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प्रश्नोत्तर P17-0016 · भाग 17

मोह कैसे हटे — मुझे समझ आया कि मैं फंसी ऐसे कि उस व्यक्ति से मुझे अपने तरीके से कुछ मिला (मां से दूध, भाई-बहनों से लाड-दुलार); मेरी कोई कमजोरी थी जिसे उसने पोषण दिया। तो अब जो जरूरत मैं दूसरों से पूरी कर रही हूं, वो खुद से पूरी करूं, दूसरों का कंधा छोड़कर अपने आप को मजबूत करूं — तो आसक्ति की जड़ छूट जाएगी और मैं मूल में आ जाऊंगी। क्या यह सही है?

ऐसे भी नहीं छूटेगा, अपनी ताकत से। आप इस सृष्टि को समझो — यहां अगर आप कुछ एक जगह से दूसरी जगह रखोगे, तो बिना स्पेस के नहीं रख सकते। एक वस्तु आपने यहां रखी थी, आप खुश थे; बाद में पता चला कि ये जगह इसके लायक नहीं है। लेकिन अब उठाओगे तो रखोगे कहां? कब तक पकड़े रहोगे? कोई आधार चाहिए। तो इसे उठा के मुक्त जगह रखेंगे। गुरु कहा गया है — मैं वहां से अपने आप को शिफ्ट कर रहा हूं गुरु के पास; अब गुरु आधार बन रहा है, क्योंकि अभी तो मैं बंधन में हूं, अभी तो मैं "चाहिए" में हूं, और गुरु मुक्त है। तो मुझे सबसे अपने आप को छुड़ा लेना है, और गुरु के प्रति समर्पित कर देना है — गुरु मतलब ज्ञान का प्रतीक। अगर मैं सब जगह से छूट गया, तो गुरु तो बंधन वाली जगह ही नहीं है — तो मैं मुक्त हो गया। जैसे आनंद ने हर जगह से अपने आप को छुड़ा के बुद्ध में रख लिया, तो बुद्ध का जैसे शरीर छूटा, आनंद को उपलब्धि हो गई, क्योंकि बुद्ध लेन-देन से परे हो गए थे। (प्रश्न: तो पहले वहां "चाहिए" में थे, अब गुरु के पास भी "चाहिए" में आ गए?) हां, लेकिन गुरु तो मुक्त है ना — गुरु देता है, लेता नहीं है।

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वीडियो: आखिर तेरा क्या होगा ? #योगी · 2026-01-11