प्रश्नोत्तर P17-0065 · भाग 17
गुरु जी, पशुओं को दोष क्यों नहीं लगता और मनुष्य को क्यों लगता है?
मानव के अलावा पृथ्वी पर जितने भी जीव हैं, सबका भोग और भोजन का टाइम है — भूख लगेगी तो भोजन करेंगे और प्रजनन का प्राकृतिक समय आएगा तब संबंध करेंगे; वो प्राकृतिक जीते हैं, इसलिए पशुओं को दोष नहीं लगता। किसी महापुरुष या किताब ने आज तक नहीं कहा कि पशुओं को सुधारो, ये बेईमान हो गए हैं। मानव को कर्ता का अधिकार दिया गया है, उसके भोग-भोजन का कोई टाइम नहीं; अपनी कामना पूरी करने के लिए, भोग-भोजन और मान-सम्मान के लिए वह किसी भी हद तक गिर रहा है, बेईमानी में उतर गया है। आखिरी में हाथ में कुछ नहीं रहेगा, यह सबको पता है। वस्तुओं का उपयोग तो सब कर रहे हैं, बात यह है कि किस तरीके से — ईमानदारी से किया तो मुक्ति से मोक्ष तक जाओगे, बेईमानी से किया तो बंधन में जाओगे। बस इतना ही है।
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