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प्रश्नोत्तर P13-0075 · भाग 13

मेरा ओवरऑल प्रश्न यह है कि मन, वचन और कर्म — तीनों से जो भी कर्म मेरे द्वारा हो रहा है, उसमें एक साधक के रूप में टोटल मिलाकर क्या भाव रखूं? क्या उसे साक्षी भाव से चेक करूं? और राग-द्वेष छोड़ने के अलावा अपने आप को क्या टारगेट दूं?

मेरे द्वारा कोई भी कर्म हो रहा है, तो उसमें राग और द्वेष नहीं होना चाहिए — बस यह ध्यान रखें। जैसे भोजन आपके तरीके का नहीं बना, तो गुस्सा आ गया — यह द्वेष; आपके तरीके का बन गया, तो कहा फिर से यही बनाओ — यह राग। राग-द्वेष नहीं करोगे, तो आप अपने आप में रहोगे ना; अब करने को बचा क्या? छूट गए ना। और टारगेट तो आत्मिक कल्याण का है ना — तभी तो मैं राग-द्वेष नहीं करना चाहता।

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वीडियो: कर्म से पहले क्या ? #योगी · 2026-05-09