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प्रश्नोत्तर P18-0026 · भाग 18

गुरु जी, अगर तेजी से यात्रा करनी हो, जल्दी पहुंचना हो, तो क्या करें?

तेजी से यात्रा करनी है तो सत्कर्म — सेवा से भी श्रेष्ठ। सेवा से वैभव बढ़ेगा, किसी को सताने से दरिद्रता बढ़ेगी, पर सत्कर्म फल की तरह है और सेवा बीज की तरह — फल को खा भी सकते हो, लगा भी सकते हो, और वह कई वर्षों तक फल देता है। सत्कर्म से निर्विकार होने में सहायता मिलती है। इसमें धोखा नहीं है; कमियां हमारी तरफ से हैं, उसकी तरफ से नहीं — वह तो तैयार है। बड़ा चुंबक और छोटा चुंबक: छोटे ने अपने आप को बांध रखा है, बस वह छुड़ा ले तो बड़ा तुरंत खींच लेगा। आपको कर्ता का अधिकार मिला है, आपने अनेक जंजीरों में खुद को बांधा है — गांठ आपने बांधी, खोलनी भी आपको पड़ेगी। लगे रहो, और किसी को दोष मत देना — कोई मार्ग बता रहा है तो ठीक, नहीं बता रहा तो भी ठीक; यह स्वयं की यात्रा है, प्रकृति स्वयं गुरु है।

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वीडियो: योगीजी की आत्मकथा अज्ञान से ज्ञान तक खोज में कुछ अनुभव की बातें ! #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2024-08-25