मुझे कुछ नहीं मालूम, और न मैं मालूम करना चाहता हूं। जैसा जो करेगा, वैसा परिणाम उसे मिलेगा; सिस्टम है, काम कर रहा है। मैं अपने आप में सत्संग करना, अपने आप में रहना चाहता हूं, यह पता करना नहीं कि कौन कहां गया क्या कर रहा है। आप अपनी दुनिया में मस्त, हम अपनी दुनिया में मस्त।
ऐसा नहीं है, छू सकते हैं — अभी वृंदावन का एक लड़का आया, पांव भी छुए, गले भी लगा। पर जैसे शिक्षक को सब बच्चे गले लगाना चाहें तो कितनों को लगाएगा? 100-200 लोग पैर छूना शुरू करें तो एक घंटा उसी में जाएगा और सत्संग का लाभ भी नहीं होगा। सब एक साथ दूर से प्रणाम कर दें तो हो गया। लाभ पैर छूने से नहीं, संग से होगा।
क्योंकि यहां आपका आगे का कर्म बंधन नहीं बंध रहा और पिछला बहुत तेजी से छूट रहा है — आप समझ से छुड़ा भी तो रहे हो। इसलिए यहां बहुत तेजी से यात्रा हो रही है।
अच्छा तो है आपके लिए — आप यही तो चाहते हैं ना कि लोग आपको छोड़ दें। आप छोड़ोगे तो एक तकलीफ होगी; वे छोड़ देंगे तो बढ़िया रहेगा। इतना तो समझ में आ गया ना कि लोग आपको नहीं, आपसे जो उन्हें मिलता है उसको मानते हैं — यह समझना ही बहुत बड़ी बात है।
बस ईमानदारी से जीवन जियो, सत्कर्म करो और आगे बढ़ते रहो; समझ में आता रहेगा। दुनिया में यहां कोई किसी को नहीं मानता — आप जरूरत पूरी करो तो आप उनके लिए ठीक हो, नहीं तो नहीं।
कुछ भी हो जाए, ईमानदारी न छोड़ना, यह ध्यान रखना। मान लीजिए एक व्यक्ति ने पूरी जिंदगी नौकरी की और आखिरी दिन बेईमानी कर दी, तो सब गया — उसके पास कुछ भी नहीं बचा।
शरीर तो अलग है ना, आप तो सिर्फ निमित्त हो; यह अपने आप जरूरत में चलता है। अब उस जरूरत को आप ईमानदारी से पूरा करते हो या बेईमानी से — यह आपके ऊपर है। ईमानदारी से किया तो स्तर ऊपर गया, बेईमानी से किया तो नीचे; ईमानदारी से मुक्ति। जरूरत तो किसी न किसी तरीके से पूरी करोगे ही — एक में गिरना है, एक में उठना।
परमात्मा के बारे में कोई बोल ही नहीं पाया। शास्त्रों में आप उस मूल तक, अपने आप तक कैसे पहुंचो, उसके बारे में लिखा है — आप बिगड़े हो, आपको सुधारने के लिए लिखा गया है, बस। एक व्यक्ति बिगड़ा, उसे समझ आया, उसने अपने आप को सुधारा और लिख दिया कि बिगड़ने वाले इस तरीके से सुधर सकते हैं।
उस वाद-विवाद में आपका अपमान हुआ है, तो ध्यान वहीं जाएगा, और कहां जाएगा। मन बदला लेना चाहता है। अपने आप को समझाना है — तकलीफ किसको हुई, आपको कि मन को? उसे दबा दो, मन समझ जाएगा।
कोई बात नहीं, आप अपना काम करो। हमें तो लोग गालियां देते हैं, बढ़िया से सुनते हैं; अंदर से जरा सा भी भाव नहीं उठता, हंसी आती है। उनकी क्या गलती — उनके पास उतनी ही समझ है, वे अपनी जगह सही हैं। वे आपको जानते भी नहीं; वे आपको नहीं, आपके कर्म को गाली दे रहे हैं।
अगर वह (महापुरुष) स्थिति में है, तो जिस सत्ता से जुड़ा है, उसी के पास जाएगी, और कहां जाएगी। और अगर वह भी इच्छा-अपेक्षा में है, तो गाली वहीं तक रह जाएगी। महापुरुष के अंदर से प्रतिक्रिया नहीं उठती, उसे पता है कि वह उसे नहीं, उसके काम को दे रहा है; बाकी सत्ता अपना काम कर रही है।
उपहार तो वापस चला गया, पर शब्द तो निकल गए; बंदूक से गोली निकल गई तो निकल गई, वापस नहीं होती। जो शब्द मुख से प्रकट हुए, उनका परिणाम बोलने वाले को मिलेगा। श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की सौ गालियां सुनीं — गुस्सा होते तो पहली बार में मार सकते थे, उनकी ताकत थी।
वह मुझे गाली नहीं दे रहा, मेरे कर्म को दे रहा है; मुझे जानता भी नहीं। कर्म हटा दो तो कोई किसी को नहीं जानता — हम एक-दूसरे को कर्म से ही जानते हैं। अब मुझे देखना है कि मेरा कर्म उचित है या अनुचित: उचित है तो आगे बढ़ जाओ, अनुचित है तो त्याग कर दो। अपने आप को जांच लो।
हमें सब गुरुओं ने छोड़ दिया — कई गुरु हुए, सबने कहा "जाओ, हम नहीं दे सकते जो तुम्हें चाहिए, खोजो।" आखिरी गुरु प्रकृति है। गुरुओं की कमी है क्या? आप सीखने के लिए तैयार हो तो पूरा समाज गुरु है, और बताने के लिए तैयार हो तो पूरा समाज शिष्य।
रास्ता पूछने वाला किसी को पकड़कर पूछता है, पर बताने वाला पकड़ता नहीं। अगर आप किसी को बताने के लिए पकड़ रहे हो — "मैं तुझे रास्ता बताता हूं", खुद कहीं पहुंचे नहीं — यही तो गड़बड़ है। पूछे तब बताओ, जबरदस्ती नहीं।
ज्यादा संख्या उनकी है जिन्हें खुद नहीं पता कि जाना कहां है, सच में क्या चाहिए। फिर वे जो सीखने जाते हैं और सिखाने की बात करने लगते हैं। कुछ खंडन के लिए प्रश्न करते हैं, कुछ उत्तर मालूम होते हुए जांचने के लिए। सच में उत्तर के लिए प्रश्न करने वाले बहुत कम हैं — इन्हें खोजी कहा जाता है; ये वही प्रश्न पूछते हैं जिससे इनका कल्याण हो। बाकी बेमतलब घूम रहे हैं। आप भी किसी लाइन में खड़े हो — हर व्यक्ति को अपनी स्थिति पता है।
सबको पता है मैं क्या खोज रहा हूं — किसी को गड़ा धन चाहिए, किसी को मुक्ति से मोक्ष तक जाना है। जो गड़ा धन मांगते हैं, उनसे मैं कहता हूं: तुम्हारे शरीर में ही तो करोड़ों का माल है; खोदना ही है तो अपने अंदर के धन को खोद लो।
हमने समझा कि मिर्ची तीखी है, पर समझने से तीखापन नहीं आएगा — उसे तोड़कर खाना पड़ेगा। रूप को देखना पड़ता है, स्वाद को मुंह में उतारना पड़ता है; उल्टा कर दिया — मिर्ची आंख में लगा दी और रूप को खा गए — तो क्या होगा? किस इंद्रिय का कहां उपयोग करना है, यह समझ जरूरी है। जानकारी अप्रत्यक्ष थी, काम किया तो प्रत्यक्ष हो गया। खोजते-खोजते जब खोजी बचता है और खोजने को कुछ नहीं बचता, वही सत्य है।
