आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P13-0074 · भाग 13

खाना खाने में, नहाने में, घर के रोजमर्रा के काम करने में — एक-एक छोटे कर्म पर मेरा क्या भाव होना चाहिए, ताकि मैं बहिर्मुखता से अंतर्मुखता की तरफ आऊं? और घर वालों के बीच बैठी हूं, तब क्या भाव बनाऊं?

आप कोई भी रोजमर्रा का कार्य कर रहे हो, तो इतना ध्यान देने की जरूरत है कि सात्विक भोजन करें, सात्विक कर्म करें, उस कर्म में किसी से राग-द्वेष न करें। भोजन कर रहे हो, तो पहले यह जांचना है कि जिस भोजन को मैं ग्रहण कर रही हूं, वो ईमानदारी का है कि नहीं; जिस व्यवस्था का उपयोग कर रही हूं, वो ईमानदारी की है कि नहीं। भोजन करते हुए इतना भाव रखना है कि भोजन मैं नहीं कर रहा, मैं शरीर को भोजन करा रहा हूं — यह शरीर साधन है, और मैं इसे उतना ही भोजन दूंगा, जितने में मैं अपने आत्मिक कल्याण के लिए और काम कर सकूं। नहा रहे हो, तो मैं समाज में रहता हूं, तो अपने शरीर को शुद्ध कर रहा हूं — यह समाज की जरूरत है। परिवार के बीच बैठे हो, तो बैठे हो; जरूरत में हो तो बोलो, नहीं तो मत बोलो, शांति से बैठे रहो।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: कर्म से पहले क्या ? #योगी · 2026-05-09