प्रश्नोत्तर P18-0066 · भाग 18
गुरु जी, क्या कपड़े सभ्यता के प्रतीक नहीं हैं? फटे-पुराने कपड़े देखकर नए लोग असहज होते हैं और गलत समझते हैं।
कपड़े तन ढकने के लिए हैं, बस — और किस लिए? फिर अपनी-अपनी संस्कृति और इलाके के हिसाब से पहनावा है। आपके बच्चे महंगे से महंगे कपड़े फाड़कर पहनते हैं — वह सभ्यता है या असभ्यता? उन्हें क्यों नहीं मना करते? जब अपने बच्चों और घर पर दाल नहीं गलती, तो दूसरों को सभ्यता सिखाने मत चलो; सभ्यता पहले अपने घर में लाइए। मैं कब कहता हूं कि मैं समझदार हूं, सभ्य हूं या मजबूत हूं — ज्ञानी पागल ही होता है; क्या इस दुनिया में पागल नहीं घूम सकता? मैं अपनी जिंदगी स्वतंत्रता से जी सकता हूं। अगर कोई अभद्रता लगे, कोई अंग खुला हो, तब सामाजिक व्यक्ति होने के नाते बोलिए — समाज ने तो नागा साधुओं को भी स्वीकार किया है। पहली नजर में कोई असहज हो, तो हो — अगर मैं कहूं कि आपके नए कपड़े देखकर मुझे तकलीफ है, उतारो, तो क्या उतार दोगे? सबकी अपनी जिंदगी है, जीने दो। हां, अगर किसी के करने से समाज को तकलीफ हो रही है, गलत फैल रहा है, तब बोलिए। मैंने आज तक किसी को फटे कपड़े पहनने को नहीं कहा। अगर मैं आपसे कुछ मांगूं, तब आप शर्त रख सकते हो कि ऐसे रहना पड़ेगा।
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वीडियो: आत्मज्ञान किस स्थिति में होता है ? #aadhyatmik_satsang #livesatsang #yogijikasatsang #pratyakshgyan · 2025-01-03