अभी तो छुड़ाने की यात्रा चल रही है, स्व तक पहुंचने की भी नहीं। अभी आप बाहर से अपने आप को छुड़ा रहे हो; इस पिंड में भी नहीं आए हो, अनेक वस्तुओं, अनेक पिंडों में अनेक तरीके से फंसे हुए हो — आपको खुद नहीं पता कितना। जब "कुछ नहीं चाहिए" में आओगे, तब स्व की यात्रा होगी।
यह भी बंधन है — एक में द्वेष, एक में राग। किसी ने आपको थप्पड़ मारा तो बड़ी पीड़ा है, पर आपने जिसको मारा उसके लिए पीड़ा नहीं होती। जिसने मारा उसे आप श्राप दे रहे हो, और जिसे आपने मारा वह आपको — यही सर्कल चल रहा है। बंधन तब टूटना चालू होगा जब जिसको आपने थप्पड़ मारा उसके लिए पश्चाताप उठेगा — "जब मुझे इतने सालों का अपमान नहीं निकलता, तो वह कैसे रह रहा होगा।" तब आप में मानवता जगेगी।
ऐसा नहीं है कि आपने किसी को न पीटा हो, और न ऐसा कि आप न पीटे गए हो — चाहे कितना भी बलवान आदमी या राजा हो, उसे पीटने वाला भी कोई होगा। रावण युद्ध हार गया, पर उसका बाण लक्ष्मण को लगा। यह पीटना-पिटना ही जिंदगी है, यही सिखाता है; कोई नहीं बचा।
उस पर कुछ नहीं बोल सकते। सीधी सी बात — आप बस अपने आप को सुधार सकते हो; बाकी इन सब में पड़ना अपना जीवन बर्बाद करना है। मैं भी बहुत कुछ बोल सकता हूं पर उसका मतलब नहीं होगा। आप जीवित हो, बिगड़े हुए हो, अपने आप को सुधार लो, इसी में कल्याण है।
नहीं। आप जो भी करते हैं उसका परिणाम देखिए — संयोग है तो वियोग है। सामान लिया तभी पता था टूटेगा; घर बनाया तभी पता था गिरेगा; कपड़ा खरीदा, एक दिन फटेगा; विवाह किया, तभी पता था दो में से एक कभी न कभी जाएगा। सब पता है, फिर दुखी क्यों? गाड़ी ली तो कभी भी लड़ सकती है — दुख नहीं चाहिए था तो गाड़ी ही न लेते। जो भी करते हैं उसका एक परिणाम दुख है; उसे पहले से स्वीकार भाव में रख दीजिए। मन जानत है, मन मानत नहीं।
इतना समय कहां? जो व्यक्तिगत काम करता है, वह हर गाली का जवाब दे सकता है, उसके पास समय ही समय है। जो लाखों-करोड़ों के लिए, समाज और विश्व के हित के लिए काम कर रहा है, उसके पास समय नहीं — जितने में जवाब देगा, उतने में काम करेगा। उसे समझाने में समय बर्बाद करने से अच्छा है कि हम अपना काम करें।
शराब से आया पैसा तो आपको ही पता है — कई घर उजाड़ के आ रहा है, ईमानदारी का कहां हुआ; पता नहीं उसमें कितनों का श्राप लगा है — पीने वालों का ही नहीं, उनके घर में रहने वाले परिवार का। आज ज्यादातर लोग शराब से ही बर्बाद होते हैं। यह तो ऐसा सवाल है कि पानी में उतरेंगे तो गीले हो जाएंगे क्या।
पढ़ भी सकते हैं, सुन भी सकते हैं — चाहे आप पढ़ो, चाहे कोई पढ़कर सुनाए, समझ में आना चाहिए, बात खत्म। दो लोग साथ यात्रा कर रहे हों और एक ने पता पढ़ लिया, तो दूसरे ने भी पढ़ लिया। और मेरी समझ से चार वेद, 18 पुराण, छह शास्त्र, अनेक महापुरुषों की वाणियां — सबका निचोड़ ईमानदारी और सत्कर्म है; मूल यही है, यह आपको करना पड़ेगा।
बताने का तरीका तो अलग होगा ही। हर मां बच्चों को जन्म देती है, पर पालने का तरीका हर मां का अलग होता है — एक ही घर में भी; पीछे भाव एक ही रहता है कि बेटा होनहार, अच्छा, हृष्ट-पुष्ट हो।
नाम आधारा मतलब नाम ले लिया तो वाल्मीकि की तरह बैठ जाओ, जब तक उपलब्धि न हो जाए उठो ही मत — उस स्थिति में नाम जपना है। एक-दो माला जप लो और दिन भर जेब काटो — ऐसी माला का कोई मतलब है?
क्योंकि जो बीज पहले डाल दिया गया है, वह अंकुरित होकर पौधा बन चुका है, नष्ट नहीं होता। जो पुराना डला हुआ है वह जल्दी निकलता नहीं और नया समझ में नहीं आने देता; निरंतर सत्संग सुनने के बाद ही धीरे-धीरे क्लियर होता है।
बस अपने तरीके से मिला तो अपना, नहीं मिला तो पराया — एक ही झटके में होता है। आपने मेरे तरीके से कर दिया तो अपने हो गए, नहीं किया तो पराए। न तुम अपने हो, न पराए।
सीधी सी बात — पैसा चाहिए तो काम करो, शांति चाहिए तो माला जपो; देख लो आपको क्या चाहिए। दोनों चाहिए तो बीच का रास्ता है: ईमानदारी से काम करते हुए सत्कर्म करो। ईमानदारी, सत्कर्म और मेहनत — सब मिल जाएगा, शांति भी। न पूर्व जाओ, न पश्चिम, एकदम सीधा। धर्म भी तभी समझ में आएगा जब पेट में रोटी होगी।
संस्थान पर तो नहीं होगा, लेकिन (सही) संस्थान वाला जल्दी लेगा ही नहीं। मेरे यहां कोई देता है तो मैं सीधा बोल देता हूं — बेईमानी का पैसा हो तो नहीं चाहिए, ईमानदारी का हो तो देना, नहीं तो न देना; लाइव में भी बोल देते हैं।
अप्लाई करेंगे तभी अनुभव से आत्म-अनुभूति होगी; जब तक उसमें जिएंगे नहीं, सुनने का कोई मतलब नहीं। मैं उसमें जिया हूं इसलिए बोलता हूं — आप करो, आपके साथ भी होगा। चींटी काटी तो मुझे दर्द हुआ, तो पक्का बोल सकता हूं आपको भी होगा; कोई जल्दी, कोई देर में चिल्लाता है। जीवन में उतारो, जियो — उचित तरीके से जीना ही साधना है।
जब तक आपको कुछ चाहिए, तब तक शब्द काम करते हैं। कुछ नहीं चाहिए तो शब्द भी खत्म — "कुछ नहीं चाहिए" एक स्थिति है, उस पर कुछ काम नहीं करता। शब्द और भाषा तो बाद में बने हैं, "चाहिए" में बने, टकराव से निकले। सारा खेल समझ का है — भाषा न समझो तो गाली भी हंसी लगेगी।
जिस दिन भूल जाओ, उस दिन एक टाइम का भोजन न करो — एक दिन का दंड, तब नहीं भूलोगे। यह संकल्प ले लो: जब भी गलती करूंगा या भूल जाऊंगा, एक टाइम भोजन नहीं करूंगा।
देखना यह है कि जब कोई हमें कुछ कह रहा है, या हम उसे कह रहे हैं, तो उसमें कोई लॉजिक है, कोई लाभ या हानि है। न लाभ है न हानि, तो उस व्यक्ति से पूछना चाहिए — "आप कह रहे हो ऐसा न करो, मुझे तो इसमें हानि नहीं दिखती; मुझे समझाइए कि गलत कैसे है, मेरी समझ में नहीं आ रहा।" मूल बात समझ में आनी चाहिए, और जिस तरीके से समझ में आया उसी तरीके से सामने वाले से बोलना चाहिए। वह भले चिल्लाए — "मेरी समझ ही इतनी है, मैं क्या कर सकता हूं।"
