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प्रश्नोत्तर P18-0182 · भाग 18

गुरु जी, सत्संगों में सत्कर्म के पीछे मुक्ति या मोक्ष जोड़ दिया जाता है — तो मुक्ति के लिए देना भी तो एक भावना/कामना हुई?

भावना तो जुड़ेगी, लेकिन यह भावना आपको स्व तक लेकर जाएगी, क्योंकि आप निर्विकार होना चाहते हो। कपड़ा गंदा हो गया, साबुन से धोना चाहते हो — यह कोई कामना नहीं, गंदगी धो रहे हो। चोट लगाना कामना है, पर चोट लग गई तो मलहम-पट्टी करके ठीक करना कामना नहीं। आपने जो मेहनत से कमाया — वह भी एक तप है — उसे सही जगह सदुपयोग में लगा रहे हो तो लोगों के रोम-रोम से आशीर्वाद मिलेगा और निर्विकार होने में सहायता मिलेगी। जैसे जेल में जिसका आचरण अच्छा रहा, सेवा में लगा, किसी को गलत शब्द नहीं बोला, उसकी कुछ सजा जेलर कम करवा सकता है — पूरी नहीं; वैसे ही सत्कर्म से भोग कुछ हल्का होता है। जब तक मूल तक, उस परम सत्ता तक नहीं पहुंचोगे, यात्रा रुकेगी नहीं — जैसे ऊपर फेंकी चीज रुकने की जगह मिलने तक गिरती रहती है।

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वीडियो: स्वाभाविक आत्मा का गुण क्या है / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-29