प्रश्नोत्तर P20-0174 · भाग 20
गुरु जी, आपका "ध्यान तो हर समय घट रहा है" वाला प्रवचन सुनकर आया हूं, बातें समझ में आ रही हैं — अब आगे क्या करना है?
समझ में आ रहा है तो बदलाव करिए, अब उसमें जियो — उसमें जीना जरूरी है। जिन शब्दों को हम समझ रहे हैं, जब उन्हें आचरण में उतारेंगे, उनमें जिएंगे, तब उन शब्दों की ऊर्जा का उपयोग होगा और उस ऊर्जा के द्वारा आत्मानुभूति कर पाएंगे। ध्यान तो हर वक्त घटित हो रहा है, बस हम राग-द्वेष में फंसे हैं, कुछ अपने तरीके से चाहते हैं इसीलिए उलझे हैं। करना नहीं है, करने से मुक्त होना है। जो क्षणिक ध्यान घटित हो रहा है, उससे भी अपने को छुड़ाना है, क्योंकि वह "अपने तरीके से चाहिए" में घटित हो रहा है — हमारे तरीके से हुआ तो राग, नहीं हुआ तो द्वेष। तो अपने तरीके से करवाने की इच्छा का त्याग करना पड़ेगा। गलती यह कर रहे हैं कि एक ध्यान से तो वैसे परेशान हूं, ऊपर से एक ध्यान और लगा रहा हूं — हमारी परेशानी का कारण वह ध्यान ही तो है।
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वीडियो: इच्छा अपेक्षा क्या है?इससे कैसे मुक्त होते है?(Freedom from Desire & Expectation) Explained in Hindi · 2026-03-07