प्रश्नोत्तर P18-0019 · भाग 18
गुरु जी, माया का प्रसार समुद्र जैसा है, समाज रुकने नहीं देता, साधना पर चलते ही विघ्न आते हैं और मन बहाने बना देता है। वह कृपा कैसे प्राप्त हो कि व्यक्ति एकनिष्ठ होकर साधन पथ पर चल पाए और पार हो जाए?
बाहर के संसाधन बेकार नहीं, उपयोग करने लायक हैं — हम-आप बात कर पा रहे हैं तो इन्हीं संसाधनों की वजह से। देखना यह है कि आप उसके लिए चले हो या उसकी कृपा के लिए। अगर उसके लिए चले हो तो दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती। कृपा के लिए चले हो तो कृपा मिल जाएगी — कोई शरीरधारी आप पर कृपा कर देगा, वैभव से जो चाहिए। तो देखो — कृपा के लिए चले हो या कृपा वाले के लिए, लीला के लिए या लीलाधारी के लिए। पहले कृपा आएगी, बाद में कृपा वाला; अगर आपने कृपा पकड़ ली तो कृपा वाले तक नहीं पहुंच पाओगे, और कृपा को त्याग दिया तो कृपा वाले तक पहुंचने से कोई रोक नहीं सकता।
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