इस वीडियो को फिर से सुन लो। ब्रह्म परमात्मा की यात्रा करते हैं — कौन? ब्रह्म। आप बोल रहे हो कि वीडियो में आया कि जो ब्रह्म है वो आत्मा है; नहीं, आत्मा नहीं। भ्रम, पूर्णब्रह्म, पारब्रह्म — जो मैंने अब तक समझाए हैं — वे बहुत उच्चतम जीव हैं।
शब्द को ऊर्जा नहीं कह रहे हैं। शब्द समझने वाले के पास ऊर्जा है। अगर शब्द बोल दें और आपके समझ में ही नहीं आए, तो उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? दो व्यक्तियों से कुछ कहा जाए, एक के समझ में आ जाए और एक के नहीं — तो मूल समझने वाला है। अगर समझने वाले में समझ नहीं है, तो शब्द उसके किसी काम के नहीं। आप समझते हो, इसलिए (बात) गहरी है; हम कितना भी गहरा बोलें, समझ ही नहीं आए, तो आपके लिए गहरा थोड़ी ना है।
अब यहां तो आप जैसा चाहती हैं, वैसा है। तो रुक जाओ। तुझे क्या चाहिए? वह मिल गया, हां या ना? हां, तो मत जा फिर। फर्ज छोड़ के फर्ज का दिखावा मत करो। जब तुझे मिल गया, तो रुक जा, बात खत्म कर।
"चाहिए" का भाव छोड़। "चाहिए" शब्द भी कहां से पैदा हुआ? इच्छा से; यहीं से शब्द का जन्म हुआ। "चाहिए" हटा दे, तो शब्द भी खत्म। समझ तो सब गई है, कर क्या रही है वह मायने रखता है। ऐसा ना हो कि समझते-समझते ही (जीवन) खत्म हो जाए और कर ना पाए, क्योंकि परिणाम करने का मिलेगा, समझने का नहीं। जब तू समझ लिया, तो उसे अपने जीवन में उतारेगी, उसमें जीना शुरू करेगी, तब वह उपलब्धि होगी।
अच्छा एक बात बता — पुरुष में भाग सकती है, महिला में क्यों नहीं? कितने पुरुष वहीं जूते खा के पड़े हैं। मीराबाई तो महिला शरीर में ही निकल गईं। महिला-पुरुष का नाम मत बदनाम करो; शरीर को कमजोर मत बनाओ कि महिला का शरीर कमजोर है, पुरुष का ताकतवर। महिला में वह ताकत है कि अगर अपने पे आ जाए तो राक्षस को भी भगवान बना सकती है। मैं नर्मदा तट पे 2019 से घूम रहा हूं; यहां छोटी-छोटी बच्चियों को मां स्वरूप देखते हैं। अब तुझे ऐसी जगह मिल गई जहां घर से भी ज्यादा सुरक्षा है; तो अब जितनी कमियां होंगी, तेरी होंगी, क्योंकि प्रकृति ने तुझे जगह भी दे दी, ज्ञान भी दे दिया; अब सारी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है।
परमात्मा ना पूरे ब्रह्मांड में है, ना तेरे अंदर है। "सर्वव्यापी" का मतलब — जैसे एक बल्ब से उजाला आया, तो उजाला सर्वव्याप्त है, बल्ब थोड़ी ना सर्वव्याप्त है। तो यह सृष्टि परमात्मा से है, इसलिए कहा गया है परमात्मा सर्वव्याप्त है; इसका मतलब यह थोड़ी ना कि परमात्मा मैले में भी है। यही भ्रांतियां हैं जो हमें लपेट के रखी हैं — कभी कहते हैं परमात्मा ढूंढने जा रहे हैं, कभी कहते हैं परमात्मा मेरे अंदर है, तो ढूंढ किसको रहे हो? अगर परमात्मा तेरे अंदर है, तो तू परमात्मा से भी ज्यादा ताकतवर होकर कैसे भटक गई? बाहर की चीजें तुझ पर काम कर गईं और परमात्मा की ऊर्जा तुझे बचा नहीं पाई? परमात्मा से सृष्टि है, सृष्टि से हम हैं। मैंने इस सृष्टि में आकर अपनी दुनिया बसा ली, और उसमें बहुत बेईमानी कर दी। अब अपनी दुनिया छोड़ के जब मैं परमात्मा की सृष्टि में आऊंगा, तो आत्मज्ञान होगा। फिर बचा यह पिंड; जब इस पिंड से मानसिक रूप से छूट जाऊंगा (मर जाऊंगा, ऐसा नहीं), तब ब्रह्म का ज्ञान हो जाएगा। यह यात्रा है।
जब आप जाओगे, तो हर तरह के लोग मिलेंगे, हर तरह की बातें होंगी — कोई आपके तरीके से बात करेगा, कोई आपके विरोध में। उसी समय आपकी स्थिति का आपको पता चलेगा। अंदर से प्रतिक्रिया उठेगी, लेकिन बाहर से मत देना — यह याद रखना। अंदर से प्रतिक्रिया आखिरी तक उठती है, जब तक अवधूत स्थिति नहीं होती, जब तक "चाहिए" में रहोगे। अवधूत स्थिति हो जाती है तो बाहर से भी और अंदर से भी प्रतिक्रिया उठना खत्म हो जाता है। बस एक ही काम करना — अपनी आत्मरक्षा करते हुए, वह प्रतिक्रिया जिससे आप गिरते हो, बाहर से देना बंद कर देना। जैसे आदमी नशा करते हुए पैदा नहीं हुआ; बाद में किया। समझ आया तो छोड़ दिया, अब उसकी याद सताती है, पीड़ा होती है; लेकिन जब वह शरीर से नहीं करता, तो एक समय आता है कि मानसिक भी छूट जाता है। तो जितनी भी गंदी आदतें हैं, समाज में जाकर मत करना; अपने आप को समझा लेना कि मुझे निकलना है, मुझे ईमानदारी से जीना है।
सत्य नहीं कूटा गया। एक समय था जब बेईमानी (हम भी) कर रहे थे; अब छोड़ के हटना चाहते हैं, तो जिन लोगों के साथ बेईमानियां की थीं, वे कूट रहे हैं। सत्य नहीं कूटा। तेरा परिवार तेरा ही किया है; अब तू छूटना चाह रही है, तो अभी तेरी कुटाई हो रही है।
अब तुम्हें समझ में आ गया, उन्हें नहीं समझ में आया, तो उनको छोड़ दो। छोड़-छाड़ के निकल लो। और अगर वहां कुचल-कुचल के रखा जा रहा है, तो मत रहो ना; यहां तो जगह मिल गई ना।
अगर आप शरीर से नहीं करते हो, तो नहीं। वे फिर भी चलती रहती हैं, क्योंकि वे आपकी आदतें हैं; आपने कभी ना कभी उसको किया था, तभी विचार में आती हैं। जैसे आप बाजार जा रहे हो, समोसा बड़ा बढ़िया दिखा; आपने कहा चलो मानसिक खा लो, शरीर से मत खाना — तो क्या बिल देना पड़ेगा? बिल तब दोगे जब शरीर से खाओगे। इस फार्मूले को समझो — बड़ा आसान है निकलना, अगर आप चाहते हो। पहले जरूरत आई, फिर शरीर से किया, शरीर ने उसका सुख लिया, स्वाद लिया, बाद में वह मानसिक में घुसा। अब शरीर से देना बंद करते हो तो मानसिक पीड़ा, बेचैनी होती है। तो पहले शरीर से छोड़ो, बाद में मानसिक भी छूट जाएगा। गड़बड़ यह होती है कि हम शरीर से करते हुए मानसिक छोड़ना चाहते हैं — वह कभी नहीं छूटेगा। और समझ कर छोड़ो: पहले समझना पड़ेगा कि मेरी यह आदत गलत है, इससे बाहरी लाभ भले हो, मैं मानसिक गिर रहा हूं। किसी के कहने पर, बिना समझे छोड़ोगे, तो जिंदगी भर उसके लिए रोओगे, छोड़ नहीं पाओगे।
उसके अगेंस्ट मत करो ना। अपनी आत्मरक्षा करो। आप ईमानदारी से एक्शन लो, फंसोगे नहीं। अगर कोई चालाकी करके फंसाने की कोशिश करता है, तो आप मत फंसो; ऐसे लोगों के साथ क्यों रह रहे हो?
