात्रा शुरू है फिर।

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आपका ज्ञान गीता, भागवत, ज्ञानेश्वरी जैसा ही है?

बस समझ-समझ की बात है। जो स्वयं के लिए खोज करता है, वही समझेगा कि एक ही है। आत्मज्ञानी संतों का यही अनुभव है, बस कहने का तरीका अलग-अलग है।

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आत्मचिंतन में किसी अलग तरीके से, आसन लगाकर बैठना जरूरी है? मेरी कमर में दर्द रहता है।

आप चाहे जैसे बैठ सकते हो; बस आत्मिक चिंतन हो, आराम ना हो — यह आपको देखना है। कोई विशेष मुद्रा नहीं है; कभी भी, कहीं से भी बैठो।

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ब्रह्म को सत्य, शाश्वत कहा गया है। ऋषियों ने इसको कैसे जाना?

उसके लिए मेहनत किया।

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हम दृष्टा और चेतना हैं, तो फिर काम कौन करता है और सोचता कौन है? क्या हम ही दोनों करते हैं?

आप ही देखने वाले हो, आप ही सुनने वाले हो, आप ही बोलने वाले हो, आप ही सूंघने वाले हो, आप ही स्पर्श करने वाले हो, और आप ही रसपान करने वाले हो। मिला-जुला के आप ही हो।

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मैं अकेले में विचार देख रहा था, तो देखा कि मैं खुद ही गलत विचार कर रहा था। पता चलते ही मैंने नाम जप किया और ध्यान डायवर्ट हो गया। क्या यह नॉर्मल है?

जिसे आप गलत विचार कह रहे हैं, आपने कभी उन विचारों को सहयोग दिया है, उस विचार की जानकारी आपने कहीं ना कहीं से ली है। विचार ना सही होते हैं, ना गलत; आप किस विचार को पकड़कर काम करते हो, यह देखना है।

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क्या सभी साधकों की आत्मज्ञान तक पहुंचने की यात्रा एक जैसी ही रहेगी?

लक्ष्य एक है; पहुंचने का तरीका अलग-अलग, भिन्न-भिन्न हो सकता है।

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क्या मैं एकांतिक चिंतन के लिए अभी तैयार नहीं हुआ हूं?

यह तो आपको देखना है; यह आप ही बता सकते हो कि आप एकांत के लिए तैयार हुए हो कि नहीं।

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मैं बाकी हर काम में अच्छा हूं, पर अध्यात्म में मुझे इतना भ्रम क्यों होता है? क्या मुझे खुद पर विश्वास नहीं है?

यह जानकारी का अभाव है। अध्यात्म को पूरी तरह समझिए कि हमारे जीवन में अध्यात्म की जरूरत क्यों पड़ी; पूरी जानकारी लीजिए। जानकारी का अभाव है, तो अपने लक्ष्य की ओर बढ़ नहीं पाओगे।

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धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष क्या है?

जहां आपके द्वारा जरूरतमंद की सेवा होती है, वहां परोपकार घटित होता है; जहां परोपकार होता है, वहां धर्म घटित होता है, वह आपको धार्मिक बनाता है और आत्मिक कल्याण में सहायक होता है। धर्म के लिए बल चाहिए — वह बल है अर्थ, तन का बल और आपकी समझ का बल; तो अर्थ से जरूरतमंद की सेवा करिए। काम — कोई भी काम ईमानदारी से करिए। और मोक्ष — अगर ईमानदारी से कर रहे हैं तो आगे का बंधन बढ़ेगा नहीं, सत्कर्म कर रहे हैं तो पिछला खत्म होगा, और आपको मोक्ष हो जाएगा। मोक्ष के यही रास्ते हैं।

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जन्म-मरण से मुक्त कैसे हों, और अंदर की प्यास और तड़प कैसे शांत हो?

जन्म-मरण से तभी मुक्त हो पाओगे, और अंदर की प्यास तभी बुझेगी, जब आप अपने आप को इच्छा और अपेक्षा से मुक्त करा लोगे।

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क्या गुरु कृपा करने से पहले परीक्षा लेने के लिए हमारे सामने लालच रखता है?

गुरु कोई व्यक्ति विशेष नहीं है, गुरु ज्ञान का प्रतीक है; प्रकृति खुद परीक्षा लेती है। विद्यार्थी बिना परीक्षा के क्लास पास नहीं कर सकता, किसी पद पर जाना है तो इंटरव्यू देना पड़ेगा — हर जगह परीक्षा देनी पड़ेगी। कोई कहे मैं राम का भक्त हूं — भक्ति कब समझ में आएगी? जब रास्ते में उसे अथाह धन की जरूरत हो, धन ना मिले तो मर सकता हो, और सामने रावण की प्रतिमा सोने की और राम की प्लास्टिक की हो — तब वह क्या उठाता है, उस समय भक्ति का पता चलेगा। विपरीत परिस्थितियों में भक्ति का पता चलता है, अनुकूल में नहीं; जैसे रिश्तेदारों-दोस्तों का पता विपत्ति में चलता है।

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(एक साधक) धन की कमी नहीं, पर पत्नी नहीं रही, बच्चे विदेश में हैं, घर भूत बंगला लगता है। अध्यात्म में भी भ्रम ही भ्रम दिखता है; जिसके पास गया, उसने लूट लिया। और बच्चे कहते हैं धन भी मत खर्च करो। जीने का आधार ही नहीं है, क्या करूं?