सोने के बाद शरीर के नौ दरवाजों में हाथ जाता है। हम सामाजिक प्राणी हैं, वस्तुओं का आदान-प्रदान करते हैं, तो हाथ और शरीर स्वच्छ रहना चाहिए — इसलिए उठकर सर्वप्रथम स्नान करना चाहिए। अगर आप अकेले रह रहे हो तो चाहे नहाओ चाहे न नहाओ, कोई फर्क नहीं। बात जल्दी उठने की नहीं — जब उठो, तब।
नासमझ हर जगह होते हैं — उनमें हम भी हो सकते हैं, सामने वाला भी। एक-एक व्यक्ति से मिलकर समाज बना है; जब समाज की बात होती है तो हम अपने आप उसमें आ जाते हैं, छूटते नहीं। एक सदस्य हटा दो तो घर पूरा नहीं, एक अंग हटा दो तो शरीर पूर्ण नहीं।
चुप होकर सुनो — "सुनो, गुनो, फिर धुनो।" कोई कुछ कह रहा है तो सुनो, फिर समझो, और जब समझ में आ जाए तब प्रतिक्रिया दो। समझ में नहीं आया तो कहो "अभी नहीं आया, मैं सुनने में हूं।" बिना समझे जवाब दोगे तो वह जवाब झूठा होगा, उसका कोई मतलब नहीं — जैसे स्कूल में बच्चा डर के मारे कह देता है कि समझ आ गया।
सबकी बुद्धि का स्तर, आत्मविश्वास, बोलने की क्षमता, हिम्मत अलग-अलग होती है। एक बालक एक बार में समझ गया, दूसरा नहीं — सीधा उसे दोष मत दो, उसकी क्षमता ही ऐसी है, वह कई बार में समझेगा; इसके लिए दोनों को प्रयास करना पड़ेगा। कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें कितना भी समझाओ समझ नहीं आता, इसमें उनका दोष नहीं। पहले ऐसे बच्चों को बहुत मारा जाता था, आत्महत्याएं भी बढ़ीं। हमें देखना चाहिए कि उसका बुद्धि स्तर क्या है।
पहले यह बात मुझे भी समझ नहीं आती थी, बाद में समझ आई कि अगर आप किसी को समझाने का प्रयास कर रहे हो और वह नहीं समझ रहा, तो वह गलत नहीं, आप गलत हो — उसकी बुद्धि क्षमता ऐसी नहीं है। कोई एक बार में याद कर लेता है, कोई सुबह से शाम पढ़कर भी याद नहीं कर पाता — इसमें उसका कोई दोष नहीं।
शब्दों के साथ उसका भाव और भोलापन भी पकड़ना चाहिए — किस भाव से कह रहा है। एक साधक ने कहा "मजे लेने आया हूं" — उसका मतलब था कि 51 साल मनमर्जी से जिया, अब यहां पाबंदी और नियम के मजे ले रहा हूं। वही शब्द कोई और कहे तो प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाएगा, क्योंकि उसके पीछे दूसरा अर्थ होगा। इसलिए हर व्यक्ति के शब्दों को न पकड़कर उसके स्तर को पकड़ो — वह किस जगह खड़ा होकर क्या कहना चाहता है।
शिक्षा भी जरूरी है — डिग्री ऐसे नहीं मिलती, मेहनत करनी पड़ती है, उसमें समझ बढ़ती है। पर शिक्षा के साथ यह (जीवन की समझ) भी होना चाहिए, स्कूल-कॉलेज में यह बहुत जरूरी है।
अपनी बात सीधी रख दो — "दूसरों को बेचने से अच्छा आप ही ले लो, मुझे बस मूल्य चाहिए; अमाउंट बताओ और कब तक दोगे यह बताओ, उस समय को पार मत करना।" सीधी सी बात। हिसाब पूरी तरह करिए, हिसाब में समझौता न करना — समझौता करने वाला व्यक्ति गिर जाता है; आधा है तो आधा। बात रख दी तो बिना मतलब बार-बार जाकर वही बात दोहराने की जरूरत नहीं; यहां न अध्यात्म है न भौतिक, अभी तो लेन-देन की बात है।
हमारे साथ कोई रह रहा है तो हमारा कर्तव्य है कि ऐसे शब्दों का प्रयोग करें जिससे वह समझ जाए। व्यक्ति की दो स्थिति होती है: एक, समझते हुए भी समझना नहीं चाहता, उसे गलत ही करना है — ऐसे व्यक्ति का त्याग ही परम सुख है। दूसरी, समझना चाहता है पर समझ नहीं पा रहा — उसे हर तरीके से समझाना परम दायित्व है, दंड-भेद-नीति कुछ भी अपनाना पड़े। पर पहले देखो कि उसमें उसका हित है, मैं अपना स्वार्थ या अहंकार तो पूरा नहीं कर रहा। पूरा देने के बाद भी न समझे, तो त्याग कर दो — जैसे श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को बहुत समझाया, नहीं समझा तो छोड़ दिया।
ऐसे व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि वह खुद तो गिरेगा, आपको भी गिराएगा; आपकी पूरी ऊर्जा उधर ही जा रही है। आपके रहने से ही उसे सहयोग मिल रहा है, इसीलिए वह ऐसे कर रहा है। जैसे दो लोग झगड़ा करते हैं — जितना छुड़ाओ उतना लड़ते हैं; छोड़ दो, "लड़ लो", तो कोई नहीं लड़ेगा। समय और परिस्थिति सबको समझा देती है।
मैंने आजमाया है — गुरु स्थान पर जन्माष्टमी पर झूले की लाइन में धक्का-मुक्की हो रही थी; मैंने लाइन रोक दी और एक व्यक्ति से कहा "झुलाते रहो, कोई नहीं आएगा।" अब कोई धक्का नहीं मार रहा था, और वह खुद ही छोड़कर चला गया। जो गर्भगृह में घुसने के लिए डंडे खाते हैं, उनसे कहो "यहीं साल भर सेवा करो", तो उसी घंटे भाग लेंगे।
आपकी सामर्थ्य है तो अपनी योग्यता अनुसार जाओ, बहुत अच्छा होगा। सामर्थ्य नहीं है और मैं आपको उस कुर्सी पर बैठवा भी दूं, तो उतार दिए जाओगे। सोर्स का जीवन में कोई मतलब नहीं। जो पद के लायक नहीं था और परिचय के सहारे बैठा दिया गया, वह या तो हटा दिया जाएगा या जिंदगी भर पद का दुरुपयोग करेगा, क्योंकि उसकी क्षमता नहीं थी।
यह भगाने का तरीका नहीं, परखने का है — वह मुझसे मिलने आया है या किसी आकर्षण को लेकर। मुझसे मिलने आया होगा तो कभी नहीं भागेगा, चाहे एक मिनट मिलना हो या जिंदगी भर सामने बैठा रहे। आकर्षण के वश में आया है, तो भागना पक्का है; साल भर रुकने से अच्छा है दो-चार दिन में भाग जाए।
किसी को आकर्षित मत करो, तो पता चल जाएगा। जो कुछ लेने आया है, वह मिल जाए तब भी जाएगा, न मिले तब भी — जाना उसका पक्का है। जो आपके लिए आता है और उसे आपसे कुछ नहीं चाहिए, वह कभी नहीं जाएगा; ऐसा व्यक्ति साधारण हो ही नहीं सकता, वह परमात्मा के बहुत करीब है।
एक मार्ग के मार्गी साथ रहें तो ऊर्जा, ताकत, बल मिलता है और यात्रा बहुत सरल हो जाती है — जैसे रात के अंधेरे में अकेले जंगल पार करने में डर लगता है, पर कई लोग हों तो डरने वाले को बीच में कर लेते हैं और जंगल का आनंद भी ले लेते हो। कहानी है कि युधिष्ठिर ने कहा, कुत्ता नहीं आएगा तो मैं भी नहीं आऊंगा — साथ का इतना असर होता है। पर जो आपके मार्ग का मार्गी नहीं है, उसका साथ मत पकड़ो, वह भटका देगा।
