प्रश्नोत्तर P18-0186 · भाग 18
गुरु जी, कहते हैं जगत मिथ्या है, दुनिया क्षणभंगुर और चलायमान है — तो सत्य और स्थिर क्या है?
दुनिया मिथ्या नहीं, यह रूप मिथ्या है — यही लोग समझ नहीं पाते। यह जगत भी उससे है, आत्मा भी उससे है। यह रूप पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा, पर तत्व तो रहेगा — पांच तत्व में विलीन हो जाएगा, रूप का नाश होगा। हम तत्व में नहीं, रूप में फंसे हैं; रूप परिवर्तनशील है। कामनाओं वाला आपके शरीर को देखता है, आत्मज्ञानी शरीर को नहीं, आपको देखता है। पर उसे तभी देख पाओगे जब आत्म दर्शन होगा; उसके पहले देखना सिर्फ नाटक होगा। बाजार में नकली बड़ा बिकता है, सच सामने आता ही नहीं — इसलिए "रूप मिथ्या" नहीं, "जगत मिथ्या" बोला जाता है।
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वीडियो: स्वाभाविक आत्मा का गुण क्या है / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-09-29