प्रश्नोत्तर P12-0111 · भाग 12
मुझे बचपन से यही सिखाया गया है। अगर मेरे साथ मेरा सीनियर है और उसे सामने वाले की भूख नहीं दिख रही, तो लगता है मेरा बाप या मेरा गुरु कहेगा कि तुझे क्यों नहीं दिखी, तेरे अंदर मानवता क्यों नहीं जगी? कई बार डांट भी पड़ी कि तू अकेला ही पेट भर रहा है। तो मैं कौन सा करूं, कौन सा ना करूं?
मुझे पहली बात यह देखनी है कि मैं किस लिए गया हूं, मेरा अधिकार सिर्फ कितना है, मैं किसके साथ हूं, और उसने मुझे कितना अधिकार दिया है — उतने में काम करना है। मैं कुछ उपलब्धि के लिए गया हूं; जितना वो बोल रहा है उतना ही करूंगा तो मेरा टारगेट पूरा होगा। ज्यादा करूंगा तो भी नहीं हो पाएगा, कम करूंगा तो भी नहीं। उसके एक-एक शब्द का ध्यान रखना है। अब जैसे मैं भोजन कर रहा हूं और लग रहा है कि अगला व्यक्ति भोजन नहीं पाएगा तो मर जाएगा — उस स्थिति में दे देना है। दूसरी स्थिति: मेरे हिस्से का जितना मुझे खाने को मिला है, और मुझे लग रहा है कि ये आदमी सच में भूखा है, तो मैं दे सकता हूं — मान के चक्कर में नहीं, भावना के चक्कर में नहीं; सिर्फ जरूरत देखनी है। सच में उसकी जरूरत हो तो अपने हिस्से का दे सकते हो, लेकिन फिर आपको भूखा रहना पड़ेगा।
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वीडियो: बिना हिसाब के तू जा नहीं पाएगा #योगी · 2026-09-17