मात्रा की बात है — आग कम पानी ज्यादा तो आग बुझेगी, आग ज्यादा पानी कम तो पानी। जिसकी ऊर्जा बहुत ऊंची है और वह अलग मार्ग का है, तो वह आपको लपेट लेगा; आपकी ज्यादा है तो आप उसे खींच लोगे। पैदल वाले ने बाइक वाले से लिफ्ट मांगी और कहा "बाइक छोड़ो, मेरे साथ चलो" — तो बाइक वाला गिर जाएगा। देख लो आपका स्तर क्या है; उसका ऊंचा है और आपके मार्ग का है, तो उसके साथ जाओ।
समझ के जियो, समझ के जीना ही साधना है। यह आवेश और जज्बात का मार्ग नहीं, समझ का मार्ग है; करने का नहीं, ना करने का मार्ग है — अपने आप होने दो। यह शारीरिक नहीं, मानसिक मार्ग है; जब तक समझोगे नहीं, आगे बढ़ ही नहीं सकते। शरीर से कुछ भी करो, कोई मतलब नहीं।
कर्म के हिसाब से। जैसे सबके घर और कपड़े अलग-अलग हैं — जिसने जैसा मूल्य दिया, वैसा मिला। जैसा आपने कर्म किया, वैसी धन की, तन की और समझ की ताकत मिली, वैसा रूप-रंग मिला। एक पैदा होते ही सम्राट, एक दरिद्र — दोनों अबोध हैं, पर जैसा कर्म किया था, वैसी जगह पैदा हुए, वैसा शरीर मिला।
कष्ट दुनिया को लगता है, भक्त को कष्ट नहीं होता; कष्ट होता तो करता क्यों? शबरी ने राम को बेर खिलाए — दुनिया को पता था बेर जूठे थे, पर न राम को इसका पता था न शबरी को; उसका भाव था कि प्रभु के मुंह में कोई खट्टा बेर न चला जाए। रामकृष्ण परमहंस भी पहले चखकर मां को भोग लगाते थे, कि नमक-मिर्च कम-ज्यादा हो तो मां को तकलीफ न हो — यह भक्ति की पराकाष्ठा है।
पीड़ा समाज को दिखती है, भक्त को पीड़ा नहीं होती, वह आनंद होता है। जो पहले जरा सी ठोकर पर डॉक्टर के पास जाता था, वही अब पीड़ा में हंस रहा है और कहता है "मुझे इसमें जीने दो" — क्योंकि यह पीड़ा उसकी खोज में आई है, इस पीड़ा में वह उसे महसूस कर पा रहा है। जैसे बच्चा जिद पड़ोसी के सामने नहीं, उसके सामने करता है जिससे प्रेम है — "या तो तुम आ जाओ, या इस पीड़ा में ही जिएंगे।" मैं भी कभी उस पीड़ा में जीता था; वह पीड़ा नहीं, उसकी झलक थी।
नहीं, पाने से मुक्त होना है। वह आपको पा सकता है, आप उसे कभी नहीं पा सकते — आपके पास उसका पता नहीं, उसके पास आपका पता होगा, तभी तो वह परमात्मा है। कुछ ऐसा करो कि वह आपको पा ले। जैसे प्रधानमंत्री या राजा से आप जबरदस्ती मिलने जाओगे तो पकड़े जाओगे; पर किसी क्षेत्र में बहुत बढ़िया काम कर दो, तो वह खुद पुरस्कार देने के लिए बुलाएगा।
भाव में ईश्वर का वास है; प्रह्लाद ने अपना भाव खंभे में फेंका, तो साकार रूप लेना पड़ा। साकार न सच है न झूठ, पर एक आधार है — आज हम इसी रूप को निमित्त बनाकर बात कर रहे हैं; यह पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा, पर अभी है। इसका उपयोग करो और यहां से निकलो।
यह जगत परिवर्तनशील है; देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में सच कभी झूठ हो जाता है और झूठ कभी सच। आज किसी पद पर जो है, कल वहां कोई और होगा; बीज कभी पौधा, कभी वृक्ष। जिसकी व्याख्या आप कर रहे हो, वह व्याख्या करते-करते बदल गया। सच-झूठ को सिद्ध करने वाला इसी जगत में घूमता रहता है, सिद्ध करने में फंस जाते हैं। सिद्ध कर ही नहीं सकते — लगता है कर दिया, तो सामने वाला कमजोर था, मान गया। समझो, उपयोग करो और समझ के निकल लो।
वर्तमान में जिया नहीं जा सकता, रहा जा सकता है। जीना मतलब आप किसी वस्तु, किसी रूप के साथ हो, और वह प्रतिपल बदल रहा है, साथ में आपकी समझ भी बदल रही है — तो वर्तमान कहां आया? जीवन चलती गाड़ी है, रुकती नहीं। अगर आप लिप्त नहीं हो, बाहर रहकर देख रहे हो, तो आप वर्तमान में हो। यह बहुत सूक्ष्म और चुनौती भरी यात्रा है; इसमें बहुत धैर्य, समझ और सजगता चाहिए।
डर लगता है तो सब मत छोड़ो; सबके साथ जीते हुए आध्यात्मिक जियो, ईमानदारी और सत्कर्म के साथ आराम से यात्रा करो। जैसे बालक मां का पल्लू नहीं छोड़ पाता — शरीर से बड़ा हो गया पर बुद्धि से नहीं, तो उसका पल्लू मत छुड़ाओ; जब समझ अच्छी हो जाएगी, खुद छोड़ देगा। जब लगे कि अब छोड़ सकता हूं, डर नहीं है, तभी आगे की यात्रा होगी; भय में यात्रा क्या करोगे।
देखते रहो — इतनी दूर से किसके लिए आए? वह सामने बैठा है, तुम्हें देख रहा है, और तुम नजर नीचे किए हो। जिसे देखने आए हो, उसे जी भर के देख तो लो; नजर नहीं हटनी चाहिए। सचेत रहो, सत्संग में रहो।
या तो दूसरे के अवगुण हटाने की क्षमता हो, या अपना काम करते हुए आगे बढ़ो। किसी का अवगुण उसका मजाक बनाने के लिए मत बताओ; उसे भी कहीं न कहीं पता है कि उसमें अवगुण है। अगर आपके पास उसे निकालने का कोई तरीका है, तब उससे बात करो।
"कुछ नहीं चाहिए" में आ जाओ। जब कुछ नहीं चाहिए, तो विचार आएंगे-जाएंगे, आपसे मतलब ही नहीं; विचार तब परेशान करते हैं जब आपको कुछ चाहिए। कुछ नहीं चाहिए में बैठ गए तो कोई व्यक्ति आपको परेशान नहीं कर सकता।
चेतन मन से भर रहे हो, वह भरना बंद कर दो और ईमानदारी से कर्म अपना लो, धीरे-धीरे खाली हो जाएगा। वह हर पल खाली हो रहा है और हर पल आप भर रहे हो — पहले भरना बंद करो, आपका काम हो गया। इसके लिए इच्छा और अपेक्षा दोनों, हर तरह की उम्मीद छोड़नी पड़ेगी।
सीधा देख लो — मुझे इसकी जरूरत है या नहीं। अपनी जरूरत को आदत न समझ लेना: भोजन को आदत समझो तो गलती है, स्वाद आदत है; सांस को आदत समझकर छोड़ने चलो तो? साधन (शरीर) की जरूरत है तो देना पड़ेगा; जरूरत नहीं है, तो वह आदत छोड़ दो।