यही तो बात है — हम जैसे हैं, वैसे लोग मिलते हैं। दोस्त भी अगर होंगे तो आपके जैसे ही होंगे; एक राजकुमार का दोस्त राजकुमार ही बनता है। इस दुनिया में सबकी अपनी-अपनी दुनिया है, और हमारी दुनिया में वही है जैसा मैं हूं; रास्ते में भी मुझसे वही लोग मिलते हैं। अगर आप सोच रहे हो कि ऐसे लोग ना मिलें, तो अपनी आदत बदलो।
पहले पूरी बात सुनो, समझो। बीच में मत टपका करो। सुनो, गुनो (मतलब समझो), और फिर ढूंढो, फिर बोलो। गलती क्या है? हम कुछ कह रहे हैं, लेकिन तुम सुने नहीं, ढूंढने लगे — तो बात थोड़ी समझ में आएगी। और अगर आप किसी को सीनियर समझ रहे हो, तो पहले उसकी पूरी बात सुननी चाहिए, बीच में कभी नहीं बोलना चाहिए; यह हमारी आदत बहुत गंदी है। तुम क्या बोल सकते हो, मुझे अच्छी तरह पता है, क्योंकि मैं भी वहां था; बस बोलने का तरीका अलग होगा। तो पहले सुनना सीखो — सुनो, समझो, और फिर बोलो।
क्या करोगे? मूल पे काम करो। ओंकार की धुन — इस धुन से मुक्त हो जाओ। क्योंकि अगर आप बाहर का कुछ सुन रहे हो, तो सुनने वाला और जहां से सुनाई दे रहा है, दोनों अलग हैं। जब तक आप बाहर की कामनाओं में हो, तब तक ऐसे ही भटकते रहोगे। अगर इस भवसागर से निकलना चाहते हो, तो आत्मदर्शन करो; सुनने की इच्छा का त्याग करो, नहीं तो धुन के चक्कर में जिंदगी चली जाएगी। इतना सुन लिए, क्या हुआ? 15 साल चले गए ना धुन के चक्कर में। धुन जिसके द्वारा आ रही है, वह द्वार एक दिन बदल जाएगा, खत्म हो जाएगा — फिर आप पगला जाओगे, क्योंकि धुन के आदी हो जाओगे। अभी कुछ दिन पहले मेरी आवाज कैसी निकल रही थी, आज कैसी निकल रही है; अंदर वाला वही है, लेकिन जिसके द्वारा निकल रहा था, वही खराब हो गया। अगर मैं इच्छा रखूं कि पुरानी आवाज ही ठीक थी, तो मुझे दुख होगा। तो बाहर से कुछ नहीं चाहिए; नहीं तो आत्मदर्शन नहीं होगा, और ऐसे ही अनेक पिंड धारण करते रहोगे। धुन का चक्कर छोड़ो।
महात्मा के पास क्या आंखें नहीं होतीं? सबके पास होती हैं। आंखें तो सहायक हैं। किसी भी इंद्री का दोष नहीं है; दोष उसके पीछे वाले का है। तुम आदत के गुलाम हो, तो आंखें दोषी नहीं। रस किसमें है, पता है? मेरे तरीके में; और किसी में रस नहीं है। रस क्या है? राग और द्वेष। अपने तरीके से हुआ तो राग — रस मिल गया; नहीं हुआ तो द्वेष — (उसमें भी) रस मिल गया। सारा खेल इसी पे है। क्या महात्माओं के बच्चे नहीं हुए? कृष्ण, राम, गुरु नानक के बच्चे नहीं हुए? रस अपने तरीके की अनुकूलता में है। तुम अपना तरीका छोड़ दो, फिर तुम कुछ भी करो, तुम्हें किसी में रस नहीं मिलेगा, फंस ही नहीं सकते। इसलिए मैंने बहुत सरल शब्दों में अध्यात्म को उतार दिया — "अपना तरीका"; गांव का साधारण आदमी भी समझ लेगा।
यहां तो कोई गलती हो ही नहीं सकती। यहां कोई डांटता नहीं; यहां गलती को सुधारा जाता है। ऐसा ना हो कि यह डर आपको कभी रुकने ना दे; गलती होने दो, आओ, सात दिन रहो, कुछ समझो। यहां किसी से आपस में बात नहीं करनी है, अपना बनाना-खाना है, तो गलती क्या होगी? यहां सब स्वतंत्र हैं, किसी के अधीन जीवन नहीं है। कोई यह भी नहीं कहेगा कि स्वाद सही नहीं है, क्योंकि आपको ही बनाना-खाना है, और अपने हाथ की जली रोटी भी अच्छी लगती है। जब खुद बना के खाओगे, तो घर जाओगे तो पत्नी की भी इज्जत करोगे। यहां गलती होगी तो आपको नहीं निकाला जाएगा, आपकी गलती को निकाला जाएगा; कोई गलती बताएगा तो गलती निकालने के लिए, आपको गिराने के लिए थोड़ी ना।
मानव जैसा पैदा होता है, यहां वैसा ही है; यहां किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होता। इतने लोग यहां बैठे हैं, किसी को किसी की जात का पता नहीं, मुझे भी पता नहीं, और पता भी नहीं करना है। मैंने इस स्थान पर कुटिया का निर्माण इसलिए किया कि आप मूल की यात्रा करो। मूल की यात्रा कौन करेगा? जिसे सब छोड़ना है। और जब मैं सब छोड़ने के लिए तैयार हो गया, तो अब मैं कौन सी जात का, कौन सी पांत का — सब खत्म हो गया। यहां चाहे राजा आए चाहे रंक, एक जैसे बैठेंगे। कोई कुर्सी पर बैठा है तो शरीर की जरूरत की वजह से।
इसलिए कि जहां वह गया है, उसके बताए हुए शब्दों का पूरी तरह पालन नहीं कर रहा, उसमें जी नहीं रहा; वह खुद कुछ अपना मिला रहा है। जैसे ही उसने अपना मिलाया, भ्रमित हो जाएगा, क्योंकि उसकी (गुरु की) बातें कुछ और कहेंगी और मेरी कुछ और। कोई पुराने पाप कर्म नहीं। अगर आप कहीं हो और वह कहीं, तो जरूर उसकी बातें आपसे अलग हैं, तभी तो वह वहां है और तुम यहां; वहां तक पहुंचने के लिए तुम्हें अपनी समझ छोड़नी पड़ेगी, बिना अपनी समझ छोड़े तुम वहां कभी नहीं पहुंच सकते। अगर मैं अपनी वही समझ वहां भी मिलाऊंगा, तो वहीं चला जाऊंगा जहां था, या उससे नीचे। अगर कुछ बातें विपरीत लगें, तो पूछना चाहिए कि वह कहना क्या चाहता है।
गंदी आदतों की प्रतिक्रिया नहीं देनी है; आत्मरक्षा करनी है। अभ्यास करके (वह आदत) ऑटोमेटिक मोड बन गई है। प्रतिक्रिया मत दे — ऑटोमेटिक मोड टूटेगा, थोड़ी अपनी शक्ति इधर लगानी पड़ेगी कि नहीं करनी।
तो जाने दे, उनको करने देना। तू मत करना। यह मान का चक्कर है — शाबाशी चाहिए। (हंसते हुए) तो एक काम कर, जब किया कर तो वीडियो बना लिया कर, और उनको दिखाया कर कि देखो मैंने बचा लिया।
अगर तेरे घर वाले कुटिया बना के दे देंगे, तो उसमें साधना नहीं हो पाएगी। साधना हमेशा "तेरा" में होती है, "मेरा" में नहीं; नहीं तो राजा-महाराजा अपना घर छोड़ के क्यों जाते? ध्यान रखना — जब तक आत्मज्ञान ना हो, अपनी कुटिया बना के कभी मत रहना, कुछ नहीं होगा; क्योंकि तुम्हारा अहंकार यही सोचेगा — ये मेरा घर, ये बेड, ये पर्दे; वहां सब कुछ आपके तरीके से होगा, और आपके तरीके से आपका पतन के अलावा कुछ नहीं होगा। इसलिए कहा गया है जीवंत गुरु ढूंढो; जब उसके तरीके में रहोगे, तो वह डांट के रखेगा — चल उठ, वहां बैठ; बुरा लगेगा, तब अपनी स्थिति का पता चलता है। "मेरा" में कोई नहीं कहेगा। अष्टावक्र ने राजा जनक का सिंहासन ही छुड़वा दिया — चल मेरे साथ, तेरे राज्य में नहीं, सही ज्ञान तुझे वहां होगा जहां तेरा अधिकार नहीं। आश्रम में राजा-रंक एक ही जगह बैठते हैं, क्योंकि वहां सब एक समान हैं; जहां राजा-रंक अलग बैठें, समझ लेना वह जीवंत, आत्मज्ञानी गुरु नहीं है। इसलिए मैंने 12 साल तक अपने लिए कभी कुटिया, कभी झोपड़ी नहीं बनाई — कभी मंदिर में रहा, कभी पेड़ के नीचे, कभी नर्मदा किनारे, कभी श्मशान में सो गया।
अगर वे इस नियम में रह सकते हैं, तो ला सकते हो, लेकिन नियम यही रहेगा, पक्का। और जैसे ही स्कूल खुले, पहले यहां से ले के चले जाना है। अकेले बच्चे नहीं आ सकते; साथ में रहना पड़ेगा, और इसी नियम में रहना पड़ेगा।
आपको सिर्फ अधिकार मिला है अपने लिए, कि अपना कल्याण कैसे कर लो। जैसे ही तुम किसी और में लगे — आंख बंद करो, खोलो, ऐसी मुद्रा में बैठो — आप फंस गए, आपकी यात्रा वहीं रुक गई। मान लीजिए आप कार से जा रहे हैं और एक साइकिल वाला हैंडल छोड़ के चला रहा है; आपने तुरंत कार रोकी — स्पीड किसकी कम हुई? आपकी। बात कहने के लिए उसे भी रोकना पड़ेगा; अब दोनों रुक गए। और उसने कह दिया — तू कौन है रे, ज्यादा ज्ञान मत ठोक; तो समय भी गया, एनर्जी भी गई, और आप मायूस होकर चल दिए, जिस तेजी से जा रहे थे वह भी गई। इसलिए लक्ष्य तक बिना पहुंचे किसी से बात ना करो। जीवंत गुरु के अलावा किसी से सलाह लिया या दिया — दोनों स्थिति में आपकी स्पीड कम हो जाएगी, हो सकता है यात्रा ही छूट जाए। जीवंत गुरु लक्ष्य पे है; उससे बात करोगे तो वह कहेगा और तेज कर। तो जीवन में याद रखो — ना सलाह दो, ना लो।
आप सत्संग सुनो, उन शब्दों को अपनाओ, उसमें जियो, परिणाम आएगा। परिणाम तुम अपने तरीके से मत चाहो, नहीं तो परेशान हो जाओगे। तुम सोच रहे हो कि मैं यहीं हूं तो कहीं विचार ना आए — वह आएगा, आने दो। आप यहां की बातें समझो। हमें किसी में नहीं जीना है, मुझे अपने आप में होना है। जहां विचार जा रहा है, जाने दो; रोकने का प्रयास कभी मत करना। अभी एक ही महीना हुआ है; और सुनो, बारीकी से समझो — हमें तो प्रत्यक्ष ज्ञान को खोजने में ही कितने साल लग गए।
कोई बात नहीं, आने दे। यहां नींद के लिए लोग गोलियां खाते हैं। आ रही है तो आने दे, नींद को तोड़ मत। अपने को कुछ प्राप्त थोड़ी ना करना है; जितना प्राप्त है, उसे छोड़ना है। बचपन से हमें सोने कहां दिया गया — 4 बजे उठो, 5 बजे उठो; कभी यह भी पूरा हो जाएगा, तो नहीं लगेगी। बस सारे कामों से निवृत्त होकर बैठा करो; अगर कोई काम बाकी है और सो गए, तो गुस्सा आएगा।
आपके पास जितनी जानकारियां हैं — कुछ प्रत्यक्ष, कुछ प्रत्यक्ष नहीं — आपकी वे जानकारियां और आप खुद बातें करते हो। वे जानकारियां अनेक लोगों से, अनेक जगह से मिली हैं, एक ही लक्ष्य की अनेक जानकारियां अनेक तरीके की। तो आप, आपकी जानकारी, और जानकारी के पीछे के लोग मिलकर हमेशा बातें करते रहते हैं। जैसी आपके पास जानकारी होगी, वैसा ही आप सोचोगे।
"कुछ नहीं चाहिए" एक स्थिति है। पहले "कुछ नहीं चाहिए" का भाव बनाओ, और धीरे-धीरे जब जरूरत में जीने लगोगे, तो एक समय ऐसा आएगा कि "कुछ नहीं चाहिए" स्थिति में आ जाओगे।
उनसे अपने तरीके से पाने की इच्छा का त्याग करना है। आप सीधा उनको नहीं छोड़ सकते, क्योंकि आप उनके पास गए हो तो कुछ उम्मीद में गए हो। बंधन और आसक्ति तब होती है जब आपको उनसे अपने तरीके से मिल जाता है, और नहीं मिलता तो द्वेष होता है। तो मिला-जुला के अपना तरीका हमें छोड़ना है।
कर्म के हिसाब-किताब का कोई पता नहीं, क्योंकि आपको भी याद नहीं है कि आपने क्या-क्या किया है। पर आत्मज्ञान संभव है। आत्मज्ञान इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि आप राग-द्वेष से मुक्त नहीं हो पा रहे; राग-द्वेष से मुक्त हो जाओगे, बस। आगे राग-द्वेष बनाना बंद करो, और पिछला जितना है, जब एकांत में बैठोगे तो दिखेगा — उसका सामना करो: इस व्यक्ति से राग हुआ तो क्यों हुआ, द्वेष हुआ तो क्यों हुआ, वजह क्या थी, किस कारणवश मैं फंस गया, उसकी यादें मुझे क्यों सता रही हैं। यह अपने आप से पूछना है, और राग-द्वेष से अपने आप को छुड़ाना है।
इसलिए कि आपको लग रहा है मैं कुछ हूं, और आप कुछ बनना चाहते हो; जब तक बनने की भावना अंदर है, तब तक लगता है मैं कर रहा हूं। अपनी समझ से देखो — कर्ता तो आप हो नहीं; स्थिति-परिस्थिति, जरूरत में आप करते हो। भूख लगी, भोजन कर लिया — लगता है मैं खा रहा हूं; पर पेट भरने के बाद खाकर बताओ — जबरदस्ती करना पड़ेगा, घुटन, बेचैनी, अशांति होगी। प्यास बुझ गई, फिर पानी पीकर बताओ। कोई भी कार्य आप जरूरत में करते हो, तो कर्ता कहां हुए? जरूरतें करवा रही हैं। कर्ता तो मान बैठे हो — यही अज्ञानता है; और इसलिए मान बैठे कि आपको साबित करना है कि मैं कुछ हूं।
पहले गोविंद का अर्थ समझो — गोविंद क्या है, कौन है। सब गोविंद हो ही नहीं सकते। सब एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन सब एक ही नहीं हैं। अगर एक ही होते तो द्वंद्व क्यों पैदा होता, द्वैत कहां से आता, राग-द्वेष क्यों होता? तो सब गोविंद कैसे नजर आएंगे?
