प्रश्नोत्तर P13-0070 · भाग 13
योगी जी, आपके प्रत्यक्ष ज्ञान में कोई माला, जाप, शास्त्र या बाहरी कर्मकांड नहीं है; आत्मचिंतन ही अहम है — देखो कि तुम राग में फंसे हो या द्वेष में। जब लगातार आत्मचिंतन करते हैं, तो कुछ समय के लिए एक भाव आता है कि अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, न किसी से राग है, न द्वेष। यह भाव निरंतर या ज्यादा समय तक कैसे ठहरे, उस भाव में पूरा कैसे जिऊं? यह भाव बहुत थोड़ी देर के लिए आता है, इसकी अवधि कैसे बढ़ाऊं?
देखिए, अभी तो हम आगे का राग-द्वेष नहीं बना रहे, लेकिन पिछला तो है ना। तो निरंतर इतना भाव बनाकर रखें कि मुझे आगे का नहीं बनाना है, लेकिन पिछला भोगने के लिए भी तैयार रहो। पिछला राग-द्वेष आपने बनाया है, उसकी वजह से जीवन में उतार-चढ़ाव आएगा — बेचैनी, घबराहट, उदासी, बहुत सारी बातें होंगी; उसका सामना करना पड़ेगा। पिछला जितना किया है, उसकी यादें हैं, यादों में घुटन है। मुझे ऐसा व्यवहार, ऐसी बातचीत, ऐसा उठना-बैठना नहीं करना है कि आगे का राग-द्वेष बने; मुझे सिर्फ जरूरत में जीना है। राग-द्वेष तभी बनता है, जब आप जरूरत से ज्यादा में जाते हो, अधिकार से ज्यादा में जाते हो। समझ के साथ — हमेशा समझ को याद रखना होगा कि मुझे राग-द्वेष वाला काम करना ही नहीं है, मुझे जरूरत में जीना है। जरूरत में जीने लगोगे, तो भाव निरंतर बना रहेगा; और जैसे ही जरूरत से आगे गए — चाहे रूप में, रंग में, शब्द में, सुगंध-दुर्गंध में, स्पर्श में, फालतू एक शब्द भी — भाव टूटा, ऊर्जा इधर-उधर लग जाएगी, और आपको पछतावा भी होगा। पिछले की बहुत याद आएगी — जैसे नशेड़ी नशा छोड़े, तो पिछला नशा याद आता है, बेचैन होता है, क्योंकि दिमाग ने उसका रस लिया है; लेकिन काफी समय छोड़कर रहे, तो कहता है अब याद आती है, सताती नहीं। एक समय ऐसा आएगा कि याद आएगी, लेकिन यादों में राग-द्वेष नहीं होगा। तो जरूरत में जियो — जरूरत में उठो, जरूरत में बोलो, जरूरत में काम करो।
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वीडियो: भाव में कैसे रहूं ? #योगी · 2025-12-14