ईमानदारी अपना लो, सत्कर्म अपना लो — घर में रहो चाहे बाहर। हां, एकांत में यात्रा बहुत तेजी से होती है; घर में लोग घुमा-फिराकर वही पांच-दस बातें करेंगे — प्रॉपर्टी कैसे बढ़े या स्वास्थ्य। समय है तो एकांत चले जाओ; नहीं है तो अपने कर्तव्य-दायित्व पूरे करते हुए यह भाव रखो कि कभी एकांत में जाएंगे, पक्का।
गलतियों को सुधारो। आप सुधरने आए हो, तो आपको नहीं, आपकी गलती को डांटा जा रहा है — गलती छोड़ दो। डांट के समय अंदर गुस्सा या आवेश उठे तो होने दो, उसे प्रतिक्रिया मत दो, उसे होते हुए देखो; बस बाहर मत निकालो। जो कार्य करने से मना किया गया था, वह किया, तो डांट तो सुननी ही पड़ेगी — अब दोबारा मत करना। यह समझ है, पर इसकी प्रैक्टिस करनी पड़ेगी।
एक बार गलती हुई तो चलो ठीक है; दूसरी बार हुई तो मतलब वह लापरवाह है — जहां जा रहा है उसकी वैल्यू नहीं पता। अगर मुझे लगे कि वहां जाना जरूरी है, उसके बिना मेरा काम नहीं चलेगा, तो मैं गलती नहीं करूंगा, पूरी तरह सचेत रहूंगा, ऐसा काम नहीं करूंगा जो गुरु को पसंद न आए। पहले गुरु शिष्य की बड़ी परीक्षा लेते थे; योग्य गुरु को भीड़ नहीं, जिज्ञासु चाहिए — उसके पास भीड़ आती है पर टिकती नहीं।
जैसे-जैसे आपका स्तर उठेगा और गुरु के प्रति नजदीकियां बढ़ेंगी, वैसे-वैसे परीक्षा भी होगी। परीक्षा तो देनी पड़ेगी — परीक्षा ही स्तर उठाती है; परीक्षा न हो तो स्तर उठेगा ही नहीं। फेल होंगे तो पता चलेगा किस वजह से हुए, उस वजह पर काम कर सकते हैं; पास होंगे तो अगला नया चैप्टर खुलेगा। परीक्षा से खुद को ज्यादा पता चलता है कि मेरा लेवल क्या है और गलतियां बार-बार क्यों हो रही हैं।
अध्यात्म में कहा जाता है मान की इच्छा छोड़ दो, तो जब भी परीक्षा ली जाएगी वहां आपके मान की ही बात होगी। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव में मत फंसना — परीक्षा में आपके अहम भाव को चेक करने के लिए विपरीत परिस्थितियां पैदा की जाएंगी, क्योंकि विपरीत परिस्थिति में ही भाव का पता चलता है। तैयारी यही है — पीछे मत जाना। बहुत मान-अपमान होगा, भावनाओं को ठेस पहुंचेगी; डटे रहना, अपने लक्ष्य को याद रखना और बस उसी को देखना।
जब मेरे पास पृथ्वी पर रहने की जगह भी नहीं थी, ओंकारेश्वर में एक महात्मा बोले एक करोड़ में तुम्हारा आश्रम बन जाएगा — मैंने कहा आत्मज्ञान के अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए। फलाहार पर रहता था, एक रात फल, पैसे, दवा कुछ नहीं था, पैरों में गड्ढे थे; बहन एक स्टेशन दूर थी, कमरे में चावल-घी भी था, पर मैंने नहीं खाया और मृत्यु को स्वीकार कर लिया — इष्ट से कहा "तुझे तुझ पर शक होगा, मुझे मुझ पर नहीं, मैं तेरे भरोसे निकला हूं।" मुझे कोई डगमगा नहीं सकता, क्योंकि फैसला मेरा है; फैसला किसी और का होता तो डगमगा जाता।
अगर ऑप्शन नहीं होता तो परीक्षा नहीं होती। परीक्षा में भागने का ऑप्शन होता है — आप पार भी कर सकते हो, गिर भी सकते हो, वहां सिर्फ तुम खड़े हो। गुवाहाटी में किराए के बाद खाने को पैसे नहीं थे, दो लड़कों ने हाथ दिखाकर पर्स भर पैसे रख दिए — मैंने नहीं लिए और सुबह मंदिर के पुजारी को दे दिए, क्योंकि उस पैसे पर हक मेरा था ही नहीं। केदारनाथ में छालों के साथ रात को जंगल पार किया, गांव में रुकने का ऑप्शन था — रुक जाता तो डर जीत जाता, मैं हार जाता। वहां खा लेता या पैसा ले लेता तो मैं गिर जाता।
गुरु नहीं लेगा, प्रकृति लेवाएगी। चैलेंज आने ही हैं, किसी भी टाइप के आ सकते हैं; जहां भी रहोगे परीक्षा उसी तरीके की मिलेगी। संसार में भी बहुत परीक्षाएं होती हैं, पर वहां हम लोभ-लालच और स्वार्थ में यह देखते नहीं। अगर कहीं भी स्तर उठाना है तो परीक्षा है; स्तर गिराना है तो कोई परीक्षा नहीं।
अगर आप पीछे नहीं जा रहे और अपनी पूरी ताकत लगा दी है, तो जहां आपकी ताकत खत्म होगी वहां से गुरु मदद शुरू करेगा — बाहरी रूप से भी और आंतरिक रूप से भी। आपके पास ताकत है और बोलो "कर दो", तो नहीं करेगा, क्योंकि तब आपका अहम बढ़ जाएगा और स्तर उठ नहीं पाएगा; ताकत खत्म होने पर मदद मिले तो अहम गिरता है और स्तर उठता है। इसलिए गुरु आपकी सारी जानकारियां खत्म कर देता है, क्योंकि आपने हर जानकारी अपनी स्थिति से समझी है — वह प्रत्यक्ष दिखाता है, प्रत्यक्ष में ले जाता है।
दुनिया में कहीं भी रहो, स्तर उठाना है तो परीक्षा देनी पड़ेगी, और हर तरह की परीक्षा आ जाएगी। हो सकता है कोई भूखा, फटे कपड़ों में आ जाए — कहा गया है भूखे को भोजन, प्यासे को पानी। हो सकता है आपके पास एक ही को खिलाने का भोजन हो और सामने एक निर्धन और एक अमीर दोनों मांग रहे हों; आप निर्धन को चुनो, पर हो सकता है उसे जरूरत ही न हो और अमीर को सच में हो — इसलिए बहुत संभल के यात्रा करनी पड़ती है, जरूरत देखकर चुनाव करना है।
नौकरी जाए तो जाए, दूसरी मिलेगी — आपको ईमानदारी से जीना है, समझौता नहीं करना है, सीधी सी बात है। समझौता करोगे तो गिर जाओगे। विपरीत परिस्थितियों में ही आपकी ईमानदारी का पता चलता है; अनुकूल परिस्थितियां रहें तो कैसे पता चलेगा? टांग खींचेंगे तभी आपकी ताकत का पता चलेगा। जैसे ही आप ईमानदार होगे, आपकी परीक्षा चालू हो जाएगी — सत्संग में जो सुना, वैसे ही जिंदगी जीओ, चाहे कुछ भी हो जाए।
पूरी दुनिया में कीचड़ है, तो कीचड़ से बचना है तो कीचड़ से बचने वाली जगह जाओ। दुख का निवारण करना है तो इन शर्तों पर रुकना ही पड़ेगा — ईमानदारी, सत्कर्म और योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग; नहीं कर पाओगे तो उसी में रहोगे। दोनों हाथों में लड्डू नहीं रह सकते, एक रास्ता चुनना ही पड़ेगा। अगर आप उनके साथ वैसा ही काम करने लगे तो उनके जैसे ही हो गए।