विपत्ति में आपको खुद सामना करना पड़ेगा; अपनी विपत्तियों से मुक्त होने के लिए खुद अपनी सहायता करो, कोई नहीं आने वाला, किसी के पास इतना समय नहीं है। अपनों ने आपको नहीं रखा — उन्होंने अपने तरीके से रखना चाहा, आप अपने तरीके से रहना चाहे; अपनों ने बहुत इज्जत के साथ बेइज्जत किया, तभी आप वहां से भागे। तो आपके पास जितनी ताकत है — धन, तन, समझ — सब अपनी परम शांति के लिए लगा दो, कुछ बचाओ मत; आखिरी में तुम्हारे अलावा तुम्हारे पास कुछ बचना नहीं चाहिए, ताकि कह सको कि तुझे पाने के लिए मैंने सब लुटा दिया। मैं जब निकला था तो 12 ज्योतिर्लिंग की जगह 14 कर लिए (कि असली छूट ना जाए), कर्ज लेकर भी घूमा, ताकि कोई ना कहे कि मैं तेरे दरवाजे पे आया नहीं। बस इतना ध्यान रखना कि ईमानदारी और सत्कर्म हो, किसी को तकलीफ ना हो — कोई कहे कि एक चींटी मारने से परमात्मा मिल जाएगा, तो मैं नहीं मार सकता।

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क्या ऐसे समझ सकते हैं कि जहां राग है वहां हमारा लेनदेन बाकी है, और जहां वैराग्य है वहां लेनदेन क्लियर हो गया?

अब देखना यह है कि जहां राग है, हो सकता है वहां नया लेनदेन कर रहे हो। हमें राग-द्वेष से मुक्त होना है, ईमानदारी से जीवन जीना है; अपनी योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करोगे, तो राग होगा ही नहीं। यह बहाना मत बनाओ कि पीछे का है, जबकि नया तैयार कर रहे हो। नया बनाना, पैदावार बंद करो, पिछला खत्म हो जाएगा। ईमानदारी-सत्कर्म से जियो; जितनी आपकी योग्यता है उतना मिल जाएगा, और चाहिए तो उसके लिए काम करो।

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आपने कहा किसी और की समझ से काम मत करो, पर मैं तो आपको सुनता हूं। अपनी समझ विकसित कैसे करें?

जैसे मैं शब्दों के द्वारा बता रहा हूं और आप समझ रहे हो — इन शब्दों को अपना के जीवन जियो, तब आपकी समझ विकसित होगी।

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क्या हम जिस समय प्रेम में होते हैं, उसी समय आनंद में भी होते हैं, या ये अलग-अलग समय की स्थितियां हैं?

अगर आप प्रेम में हो, तो आप आनंद में हो, क्योंकि प्रेम में हो तो अपने आप में हो। और प्रेम में तब होंगे, जब आपको कुछ नहीं चाहिए।

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क्या यह सही है कि इस संसार में रहने का आधार दूसरों की बद्दुआ है — अगर दूसरों के भीतर से बद्दुआ बंद हो जाए, तो हम इस संसार में रह ही नहीं पाएंगे?

एकदम। आधार और बेस पाप और पुण्य है। अगर आप इस संसार में, इस शरीर में रुके हो, तो लेनदेन है, और लेनदेन पाप-पुण्य में है। लेनदेन खत्म, तो आप यहां आकर क्या करोगे?

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मेरे अंदर आनंद है, पर पता नहीं कहां है। इस आनंद को कैसे खोजें, कैसे उसमें रहें?

आनंद को खोजना नहीं है; अपने आप में होना है, और आपमें आनंद है। जैसे कोई व्यक्ति किसी पद पे है — या तो इस्तीफा दे, तो घर जाकर सुकून से बैठेगा; या बेईमानी करे, तो जेल में बैठेगा; या नौकरी पूरी करे, तो इज्जत के साथ हट जाएगा। तो अगर आप लेनदेन ईमानदारी के साथ कर लेते हो, तो सम्मान सहित अपने आप में, आनंद में हो जाओगे।

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आपकी कुटिया में आजीवन रहने के लिए क्या केवल एक नियम में ढील मिल सकती है?

किसी को भी नहीं मिल सकती। नियम सिर्फ नियम है, और उस नियम में ही आपकी उन्नति हो सकती है। जैसे किसी बीज को पृथ्वी में डालो और पांच तत्वों में से एक तत्व निकाल दो, तो वह वृक्ष बन ही नहीं सकता।

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आत्मिकता से किसी से लेनदेन करें, और अहंकार से करें — इसका हमारे और सामने वाले के आत्मिक स्तर पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

आत्मिकता से लेनदेन करोगे तो सामने वाले को भी समझ में आएगा, उसके भाव का भी शुद्धिकरण होगा, सुधार आएगा। अहम भाव में करोगे तो उसे भी ठेस पहुंचेगी; आप तो भटक ही गए, वह भी भटक सकता है अगर उसकी समझ विकसित नहीं हुई — वह भी अहंकार, मान के चक्कर में जी रहा है, तो ईंट का जवाब पत्थर से देगा।

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मैं विकलांग हूं, मेरी माताजी मेरी सेवा करती हैं। मेरा कर्मबंधन कैसे मिटेगा?

नहीं, आपको जरूरत है; यह बंधन नहीं है। अगर जरूरत में कोई आपकी सेवा कर रहा है, तो बंधन नहीं है।

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धन्यवाद देने से हमारा आत्मिक स्तर कैसे बढ़ता है और ना देने से कैसे गिरता है? इसके पीछे क्या विज्ञान है?

जैसे कोई आपसे रास्ता पूछे और धन्यवाद दे, तो आत्मिक सुकून मिलता है कि बहुत अच्छा इंसान है; धन्यवाद ना दे, ऐसे ही चला जाए, तो कहते हो कितना खड़ूस है — उसके अंदर से कहीं ना कहीं बद्दुआ निकली। आशीर्वाद और श्राप अंदर से अपने आप निकलता है, वह कुछ कर नहीं सकता। इसलिए धन्यवाद देकर ही आगे बढ़ना चाहिए।

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जीव, आत्मा और परमात्मा — ये तीन अलग-अलग क्या हैं? समझाइए।

जैसे बीज है, अंकुरित हुआ तो पौधा है, फिर वृक्ष है — नाम अलग-अलग हैं, स्रोत एक ही है। लेकिन क्या पौधे को वृक्ष बोल सकते हो, या वृक्ष को पौधा? है एक ही, पर देश-काल, स्थिति-परिस्थिति से पहले बीज, फिर पौधा, फिर वृक्ष।

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पहले गुरु ज्ञान देने से पहले शिष्य से 12 साल सेवा करवाते थे; आज गुरुओं ने लंगर लगा रखा है, कहते हैं पहले ज्ञान ले लो, सेवा बाद में कर लेना। इसमें क्या अंतर है?

