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प्रश्नोत्तर P16-0115 · भाग 16

पांचों विषयों — शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध — में आसक्ति है। इनसे आसक्ति कैसे जाती है?

शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — ये शरीर की भी जरूरत है, और शरीर के पीछे मैं रस भी ले रहा हूं। सर्वप्रथम दो तो बहुत जरूरी हैं — भोजन और सांस। अब सांस लेंगे तो उसमें गंध तो आएगी ही; अगर मैं कहूं गंध नहीं लूंगा तो मैं सांस नहीं ले सकता। तो मुझे ईमानदार बन के रहना है कि मैं इससे मुक्ति पाना चाहता हूं, लेकिन शरीर की जरूरत भी है। तो मैं जरूरत की पूर्ति करूंगा, लेकिन इसमें रस नहीं लेना है। तो धीरे-धीरे भोगते हुए भी आप मुक्त हो जाओगे। आप किस भाव से भोग रहे हो? भोगी भोग को बढ़ाने के लिए भोग करता है, योगी भोग से मुक्त होने के लिए भोग करता है। एक आगे और भोग के लिए तैयार हो जाता है, एक भोग से मुक्त हो जाता है — भोगी और योगी में बस यही फर्क है। सारा खेल भाव का है; भोग दोनों कर रहे हैं। ज्यादातर दिलचस्पी हमारी भोजन में होती है — खाओ, देखो कि मेरी जरूरत है और मैं ईमानदारी के पैसे से खा रहा हूं, तब तो ठीक है, तब मैं धीरे-धीरे उससे मुक्त हो जाऊंगा। भाव यही रखना है कि मैं खा रहा हूं लेकिन मुझे इस रसपान से, इस भोग से मुक्त होना है। योग्यता के अनुसार भोग करो; योग्यता से ज्यादा भोग करोगे तो फंस जाओगे। होटल में आपके पास जितना पैसा है, उससे ज्यादा भोजन कर लिया तो सेठ हाथ पकड़ लेगा कि पैसा दो, नहीं तो बदले में काम करो; और जितनी सामर्थ्य है उतने का मंगा के खाया तो बाइज्जत निकल जाओगे। तो अपनी योग्यता के अनुसार और ईमानदारी से भोग करो, तो आप फंसोगे नहीं; और भोग को इसलिए भोगना है कि भोग से मुक्त होना है। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग को जीवन में अपना बना लो तो आप इस भवसागर से मुक्त हो जाओगे।

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वीडियो: ईमानदार तो सिर्फ ईमानदार #योगी · 2026-02-28