नहीं, हम सब जीव ब्रह्म नहीं। अगर मैं खुद ब्रह्म होता, तो भटकता क्यों? अपने आप से खुद प्रश्न करो। और अगर ब्रह्म भटक जाए, तो फिर वह ब्रह्म कैसा? वह भटकेगा कहां?
देने वाला कह रहा है दे दिया, तो छोड़ दो। आपके पास प्रूफ क्या है, सिद्ध कैसे करोगे? हाथ में लेते वक्त ही गिनना था। अगर एक घंटे बाद कह रहे हो कि नहीं दिया, तो सिद्ध करो; सिद्ध नहीं कर पा रहे, तो इसका मतलब वह सही है। समझ लो कहीं गिर गए होंगे — बात खत्म।
है तो अप्राकृतिक। इसी को वासना कहते हैं — ज्यादा पाने के चक्कर में, अपने तरीके से पाने के चक्कर में, धीरे-धीरे हम लोग राक्षस बनते जा रहे हैं; प्राकृतिक रूप से यह गलत है। अगर इंसान को यह अपने साथ करवाना हो, तो करवाएगा क्या? आप उसके साथ इसलिए कर रहे हो क्योंकि वह पशु है। तो आप खुद डिसाइड करो — जो अपने साथ चाहते हो, वही दूसरों के साथ करो।
देखो कि पीड़ा देने वाले के साथ आपने (कोई गलत) काम किया था — हां या ना? किया था, तो बात खत्म, इसलिए पीड़ा दिया उसने। अगर नहीं किया था, तो वह व्यक्ति मौजूद हो तो उससे जाकर पूछिए कि आपने मुझे पीड़ा क्यों दी, क्या कारण था, कौन-सा ऐसा अपराध मैंने कर दिया था; मैं नहीं समझ पा रहा, आप मुझे बताने की कृपा करें।
आत्मज्ञान से जितना हासिल है, सब खत्म हो जाएगा — मानसिक; क्योंकि हमारे पास जो कुछ भी है, उस पर मानसिक बंधन है। इतना पक्का पता है कि जिसे मैं भोग रहा हूं, उसे पहले किसी और ने भोगा है, बाद में कोई और भोगेगा, चाहे यह शरीर तक। तो हमें कुछ मिलने वाला नहीं है। हमने दूसरे के चक्कर में आकर अपने आप को खो दिया; अब मुझे खुद "मैं" चाहिए। व्याकुलता, घुटन, बेचैनी, राग, द्वेष, मोह, आसक्ति — ये किसी के कारण हैं; कर्म तुम्हारे द्वारा हुआ, लेकिन जिस तरीके से किया वह गलत था, उससे राग-द्वेष हो गया — वहीं से अपने आप को छुड़ाना है। आत्मज्ञान में आपको आपके अलावा कुछ नहीं मिलने वाला। आप अकेले हो जाओगे, भीड़ में रहकर भी अकेले रहोगे, क्योंकि भीड़ तभी तक अच्छी लगती है जब तक हम रसपान करते हैं; आत्मज्ञान की तरफ बढ़ने वाला जिंदा लाश हो जाता है, आपके पास कुछ नहीं रहेगा। (और उस दिन मैंने आपसे इसलिए बात नहीं की, क्योंकि एकांत में घुटन के समय किसी से बात कर लोगे तो वहां से वापस आ जाओगे और सारी मेहनत खत्म हो जाएगी; उस समय आपको आपकी जरूरत है।)
यह आपको देखना है कि मेरे जीवन में क्या जरूरी है; फैसला आपको लेना है। ऐसा नहीं कि जिन लोगों से राग-द्वेष हुआ, वे वहीं हैं — जीवन में जितने लोगों से राग-द्वेष हुआ है, क्या उन्हें पृथ्वी पर खोज सकते हो? रास्ते में, ट्रेन में, बस में राग-द्वेष हो गया; नाम भी नहीं पता। तो देखना है कि मैं कहां रहकर मेरा कल्याण होगा। यहां रहोगे तो 24 घंटे आत्मिक कल्याण को दोगे; घर पर रहोगे तो 24 घंटे नहीं दे सकते। अगर आपकी जिम्मेदारी, कर्तव्य, दायित्व है, तो उसे निभाते हुए करो; और नहीं है, तो यहां चले आओ। यह फैसला आपको करना होगा।
मेरे कहने से मत छोड़ना, नहीं तो जिंदगी भर पछताओगे। यह आपकी चाल के ऊपर है। जैसे विद्यालय में रह रहे हो पर पढ़ ही नहीं रहे, तो क्या होगा? यहां रहकर दृश्य में फंसे घूम रहे हो, तो नहीं होगा। यहां के नियम में पूरी तरह रहोगे, तो होगा ही होगा। दुनिया में कहीं भी, जिस क्षण आप राग-द्वेष से मुक्त हो जाओगे — पिछले से, और आगे बनाना बंद — उसके बाद अवधूत स्थिति हो जाएगी, फिर आज्ञा चक्र खुलता है, और उसके बाद कुछ ही महीनों-दिनों में आत्मा का बोध हो जाएगा। अब आप राग-द्वेष से कितने समय में मुक्त होते हो, यह आपके ऊपर है — चाहे एक दिन में, चाहे 100 साल में भी नहीं।
आपकी यादें रहेंगी, उसमें राग-द्वेष नहीं रहेगा, एक मुस्कान रहेगी। जैसे किसी से झगड़ा हुआ, उसे देखते ही गुस्सा आता था; जब समझौता हो गया, गले मिल लिए, तब देखते हो तो कुछ नहीं रहा — पता है लड़ाई हुई थी, द्वेष था, पर अब उसे देखकर मुस्कुराते हो, वह निकल गया। जिस क्षण आप राग-द्वेष से मुक्त होगे, यह आपको ही पता चलेगा, किसी और को नहीं।
(पहली स्थिति में) बेचैनी आ रही है, दुखी हो रही हो, तो उसमें राग और द्वेष है, अभी है। और पिछला राग-द्वेष सिर्फ घर वालों से नहीं, बहुत लोगों से है; जब आप एकांत में जाते हो, तो वे घटनाएं याद आती हैं जो तुम भूल गए हो। दुनिया के किसी कोने में रहो, जिस क्षण आप राग और द्वेष से मुक्त होगे, उसके बाद अवधूत स्थिति हो जाएगी।
बच नहीं सकता; प्रकृति किसी ना किसी तरीके से (हिसाब करेगी)। पश्चाताप की आग लगेगी — पश्चाताप भी एक भोग है; आत्मग्लानि, घुटन, बेचैनी — वह भी एक सजा है, और सबसे तगड़ी सजा है। अगर पश्चाताप की आग लगी रही और कहीं रसपान नहीं किया, तो जल्दी से जल्दी वह खत्म हो जाएगा। अगर कहीं रसपान कर लिया, अपने आप को लुभावनी चीजों में फंसा लिया, तो वह आग बुझ गई।
वह आत्मज्ञान नहीं करा सकता। लेकिन जब आप उस लेवल पर हो जाओगे, "कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओगे, यह स्थिति पक्का बनाने के लिए तैयार रहोगे, तो वह किसी ना किसी गुरु से मिला देगा — जैसे रामकृष्ण परमहंस को मां काली ने तोतापुरी को उनके दरवाजे पर भेज दिया। अगर आप योग्य हो जाओगे, तो इष्ट इतना करता है — वह करवा नहीं सकता, लेकिन गुरु से मिलन करा देगा। और आप अपने भरोसे चलो — अभाव में मत चलो, कुभाव में मत चलो, स्वभाव में चलो।
आप किसी से यह मत कहो कि कितने समय में हो जाएगा। मैं जब चला था, मैंने कभी किसी से नहीं पूछा कितना समय लगेगा, क्योंकि मेरी जिम्मेदारी थी, मैं अपनी जिम्मेदारी पे निकला। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि व्यक्ति अगर अपने स्वभाव से पूरी तरह लग जाए — व्याकुलता से, तड़प से, जैसे भोग की तरफ आकर्षित होता है — तो कुछ ही वर्षों में हो जाएगा; मेरी समझ से पूरी तरह लगने के बाद 12 साल फाइनल है। अभी तो आप लगने की प्लानिंग कर रहे हो; आप लग जाओ। मैं लोगों से यही पूछता था — आप इस मार्ग में चले हैं, तो आपके साथ क्या हुआ, उससे मुझे प्रेरणा मिलेगी; कितने जन्म लगेंगे, यह पूछने नहीं आया था, क्योंकि मैं फाइनल कर चुका था कि यह मेरा आखिरी जन्म है। आत्मज्ञान है, यह पक्का है; मैं फंसा हूं, यह भी पक्का है; तो मैं दूसरे पर क्यों थोपूं — ताकि बाद में कहूं कि आप बोले थे इतने साल? पूरा रिस्पॉन्स खुद पे लो। मैं 2011 में चला; पूरी तरह चला; कभी पश्चाताप नहीं हुआ, कभी रोटी-कपड़ा-मकान नहीं सोचा, क्योंकि जहां था वहां दुख ही था। अगर आप पूछ रहे हो कितने साल में होगा, तो इसका मतलब आप वहां छोड़े नहीं हो, और प्लानिंग है कि इतने साल में नहीं हुआ तो वहीं चला जाऊंगा।
अध्यात्म में, आत्मज्ञान की तरफ वही बढ़े जिसे ना तो कुछ चाहिए, ना कुछ करना है। अगर कुछ बाकी है तो भोग लो; अगर नहीं भोगोगे, तो यहां रहकर भी वहीं हो, और 60 साल बाद वहीं लौटोगे, क्योंकि कुछ बाकी है। जब कुछ ना हो करने को, अपने आप को मरा समझ लो कि भोग-विलास, मान-सम्मान सब करके थक गया, तब इस मार्ग में आना, ताकि पछतावा ना हो। यह "कुछ नहीं चाहिए" की यात्रा है; पछतावा तो तब होगा जब कुछ चाहिए।
(आपने) सब कुछ नहीं रखा; उतना ही रखा जितने में अच्छे दिख सको — सब कुछ रख देते तो घुटन भी नहीं रहती। एक बार अपनी समझ से ज्ञान को समझ लिया और ज्ञान को, और जहां से ज्ञान निकल रहा है उस परमात्मा को समर्पण कर दिया, तो फिर रसपान की बातें खत्म; अब क्या होगा, वह जानेगा। भागो मत; वह जैसा बता रहा है, वैसा करते जाओ, उसमें जियो, पलायन मत करो। अगर आप उतना ही कर रहे हो जितना वह कह रहा है, तो पूरी जिम्मेदारी उसकी हो जाएगी; और अगर विपरीत कर रहे हो, तो दंड के अधिकारी आप हो, और जिसके लिए आए हो वह होगा भी नहीं। आप दो तरफ चलना चाहते हो — वह भी ना छूटे और यह भी मिल जाए — यह नहीं हो सकता; आपको उसमें पूरी तरह जीना पड़ेगा, पूरी तरह नियम में रहना पड़ेगा। समर्पण के बाद (संशय भरे) प्रश्न नहीं उठते।
कोई रिस्क नहीं है, ना प्राणों की बाजी है। आप जिस जिंदगी में थे, वहां से थक चुके हो, और वहां से निकलने के लिए उससे ज्यादा कुछ चाहिए। अगर वहां सुकून-आनंद होता, तो आप वहां से हटते ही नहीं; वहां घुटन, बेचैनी, धोखा, पश्चाताप मिला, तो निकलकर कहीं और जा रहे हो — प्राणों की बाजी कहां हुई? जब तक मूल तक नहीं पहुंचोगे, अपने आत्मतत्व में स्थिर नहीं होगे, तब तक ज्यादा के चक्कर में ही भागते रहोगे। रिस्क तब होता जब आप नीचे जाते — पर नीचे जाने में भी आपको रस आता है। रिस्क तो अगर इस दुनिया में किसी का है, तो गुरु का है — जो आपके लिए जंगल में बैठा है, आपके साथ ही उसका जीवन जा रहा है, बच्चों की तरह हर व्यवस्था दे रहा है, फिर भी कभी बोलता नहीं।
मां-बाप ऐसा इसलिए करेंगे क्योंकि आपके द्वारा उन्हें कुछ मिलेगा — आपका कुल, खानदान, नाम, शोहरत; आपके द्वारा वे अपने "मैं" को खड़ा करते हैं। लेकिन गुरु को तुमसे कुछ नहीं चाहिए, आपके नाम से भी उसका लेना-देना नहीं। वह तभी आपसे बात करेगा जब उसे लगेगा कि आपको उसकी सख्त जरूरत है; टाइम पास के लिए नहीं मनाएगा — यहां मनाना और रूठना नहीं है। उसे पता है कि बात करेगा तो आपका स्तर गिर जाएगा, इसलिए बात नहीं कर रहा। आप अपनी समझ से आगे बढ़ो। आश्वासन मांग रहे हो, इसका मतलब अब आप मेहनत नहीं करना चाहते, सामना नहीं करना चाहते, आश्वासन पाकर अपना रसपान करना चाहते हो — यह चालाकी नहीं चलेगी।
नहीं आने के लिए अपना लेनदेन पूरा करो। बाकी, मैं तो आपको कहूं कि अपने भरोसे से चलो, अपनी समझ से। अगर आप मुझसे भरोसा दिलवा रहे हो, तो मतलब मुझे समझे ही नहीं; मुझे समझ गए होते तो मुझसे भरोसा भी नहीं मांगते। ज्ञान से कल्याण होगा, यह शरीर से तो होगा नहीं; मेरे द्वारा जो बोला जा रहा है, उसको समझोगे तभी कल्याण होगा। दूसरा आपकी सहायता कर रहा है, यही धन्यवाद है। मैं भी तो आपके लिए जंगल में बैठा हूं — मैं किससे भरोसा मांगूं?
