प्रश्नोत्तर P17-0100 · भाग 17
गुरु जी, महर्षि पतंजलि का योगसूत्र "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" सब योगी-साधु पढ़ते हैं, फिर भी समझने में चूक क्यों हो जाती है? इसका मूल क्या है?
योग मतलब खुद का और परमात्मा का मिलन — अपने चित्त की वृत्तियों को बंद कर देना, निरोध कर देना। एक ही सूत्र की अलग-अलग व्याख्याएं हैं, फिर भी मूल को कोई पकड़ नहीं पाता — सब योगा-योगा करते रहते हैं। जो आत्मा-परमात्मा के मिलन वाली इस बात को पकड़ लेता है, उसका बेड़ा पार है। मेरा तो कहना है — "कुछ नहीं" में आ जाओ, इतना भाव बना लो, सब पकड़ लिया, कोई श्लोक नहीं छूटा। एक छोटे से वाक्य "कुछ नहीं चाहिए" में सारे श्लोक आ गए — कितने श्लोक पकड़ोगे? इस भाव को प्रबल कर लो, सारा झंझट, सारा खेल खत्म; ना शुद्धि रही ना अशुद्धि। कुछ करके संसार की वस्तुएं, सुख-दुख मिलते हैं; और वो कुछ ना करने में मिलता है — इंद्रियां अपना काम कर रही हैं, आंख देख रही है, कान सुन रहा है, मुझे तो कुछ नहीं चाहिए।
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वीडियो: अद्भुत सत्संग ईश्वरी कृपा एकाकार / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-21