प्रश्नोत्तर P16-0019 · भाग 16
गुरुदेव, भजन और भक्ति में क्या अंतर है? मार्गदर्शन करें। क्या भक्ति द्वारा भी अपने आप में पहुंच सकते हैं?
भक्ति का मतलब होता है कि हम किसी की भक्ति कर रहे हैं, कोई इष्ट है। भजन का मतलब होता है हमने भज दिया, उसके लिए समर्पण कर दिया। आप एक कंकड़ उठा लो और सर पे मारते रहो, और पक्का हो जाए कि इससे पहुंच जाऊंगा, तो पहुंच जाओगे। संकल्प होना चाहिए, लेकिन आपको पक्का पता होना चाहिए; अगर आपको पता है कि नहीं पहुंच पाऊंगा, तो नहीं पहुंच पाओगे। जो भी करो, अपने आप से करो, उसमें किसी को पीड़ा ना हो — यह ध्यान रखना। पर वह थोपा हुआ ना हो। किसी के द्वारा जाना नहीं है — द्वारा छोड़ देना है, अपना तरीका पैदा करना है; जान के उसे छोड़ देना, अपने तरीके से। अगर वह एक तरीका पैदा कर सकता है तो मैं क्यों नहीं? वह कहता है काले पत्थर से पहुंच जाओगे, तो मैं लाल वाला चुनूंगा, क्योंकि काला वाला उसका थोपा हुआ है। यहां विश्वास की बात नहीं, पता होना चाहिए — यहां प्रत्यक्ष की बात होती है। "भाव में विद्यते देवा" — भाव में ईश्वर का वास है। प्रह्लाद ने कहा खंभे में भगवान है — तो क्या खंभे में भगवान है? प्रह्लाद के भाव में था भगवान, प्रह्लाद ने खंभे में फेंक दिया; अगर खंभे में भगवान होता तो दुनिया का जितना भी खंभा टूटता, सब में भगवान निकलते। जैसे ही आपने दृढ़ संकल्प से, भाव से फेंका कि यह करने से उपलब्धि हो जाएगी, तो हो जाएगी — यही मेन पॉइंट है। "मैं भाव का भूखा हूं, भाव से ही मिलता हूं" — उसे कोई विधि थोड़ी चाहिए। तुम उससे हो, तुमसे वह है, तो बस तुम पैदा कर दो अपना तरीका। मैंने पक्का किया कि मैं तुमसे हूं, इसलिए पक्का करने का अधिकार मुझे है; और मैंने पक्का कर दिया कि नहीं आएगा तो नहीं आएगा — उसे रोक के हम ही रखे हैं।
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वीडियो: कोई प्रश्न ना होने के बाद कौन सा प्रश्न होना चाहिए ? #yogijikasatsang #आध्यात्मिकप्रत्यक्षज्ञान · 2026-06-16