डॉक्टर को पैसे मिल रहे हैं, शिक्षक को भी, वे अपना परिवार चला रहे हैं। गुरु को कुछ नहीं मिल रहा, और उसे कुछ नहीं चाहिए — वही तो गुरु है। वह "ना मिलने" में पूरी तरह हो गया है, तभी गुरु स्थिति होती है, तभी आत्मज्ञान को उपलब्ध होता है; अगर एक पॉइंट भी कुछ चाहिए, तो आत्मज्ञान नहीं है। वह अपने आप में स्थिर हो चुका है, किसी के द्वारा उसे कुछ नहीं मिलने वाला। इसीलिए गुरु को श्रेष्ठ, महान बोला गया — वह "कुछ नहीं चाहिए" में काम करता है; बाकी इस पृथ्वी पर जितने पद हैं, सब "कुछ चाहिए" में काम करते हैं।
नहीं, वह दुख-सुख से परे है। उसे बस यह होता है कि देखो, कल्याण कर सकता था, फिर निकल गया; फिर कभी करेगा। उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा — तुम चाहे आओ चाहे जाओ। नियम में रहो तो भी तुम अपने लिए कर रहे हो, नहीं रहो तो भी तुम्हारे लिए ही है।
गुरु क्या रीझेगा? गुरु तो पहले से पहुंच गया है। वह ऐसे लोगों के इंतजार में है जिन्हें निकलना है। अगर आप निकलना चाहोगे, तो निकालने में वह आपकी सहायता करेगा। आप निकलो चाहे ना निकलो, उसे कुछ ना चाहिए, ना मिलने वाला है। वह ना रीझता है, ना दुखी होता है; समझाने के बाद भी कोई अपना रस लेने जा रहा है, तो जाने देगा। इसलिए अपनी समझ से आगे बढ़ो; आश्वासन किसी से मत लो, और गुरु आश्वासन कभी नहीं देगा — वह कहेगा, तुम्हें करना पड़ेगा, मैं पूरी तरह हूं, बस मुझ पर संशय ना करना।
एक शिक्षक जो पढ़ाता है, उसे बच्चों के बारे में जानकारी हो ही जाती है कि किसका लेवल क्या है; पढ़ाते-पढ़ाते पूरा पता चल जाता है। आपको भी पता है, उसे भी पता है। अपना भाव चेक करते रहना — इसमें ईमानदारी आपको ही रखनी है।
पड़े रहने में ही आपका कल्याण है। और उस पड़े रहने में चिंतन करो; चिंता ना हो। चिंता हो, तो गुरु के समक्ष अपनी बात रखो, लेकिन गुरु का इंतजार करो। गलती यह है कि गुरु को हम अपने तरीके से बुलवाना चाहते हैं। काश गुरु तुमसे खुद बोले — वह दिन लाओ; ऐसे जिज्ञासु बनो कि वह खुद आपके पास आए।
पहले था, लेकिन लोगों का ऐसा बर्ताव रहा कि मुझे ऐसा करना पड़ा। एक बार एक महिला-पुरुष बोले, बहुत इमरजेंसी बात एकांत में करनी है; मेरे पास 16-18 घंटे सत्संग से समय नहीं था, फिर भी नहाने जाते समय मिला — बोले, मेरी भैंस बहुत बीमार है, रखूं कि बेचूं? एक साधक ने चावल चढ़े हुए बुलाया और सलाह दी कि यहां दान पात्र रखो; मैंने कहा, परमात्मा भी आकर कह दे तो दान पात्र नहीं रखूंगा, जिसके लिए आए हो वह करो। लोगों को हमने खूब समय दिया, पर लोगों ने दुरुपयोग किया। पर उस परेशानी में भी मेरे मुखारविंद से ज्ञान ही निकला, वीडियो बने, लाखों लोगों को लाभ हो रहा है — गंगा से गंगाजल ही निकलेगा; मेरा ज्ञान कुएं की तरह है, जब तक कोई निकालेगा नहीं, सोते से और पानी नहीं आएगा। लेकिन अब वीडियो बन चुके, वीडियो बनाने का भाव खत्म हो गया। अब भाव यह है कि मुझसे सिर्फ जिज्ञासु बात करे।
ना मुझे बुरा लगेगा, ना अच्छा। आपको ज्ञान से मतलब है कि घटनाओं से? गलती यही होती है कि हम घटनाओं को पकड़ लेते हैं, हमें ज्ञान पकड़ना चाहिए। संत जनाबाई गोबर के उपले के लिए लड़ रही थीं; घटना पकड़ोगे तो कहोगे इनकी परम स्थिति नहीं हो सकती, पर उन्होंने बताया कि मेरे उपलों से "विट्ठल-विट्ठल" की आवाज आएगी। जब मैं काम करूंगा तो घटनाएं होंगी — शरीर थकेगा, विरोध होगा; सामना मुझे ही करना पड़ेगा, आपको नहीं करने दूंगा, क्योंकि आप करोगे तो राग-द्वेष में फंसोगे, मैं करूंगा तो निर्लिप्त रहूंगा। कुछ नहीं करूंगा तो कोई घटना नहीं होगी, पर आपको लाभ भी नहीं मिलेगा। अर्जुन को सिर्फ चिड़िया की आंख दिखी — आप अपना लक्ष्य देखो। किसी का कांटा निकालना है तो उसकी पीड़ा देखकर नहीं निकलेगा; कभी-कभी सज्जन को भी दुर्जन बनना पड़ता है, काम के लिए। जो अपनी समझ से ज्ञान को समझकर आए हैं, वे कभी भ्रमित नहीं हो सकते; घटनाएं देख रहे हो, इसका मतलब आपका लक्ष्य ही नहीं है।
यही गड़बड़ है कि आप अपने आप को मनुष्य समझते हो। 84 लाख (योनियां) बोली गई हैं, इतने शरीरधारी जीव इस पृथ्वी पर हैं। यह शरीर मानव का है, आप मानव नहीं हो; आपको यह मानव शरीर मिला है। हो सकता है आप इसमें योग करके ना निकल पाओ, भोग-भोजन में लिप्त रहो, तो अगला शरीर पशु का, भोग-भोजन का मिल जाए।
चिपकाया कौन है? आप ही ना। तमोगुण हो, रजोगुण हो, सतोगुण — चिपकाया हमने, तो निकालना भी पड़ेगा; जब तक उसमें हैं, जन्म-मरण है। बुद्धि गलत कहां है? यह हाथ ना गलत है, ना सही; उपयोग कहां कर रहे हो? किसी कमजोर को बिना मतलब मार रहे हो तो गलत, और उसके सुधार के लिए मार रहे हो और आपका अधिकार है, तो सही — मार दोनों स्थिति में रहे हो। जहर से दवाइयां भी बनती हैं। उपयोग का भाव क्या है, यही मुख्य है — कर्म के पहले और कर्म के बाद के भाव से फल का निर्णय होता है, सिर्फ कर्म से नहीं।
भाव जागृत करना ही नहीं है; जरूरतें भाव पैदा कर देती हैं। कर्म वैसा करो। जैसे भूख लगी, भोजन परोस दिया गया — तो शरीर की जरूरत देखो, स्वाद मत देखो; जैसा भी बना है, उसको ग्रहण कर लो। आप स्वाद में फंस जाते हो; और स्वाद अपना-अपना है — जो आपके लिए अच्छा, किसी के लिए बुरा।
कमी बताना बहुत आसान है; उस कमी को दूर करने के लिए आपने जीवन में क्या काम किया? पहले आप कल्याण कर लो। अगर लग रहा है कि बहुत लोग पढ़ना चाहते हैं पर कोई पढ़ाने वाला नहीं, तो आप शिक्षक बन जाइए — लेकिन पढ़ाना तब चालू करोगे जब उस योग्य होंगे। कहने से अच्छा है करने में लग जाओ। मुझे कमी दिखी, तो मैंने उसके लिए काम किया, और आज मैं यहां हूं; मैं घर से बातें ही करता रहता, तो किसी को लाभ मिलता क्या? बातें करना, कमी बताना इस दुनिया में सबसे आसान है, और उसमें हम अपने आप को महान समझते हैं; आपकी महानता तब है जब आप उस कमी को दूर करने का प्रयास करो। परिणाम करने वाले को मिलेगा।
मैं क्या समझाऊं, वे समझा के ही गए हैं। उसकी व्याख्या भी तो उन्होंने की होगी; वहां जाकर व्याख्या पढ़ लेना। कोई श्लोक है तो उसके नीचे व्याख्या भी होती है, आगे-पीछे पढ़ लेना।
हमें यह देखना है कि मैं राग-द्वेष में घिरा हुआ हूं। पहले राग-द्वेष से अपने आप को छुड़ाने का प्रयास करें, फिर देखें क्या होता है। राग-द्वेष पकड़ोगे तो बहिर्मुखी होगे, छोड़ोगे तो अंतर्मुखी — बहुत साफ-सुथरी बात है। काम कैसे करना है: राग-द्वेष किस कारण से हुआ, वह देख लेना। कोई विचार या याद पीड़ा दे रही है, तो देखो क्यों आ रही है, मुझे तो कुछ नहीं चाहिए — क्यों, क्यों, क्यों करके जाइए। राग-द्वेष एक वृक्ष की तरह है; पत्ते, टहनियां पकड़कर धीरे-धीरे जड़ तक जाओ और वहां से काट दो, तो कुछ दिन बाद वृक्ष सूख जाएगा; जब तक जड़ तक नहीं जाओगे, कभी टहनी, कभी डाली, कभी तना काटोगे, और तने से भी बहुत वृक्ष बन जाएंगे। घुटन होती है तो आप उससे निकलने का एक ऑप्शन निकाल लेते हो — नहीं, उसकी गहराई में जाओ कि इस घुटन, बेचैनी, याद, आसक्ति, उदासी के पीछे वजह क्या है। इसलिए एकांत में विचारों से मुक्त होने का प्रयास ना करें; विचारों को देखना, और कोई विचार ले जाए तो जाना। संसार में भोग गलत तब है जब गलत तरीके से — झूठ बोलकर, बहला-फुसलाकर — कर रहे हो; भोग की जरूरत आपको नहीं, शरीर को है; शरीर की जरूरत के लिए करो तो देखो करने में ईमानदारी है। बस — ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन है।
