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प्रश्नोत्तर P13-0072 · भाग 13

गुरु जी, कहा जाता है 'आत्मा सो परमात्मा' — आत्मा और परमात्मा को एक मान बैठे हैं। मेरी समझ से ये अलग-अलग हैं: परमात्मा स्वयंभू है, उसे आधार की जरूरत नहीं; आत्मा उसी से है, निर्मल है, पर इच्छा आते ही आत्मा जीवात्मा हो जाती है, और जितनी इच्छाएं बढ़ती हैं, उतनी भटकती जाती है। समाज को प्रत्यक्ष ज्ञान के हिसाब से इस पर समझाइए — आत्मा, परमात्मा और जीव।

'आत्मा सो परमात्मा' मतलब आत्मा के द्वारा ही परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है। मैंने आधार बनाकर बाहर चला गया हूं; उस आधार को छोड़ना होगा। आत्म तत्व तक पहुंच गए, बाहरी आवरण छोड़कर, तो परमात्मा तक पहुंच जाओगे — आत्मा के द्वारा परमात्मा तक की यात्रा होगी, यही बोला गया है। जो कहते हैं कि तुम ही परमात्मा हो, आत्मा को ही परमात्मा बोलते हैं, यह उनका भ्रम है — अगर आत्मा ही परमात्मा होता, तो भटकता ही नहीं, भटकने की कोई संभावना ही नहीं होती। हम ही आत्मा हैं, आत्मा हमसे अलग नहीं; जैसे आप किसी के बाप हो, किसी के दादा हो, लेकिन एक ही हो, वैसे ही हम जीवात्मा हो गए हैं। हमें अभी आत्म तत्व में स्थिर होना है, फिर आत्मा सो परमात्मा की यात्रा करनी है। आप खुद चिंतन करें — अगर एक ही ब्रह्म है, उसके अलावा कुछ नहीं, तो भटकने के लिए दो चाहिए, और जिसके लिए भटका जाएगा, वह तीसरा चाहिए; भटकने के लिए कोई ऑप्शन चाहिए। आत्मा-परमात्मा में कोई भटकाव नहीं है; यह तीसरा कोई आया है, तब सारा सिलसिला गड़बड़ हो रहा है। जीवात्मा कब बने? जब आपने किसी तीसरे को पकड़ा और तीसरे से कोई इच्छा हुई। इसलिए आत्मज्ञान तक अपने आप को पहुंचा लो, सारी भ्रांतियों से मुक्त हो जाओगे। अपनी समझ से ही आगे की यात्रा करनी चाहिए, और अपना आत्मिक कल्याण करने में लग जाना चाहिए।

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वीडियो: आत्मा परमात्मा एक ही है या अलग-अलग ? #योगी · 2025-10-10