कहानी है (सच भी हो सकती है, झूठ भी) कि जब कलियुग आया, तो उसने कहा — मुझमें अवगुण अनेक हैं, पर एक गुण है: हर युग में हजारों साल तपस्या के बाद आपसे मिलना होता था, मेरे युग में घड़ी-आधी घड़ी में मिलना हो जाएगा; और मैं इतनी व्यवस्था दे दूंगा कि लोग सोच भी नहीं सकते। पहले नदी, कुएं से पानी लाने में घंटों लगते थे, अब हर रूम में नल है; टंकी भरी तो खुद बताती है कि मोटर बंद करो; संजय को महाभारत में जो आंख मिली थी, आज सबके हाथ में है। इतनी सुविधा के बावजूद लोग कहेंगे टाइम ही नहीं है, जबकि टाइम ही टाइम रहेगा। पहले वाल्मीकि को दीमक लग जाती थी, आज मच्छर काट ले तो साधना छोड़ मच्छर भगाते हैं — सहनशक्ति नहीं है। और आज कल्याण की बातें भी रसपान बन गई हैं — जहां थे वहां मजा नहीं आ रहा, तो अध्यात्म ले लिया; शब्दों को ले रहे हो, जी नहीं रहे; मान के चक्कर में आंख बंद करके बैठ गए, नाम के ध्यानी, नाम के ज्ञानी बन गए।

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कोई एक अक्षर का ज्ञान दे रहा है, कोई दो का, कोई पांच का; कोई राम कहता है, कोई अल्लाह, कोई वाहेगुरु — असल में कहना क्या है?

कोई वाटर कह रहा है, कोई पानी, कोई जल, कोई नीर — मूल क्या है? अपनी प्यास बुझाओ; सबसे प्यास बुझेगी। शब्दों के जाल में मत फंसो; देखो बात किसकी कह रहा है, तब देखोगे कि मिला-जुला के सब उस परम सत्ता की बात कर रहे हैं। अब लोग गुरु भी क्यों खोज रहे हैं — निर्विकार होने के लिए नहीं, मालामाल होने के लिए। अगर कहते हो उसने मुझे ठग लिया, तो आप उससे ज्यादा ठगने गए थे — हजारों दिए लाखों के चक्कर में, लाखों दिए करोड़ों के चक्कर में। सबसे बड़े ठग हम हैं; काश अपने ठगपन को देख पाते। अगर आप ठग नहीं हो, तो आपको कोई ठग ही नहीं सकता। मेरी अशांति का कारण मैं हूं, और कोई नहीं।

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(वही साधक) आज धन-वैभव खूब है, फिर भी घुटन क्यों है? और मेरे बच्चे मेरी इज्जत क्यों नहीं करते?

30 साल पहले लोग गरीब थे, लेकिन शांति और मस्ती से जीते थे। आज घुटन इसलिए है क्योंकि बेईमानी से धन इकट्ठा कर रहे हैं; जब स्रोत ही अशुद्ध है, तो उससे जितनी व्यवस्था होगी, अशुद्धि ही आएगी। पहले मां-बाप बच्चों को संस्कार देते थे — ईमानदारी से जीना; अब कहते हैं बस पैसा कमाना, चाहे लूट लो। आपके घर में कोई काम करने वाला बेईमानी करते पकड़ा जाए, तो क्या करोगे? निकालोगे। एक बेईमान की इज्जत बेईमान भी नहीं करता — बेईमान भी ईमानदार नौकर, ईमानदार साथी की उम्मीद रखता है। तो आपने व्यापार में बेईमानी की, तो बच्चे आपकी इज्जत कैसे करेंगे? आप भटक रहे हो, तो उसके जिम्मेदार आप हो; इसे स्वीकार करो और सत्संग से सारी बातें समझो, आप परम शांति की तरफ बढ़ते जाओगे।

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घर पर बेड-गद्दे पर इतना आलस है; और यहां (कुटिया में) ऐसी नींद आती है, जैसे गद्दे पर बैठे हों। ऐसा क्यों?

इसीलिए कि वहां बेईमानी की व्यवस्था है, और यहां ईमानदारी की व्यवस्था है; यह सुकून देगी।

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घर जाकर कोई मंत्र वगैरह जाप करना है?

मंत्र यही है — ईमानदार हो जाओ। और मूल मंत्र यही है — स्वीकार कर लो कि आज मैं जहां हूं, उसका जिम्मेदार मैं हूं, मैं यहां से निकलना चाहता हूं, और इसके लिए कुछ भी कर सकता हूं। अगर यह स्वीकार कर लोगे, तो कोई निकालने वाला भी आ जाएगा — कोई दया कर देगा, करुणा कर देगा। लेकिन गुनाह करने के बाद कहोगे मैंने तो कुछ किया ही नहीं, तो जितने आएंगे, दो पटाखा मार के ही जाएंगे। जैसे अपराधी जब तक भागता है, कानून मारता रहता है; जैसे ही कबूल लेता है, मारना बंद, वही लोग भोजन-रहने की व्यवस्था करते हैं; घर में बच्चा चोरी करके जब तक नहीं कबूलता, मार खाता है। तो एकांत में बैठकर कबूल लेना कि इसमें किसी का दोष नहीं, इस दुनिया में एक ही दोषी है — मैं; बाकी सबने तो मेरी सहायता की है।