जब वहां जाओगे तो पश्चाताप में जाओगे; देखो आपका जाने का भाव क्या है। जब पश्चाताप की आग लग जाएगी, तो वह उसे जला देगी; लेकिन जाना आपको अंत तक है — यह बीज वृक्ष बन गया है, अब जड़ों तक जाना पड़ेगा। सत्कर्म तो अपने आप मिलता है; सत्कर्म से आत्मिक चिंतन में अपने आप को छुड़ाने का बल मिलता है। आप चाहे पूरा (कई गुना) दे दो, ऐसे नहीं होगा। पश्चाताप होगा, फिर निकलने के लिए जो करना है वह खुद आएगा। जैसे दो व्यक्ति आपसे गलती करके सॉरी बोलें — एक फॉर्मेलिटी में, एक आत्मिकता से — तो क्षमा उसे करोगे जिसे सच में गलती का एहसास हुआ; फॉर्मेलिटी वाले पर तो और गुस्सा आएगा। तो देखना है कि पश्चाताप की आग लगी कि नहीं।
उसका सामना करो कि घुटन का कारण क्या है, कहां से हुई। पहले तो आप घुटन भी भूल गए थे जब कहीं और लगे थे; अब एकांत में कम से कम घुटन का सामना तो करना पड़ा। वही आपको ले जाएगा; घुटन का कोई बेस-आधार है, ऐसे घुटन नहीं आ सकती। उस घुटन को पकड़ के आप (जड़ तक) जा सकते हो, छोड़ के नहीं, क्योंकि घुटन ही आधार है, आखिरी तक जाने का बेस है।
वह आपके हिसाब से खत्म नहीं होगी। आपको लग रहा है वह छोटी चीज है; जैसे एक करोड़पति ने किसी के ₹2 छीन लिए, और पता चला कि वे ₹2 उसकी पूरी जिंदगी की कमाई थे — आप 2 लाख भी दे दो, उसकी घुटन आपका पैसा नहीं भर पाएगा। अपने से किसी की तुलना मत करिए। और ध्यान रखिए — जहां आप जलील हुए, वहां बदले की भावना अभी भी है; लेकिन जिसे आपने जलील किया, उसका क्या? इसमें हम स्वार्थी हो जाते हैं। जितनों को इंसल्ट किया, क्या उन्हें ढूंढ पाओगे? नहीं; तो प्रकृति को समर्पण कर दो, जैसे हिसाब-किताब करना होगा, कर लेगी।
आपको देखना है कि आप किस अधिकार से बोल रहे हो — हमारा अधिकार क्या है, पावर क्या है। अगर अधिकार और पावर है, तो बदलने का प्रयास करो; अगर अधिकार नहीं, सिर्फ बोलना है, तो बोल के हट जाओ, क्योंकि प्रयास में आपको तकलीफ होगी। अगर मेरे पास कोई समझ है, तो बोल देना चाहिए, चुप नहीं रहना चाहिए। जैसे (यहां मिस्त्री) बात करना बंद नहीं कर रहे थे, मैंने कह दिया खुलकर बोलो — अब मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं; प्रॉब्लम तभी तक थी जब तक उम्मीद थी कि ये चुप हो जाएंगे। तो अपनी बात रख दो; समझ गया तो ठीक, नहीं समझा तो भी ठीक, बात खत्म।
मान लीजिए आपकी उंगली में कैंसर हो गया — या तो ठीक कराओगे, या कटवा दोगे; रखोगे तो नहीं, क्योंकि पूरा शरीर खत्म कर देगा। तो अगर वह समझता है तो साथ रखो, नहीं समझता है तो या तो उस जगह को आप छोड़ दो या उसे छुड़वा दो; और कोई रास्ता नहीं है, सिर्फ घुटन का है। त्याग ही परम सुख है — समझा तो ठीक, नहीं समझा तो त्याग कर; हो सकता है आपका त्याग ही उसे समझा दे। अगर मौकापरस्ती में साथ रह रहे हो, तो बात अलग है — फिर घुटन में जियो।
बस जहां हो, वहीं से (अगली) यात्रा शुरू होती है। बुद्ध ने कहा पुनर्जन्म नहीं होता, तो बहुत लोगों ने कहा होता है — किसकी बात मानोगे? कबीर ने कहा पत्थर पूजने से हरि मिले तो मैं पहाड़ पूजूं, पर मीराबाई को, रामकृष्ण परमहंस को मिल गया। बहुत तरह की बातें हैं। किसी चक्कर में ना पड़कर अपने चक्कर में रहो कि मेरा कल्याण कैसे हो। पुनर्जन्म होता हो या नहीं, मुझे क्या मतलब? मैं इसी जन्म में अपना कल्याण क्यों ना कर लूं — खत्म बात।
गुरु ज्ञान का प्रतीक है। अगर वह गुरु शरीर छोड़ दे, तो जिसके द्वारा ज्ञान निकल रहा है, उससे ज्ञान लेके आगे बढ़ो। अगर आपका नल खराब हो गया, तो क्या आप दूसरे के नल से पानी नहीं पी सकते? प्यास बुझानी है — आपको पानी की जरूरत है या नल की? तो फिर खोज करो। आपकी योग्यता, सामर्थ्य होगी तो मिल जाएगा, नहीं है तो नहीं मिलेगा।
क्यों नहीं होगा? अगर ईमानदारी-सत्कर्म से उसका पूरी तरह जीवन है, तो आत्मज्ञान उसी समय पक्का हो गया, होगा ही होगा। जिसके बताए मार्ग पर वह ईमानदारी से चल रहा है, वही उसके सारे प्रश्नों को अंत में खत्म कर देगा — जैसे आदि शंकराचार्य का एक शिष्य प्रश्न नहीं कर पाता था, लेकिन उसकी व्याकुलता ऐसी थी कि गुरु ने उसके सारे प्रश्न खुद गिरा दिए; उसमें पात्रता थी।
क्रोध नहीं आता, वे क्रोध से परे हैं; लेकिन काम के लिए क्रोध करना पड़ता है। जैसे शिक्षक विद्यार्थी पर, मां बेटे पर क्रोध करती है — क्रोध ना करे तो वह समझेगा नहीं। क्रोध एक ऊर्जा है। आत्मज्ञानी आपके कल्याण के लिए क्रोध करते हैं; अपमान किया जाएगा तब पता चलेगा कि आपमें अहंकार कितना है, अपमान का कितना असर है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह में से आत्मज्ञानी में लोभ, मोह और मद (कुछ होने का अहंकार) नहीं रहता; क्रोध नहीं रहेगा तो समाज के लिए काम ही नहीं कर पाएगा।
परमहंस स्थिति मतलब अपने आप को (सबसे) निकाल लिया था; और जब अपने आप को निकाल लिया, तो कोई संप्रदाय, परंपरा — सबसे वह निकल गया, परंपरावादी नहीं रह जाता। आपको चुना होगा क्योंकि आपकी पात्रता होगी, आपकी जिज्ञासा होगी।
भाव तो यह भी बन सकता है कि मैं राजा बन जाऊं, लेकिन भाव से नहीं होगा; राजा तक पहुंचने के लिए काम करना पड़ेगा। आप तब खत्म होंगे जब आपको कुछ नहीं चाहिए; उस स्थिति के लिए काम करो।
जैसे बल्ब से उजाला है, और उजाले में बल्ब नहीं है; उजाले में आप कुछ भी करो, क्या उजाला गंदा होगा? प्रकाश को कोई आंच नहीं आएगी। इसलिए ब्रह्म से यह जगत है, ब्रह्म से आप हो, पर जगत में ब्रह्म नहीं है। या तो इस जगत को पकड़ोगे, तो ब्रह्म से दूर हो गए; ब्रह्म को पकड़ोगे, तो जगत से दूर हो गए। जब तक अपने तरीके से चाहिए, तब तक आप जगत को पकड़े हो; जब अपने तरीके से मुक्त हो गए, तो आपने ब्रह्म को पकड़ लिया।
नहीं, बहुत आगे चली जाएगी, क्योंकि सबसे ज्यादा काम और समय अगर कोई देता है तो आत्मज्ञानी। तब आप देश के लिए काम करोगे; अभी तो सिर्फ अपने लिए काम कर रहे हो, एक तरह से देश को खोखला कर रहे हो — पकड़े जाने का डर है, इसलिए पूरी तरह नहीं कर पा रहे। आत्मज्ञानी को कुछ नहीं चाहिए, वह आपके लिए काम करता है; अगर सब ऐसे हो जाएं, तो स्वर्ग यहीं उतर आएगा।
शुरुआत जरूरत में होती है; प्रेम में (बाद में) वह हो जाता है। अगर सोचो कि मैं इनसे प्रेम करूं, तो कभी नहीं होगा; वह हो जाएगा। मीरा का भाव प्रेम का था, पर उन्हें भी ज्ञान चाहिए था — बाद में संत रविदास जी को गुरु बनाया; इसका मतलब कुछ उन्हें चाहिए था। ज्ञान के बाद आदमी प्रेम में हो जाता है, तब उसका जीवन समाज के लिए होता है, और वह सबके लिए एक जैसा हो जाता है। प्रेम कब घटता है? जब कुछ नहीं चाहिए। शुरुआत हम "कुछ नहीं चाहिए" से कर सकते हैं, प्रेम तक पहुंच सकते हैं।
नहीं, ऐसा संभव नहीं। भाव, फिर कर्म, फिर परिणाम। सिर्फ भाव से कुछ नहीं होने वाला — भाव से राजा बनते तो सब बन जाते। कर्म के पहले भाव बनता है और कर्म के बाद भाव बनता है, उससे फल का निर्णय होता है; भाव हुआ, कर्म ही नहीं हुआ, तो उससे क्या परिणाम आएगा?
