आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P18-0012 · भाग 18

गुरु जी, उस समय (आत्मज्ञान की) मन-स्थिति, भाव-स्थिति क्या होती है?

सीधा जवाब है — कुछ भी नहीं। घुमा-फिराकर बहुत बोला जा सकता है। ध्यान किया नहीं जाता, घटित होता है; जो घटित होता है उसमें "कुछ है", और जब "है" से छूट गए तो उसमें कुछ भी नहीं। दो "मैं" हैं — एक अहम मैं जो "मेरा" से धारण किया, और एक परम सत्य। जब तक आप राग-द्वेष में हो, अहम मैं मजबूत है; राग-द्वेष से मुक्त हुए तो अहम मैं गिर जाता है और परम सत्य बचता है। वह अनुभव से परे है, बोला नहीं जा सकता — उसके आसपास रहकर महसूस किया जा सकता है, जैसे फूल से पूछोगे कैसी सुगंध है तो जवाब नहीं, पर पास रहोगे तो सुगंध आएगी — बशर्ते आपकी नाक ठीक हो, यानी एहसास करने की क्षमता हो। जिसे आत्मज्ञान हुआ है, उसके आसपास पहुंचोगे तो खुद अपने आप में हो जाओगे; मन रोकना नहीं पड़ेगा, रुक जाएगा। मेरा एक ही कहना है — बस खोजी बन जाओ; कोई बताए या न बताए, प्रकृति स्वयं गुरु है।

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वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25