प्रश्नोत्तर P12-0163 · भाग 12
(लाइव में) मां नर्मदे हर, प्रणाम गुरु जी — मैं आपका पुराना साधक हूं, पंजाब से।
पुराने हो या नए, इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क यह पड़ता है कि पुराने हो तो प्रत्यक्ष ज्ञान का कितना उपयोग किया, क्या उसमें जी रहे हो; और उसके बाद, उससे जीवन में बदलाव हुआ तो आपने मेरे काम में क्या सहयोग किया? अगर कोई नया सहयोग कर रहा है तो फिर पुराने का कोई मतलब ही नहीं। पुराने तो बहुत लोगों को मैं छोड़कर आया, जिनके साथ पला-बढ़ा, क्योंकि सब घुमा-फिराकर अपने मतलब के लिए जी रहे थे; मैं सिद्धांतवादी रहा, कर्म के सिद्धांत को माना, जितना बोला उतना किया, तो जिन्हें अपने कहते हैं, खून के रिश्ते, वो मुझसे बहुत दूर हो गए। अपनों का मतलब क्या है? आप उसे क्या सहयोग दे रहे हो, उसे जरूरत क्या है, क्या आपने उसकी देखभाल की, जरूरत पड़ने पर कभी पूछा? जब आप संपन्न होते हो तो अपने ज्यादा आने लगते हैं, और जब आपके पास कुछ नहीं था तब अपने पल्लू झाड़ लेते हैं। अपना वो है जो मेरी जरूरत पर काम आया, समय पर सहयोग किया, मुझे ताकतवर बनाया — सगा वही है। खून के रिश्तों के चक्कर में जो लोग हमसे प्रेम करते हैं, उन्हें हम छोड़ देते हैं। मैं जिसके साथ जीता हूं, पूरी तरह जीता हूं — धन से, तन से, समझ से; नहीं हूं तो बात खत्म। यहां बातों से बात बनने वाली नहीं, काम से बात बनेगी। मुझे झुंड नहीं चाहिए; एक ही साधक हो पर ईमानदार हो, सत्कर्मी हो, प्रत्यक्ष ज्ञान का उपयोग करे और उसके काम में पूरी तरह सहयोग दे — मेरे लिए मायने रखता है आपने किया क्या, वो बताओ।
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