स्वप्न मतलब आपकी ही रचना है, आपके द्वारा ही देखा जा रहा है; और नींद शरीर का आराम है। आप देखो कल्याण कैसे होगा; ऐसे प्रश्नों में ना उलझो तो अच्छा है, जिनके जवाब का कोई मतलब नहीं — जैसे बाल काले क्यों हैं, पत्ता हरा क्यों है।
मैं भी वहीं से आया हूं। एक जगह सब थे, मैं भी वहीं था, और मैं निकल गया, एक जगह पे आ गया; तो उस जगह आप हो, तो आपकी गठरी मैं देख ही पाऊंगा ना। आप जिससे पीड़ित हो, मैं भी कभी उसी पीड़ा में था।
आप देखिए कि आपको करना क्या है, आप चाहते क्या हो — यह पक्का करो, और उसके लिए काम करो। हर भाव पे काम भी मत करो, क्योंकि भाव तो देश-काल, स्थिति-परिस्थिति में, कभी घटनाओं को देखकर बन जाता है। सोचो कि इस भाव वाला कर्म करेंगे तो परिणाम क्या मिलेगा; जब तक परिणाम का पता ना हो, तब तक काम मत करो।
फिक्स नहीं बोल सकता; यह प्रत्यक्ष ज्ञान की खोज हुई है, और यह इतिहास में सबसे अलग है, क्योंकि जब भी कोई ज्ञान लाता है तो इतिहास से अलग ही लाता है। मैंने बहुत शुरुआत की थी, लेकिन गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है — फिक्स मेरा कोई गुरु नहीं हुआ कि बोल सकूं मेरे गुरु ये हैं; पर अनेक लोग कहीं ना कहीं मेरे निमित्त बने, किसी ना किसी द्वारा कुछ ज्ञान मिलता गया। 2020 में मेरे प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए; मुझे खुद नहीं पता कहां हुआ, कैसे हुआ। लगभग 24 फरवरी 2020 से 1 जुलाई तक मैं अपने आप में ही पड़ा रहा, बाहर ही नहीं निकला, आसमान ही नहीं देखा — बस एक आसन था, उसी पे सोया रहता, वहीं भोजन मिल जाता था।
क्रोध दो स्थिति में व्यक्ति करता है — एक अपनी इच्छा पूरी करने के लिए, एक सामने वाले के हित के लिए। और काम मतलब आप कोई काम करके परिणाम पाना चाहते हो, उसके लिए करते हो। काम में ही क्रोध का उपयोग होता है; अगर काम छोड़ दो, तो क्रोध आप कर ही नहीं सकते।
इसलिए कि यहां आत्मिक शांति के लिए लोगों ने ज्यादा काम किया है; जिसके लिए आप काम करोगे, वही बढ़ेगा। उन्होंने पैसे के लिए, बाहरी चीजों के लिए काम किया, तो वह उनके पास है; लेकिन आज जितने विकसित देश हैं, उनकी मानसिक स्थिति बहुत खराब है, वे मानसिक पीड़ा में हैं। यहां के लोग आत्मिक कल्याण के लिए ज्यादा काम करते हैं, तो शांति में हैं।
मैं यह कह रहा हूं कि तुम लोगों को किसी जीव की फीलिंग, दर्द क्यों नहीं दिखता? वह (जर्मन शेफर्ड) गेट की ओर मुंह करके इंतजार कर रहा था कि ये खोलेंगे और मैं जाकर विश्राम करूंगा; सुबह चिल्ला रहा था, तुम्हें आवाज नहीं गई। कोई अदृश्य थोड़ी ना है, प्रत्यक्ष है। यह लापरवाही है — सुधार करो; आप जवाबदार इंसान बनो। कोई बात नहीं, उस पर काम करो, अपने अंदर मानवता को जागृत करो; हम बहुत नीचे गिर गए हैं कि जीवों की फीलिंग नहीं समझ पाते, बस अपने आप से मतलब रहता है। (और जो मन कहता है कि दिखावे में ही सही, कर तो रहा हूं — कोई बात नहीं, लगे रहो, अपने आप को हमेशा लगा के रखो।)
पूर्ण तो आप इसी शरीर में हो सकते हो, मरने के बाद थोड़ी ना। मरने के बाद तो जिस स्थिति में आप गए हो, अगला शरीर तैयार है। अल्लाह के सामने बनके क्या जाते हैं — हो सकता है राक्षस बनके जाएं। अगर सजा सुनाने के लिए दर्शन हो रहा है, तो वह दर्शन थोड़ी ना है; राजा किसी आदमी को मृत्युदंड सुना रहा है, तो क्या वह राजा का दर्शन हुआ? जैसा कर्म है, वैसा लेकर जाएगा; अपराधी जज के सामने अपराधी बनके ही जाएगा, समान नागरिक बनके नहीं।
ब्रह्म एक है, हमारी बात थोड़ी ना हो रही है। नाश रूप का होता है, लेकिन रूप के पीछे भी तो कोई है। यहां बातें काम नहीं करेंगी; देखो ना — द्वेष के पीछे कौन है, द्वेष को समझने वाला कौन है? द्वेष अलग है, और समझने वाला अलग। शरीर चेतन है; आप चेतन के चक्कर में पड़ गए। आत्मा को भी चेतना कहा गया, समझ को भी चेतना कहा गया। कहने का मतलब, सबके पीछे आप हो; आप देखो आप क्या हो। अभी तो आप किसी के द्वारा अपने आप को देख पा रहे हो कि मैं यह हूं; जब द्वारा हट जाएगा, तब देख पाओगे कि आप क्या हो। पहले द्वारा तो हटाओ।
तब पकड़े रहोगे जब किसी और को नहीं पकड़ना चाहोगे। यह हाथ कब तक पकड़े रहोगे? जब तक कुछ और नहीं पकड़ना चाहोगे; जैसे ही किसी और को पकड़ा, यह हाथ छूट जाएगा। उससे बेटर मिल गया तो निकल गया।
आप ही देखने वाले हो, आप ही सुनने वाले हो, आप ही बोलने वाले हो, आप ही सूंघने वाले हो, आप ही स्पर्श करने वाले हो, और आप ही रसपान करने वाले हो। मिला-जुला के आप ही हो।
जिसे आप गलत विचार कह रहे हैं, आपने कभी उन विचारों को सहयोग दिया है, उस विचार की जानकारी आपने कहीं ना कहीं से ली है। विचार ना सही होते हैं, ना गलत; आप किस विचार को पकड़कर काम करते हो, यह देखना है।
यह जानकारी का अभाव है। अध्यात्म को पूरी तरह समझिए कि हमारे जीवन में अध्यात्म की जरूरत क्यों पड़ी; पूरी जानकारी लीजिए। जानकारी का अभाव है, तो अपने लक्ष्य की ओर बढ़ नहीं पाओगे।
जहां आपके द्वारा जरूरतमंद की सेवा होती है, वहां परोपकार घटित होता है; जहां परोपकार होता है, वहां धर्म घटित होता है, वह आपको धार्मिक बनाता है और आत्मिक कल्याण में सहायक होता है। धर्म के लिए बल चाहिए — वह बल है अर्थ, तन का बल और आपकी समझ का बल; तो अर्थ से जरूरतमंद की सेवा करिए। काम — कोई भी काम ईमानदारी से करिए। और मोक्ष — अगर ईमानदारी से कर रहे हैं तो आगे का बंधन बढ़ेगा नहीं, सत्कर्म कर रहे हैं तो पिछला खत्म होगा, और आपको मोक्ष हो जाएगा। मोक्ष के यही रास्ते हैं।
गुरु कोई व्यक्ति विशेष नहीं है, गुरु ज्ञान का प्रतीक है; प्रकृति खुद परीक्षा लेती है। विद्यार्थी बिना परीक्षा के क्लास पास नहीं कर सकता, किसी पद पर जाना है तो इंटरव्यू देना पड़ेगा — हर जगह परीक्षा देनी पड़ेगी। कोई कहे मैं राम का भक्त हूं — भक्ति कब समझ में आएगी? जब रास्ते में उसे अथाह धन की जरूरत हो, धन ना मिले तो मर सकता हो, और सामने रावण की प्रतिमा सोने की और राम की प्लास्टिक की हो — तब वह क्या उठाता है, उस समय भक्ति का पता चलेगा। विपरीत परिस्थितियों में भक्ति का पता चलता है, अनुकूल में नहीं; जैसे रिश्तेदारों-दोस्तों का पता विपत्ति में चलता है।
विपत्ति में आपको खुद सामना करना पड़ेगा; अपनी विपत्तियों से मुक्त होने के लिए खुद अपनी सहायता करो, कोई नहीं आने वाला, किसी के पास इतना समय नहीं है। अपनों ने आपको नहीं रखा — उन्होंने अपने तरीके से रखना चाहा, आप अपने तरीके से रहना चाहे; अपनों ने बहुत इज्जत के साथ बेइज्जत किया, तभी आप वहां से भागे। तो आपके पास जितनी ताकत है — धन, तन, समझ — सब अपनी परम शांति के लिए लगा दो, कुछ बचाओ मत; आखिरी में तुम्हारे अलावा तुम्हारे पास कुछ बचना नहीं चाहिए, ताकि कह सको कि तुझे पाने के लिए मैंने सब लुटा दिया। मैं जब निकला था तो 12 ज्योतिर्लिंग की जगह 14 कर लिए (कि असली छूट ना जाए), कर्ज लेकर भी घूमा, ताकि कोई ना कहे कि मैं तेरे दरवाजे पे आया नहीं। बस इतना ध्यान रखना कि ईमानदारी और सत्कर्म हो, किसी को तकलीफ ना हो — कोई कहे कि एक चींटी मारने से परमात्मा मिल जाएगा, तो मैं नहीं मार सकता।
अब देखना यह है कि जहां राग है, हो सकता है वहां नया लेनदेन कर रहे हो। हमें राग-द्वेष से मुक्त होना है, ईमानदारी से जीवन जीना है; अपनी योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करोगे, तो राग होगा ही नहीं। यह बहाना मत बनाओ कि पीछे का है, जबकि नया तैयार कर रहे हो। नया बनाना, पैदावार बंद करो, पिछला खत्म हो जाएगा। ईमानदारी-सत्कर्म से जियो; जितनी आपकी योग्यता है उतना मिल जाएगा, और चाहिए तो उसके लिए काम करो।
एकदम। आधार और बेस पाप और पुण्य है। अगर आप इस संसार में, इस शरीर में रुके हो, तो लेनदेन है, और लेनदेन पाप-पुण्य में है। लेनदेन खत्म, तो आप यहां आकर क्या करोगे?
