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प्रश्नोत्तर P12-0110 · भाग 12

आपने कुटिया के आश्रमवासियों से कहा कि जो भी आए उसे अच्छे से खिलाओ-पिलाओ, ताकि देने का स्वभाव आए। तो हम संसार में या आपके साथ भी बांटने लग जाते हैं कि योगी जी खुश होंगे, और फिर आप कहते हो कि तुम अपना मान खड़ा कर रहे हो। इसे मैं कहां तक सही मानूं?

इसे बहुत गहराई से समझना है। अपनों की कुटिया मतलब एक दरवाजा है। हमने एक दरवाजा खोला है, और उस दरवाजे पर कोई भी आए — भूखे को भोजन, प्यासे को पानी — ये मेरा कर्तव्य है। लेकिन जब मैं वो दरवाजा छोड़कर समाज में कुछ काम करने गया हूं, तब तो मेरा दरवाजा ही नहीं है। मैं तो उसके दरवाजे पर गया हूं, तो उसके दरवाजे पर अपने अहंकार को पोषण क्यों दे रहा हूं कि मैं तुझसे ज्यादा हूं? मैं जिसके दरवाजे पर गया हूं, उसके पास नमक-रोटी है तो नमक-रोटी खा लो। पूछना उसका कर्तव्य है, मेरा नहीं। मेरा देना मेरे ही क्षेत्र में है। अगर मैं किसी के यहां किसी काम से गया हूं, तो वो जैसे चाहे वैसे रखे; मुझे सिर्फ अपना काम याद रखना है कि मैं किस कार्य को लेकर यहां आया था और मेरा काम हो रहा है कि नहीं। यही गलती हम कर देते हैं कि अपना काम भूल गए और उससे व्यवहार बनाने लगे — कि मैं कुछ हूं, मैं सज्जन हूं। हर व्यक्ति सबकी नजरों में सज्जन बनना चाहता है कि देखो मेरे अंदर कितनी मानवता है, मैं लोगों की भूख देख पा रहा हूं।

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वीडियो: बिना हिसाब के तू जा नहीं पाएगा #योगी · 2026-09-17