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मैंने मान लिया, जान लिया कि मैं दृष्टा हूं, फिर भी आत्मज्ञान जैसा कुछ नहीं हुआ। बात समझ नहीं आई।

मैं यहां बैठकर मान लूं कि मैं राजा हूं, तो क्या राजा हो गया? राजा के लिए योग्यता चाहिए, राजगद्दी चाहिए, प्रजा चाहिए। यह गुड्डा-गुड्डी का खेल छोड़ो। आपने दृष्टापन का भाव लाया है, दृष्टा स्थिति थोड़ी ना हुई है — उसमें आओ। राजा का भाव बनाने और राजा जैसे कपड़े पहन लेने से राजा थोड़ी ना हो जाओगे। कोई अपने आप को परमात्मा मान रहा है, कोई ब्रह्म, कोई कहता है मुझे आत्मज्ञान हो गया — ये सब भ्रांतियां मत लो। जब आप उस स्थिति में आएंगे, तो आनंदमय हो जाएंगे; किसी से पूछोगे नहीं कि दृष्टा हो गया, अब क्या करूं। कल्पनाओं में मत जियो, कल्पनाएं बहुत नीचे गिरा देती हैं; प्रत्यक्ष में आओ।

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इस शरीर से अलग कैसे हो सकते हैं?

जीते जी शरीर को अलग आप तब देख पाओगे, जब जरूरत में जीने लगोगे। भोजन करो, किसी से बात करो, तो देखो — क्या मैं जरूरत में कर रहा हूं, और यह जरूरत मेरी है कि मेरे शरीर की? भोजन करते हुए अपने आप से पूछो, भोजन मैं कर रहा हूं या शरीर के लिए कर रहा हूं — अंतरात्मा से जवाब मिल जाएगा। बात करते हुए देखो — काम के लिए कर रहा हूं, या इन शब्दों से रसपान कर रहा हूं; क्या इन शब्दों की शरीर को जरूरत है? हर वक्त सचेत रहो, जांचते रहो; प्रतिदिन यह अभ्यास करोगे, तो एक समय ऐसा आएगा कि अपने आप को और शरीर को अलग देख पाओगे।

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दृष्टा को देखने के लिए अहंकार को कैसे खत्म करें?

दृष्टा को कहां देखना है? जब दृष्टा हो गया, तो कौन किसको देखेगा — सब खत्म हो गया। अहंकार तब होता है जब आप बड़ा बनना चाहते हो; तो बड़ा बनने की इच्छा का त्याग करो। जिसे देखा जा रहा था, जिसके द्वारा देखा जा रहा था — जब द्वारा हट जाएगा, तो दृष्टा हो जाओगे, तब आप अपने आप में रहोगे; द्वारे की वजह से आप उसमें हो।

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सत्संग से इतना समझ आ रहा है कि मैं शरीर और मन नहीं हूं — शरीर माता-पिता और पोषण से बना, मन बाहरी जानकारियों से। फिर इनके बिना भी क्या मैं कुछ हूं? इस पर अब जिज्ञासा टिक रही है।

एकदम टिकाओ कि इसके बिना मैं क्या हूं। यह मैं नहीं हूं — मैं उंगली नहीं, हाथ नहीं, बाल नहीं, पैर नहीं, मुंह नहीं, सीना नहीं, पेट नहीं; तो आखिर फिर मैं क्या? आखिर में यह प्रश्न खड़ा हो जाता है।

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एक जन्म से दूसरे जन्म तक कर्म का सिद्धांत कैसे काम करता है?

अगला-पिछला छोड़ो। अभी अपने कल्याण के लिए क्या कर सकते हो, वह करो, बस बात खत्म।

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क्या करें कि अपने आनंद में आ जाएं?

बस आप करना बंद कर दो; अपने तरीके से (करना छोड़कर) जरूरत में जीना चालू करो। जब राग-द्वेष होना बंद हो जाएगा, और अतीत में जितना राग-द्वेष था उससे अपने आप को निकाल पाओगे, तो आप आनंदमय हो जाओगे।

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मैं जरूरत से ज्यादा के फैलाव में फंस चुका हूं, जीवन किस्तों पे चल रहा है, समेट रहा हूं। आपके काम में सहयोग नहीं कर पा रहा। क्या मैं बेईमान हूं?

दो टाइम भोजन कर रहे हो, तो एक टाइम बंद कर दो, क्योंकि मेरे काम का लाभ भी तो ले रहे हो; लाभ ले रहे हो मतलब देने लायक हो। हफ्ते में एक दिन उपवास ही रख लो, पाचन क्रिया भी सही रहेगी, और बचा हुआ धन जरूरतमंद की सेवा में लगाओ। और जहां से ले रहे हो, पहले वहां दो।

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क्या हमारा लेनदेन ही इच्छाओं का रूप लेकर हमारे सामने आता है? और हमारे जीवन का आधार क्या होना चाहिए?

एकदम। और जीवन का आधार-बेस होना चाहिए — आत्मिक कल्याण।

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क्या पहले की गलतियों को धोते रहना जरूरी है, या उन्हें भूलकर वर्तमान परिस्थितियों में काम करना? पहले के सच को पकड़े रहें तो जीवन रुक ही जाता है।

आप ईमानदारी-सत्कर्म से करो, पिछला अपने आप प्रकृति हिसाब करवा लेगी। पिछला आप छोड़ो, आगे अपराध करना बंद करो।

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जिंदगी में हमें जो भी मिलता है — इंसान से लेकर कोई भी जीव — क्या वह लेनदेन के कारण है? और क्या आध्यात्मिक ज्ञान के बाद मनुष्य अपनी मर्जी से शरीर त्याग सकता है?