आनंद को खोजना नहीं है; अपने आप में होना है, और आपमें आनंद है। जैसे कोई व्यक्ति किसी पद पे है — या तो इस्तीफा दे, तो घर जाकर सुकून से बैठेगा; या बेईमानी करे, तो जेल में बैठेगा; या नौकरी पूरी करे, तो इज्जत के साथ हट जाएगा। तो अगर आप लेनदेन ईमानदारी के साथ कर लेते हो, तो सम्मान सहित अपने आप में, आनंद में हो जाओगे।
किसी को भी नहीं मिल सकती। नियम सिर्फ नियम है, और उस नियम में ही आपकी उन्नति हो सकती है। जैसे किसी बीज को पृथ्वी में डालो और पांच तत्वों में से एक तत्व निकाल दो, तो वह वृक्ष बन ही नहीं सकता।
आत्मिकता से लेनदेन करोगे तो सामने वाले को भी समझ में आएगा, उसके भाव का भी शुद्धिकरण होगा, सुधार आएगा। अहम भाव में करोगे तो उसे भी ठेस पहुंचेगी; आप तो भटक ही गए, वह भी भटक सकता है अगर उसकी समझ विकसित नहीं हुई — वह भी अहंकार, मान के चक्कर में जी रहा है, तो ईंट का जवाब पत्थर से देगा।
जैसे कोई आपसे रास्ता पूछे और धन्यवाद दे, तो आत्मिक सुकून मिलता है कि बहुत अच्छा इंसान है; धन्यवाद ना दे, ऐसे ही चला जाए, तो कहते हो कितना खड़ूस है — उसके अंदर से कहीं ना कहीं बद्दुआ निकली। आशीर्वाद और श्राप अंदर से अपने आप निकलता है, वह कुछ कर नहीं सकता। इसलिए धन्यवाद देकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
जैसे बीज है, अंकुरित हुआ तो पौधा है, फिर वृक्ष है — नाम अलग-अलग हैं, स्रोत एक ही है। लेकिन क्या पौधे को वृक्ष बोल सकते हो, या वृक्ष को पौधा? है एक ही, पर देश-काल, स्थिति-परिस्थिति से पहले बीज, फिर पौधा, फिर वृक्ष।
कहानी है (सच भी हो सकती है, झूठ भी) कि जब कलियुग आया, तो उसने कहा — मुझमें अवगुण अनेक हैं, पर एक गुण है: हर युग में हजारों साल तपस्या के बाद आपसे मिलना होता था, मेरे युग में घड़ी-आधी घड़ी में मिलना हो जाएगा; और मैं इतनी व्यवस्था दे दूंगा कि लोग सोच भी नहीं सकते। पहले नदी, कुएं से पानी लाने में घंटों लगते थे, अब हर रूम में नल है; टंकी भरी तो खुद बताती है कि मोटर बंद करो; संजय को महाभारत में जो आंख मिली थी, आज सबके हाथ में है। इतनी सुविधा के बावजूद लोग कहेंगे टाइम ही नहीं है, जबकि टाइम ही टाइम रहेगा। पहले वाल्मीकि को दीमक लग जाती थी, आज मच्छर काट ले तो साधना छोड़ मच्छर भगाते हैं — सहनशक्ति नहीं है। और आज कल्याण की बातें भी रसपान बन गई हैं — जहां थे वहां मजा नहीं आ रहा, तो अध्यात्म ले लिया; शब्दों को ले रहे हो, जी नहीं रहे; मान के चक्कर में आंख बंद करके बैठ गए, नाम के ध्यानी, नाम के ज्ञानी बन गए।
कोई वाटर कह रहा है, कोई पानी, कोई जल, कोई नीर — मूल क्या है? अपनी प्यास बुझाओ; सबसे प्यास बुझेगी। शब्दों के जाल में मत फंसो; देखो बात किसकी कह रहा है, तब देखोगे कि मिला-जुला के सब उस परम सत्ता की बात कर रहे हैं। अब लोग गुरु भी क्यों खोज रहे हैं — निर्विकार होने के लिए नहीं, मालामाल होने के लिए। अगर कहते हो उसने मुझे ठग लिया, तो आप उससे ज्यादा ठगने गए थे — हजारों दिए लाखों के चक्कर में, लाखों दिए करोड़ों के चक्कर में। सबसे बड़े ठग हम हैं; काश अपने ठगपन को देख पाते। अगर आप ठग नहीं हो, तो आपको कोई ठग ही नहीं सकता। मेरी अशांति का कारण मैं हूं, और कोई नहीं।
30 साल पहले लोग गरीब थे, लेकिन शांति और मस्ती से जीते थे। आज घुटन इसलिए है क्योंकि बेईमानी से धन इकट्ठा कर रहे हैं; जब स्रोत ही अशुद्ध है, तो उससे जितनी व्यवस्था होगी, अशुद्धि ही आएगी। पहले मां-बाप बच्चों को संस्कार देते थे — ईमानदारी से जीना; अब कहते हैं बस पैसा कमाना, चाहे लूट लो। आपके घर में कोई काम करने वाला बेईमानी करते पकड़ा जाए, तो क्या करोगे? निकालोगे। एक बेईमान की इज्जत बेईमान भी नहीं करता — बेईमान भी ईमानदार नौकर, ईमानदार साथी की उम्मीद रखता है। तो आपने व्यापार में बेईमानी की, तो बच्चे आपकी इज्जत कैसे करेंगे? आप भटक रहे हो, तो उसके जिम्मेदार आप हो; इसे स्वीकार करो और सत्संग से सारी बातें समझो, आप परम शांति की तरफ बढ़ते जाओगे।
मंत्र यही है — ईमानदार हो जाओ। और मूल मंत्र यही है — स्वीकार कर लो कि आज मैं जहां हूं, उसका जिम्मेदार मैं हूं, मैं यहां से निकलना चाहता हूं, और इसके लिए कुछ भी कर सकता हूं। अगर यह स्वीकार कर लोगे, तो कोई निकालने वाला भी आ जाएगा — कोई दया कर देगा, करुणा कर देगा। लेकिन गुनाह करने के बाद कहोगे मैंने तो कुछ किया ही नहीं, तो जितने आएंगे, दो पटाखा मार के ही जाएंगे। जैसे अपराधी जब तक भागता है, कानून मारता रहता है; जैसे ही कबूल लेता है, मारना बंद, वही लोग भोजन-रहने की व्यवस्था करते हैं; घर में बच्चा चोरी करके जब तक नहीं कबूलता, मार खाता है। तो एकांत में बैठकर कबूल लेना कि इसमें किसी का दोष नहीं, इस दुनिया में एक ही दोषी है — मैं; बाकी सबने तो मेरी सहायता की है।
मैं यहां बैठकर मान लूं कि मैं राजा हूं, तो क्या राजा हो गया? राजा के लिए योग्यता चाहिए, राजगद्दी चाहिए, प्रजा चाहिए। यह गुड्डा-गुड्डी का खेल छोड़ो। आपने दृष्टापन का भाव लाया है, दृष्टा स्थिति थोड़ी ना हुई है — उसमें आओ। राजा का भाव बनाने और राजा जैसे कपड़े पहन लेने से राजा थोड़ी ना हो जाओगे। कोई अपने आप को परमात्मा मान रहा है, कोई ब्रह्म, कोई कहता है मुझे आत्मज्ञान हो गया — ये सब भ्रांतियां मत लो। जब आप उस स्थिति में आएंगे, तो आनंदमय हो जाएंगे; किसी से पूछोगे नहीं कि दृष्टा हो गया, अब क्या करूं। कल्पनाओं में मत जियो, कल्पनाएं बहुत नीचे गिरा देती हैं; प्रत्यक्ष में आओ।
जीते जी शरीर को अलग आप तब देख पाओगे, जब जरूरत में जीने लगोगे। भोजन करो, किसी से बात करो, तो देखो — क्या मैं जरूरत में कर रहा हूं, और यह जरूरत मेरी है कि मेरे शरीर की? भोजन करते हुए अपने आप से पूछो, भोजन मैं कर रहा हूं या शरीर के लिए कर रहा हूं — अंतरात्मा से जवाब मिल जाएगा। बात करते हुए देखो — काम के लिए कर रहा हूं, या इन शब्दों से रसपान कर रहा हूं; क्या इन शब्दों की शरीर को जरूरत है? हर वक्त सचेत रहो, जांचते रहो; प्रतिदिन यह अभ्यास करोगे, तो एक समय ऐसा आएगा कि अपने आप को और शरीर को अलग देख पाओगे।
दृष्टा को कहां देखना है? जब दृष्टा हो गया, तो कौन किसको देखेगा — सब खत्म हो गया। अहंकार तब होता है जब आप बड़ा बनना चाहते हो; तो बड़ा बनने की इच्छा का त्याग करो। जिसे देखा जा रहा था, जिसके द्वारा देखा जा रहा था — जब द्वारा हट जाएगा, तो दृष्टा हो जाओगे, तब आप अपने आप में रहोगे; द्वारे की वजह से आप उसमें हो।
एकदम टिकाओ कि इसके बिना मैं क्या हूं। यह मैं नहीं हूं — मैं उंगली नहीं, हाथ नहीं, बाल नहीं, पैर नहीं, मुंह नहीं, सीना नहीं, पेट नहीं; तो आखिर फिर मैं क्या? आखिर में यह प्रश्न खड़ा हो जाता है।
बस आप करना बंद कर दो; अपने तरीके से (करना छोड़कर) जरूरत में जीना चालू करो। जब राग-द्वेष होना बंद हो जाएगा, और अतीत में जितना राग-द्वेष था उससे अपने आप को निकाल पाओगे, तो आप आनंदमय हो जाओगे।
दो टाइम भोजन कर रहे हो, तो एक टाइम बंद कर दो, क्योंकि मेरे काम का लाभ भी तो ले रहे हो; लाभ ले रहे हो मतलब देने लायक हो। हफ्ते में एक दिन उपवास ही रख लो, पाचन क्रिया भी सही रहेगी, और बचा हुआ धन जरूरतमंद की सेवा में लगाओ। और जहां से ले रहे हो, पहले वहां दो।
हां, सब लेनदेन के कारण है। अगर आप ईमानदारी से उनके साथ हो, तो मुक्त हो रहे हो; अगर बेईमानी से हो, तो आगे फिर मिलने की तैयारी हो रही है। और (शरीर त्याग के बारे में) मैं जहां तक समझा हूं, जब हमारा समय आएगा, तभी मैं इस शरीर से निकल पाऊंगा।
पहली बार ऐसा था कि आप इस शरीर में अपनी इच्छा से आए। लेकिन इस शरीर में आने के लिए कुछ शर्तें थीं; आपने उन शर्तों को अपनाया और बाद में फंस गए। फिर जब दोबारा जन्म-मरण के चक्कर में पड़े, तो इच्छा-अपेक्षा में पड़ गए। एक बार अपनी मर्जी से आए।
इच्छा-अपेक्षा का त्याग करके वह इस भवसागर से निकलेगा; लेकिन वह इतना तो स्वतंत्र है कि जब चाहे फिर इच्छा में आ सकता है। जैसे एक सामान्य व्यक्ति अपराधी बना — उसे पता था अपराध करने से क्या मिलेगा, यही तो स्वतंत्रता है। अगर पूर्ण से अपूर्ण में नहीं आ सकते, तो यह तो गुलामी हो गई। अपराध किया तो कैदी हुए, सजा काटकर फिर सामान्य हुए, फिर चाहो तो कैदी हो सकते हो — यह चलता नहीं रहेगा, यह आपके ऊपर है। जैसे (ये साधक) — क्या इन्हें नहीं पता था कि बेईमानी अपराध है, उसका परिणाम क्या है? फिर भी किया, शांति से अशांति में अपने आप को ले गए; गलती हमारी है।
वैराग और वैराग्य अलग-अलग हैं। वैराग हुआ — मुझे लगा कि जहां मैं जी रहा हूं, वहां खुश नहीं हूं, अपना जीवन गंवा रहा हूं। फिर समझ विकसित हुई — शास्त्र, जीवंत गुरु या किसी वाणी से — कि निकलने के लिए राग और द्वेष से मुक्त होना है; राग-द्वेष से मुक्त होना वैराग्य है। राग-द्वेष जाएगा अपनी समझ से। जैसे-जैसे समझ विकसित होगी, जिन्होंने दुर्व्यवहार किया उन्हें माफ करते जाओगे कि हमारा लेना-देना था, खत्म करो; समझ आएगी कि मैंने भी कभी सताया होगा। एक झटके में नहीं हटेगा — जितना गहरा कपड़े पे दाग, उतनी धुलाई करनी पड़ेगी, उतना इंतजार। आगे राग लगाओगे नहीं; पीछे ज्यादा प्रॉब्लम द्वेष वालों से है, उन्हें धीरे-धीरे माफ करते जाओगे। जैसे-जैसे सत्कर्म करोगे, मोह खत्म होगा; सामने वाले से लेने की इच्छा का त्याग करोगे, तो मोह होगा ही नहीं।
