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प्रश्नोत्तर P16-0116 · भाग 16

गुरु जी, हमने एक पुस्तक पढ़ी थी, उसमें भगवान शिव कह रहे हैं कि जो आंखों से देखा जाए वह ब्रह्म नहीं है, आंख जिससे देखती है वह ब्रह्म है; जो कानों से सुना जाए वह ब्रह्म नहीं, कान भी जिससे सुनते हैं वह ब्रह्म है — इंद्रियां भी जिससे चलती हैं, वह ब्रह्म है। तो वह दिखाई क्यों नहीं देता?

वह आपके पीछे है, और आप उसे आगे खोज रहे हो। आप पीछे मुड़ना ही नहीं चाहते, क्योंकि पीछे मुड़ते ही सामने का सब खत्म हो जाएगा। आगे ही बढ़-बढ़ के खोज रहे हैं — कहीं इधर गए, कहीं उधर गए। पीछे मुड़ते भी हो, तो बोल के मुड़ते हो कि मैं आ रहा हूं — तो कैसे मिलेगा? तुमने अपने आप को खूंटे से बांध दिया ना, कि मैं वापस आ रहा हूं, मैं देख के आ रहा हूं। उसके लिए पूरी तरह कहां गए, कि अब मैं नहीं आऊंगा? पूरा तो देखने के लिए मुड़े नहीं; ऐसे मुड़े कि कहीं ये ना छूट जाए। तो ना ये मिला, ना वो। "जानत तुमहि तुमहि होइ जाई" — उसे जानोगे तो उसके जैसे ही हो जाओगे, परिवार आपको स्वीकार ही नहीं करेगा, तुम्हारा अस्तित्व मिट जाएगा। तो तुम जब अपना अस्तित्व मिटाने के लिए तैयार नहीं हो, तो वो तो मिटा नहीं सकता — तुम्हें पूरी स्वतंत्रता दी गई है। तुम कह रहे हो मैं आ रहा हूं, तो वो कैसे मिलेगा? क्योंकि उसके मिलते ही तुम खत्म हो जाओगे, इसलिए वो नहीं मिल रहा है। वो पीछे ही है, तुम्हारे इंतजार में खड़ा है, तो मुड़ तो जाओ। लेकिन तुमने बोला है मैं आ रहा हूं, और वो तुम्हारी बात को झूठा नहीं करना चाहता — वो तुम्हें खत्म कर दे तो तुम झूठे हो जाओगे, परिवार वाले बोलेंगे तुम तो बदल गए। इसलिए वो मिल नहीं रहा। तुम पूरी तरह एक बार पीछे मुड़ जाओ, बस खत्म। अब तुम आगे खोज रहे हो कि परिवार के साथ, पूरे संसार के साथ, संसार में उसे पा लूं। एक तरफ कह भी रहे हो कि शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से परे है वो, और फिर इसी में खोज भी रहे हो।

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वीडियो: आखिर परमात्मा है तो हम उससे मिल क्यों नहीं पा रहे हैं ? #yogijikasatsang #aadhyatmik_satsang · 2024-10-12