ऐसा नहीं कि हर दिन करता था। मैं निकला था तो कुछ नियम बना लिए थे और उसी नियम में जीता था — बाहर से पैसा नहीं लूंगा, अन्न नहीं खाऊंगा, किसी से नहीं लूंगा, जहां से सेवा आ रही है वहीं से लूंगा। ये नियम लगभग 12 साल (2011 से 2020 तक), जब तक ज्ञान नहीं हुआ, ऐसे ही रहे। मेरे पास ऑप्शन आते थे क्योंकि मैं बहुत ईमानदारी से अपना काम करता था, पर मैं ऑप्शन का चुनाव करता ही नहीं था, पीछे जाता ही नहीं था। अपनी जिंदगी का एक उसूल, एक डिसिप्लिन बनाओ और परिस्थिति आने पर भी उसे मत तोड़ो, तभी कहीं पहुंचोगे।
बस अपना देख लो — इतना धैर्य तो हमारे पास रहना ही चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि दूसरे को देखने के चक्कर में आप डगमगा जाओ, क्योंकि दूसरे को देखने में भी ताकत जाती है और वैसी ऊर्जा आपकी तरफ भी आती है। अलर्ट रहना है, पूरी तरह लगे रहना है। अगर पूर्णता में नहीं पहुंचे तो डगमगा सकते हो, लेकिन डगमगाने पर भी वही करना है जो फैसला आपने अपने हित के लिए लिया है।
खूब डर था — मृत्यु से भयभीत था, रोंगटे खड़े हो गए, कांप गया; आज भी वह घटना बोलते हुए आंखों में आंसू आ जाते हैं। लेकिन फैसला मैंने वही लिया जो लेना था, जिसमें मेरा हित था। मैंने कहा कभी तो अंत होना ही है, तो कायर की तरह मरने से अच्छा है वीरगति को प्राप्त हो — खोज में जाओ, गिरने में मत जाओ। परीक्षा इसलिए हो रही है कि कहीं गिरा था, मतलब अब उठने वाला हूं; जाना तो पक्का है, तो परीक्षा देते हुए, उठने में चले जाओ।
जहां घुटन लगे, जहां कंफर्ट जोन टूटे, वहां पक्का परीक्षा है। मुंबई में मुझे पैसे की जरूरत थी, जिस व्यक्ति का काम करने गया था वह पैसे देने लगा — गया उसी के लिए था, फिर भी बोला "आज नहीं लूंगा" और आगे बढ़ गया; आंखों में आंसू थे और अंदर हंसी थी कि आज मैं जीत गया, लालच हार गया। मेरी असली जरूरत लालच से मुक्त होना था। जो सामने दिखा उसे दबाया नहीं, नष्ट किया — एक बार मरा तो उसका जन्म नहीं होता।
अगली बार एक्शन लेने में आप थोड़े पावरफुल हो जाओगे; एनर्जी की पावर बढ़ती रहेगी और एक दिन वह लालच ऑटोमेटिक नष्ट हो जाएगा — फिर लालच पैदा भी करना चाहूं तो नहीं हो सकता। जिन जरूरतों के लिए लालच करते थे, वे तब पूरी होने लगेंगी जब मैं उस लायक हो जाऊंगा — अगर मैं काम कर रहा हूं तो मेरा मुझे मिलेगा, सीधी सी बात है।
यहां कोई न कोई लाइन में खड़ा है, पर हमें पीछे वाले नहीं दिखते क्योंकि हम सोचते हैं हम ही हैं — "जरा हटो, तुम्हारे पीछे कितने इंतजार कर रहे हैं।" आपने कहीं प्रार्थना की थी कि मुझे भी अपना कल्याण करना है, तो प्रकृति ने आपको मौका दिया; आप नहीं करोगे, कोई और करेगा। ज्ञान तो फैलेगा ही — कोई सहयोग करता है तो मेरे ज्ञान को करता है, ज्ञान हटा दो तो मुझे कोई पूछेगा भी नहीं; इसलिए मैं किसी में लिप्त नहीं होता।
बस इतना करना है — "हे परमात्मा, मैंने मांगा था और तूने मुझे सेवा का मौका दिया; इस सेवा को मैं निपुणता से, दायित्व से, कर्तव्य से, जिम्मेदारी लेकर करूंगी। तुझे बहुत धन्यवाद कि तूने मुझे उस लायक बनाया; शरीर छूटे तो सेवा में ही छूटे।" अपने संकल्प पर रुके रहना है, बहुत विपरीत परिस्थितियां आएंगी, पर सेवा नहीं छोड़नी — सत्कर्म की सेवा एक बार हाथ से गई तो फिर नहीं मिलेगी। जिसे पूरी तरह सत्कर्म का मौका मिल जाए, वह टिका रहे तो पक्का मूल तक पहुंच जाएगा।
फिसलने का बहुत डर रहता है, और आदमी छोटी सी बात में फिसलता है — बड़ा तो दिख जाता है, उसमें अवेयर हो जाते हैं, छोटी नहीं दिखती। पर फैसला तो चलने वाला ही लेता है। जैसे इस बालिका को ठेस पहुंची, पर उसने फैसला लिया कि मैं यहीं टिकी रहूंगी — उसने अहम भाव को बल नहीं दिया और परीक्षा में पास हुई। अपने अहम भाव को पोषण मत दो, लालच को पोषण मत दो; जिसके लिए गए हो वही करो, फिर नहीं गिरोगे।
गलतियां हो रही हैं तो उसकी डांट भी स्वीकार करो, क्योंकि गलती का पुरस्कार डांट ही है। आपके सामने कोई गलती करता है तो आप भी पुरस्कार में डांट देते हो। और वह डांट अपनेपन में ही डांटता है — और कौन डांटता है? इसलिए बहुत संभल के, परमात्मा को भी धन्यवाद देना है और जिसके लिए सेवा में भेजा है उसे भी — "मुझे सेवा लायक समझा, बहुत लोग थे, मुझे ही चुना।"
मैंने बस बोल दिया था कि ज्ञान पूरे विश्व में फैलाऊंगा, भारत भ्रमण करके प्रचार करूंगा — कौन आएगा यह थोड़ी तय किया था; प्रकृति किसको निमित्त बनाएगी, वह जाने, उसका चुनाव मैं नहीं करूंगा। मैं बस चुनाव करूंगा कि ये साधन चाहिए; आप देते हो तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं, हम भी पड़े रहेंगे, मेहनत के लिए तैयार हैं। मैं तन, धन और ज्ञान तीनों से सेवा करता हूं — चैनल से कुछ पैसा आता है तो उसे भी यहीं लगा देता हूं। कोई जाता है तो मैं रोकता नहीं; कोई गया, कोई और आएगा।
यहां कोई किसी के लिए नहीं कर रहा, सब अपनी इच्छाएं पूरी कर रहे हैं — मेरी इच्छा आपके द्वारा पूरी हो रही है और आपकी इच्छा मेरे द्वारा। मेरी इच्छा में भी इच्छा नहीं है, क्योंकि वह समाज के लिए है, उनके लिए जिन्हें मैं जानता भी नहीं। आप आत्मिक कल्याण का भाव रखिए कि "मेरा भी आत्मिक कल्याण हो जाए, धन से, तन से, ज्ञान से जितना मेरे पास है सब लगा दूंगी" — बचोगे आप ही।
मैं किसी को आश्वासन नहीं देता; आज तक कोई नहीं कह सकता कि मैंने किसी सेवा के लिए कहा हो कि तुझे पुण्य मिलेगा, मुक्ति मिलेगी। इतना जरूर कहता हूं कि अगर आपके द्वारा जरूरतमंद की सेवा हो रही है तो आपका स्तर उठेगा — यह आपको भी पता है, पूरी दुनिया को पता है। और मेरे द्वारा किसी को तकलीफ हुई तो मेरा स्तर गिरेगा — सीधा सा लॉजिक है।