दृष्टा ऐसे नहीं बन पाओगे। वही विचार परेशान करते हैं जिनसे मेरा लेना-देना है, राग और द्वेष है; बहुत विचार ऐसे हैं जो परेशान ही नहीं करते — 1 लाख की भीड़ निकल रही हो, उसमें परेशान वही करेगा जिससे राग या द्वेष है। विचार किसी रूप का ही आता है — व्यक्ति, धन, संपत्ति, वैभव; रूप से परे विचार नहीं आ सकता। तो उस विचार पर काम करो कि इससे राग-द्वेष क्यों है, और गहराई में अंत तक जाओ, जहां से राग-द्वेष पैदा हुआ होगा; अंत तक जाओगे तभी अपने आप को वहां से निकाल पाओगे। विचारों को सिर्फ देखो नहीं — जिन विचारों से पीड़ा हो रही है, उन पर काम करो कि पीड़ा क्यों है। (एक ही विचार है तो भी) — नाव में एक छेद हो चाहे 99, खड़े तो वहीं हो।
मान लीजिए दो व्यक्ति हैं — एक को पढ़ना आता है, एक को नहीं; दोनों को दुनिया की सारी किताबें देकर बैठा दो, और कुछ साल बाद निकालो — एक की समझ विकसित मिलेगी, और जिसे पढ़ना नहीं आता वह डिप्रेशन में मिलेगा। तो एकांत में जाने से पहले, एकांत में करना क्या है वह समझ के जाना पड़ेगा; और जब समझ लोगे, तो एकांत में जाना नहीं पड़ेगा, आप चले जाओगे। समझ के साथ एकांत में जाते हो तो कुछ करोगे और परिणाम आएगा; समझ नहीं है, तो डिप्रेशन के शिकार हो जाओगे।
अपने लक्ष्य के प्रति लगे रहो, बस। सारे ऑप्शन देख लिए, अब यह आखिरी है। वापस गए तो क्या मिलेगा — जिससे निकले थे वही घुटन, और बहुत तेजी से जाओगे; जैसे परिवार के सदस्य दूर रहकर पास आते हैं तो खूब गले मिलते हैं, जितना आगे आए हो उतनी तेजी से उसमें जाओगे। तो ऐसी गलती ना करना; मुड़ना मत। पता नहीं कितनी सदियों के बाद समझ विकसित हुई है। मुझे तो बताने वाले भी नहीं मिलते थे, फिर भी मैं पीछे नहीं गया — पीछे वही दलदल है। चाहे एक साल में हो, चाहे पूरी जिंदगी लग जाए — दिन, महीना, साल मत गिनना। यह गलती की संभावना तब तक रहती है जब तक पहुंचे नहीं, क्योंकि पीछे परिचित लोग पुकार रहे हैं; लौटाने वाले भी मिलेंगे जो कहेंगे जन्मों-जन्म लगते हैं, यह अवतारों को होता है। मेरी व्यक्तिगत सलाह है — दुनिया में जहां भी रहना, अपने आत्मिक कल्याण के लिए काम करना, कभी लौटना मत।
किसी के प्रति लगाव है तो उसे राग कहते हैं; किसी के प्रति नफरत, गुस्सा है तो द्वेष। आत्मज्ञान कभी भी हो सकता है; पता नहीं आप भागने वाले हो और आत्मज्ञान होने वाला था — भागो मत, रुक जाओ। मोक्ष के लिए चाहे जितना समय लगे, आत्मज्ञान के लिए पूरी तरह प्रयास करो, पता नहीं वह घटना किस क्षण घट जाए। जैसे अपराधी आप कभी भी बन सकते हो — अभी किसी को पीट दो तो अपराधी हो गए, यह आपके हाथ में है; लेकिन कैदीपन से कब छूटोगे, वह जज के सामने है — एक साल, दो साल, या बाइज्जत बरी। वैसे ही आत्मज्ञान पूरा आपके हाथ में है, मोक्ष कब होगा वह छोड़ दो। इसीलिए महापुरुषों ने चिल्ला-चिल्ला कर कहा कि आत्मज्ञान के लिए प्रयास करो।
नहीं, आप अपना सकते हो, दे नहीं सकते। सत्संग सिर्फ वही सुना सकता है जो सत्य में स्थिर हो गया हो; आप तो सिर्फ एक जानकारी बोलोगे। यह गलती मत करना — यही तो लोग करके प्रचारक बन गए, क्योंकि सुनाने से मान-सम्मान मिलता है। हां, आप बता सकते हो कि यहां से मेरा जीवन बदला है, इस चैनल पर वीडियो है, आप भी देख लो; मैंने अपनी समझ से समझा है पर पक्का नहीं, तुम अपनी समझ से समझना।
नहीं। जैसे बल्ब का रूप होता है, लेकिन बल्ब के पीछे विद्युत है, उसका कोई रूप नहीं है; रूप के द्वारा ही उसका परिणाम है। वैसे ही इस रूप के द्वारा ही आत्मा का परिणाम है, लेकिन (आत्मा का) रूप नहीं।
यहां आप बैठे हो तो कोई पूछने वाला नहीं, क्योंकि मेरा सानिध्य है। इसी जगह को छोड़कर बगल में भी जाकर बैठो, तो कई लोग पूछेंगे कि यहां क्या कर रहे हो; घर पर इतना बैठोगे तो कहेंगे डिप्रेशन का शिकार तो नहीं हो गया, मानसिक रोगी तो नहीं, बैठ के खाता है — और धीरे-धीरे वे आपको मानसिक रोगी कर देंगे, एकांत में लगने ही नहीं देंगे। यहां जिंदगी भर रहो, कोई नहीं पूछेगा — आज तक आपका किसी ने नाम तक नहीं पूछा; दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं जहां बिना नाम एंट्री हो। तो यहां के एकांत और वहां के एकांत का माहौल और प्रभाव अलग-अलग है।
अब थोड़ा और आगे जा रहे हो। धीरे-धीरे स्तर बढ़ेगा, समझ विकसित होगी, क्योंकि वह आनंद कहीं और से था — मैंने कहा था कि गुरु से भी आनंद की झलक मिलती है। अब धीरे-धीरे आपकी समझ विकसित होगी, तो जब आनंद आपसे आएगा, तो वह रहेगा। और पूछ लिया करो; जब तक नहीं पूछोगे, प्रश्न नहीं जाएगा; पूछने से मन हल्का होगा, और तेजी से यात्रा होगी।
अगर उम्मीद है कि मेरे यहां भी लोग आएं, मेरे मरने पर भी लोग आएं, तब तो आपको करना पड़ेगा; आप जाओगे तभी लोग आएंगे। हम तो जेब में आईडी भी नहीं रखते थे — शरीर कहीं छूट गया तो छूट गया, पांच तत्व में विलीन हो जाएगा; जब जीते जी नहीं आए, तो मरने के बाद आकर क्या करेंगे? अभी बच्चों को बुलाओ कि याद आ रही है, तो कहेंगे बहुत काम है; मरने की खबर जाए तो सब छोड़कर आएंगे, क्योंकि पीछे वैभव है। यह शरीर हमारा तभी तक है जब तक हम इसमें हैं — जैसे ट्रेन की सीट पर अधिकार तभी तक है जब तक स्टेशन नहीं आता; उतरते ही कोई और उस सीट पर बैठ जाएगा। तो शरीर से मोह मत करो; चिंता यह करो कि इस शरीर को छोड़कर मैं कहां जाऊंगा — शरीर छोड़ने से पहले मैं अपना आत्मिक कल्याण कर सकूं।
इसलिए कि मैंने बहुत कुछ लिया है; अब सबको अपना इसलिए बनाना है कि जब मैं दे दूंगा, तभी निकल पाऊंगा। लिया है तो भी नहीं निकल सकता। अगर आपके पास है तो वह सब देना पड़ेगा, और देने के लिए अपना बनाना पड़ेगा, नहीं तो लेंगे ही नहीं — अपना बनाकर देकर निकल लो, "मेरा" मत बनाओ। जहां "मेरा" का भाव है — जैसे गाड़ी में; क्या गाड़ी के लिए था? उससे डबल पैसा कोई दे दे, तो "मेरा" का भाव खत्म — वह पैसे के लिए था, मूल्य के लिए। मूल्य दो और लो, निकल लो।
अगर आपने उसे छोड़ दिया, तो आपको नहीं आना पड़ेगा। लेकिन उन्होंने आपसे लिया है, तो हो सकता है उसी व्यक्ति को नहीं, पर किसी ना किसी को, अलग-अलग रूप में देना पड़ेगा — प्रकृति का लेने-देने का तरीका अलग है, प्रकृति ले लेगी। जैसे व्यक्ति अपराध करके समर्पण करे, तो सजा उसी हिसाब से भिन्न होती है। प्रकृति हिसाब कर लेगी, आप उसकी चिंता छोड़ो; आप बस तैयार हो जाओ कि मैं सजा भोगने के लिए तैयार हूं।
बात यह है कि राजा से मिलने के बाद मैंने मांगा क्या — मांगेंगे तो हम गिर गए। अगर हमारे सामने कोई आया, तो उस समय हमने उससे क्या कहा, वह मायने रखता है; वह दर्शन आपको ऊपर भी उठा सकता है, नीचे भी गिरा सकता है।
धन, वैभव, समृद्धि सब दिया जा सकता है; आत्मज्ञान कोई किसी को नहीं दे सकता, क्योंकि वह आपके अंदर है, आपमें ही है। बाहर होता तो दे भी देता। उसके लिए आपको अपने अंदर जाना पड़ेगा, और आपके अंदर आपके अलावा कोई नहीं जा सकता। आपने अपने आप को बाहर किया है, और आप ही को वहां से निकालकर अपने आप में लाना है।
हां, ठीक है। लेकिन अब आपको वहां का पूरा माहौल देखना पड़ेगा — ऐसा ना हो कि आप एकांत में बैठी हो और आपके लिए लोग परेशान हैं; भोजन, व्यवस्था भी तो चाहिए। अगर आपकी व्यवस्था में कोई परेशान है और आप बैठकर मजा ले रही हो, तो फिर उस व्यवस्था में सहयोग करो।
वैराग्य होने का भ्रम था। कहीं ना कहीं भोग आपके तरीके से नहीं मिल रहा था, इसलिए अशांति थी, तो भजन का सहारा लिया — डूबते को तिनके का सहारा; और जब भोग आपके तरीके से मिलने लगा, तो उसमें मस्त हो गए। पास के गांव में एक आदमी गरीब था पर इतना सेवाभावी था कि गांव वालों ने उसे सरपंच बना दिया; सरपंच बनते ही बस क्वार्टर पर साइन करने लगा, अब कोई उसे एक गिलास पानी देने को तैयार नहीं — वह सेवक नहीं था, मजबूरी थी, सेवा से पेट भर जाता था। भजन में तुम आए कब थे? भजन में आना मजबूरी थी — स्वभाव में नहीं, अभाव में, कुभाव में आए थे।
अचानक से भी होता है, और प्लानिंग से भी कर सकते हो — जैसे खूब भोजन बना लिया, रोटी-सब्जी लेकर निकल गए कि जो भूखा मिलेगा उसे खिलाऊंगा; किसे, मुझे नहीं पता; यह सत्कर्म होगा। जो आपके पास (बचा) है उसे देते हो तो सेवा है; और जो आपकी जरूरत है उसमें से देते हो — जैसे चार रोटी खाते हो और दो दे दो — वह असली दान है। नर्मदा तट पर एक बालक मुझसे बोला, इतने जीव-जंतु भूखे घूमते हैं, मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। मैंने पूछा, इसके लिए किया क्या? 100 भूखे हैं और तुम एक को भी खिला दो, तो एक आंकड़ा तो कम किया। और घर से नहीं, पहले अपने हिस्से का देना चालू करो, तब समझ आएगा कि देना क्या होता है; बचा हुआ तो कोई भी दे सकता है।