हां, सब लेनदेन के कारण है। अगर आप ईमानदारी से उनके साथ हो, तो मुक्त हो रहे हो; अगर बेईमानी से हो, तो आगे फिर मिलने की तैयारी हो रही है। और (शरीर त्याग के बारे में) मैं जहां तक समझा हूं, जब हमारा समय आएगा, तभी मैं इस शरीर से निकल पाऊंगा।

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यदि जन्म किसी कर्म के परिणाम से हुआ है, तो जन्म के पहले कर्म कैसे हुआ?

पहली बार ऐसा था कि आप इस शरीर में अपनी इच्छा से आए। लेकिन इस शरीर में आने के लिए कुछ शर्तें थीं; आपने उन शर्तों को अपनाया और बाद में फंस गए। फिर जब दोबारा जन्म-मरण के चक्कर में पड़े, तो इच्छा-अपेक्षा में पड़ गए। एक बार अपनी मर्जी से आए।

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अगर हम पहले कभी मूल में (पूर्ण) थे और फिर भी अपूर्ण हो गए, तो पूर्ण होने के बाद भी क्या फिर अपूर्ण हो सकते हैं? तब तो यह चलता ही रहेगा।

इच्छा-अपेक्षा का त्याग करके वह इस भवसागर से निकलेगा; लेकिन वह इतना तो स्वतंत्र है कि जब चाहे फिर इच्छा में आ सकता है। जैसे एक सामान्य व्यक्ति अपराधी बना — उसे पता था अपराध करने से क्या मिलेगा, यही तो स्वतंत्रता है। अगर पूर्ण से अपूर्ण में नहीं आ सकते, तो यह तो गुलामी हो गई। अपराध किया तो कैदी हुए, सजा काटकर फिर सामान्य हुए, फिर चाहो तो कैदी हो सकते हो — यह चलता नहीं रहेगा, यह आपके ऊपर है। जैसे (ये साधक) — क्या इन्हें नहीं पता था कि बेईमानी अपराध है, उसका परिणाम क्या है? फिर भी किया, शांति से अशांति में अपने आप को ले गए; गलती हमारी है।

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घर से निकलने के बाद शरीर से तो भाग लेते हैं, पर गृहस्थ के 20-50 साल का राग-द्वेष, यादें साथ चलती रहती हैं। वैराग्य कैसे हो?

वैराग और वैराग्य अलग-अलग हैं। वैराग हुआ — मुझे लगा कि जहां मैं जी रहा हूं, वहां खुश नहीं हूं, अपना जीवन गंवा रहा हूं। फिर समझ विकसित हुई — शास्त्र, जीवंत गुरु या किसी वाणी से — कि निकलने के लिए राग और द्वेष से मुक्त होना है; राग-द्वेष से मुक्त होना वैराग्य है। राग-द्वेष जाएगा अपनी समझ से। जैसे-जैसे समझ विकसित होगी, जिन्होंने दुर्व्यवहार किया उन्हें माफ करते जाओगे कि हमारा लेना-देना था, खत्म करो; समझ आएगी कि मैंने भी कभी सताया होगा। एक झटके में नहीं हटेगा — जितना गहरा कपड़े पे दाग, उतनी धुलाई करनी पड़ेगी, उतना इंतजार। आगे राग लगाओगे नहीं; पीछे ज्यादा प्रॉब्लम द्वेष वालों से है, उन्हें धीरे-धीरे माफ करते जाओगे। जैसे-जैसे सत्कर्म करोगे, मोह खत्म होगा; सामने वाले से लेने की इच्छा का त्याग करोगे, तो मोह होगा ही नहीं।

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सब कहते हैं ध्यान में जो विचार आएं उन्हें देखो, दृष्टा बनो — पर दृष्टा बना नहीं जा रहा। 15 साल से एक बात (चोट) है जो जा ही नहीं रही; सात समुंदर पार भागा, फिर भी पीछा नहीं छोड़ा। क्या करूं?

दृष्टा ऐसे नहीं बन पाओगे। वही विचार परेशान करते हैं जिनसे मेरा लेना-देना है, राग और द्वेष है; बहुत विचार ऐसे हैं जो परेशान ही नहीं करते — 1 लाख की भीड़ निकल रही हो, उसमें परेशान वही करेगा जिससे राग या द्वेष है। विचार किसी रूप का ही आता है — व्यक्ति, धन, संपत्ति, वैभव; रूप से परे विचार नहीं आ सकता। तो उस विचार पर काम करो कि इससे राग-द्वेष क्यों है, और गहराई में अंत तक जाओ, जहां से राग-द्वेष पैदा हुआ होगा; अंत तक जाओगे तभी अपने आप को वहां से निकाल पाओगे। विचारों को सिर्फ देखो नहीं — जिन विचारों से पीड़ा हो रही है, उन पर काम करो कि पीड़ा क्यों है। (एक ही विचार है तो भी) — नाव में एक छेद हो चाहे 99, खड़े तो वहीं हो।

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डॉक्टर कहते हैं कि बंद कमरे में अकेले जिंदगी बिताओगे तो डिप्रेशन हो सकता है। फिर एकांत कैसे सही है?

मान लीजिए दो व्यक्ति हैं — एक को पढ़ना आता है, एक को नहीं; दोनों को दुनिया की सारी किताबें देकर बैठा दो, और कुछ साल बाद निकालो — एक की समझ विकसित मिलेगी, और जिसे पढ़ना नहीं आता वह डिप्रेशन में मिलेगा। तो एकांत में जाने से पहले, एकांत में करना क्या है वह समझ के जाना पड़ेगा; और जब समझ लोगे, तो एकांत में जाना नहीं पड़ेगा, आप चले जाओगे। समझ के साथ एकांत में जाते हो तो कुछ करोगे और परिणाम आएगा; समझ नहीं है, तो डिप्रेशन के शिकार हो जाओगे।

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यहां रुकता हूं तो 8-9 दिन में ठीक हो जाता हूं, पर वहां पहुंचकर फिर वही दिक्कत। मैं सोच रहा हूं सब समेट के यहीं आ जाऊं।