इस बात को गहराई से समझिए। जिस दिन आपको लग गया कि सामने वाला मेरा इस्तेमाल कर रहा है, इसे मेरी जरूरत है, उसी दिन तुम अहंकारी हो जाओगे और उसके बाद जाना ही जाना है। जब तक यह समझ रहेगी कि मैं अपनी जरूरत में, अपने कल्याण के लिए हूं, तभी यहां रुक पाओगे। कोई मेरे लिए कुछ नहीं कर रहा — वे ज्ञान को समझकर, फैलाकर अपना आत्मिक कल्याण करना चाहते हैं। मैं मेहनत की रोटी खाता हूं, मेरी कोई पर्सनल इच्छा नहीं, काम के अलावा कुछ करता ही नहीं।
हमेशा अपनी ही जरूरत बनाकर रखना — "मुझे इस सेवा की जरूरत है, मुझे शरण में रखना; मेरे अंदर कोई कमी है तो निकालने की आपकी जिम्मेदारी है, मैं नहीं जाऊंगी।" शबरी को बहुत भगाया गया कि तुम गुरु से नहीं मिल सकती, पर उसने कहा मैं आश्रम के आसपास ही रहूंगी और गुरु जी जिस रास्ते से जाते हैं, तुम्हारे उठने से पहले झाड़ू लगा दूंगी। कंपनी में गेट के अंदर रहो और काम न मिले तो भी हाजिरी लगती है, सीनियर से पूछा जाएगा; पर गेट के बाहर भाग गए तो पगार नहीं मिलेगी — इसलिए डटे रहना।
सामने वाला हटा नहीं सकता, वह खुद ही हट जाता है — जितने गए, एक को भी मैंने नहीं हटाया। उन्हें लग गया कि इनको मेरी जरूरत है; अरे यह काम परमात्मा का है, मेरा नहीं, तो तेरी जरूरत मुझे कैसे? तुझे भ्रम हो गया। जरा हट जा, फिर देख लाइन में कितने लोग खड़े हैं — पर फिर तू पहले वाली स्थिति में नहीं आ पाएगा; एक बार गया तो गया। जैसे किसी ने पता पूछा, आपने नहीं बताया, दूसरे ने बता दिया — फिर आप बताने जाओ तो वह कहेगा मुझे मालूम हो गया।
मेरे जैसे कितने आए-गए; मैं कह दूं ज्ञान नहीं दूंगा तो प्रकृति किसी और को पैदा कर देगी — "तू बहुत अहंकारी हो गया, चल हट, लाखों लोग चले हैं कि मुझे ज्ञान हो जाए, एक को करा दिया, चल तू बांट।" जैसे शिक्षक बोल दे मैं नहीं पढ़ाऊंगा तो विद्यालय दूसरा टीचर खड़ा कर देगा; 100 की भर्ती में 1 लाख खड़े हैं, एक कुर्सी के लिए हजार। अध्यात्म में भी ऐसा ही है — वहां देख पाते हो, यहां नहीं। मौका मिला है तो इसे कभी गंवाओ मत; इस्तीफा देकर कुर्सी छोड़ी तो फिर नहीं मिलेगी।
मैं किसी को रोकता नहीं — "ठीक है भाई जाओ, आज नहीं तो कल पछताओगे कि क्या खो दिया।" यह मेरा व्यक्तिगत या घर का काम नहीं, परमात्मा व्यवस्था करता है। आज तक न किसी को बुलाया, न भगाया; सबको अपनी-अपनी स्थिति से सेवा और कल्याण का मौका मिला है, और मालूम है इससे अच्छा आने वाला है। पर्सनल सेवा मैं लेता नहीं — कपड़े धोना, आसन लगाना, सारा काम मैं खुद करता हूं। आपने सेवा मांगी है तो बस प्रार्थना रखो कि "इस सेवा की जरूरत मुझे है, इसी से मेरा कल्याण होगा, मैं इसे छोड़ने वाला नहीं।"
कितने लोगों ने कहा आपके साथ रहूंगा, सुरक्षा करूंगा, फिर जरा सी बात में डगमगाकर भाग गए। अरे तुम अपनी सुरक्षा कर लो, मेरी सुरक्षा पूरी प्रकृति कर रही है — तुम्हें क्या मालूम तुम किसके सामने बात कर रहे हो। तुम्हें परमात्मा ने भेजा था इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि मैं न "ना" वाली जगह खड़ा हूं, न "हां" वाली। मैंने डोनेशन के लिए कभी किसी से नहीं कहा — करोगे तो लाभ तुमको मिलेगा, मुझे नहीं; मुझे जहां पहुंचना था पहुंच गया, यह काम हो तो भी ठीक, न हो तो भी ठीक। मैंने गली-मोहल्लों में घूमकर जितना बोला था, बांट दिया।
मैं तो आपको कहूंगा कभी मत जाना — लेकिन ध्यान रखना कि रहना वहां है जहां सत्कर्म हो, क्योंकि सत्कर्म के द्वारा ही मेरा कल्याण होगा। इतनी समझ रखो कि जहां धन, तन और ज्ञान लगा रहे हो, उसका उपयोग डेफिनेटली सत्कर्म में ही हो रहा है, तभी करना है। मन में अहंकार या कुछ उठेगा, पर उसके साथ मत भागो — जो फैसला लिया, उसी पर डटे रहो।
इसलिए कि कोई दबाव में सेवा न कर दे — दबाव और संकोच में सेवा नहीं होती। अभी भी मौका है; उतना अमाउंट रहेगा तो बुढ़ापे में काम आएगा, और यहां गया तो गया, जाने के बाद वापस नहीं मिलने वाला। सेवा वह करे जिसके अंदर पछतावा न हो — पछतावा है तो सेवा करके भी क्या मतलब। कोई करोड़ों दान करे, मैं दोबारा पूछूंगा ही नहीं; जाओ तो मैं एक प्रतिशत भी, न बाहर से न अंदर से, नहीं रोकूंगा। पिछली जिंदगी में पैसा न लेने में मेरा नाम है, लोग मुझसे पैसा पूछने में डरते हैं।
अगर मैं किसी का कुछ उपयोग करवाता हूं तो उसके हित और कल्याण के लिए, मुझे कुछ नहीं चाहिए; मेरी कोई पर्सनल इच्छा नहीं। मैंने बोल दिया था कि गाड़ी आएगी तो भारत घूमकर गांव-गांव ज्ञान बांटूंगा; ये नहीं देंगे तो प्रकृति किसी और को भेजेगी। मैंने फटे कपड़े पहनकर, 20-20 किलोमीटर चलकर, भूखा सोकर, नदियों के किनारे ठंड में कांपकर खूब तकलीफ उठाते हुए ज्ञान दिया — जितना बोला था कर दिया; अब परमात्मा को करवाना हो तो व्यवस्था करे।
जब मैंने एक साल का वादा किया था, तो कुटिया से एक भी आदमी वापस नहीं जाता था — 24 घंटे; रात 12 बजे कोई आया तो मैं जागता मिला, सुबह 6 बजे कोई गया तो भी जागता मिला। कोई बोलता "मैं 6 के पहले चला जाऊंगा", तो मैं पूरी रात नहीं सोता, क्योंकि घर के दरवाजे से कोई जाए तो कोई तो रहना चाहिए — तुम मेरे लिए आए हो, तो मेरा कर्तव्य है कि जाते समय तुमसे मिलूं। मैंने अपने काम को पूरी ईमानदारी से किया, इसलिए बोलता हूं कि लोग अपना समय बर्बाद न करें।
क्योंकि ना करने में उसकी स्थिति का पता चलेगा कि उसने जो शब्द बोला वह पक्का है या नहीं; अगर मैं कर दूंगा तो न तुम्हें पता चलेगा, न मुझे। अगले की सच्चाई निकालने के लिए मैं ना करने वाला ऑप्शन लेता हूं — और जरूरत उनकी है तो फोन भी वही करेंगे। जब देखा कि वह सच में परेशान है, तब परमात्मा ने जिसे भेजा था उसे डायल किया — तीन की जरूरत थी, सामने पूरा पंद्रह रख दिया गया। इस स्थिति पर होने के बाद पूरी प्रकृति साथ है; किसी के लिए किसी की जिंदगी रुकती नहीं।