अपने लक्ष्य के प्रति लगे रहो, बस। सारे ऑप्शन देख लिए, अब यह आखिरी है। वापस गए तो क्या मिलेगा — जिससे निकले थे वही घुटन, और बहुत तेजी से जाओगे; जैसे परिवार के सदस्य दूर रहकर पास आते हैं तो खूब गले मिलते हैं, जितना आगे आए हो उतनी तेजी से उसमें जाओगे। तो ऐसी गलती ना करना; मुड़ना मत। पता नहीं कितनी सदियों के बाद समझ विकसित हुई है। मुझे तो बताने वाले भी नहीं मिलते थे, फिर भी मैं पीछे नहीं गया — पीछे वही दलदल है। चाहे एक साल में हो, चाहे पूरी जिंदगी लग जाए — दिन, महीना, साल मत गिनना। यह गलती की संभावना तब तक रहती है जब तक पहुंचे नहीं, क्योंकि पीछे परिचित लोग पुकार रहे हैं; लौटाने वाले भी मिलेंगे जो कहेंगे जन्मों-जन्म लगते हैं, यह अवतारों को होता है। मेरी व्यक्तिगत सलाह है — दुनिया में जहां भी रहना, अपने आत्मिक कल्याण के लिए काम करना, कभी लौटना मत।

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राग और द्वेष क्या अच्छा और बुरा है?

किसी के प्रति लगाव है तो उसे राग कहते हैं; किसी के प्रति नफरत, गुस्सा है तो द्वेष। आत्मज्ञान कभी भी हो सकता है; पता नहीं आप भागने वाले हो और आत्मज्ञान होने वाला था — भागो मत, रुक जाओ। मोक्ष के लिए चाहे जितना समय लगे, आत्मज्ञान के लिए पूरी तरह प्रयास करो, पता नहीं वह घटना किस क्षण घट जाए। जैसे अपराधी आप कभी भी बन सकते हो — अभी किसी को पीट दो तो अपराधी हो गए, यह आपके हाथ में है; लेकिन कैदीपन से कब छूटोगे, वह जज के सामने है — एक साल, दो साल, या बाइज्जत बरी। वैसे ही आत्मज्ञान पूरा आपके हाथ में है, मोक्ष कब होगा वह छोड़ दो। इसीलिए महापुरुषों ने चिल्ला-चिल्ला कर कहा कि आत्मज्ञान के लिए प्रयास करो।

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क्या हम आपका उपदेश आगे दे सकते हैं, जैसे आपने हमें सत्संग सुनाया, वैसे किसी को सुना सकते हैं?

नहीं, आप अपना सकते हो, दे नहीं सकते। सत्संग सिर्फ वही सुना सकता है जो सत्य में स्थिर हो गया हो; आप तो सिर्फ एक जानकारी बोलोगे। यह गलती मत करना — यही तो लोग करके प्रचारक बन गए, क्योंकि सुनाने से मान-सम्मान मिलता है। हां, आप बता सकते हो कि यहां से मेरा जीवन बदला है, इस चैनल पर वीडियो है, आप भी देख लो; मैंने अपनी समझ से समझा है पर पक्का नहीं, तुम अपनी समझ से समझना।

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क्या आत्मा का भी कोई रूप होता है?

नहीं। जैसे बल्ब का रूप होता है, लेकिन बल्ब के पीछे विद्युत है, उसका कोई रूप नहीं है; रूप के द्वारा ही उसका परिणाम है। वैसे ही इस रूप के द्वारा ही आत्मा का परिणाम है, लेकिन (आत्मा का) रूप नहीं।

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जीवन जीने का कोई आधार नहीं है; अंदर प्यास है, तड़प है, समझ में नहीं आ रहा क्या करूं। मार्गदर्शन दीजिए।

सत्संग को आधार बना लो। सत्संग सुनो, और "मैं कैसे अपना कल्याण कर लूं" — इसे आधार बना लो कि बस मेरा जीवन मेरे कल्याण के लिए है।

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आत्म-कल्याण और आत्मज्ञान में क्या अंतर है? और जीव का मूल कारण क्या है?

आत्म-कल्याण कर लोगे तो आत्मज्ञान हो जाएगा — मतलब अपने आप को हर जगह से छुड़ा लेना। और जीव का मूल कारण है — योग्यता से ज्यादा इच्छा और अपेक्षा।

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मैं 30 साल से गुरु के आश्रम में हूं, फिर भी अंदर से अनुभव होता है कि गुरु कभी खुश हैं, कभी नाराज। शिष्य को सबसे बड़ी क्या साधना करनी चाहिए?

अपना आत्मिक कल्याण कर लो, जिसके लिए गुरु से आपका मिलना हुआ है।

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सही मन से भगवान से मांगने पर हर चीज मिलती है, यह होते देखा है। तो जो मिला है, उसे कैसे बचाकर रखें?

यहां अपने अलावा कुछ बचा नहीं सकते। अगर आपके पास कुछ है, तो उसका सदुपयोग कर दो।

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हम गंदे विचारों में जल्दी चले जाते हैं, फिर पछताते हैं। इससे कैसे बाहर आएं?

पछताओ मत; गंदा काम मत करो, प्रतिक्रिया मत दो। विचार आ रहे हैं, आने दो — चाहे अच्छे हों चाहे बुरे, उससे हमें क्या फर्क पड़ेगा?

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बार-बार मोह घेर लेता है। मोह से बाहर कैसे निकलें?

बस लेने की इच्छा छोड़कर देने का भाव बना लो।

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एकांत में अकेली जगह बैठने और (यहां) आत्म-कल्याण के लिए बैठने में सोचने-समझने में क्या फर्क पड़ता है?

यहां आप बैठे हो तो कोई पूछने वाला नहीं, क्योंकि मेरा सानिध्य है। इसी जगह को छोड़कर बगल में भी जाकर बैठो, तो कई लोग पूछेंगे कि यहां क्या कर रहे हो; घर पर इतना बैठोगे तो कहेंगे डिप्रेशन का शिकार तो नहीं हो गया, मानसिक रोगी तो नहीं, बैठ के खाता है — और धीरे-धीरे वे आपको मानसिक रोगी कर देंगे, एकांत में लगने ही नहीं देंगे। यहां जिंदगी भर रहो, कोई नहीं पूछेगा — आज तक आपका किसी ने नाम तक नहीं पूछा; दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं जहां बिना नाम एंट्री हो। तो यहां के एकांत और वहां के एकांत का माहौल और प्रभाव अलग-अलग है।

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शुरू में जब मेरी आत्मिक समझ बढ़ती थी तो आनंद होता था; पर जब से आपको बताया, वह होना कम हो गया, कभी-कभार ही होता है। ऐसा क्यों?

अब थोड़ा और आगे जा रहे हो। धीरे-धीरे स्तर बढ़ेगा, समझ विकसित होगी, क्योंकि वह आनंद कहीं और से था — मैंने कहा था कि गुरु से भी आनंद की झलक मिलती है। अब धीरे-धीरे आपकी समझ विकसित होगी, तो जब आनंद आपसे आएगा, तो वह रहेगा। और पूछ लिया करो; जब तक नहीं पूछोगे, प्रश्न नहीं जाएगा; पूछने से मन हल्का होगा, और तेजी से यात्रा होगी।

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घर जाऊंगा तो संसार में ब्याह-शादी, किसी के मरण में जाना पड़ेगा — कैसे करें?

अगर उम्मीद है कि मेरे यहां भी लोग आएं, मेरे मरने पर भी लोग आएं, तब तो आपको करना पड़ेगा; आप जाओगे तभी लोग आएंगे। हम तो जेब में आईडी भी नहीं रखते थे — शरीर कहीं छूट गया तो छूट गया, पांच तत्व में विलीन हो जाएगा; जब जीते जी नहीं आए, तो मरने के बाद आकर क्या करेंगे? अभी बच्चों को बुलाओ कि याद आ रही है, तो कहेंगे बहुत काम है; मरने की खबर जाए तो सब छोड़कर आएंगे, क्योंकि पीछे वैभव है। यह शरीर हमारा तभी तक है जब तक हम इसमें हैं — जैसे ट्रेन की सीट पर अधिकार तभी तक है जब तक स्टेशन नहीं आता; उतरते ही कोई और उस सीट पर बैठ जाएगा। तो शरीर से मोह मत करो; चिंता यह करो कि इस शरीर को छोड़कर मैं कहां जाऊंगा — शरीर छोड़ने से पहले मैं अपना आत्मिक कल्याण कर सकूं।

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गुरुदेव की थाली और कपड़े धोते समय "पुण्य मिलेगा" का भाव आता है। क्या यह ठीक है?

कपड़ा धोने के लिए मिला है, तो पाप-पुण्य के चक्कर में फिर क्यों पड़ रहे हो?

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अध्यात्म की ओर आना चाहता हूं, लेकिन 40 साल की उम्र में परिवार की जिम्मेदारी पूरी करना जरूरी समझता हूं; बच्चों को छोड़ नहीं सकता। क्या करूं?

ठीक है। जहां हो, उस काम को करते हुए अपने आप को तैयार तो करो।

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अध्यात्म की शिक्षा है कि "मेरा कोई नहीं, पर मैं सबका" — क्यों?

इसलिए कि मैंने बहुत कुछ लिया है; अब सबको अपना इसलिए बनाना है कि जब मैं दे दूंगा, तभी निकल पाऊंगा। लिया है तो भी नहीं निकल सकता। अगर आपके पास है तो वह सब देना पड़ेगा, और देने के लिए अपना बनाना पड़ेगा, नहीं तो लेंगे ही नहीं — अपना बनाकर देकर निकल लो, "मेरा" मत बनाओ। जहां "मेरा" का भाव है — जैसे गाड़ी में; क्या गाड़ी के लिए था? उससे डबल पैसा कोई दे दे, तो "मेरा" का भाव खत्म — वह पैसे के लिए था, मूल्य के लिए। मूल्य दो और लो, निकल लो।

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कहते हैं सुई भी ली हो तो वापस देने आना पड़ेगा। मैंने भी कइयों को दे रखा है, मुझे उनसे वापस नहीं चाहिए; क्या उनके चक्कर में मुझे भी आना पड़ेगा?

अगर आपने उसे छोड़ दिया, तो आपको नहीं आना पड़ेगा। लेकिन उन्होंने आपसे लिया है, तो हो सकता है उसी व्यक्ति को नहीं, पर किसी ना किसी को, अलग-अलग रूप में देना पड़ेगा — प्रकृति का लेने-देने का तरीका अलग है, प्रकृति ले लेगी। जैसे व्यक्ति अपराध करके समर्पण करे, तो सजा उसी हिसाब से भिन्न होती है। प्रकृति हिसाब कर लेगी, आप उसकी चिंता छोड़ो; आप बस तैयार हो जाओ कि मैं सजा भोगने के लिए तैयार हूं।

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आपने बोला आत्मज्ञान कभी भी, किसी भी क्षण हो सकता है, उसके लिए तत्परता से लगे रहना है। और मुझे क्या करना चाहिए?

बस तत्परता से लगे रहो, ईमानदारी-सत्कर्म करते रहो; आत्मज्ञान के लिए जो कर सकते हो, करते रहो।

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आपने बताया था कि आपको माता के साक्षात दर्शन हुए। मैंने भी कई लोगों के पास सिद्धियां देखी हैं। वह क्या था, क्या अब भी ऐसा होता है?

बात यह है कि राजा से मिलने के बाद मैंने मांगा क्या — मांगेंगे तो हम गिर गए। अगर हमारे सामने कोई आया, तो उस समय हमने उससे क्या कहा, वह मायने रखता है; वह दर्शन आपको ऊपर भी उठा सकता है, नीचे भी गिरा सकता है।

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आपने कहा था कि भगवान भी आत्मज्ञान नहीं करवा सकता। बाकी सब दे सकता है, पर आत्मज्ञान क्यों नहीं?

धन, वैभव, समृद्धि सब दिया जा सकता है; आत्मज्ञान कोई किसी को नहीं दे सकता, क्योंकि वह आपके अंदर है, आपमें ही है। बाहर होता तो दे भी देता। उसके लिए आपको अपने अंदर जाना पड़ेगा, और आपके अंदर आपके अलावा कोई नहीं जा सकता। आपने अपने आप को बाहर किया है, और आप ही को वहां से निकालकर अपने आप में लाना है।

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क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इच्छा आए ही ना? हम अपने आसपास के लोगों से प्रभावित कैसे ना हों?

जब आपको कुछ नहीं चाहिए, तो प्रभावित नहीं होगे; जब तक कुछ चाहिए, तब तक प्रभावित होगे।

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महात्मा कहते हैं कि पत्नी-बच्चे पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार मिलते हैं, जिम्मेदारी पूरी करते हुए नाम जप करते रहो। आपका मार्गदर्शन?

बस ईमानदारी-सत्कर्म अपनाकर आप कुछ भी करो।

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एकांत में जाकर हमें क्या करना चाहिए, क्या सोचना चाहिए?

एकांत में जाओ मत; जब आपकी समझ विकसित होगी, तो आप एकांत में चले जाओगे। बिना समझे एकांत में मत जाओ; पहले एकांत में जाने लायक बनो।

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सारे संसारी कर्म अपने आप छूट रहे हैं, एकांत में बैठी रहती हूं, रिश्ते-नाते सब पास नहीं, सारी व्यवस्था अपने आप होती जा रही है। क्या जो घट रहा है, सही है?

हां, ठीक है। लेकिन अब आपको वहां का पूरा माहौल देखना पड़ेगा — ऐसा ना हो कि आप एकांत में बैठी हो और आपके लिए लोग परेशान हैं; भोजन, व्यवस्था भी तो चाहिए। अगर आपकी व्यवस्था में कोई परेशान है और आप बैठकर मजा ले रही हो, तो फिर उस व्यवस्था में सहयोग करो।

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आपने बोला था अपने में उस परमानंद की खोज करो। अपने में कैसे करें?

पहले अपने में आओ तो। अपने में आने के लिए पहले अपने आप को निकालो — अनेक पिंडों में, अनेक वस्तुओं में आप फंसे हो, वहां से निकालो।

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दो साल से आपको सुनती हूं। जब भी बंधन से छूटना चाहती हूं, बेटा बार-बार बीमार हो जाता है, और मैं मोह में आकर भगवान से मांगने लगती हूं। इससे बाहर निकलने का रास्ता दिखाइए।

कुछ मांग मत करो। बेटा बीमार है तो उसका इलाज कराओ। (और हो सके तो) एक दिन अपनों की कुटिया में आकर कुछ दिन रहो।

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समझ कैसे काम करती है, और कैसे बढ़ाई जा सकती है?

समझ जरूरत में काम करती है, तो देखो क्या जरूरत है। और समझ बढ़ाने के लिए जिसकी समझ विकसित है, उसके साथ रहना पड़ेगा।

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पहले मेरा भजन में अच्छा मन लगता था, अब भोग में मन बार-बार परास्त कर देता है; शुरू में जो वैराग्य हुआ था, वह ठंडा पड़ गया। मार्गदर्शन दीजिए।

वैराग्य होने का भ्रम था। कहीं ना कहीं भोग आपके तरीके से नहीं मिल रहा था, इसलिए अशांति थी, तो भजन का सहारा लिया — डूबते को तिनके का सहारा; और जब भोग आपके तरीके से मिलने लगा, तो उसमें मस्त हो गए। पास के गांव में एक आदमी गरीब था पर इतना सेवाभावी था कि गांव वालों ने उसे सरपंच बना दिया; सरपंच बनते ही बस क्वार्टर पर साइन करने लगा, अब कोई उसे एक गिलास पानी देने को तैयार नहीं — वह सेवक नहीं था, मजबूरी थी, सेवा से पेट भर जाता था। भजन में तुम आए कब थे? भजन में आना मजबूरी थी — स्वभाव में नहीं, अभाव में, कुभाव में आए थे।

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सारे बंधनों से जल्दी छूटने का कोई सरल-सा मार्ग बताइए।

बस बैठ जाओ, उठो ही मत, जब तक बंधन से ना छूट पाओ।

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ध्यान से आनंद की ओर कैसे बढ़ूं?

ध्यान को समझो — कर्म के प्रति ध्यान देना है कि ईमानदारी से करना है, बेईमानी ना हो।

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सत्कर्म अचानक से होता है या प्लानिंग से? और असली दान क्या है?

अचानक से भी होता है, और प्लानिंग से भी कर सकते हो — जैसे खूब भोजन बना लिया, रोटी-सब्जी लेकर निकल गए कि जो भूखा मिलेगा उसे खिलाऊंगा; किसे, मुझे नहीं पता; यह सत्कर्म होगा। जो आपके पास (बचा) है उसे देते हो तो सेवा है; और जो आपकी जरूरत है उसमें से देते हो — जैसे चार रोटी खाते हो और दो दे दो — वह असली दान है। नर्मदा तट पर एक बालक मुझसे बोला, इतने जीव-जंतु भूखे घूमते हैं, मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। मैंने पूछा, इसके लिए किया क्या? 100 भूखे हैं और तुम एक को भी खिला दो, तो एक आंकड़ा तो कम किया। और घर से नहीं, पहले अपने हिस्से का देना चालू करो, तब समझ आएगा कि देना क्या होता है; बचा हुआ तो कोई भी दे सकता है।

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