अगर लोग अकाउंट में पैसा कंस्ट्रक्शन, साधकों के भोजन या जमीन के लिए भेज रहे हैं और मैं उस पैसे की गाड़ी ले लूं, तो उस गाड़ी में चढ़ नहीं पाऊंगा, मुझे घुटन होगी — चाहे करोड़ों आ जाएं। या तो खुद के पैसे से (जैसे चैनल से) लूंगा, या कोई गाड़ी दिलाने वाला आएगा; और उसका भी पूरा बैकग्राउंड देखता हूं, ईमानदारी का पैसा होना चाहिए। एक बार किसी ने फोन पर गाड़ी के लिए एक लाख देना चाहा, तो मेरे अंदर से "हां" निकल ही नहीं पाया। पहले साधकों के लिए जमीन ली, उसी पैसे से गाड़ी नहीं ली।
बस यही कर्म है — सत्कर्म और ईमानदारी। अगर आपके जीवन में यह है, तो आप उसके ही काम आ रहे हो और उसकी दुनिया में सहयोग कर रहे हो; निमित्त कोई और है, काम उसका ही हो रहा है, और यही करके उससे मिल सकते हो। हम उनके लिए काम कर रहे हैं जिन्हें हम जानते भी नहीं — अगर मुझे पता होता कौन-कौन लाभ लेगा, तो वे मेरे लोग होते, उसके नहीं। स्कूल में सब पढ़ते हैं, पर सम्मानित टॉप वाले होते हैं — इसमें भी टॉप आना है; सेवा में इतनी मेहनत करो कि मेहनत भी कहे बस कर।
आप लोग कहते हो "शरीर खराब कर दिया" — मतलब आप महसूस कर पा रहे हो कि इस आदमी ने शरीर के द्वारा कितनी मेहनत की, और यह आवाज उस तक जाती है। 13 साल में कब खाना, कब पीना, कब उठना-बैठना, मुझे खुद पता नहीं था, सोने की 1% भी फिक्र नहीं थी — बिस्तर है तो ठीक, नहीं तो पत्थर पर सो जाता। अब आप लोग ख्याल रखते हो, तो रख पा रहा हूं; आप जिस दिन छोड़ दोगे, मुझसे नहीं होगा। यह शरीर रहा ही नहीं, मेरा काम रहा ही नहीं — परमात्मा का काम है, वह चाहे जहां ले जाए, इसलिए मैं किसी से नहीं कहता कि लौटूंगा।
सब नदियों में ताकत नहीं होती, कुछ ही नदियां सबको लेकर सागर में समा जाती हैं। ऐसे ही पृथ्वी पर कोई ऊर्जावान व्यक्ति, आत्मज्ञानी, काम करते हुए अपने सब सहयोगियों को लेकर निकल लेता है — पर उसके साथ बहना पड़ेगा। वह गटर को भी उतना ही सम्मान देगा जितना जल को; आत्मज्ञानी के पास कोई भी आए, कभी नहीं कहेगा "जाओ", उसे भी तारने का प्रयास करेगा। अगर कोई कुछ दूर जाकर निकल गया तो उसकी कमी है। साथ न छूटे, सेवा में लग जाओ — एक समय आएगा कि जहां वह पहुंचेगा, वहां आप भी पहुंच जाओगे; साथ छोड़ा तो फिर इसी संसार में आ जाओगे।
यह सेवा का नंबर है, यहां काम की बात करिए — सुबह उठकर नमस्ते, लिंक आदि न भेजें; ऐसा करने वाले को एक बार सचेत किया जाता है, न माने तो नंबर ब्लॉक, क्योंकि इतना समय नहीं कि किसी को समझाएं। नाम मत पूछिए — फोन उठाने वाले का नाम "मुक्ति का द्वार" है, क्योंकि आप मुक्त होने के लिए फोन करते हो और जो फोन उठा रहा है वह भी मुक्ति की तरफ बढ़ रहा है। नाम पूछोगे, हाय-हेलो होगा, तो बेचारा जो एक दुनिया छोड़कर आया था, दूसरी दुनिया यहां बसा लेगा। जीवन में जिम्मेदार, जवाबदार इंसान बनिए और अपना आत्मिक कल्याण करिए।
गलती तुमने की, तुम्हारा क्या भाव था, क्या संशय था, यह तुम्हें ही पता है — कुछ तो सोचकर ही बोला होगा, तो फिर भोगो। जब वे थे तभी माफी मांग लेनी चाहिए थी, और क्षमा तब तक मांगनी चाहिए जब तक वे क्षमा न करें — पूछना चाहिए था कि मुझे माफ किया कि नहीं। अब पश्चाताप करते रहो; ईमानदारी और सत्कर्म से जीवन जियो, कभी न कभी भरपाई हो जाएगी तो अपने आप निकल जाएगी। आध्यात्म में आगे बढ़ते रहो और अपना आत्मिक कल्याण करो।
दर्द तो आपको होगा कि आप अभी तक भटक रहे हो; उस स्थिति वाले को दर्द नहीं होता, वह दर्द से परे है। वह तो सामने वाले की योग्यता देखकर बोलता है कि "भैया ये करके कल्याण कर ले, तेरी योग्यता है।" आप नहीं करोगे तो स्वतंत्रता आपने ही छीन ली — फिर वह दोबारा थोड़ी प्रयास करेगा। जब एहसास हुआ, तभी जाकर बोल देना चाहिए था "अब मेरी समझ हो गई, मैं सरेंडर करती हूं।" आपके पास अभी भी मौका है — जो आपके लिए उचित हो, वह फैसला ले लो।
क्यों उम्मीद करना — हम जितना करेंगे, मिल जाएगा। पेड़ हमने लगाया तो फल की उम्मीद "उम्मीद होकर भी उम्मीद नहीं है"; पर पेड़ किसी और ने लगाया और हम उम्मीद करें कि फल हम खाएंगे, वह न खाने दे तो दुख होगा, क्योंकि वह उस पर निर्भर है। आप परिवार के लिए करो, परिवार आपके लिए खुद करेगा; उम्मीद रख रहे हो, इसका मतलब आपने किया नहीं। कुछ किया है तो परिणाम आएगा, उसे स्वीकार कर लेना — बात खत्म। यह दुनिया लेनदेन की है, सब एक-दूसरे को यूज कर रहे हैं; गाय को भी दरवाजे पर तब तक रखते हैं जब तक दूध देती है।
प्रारब्ध होगा तो मुझे रोक लेगा, मैं तो आत्मिक कल्याण के लिए निकल रही हूं — ऐसा समझो। प्रारब्ध बनाने वाला कौन है? हम ही तो हैं — कर्ता भी हम, धर्ता भी हम; मैं जितना करूंगा उतना होगा, ये प्रारब्ध वगैरह छोड़ो। आपके किए गए कर्म का परिणाम ही प्रारब्ध है; आज से आपका कल है, तो आज अपनी समझ से करो, कल उसका परिणाम आएगा। जो जिम्मेदारी नहीं भी है उसे प्रारब्ध मान लेना — वह हमारा डर, स्वार्थ, रसपान और लालच है। महात्मा बुद्ध भी पत्नी-बच्चे को प्रारब्ध मानकर बैठ जाते तो निकल न पाते।
भोजन को साधारण में मत लीजिए। जिंदगी-मौत का सवाल हो और एक तरफ पूरी प्रॉपर्टी, एक तरफ भोजन रखा जाए, तो कोई भी जीव पहले भोजन चुनेगा, क्योंकि रहोगे तो प्रॉपर्टी बना लोगे — परिवार, नाते-रिश्तेदार सब छोड़ देगा। इस जिंदगी में सबसे प्यारा अपना जीवन है और जीवन के लिए भोजन। आत्मिक कल्याण इतना जरूरी है कि सारा काम छोड़कर भोजन, और जरूरत पड़े तो भोजन भी छोड़कर आत्मिक कल्याण — जिस दिन इतना जरूरी समझ लोगे, उस दिन आत्मिक कल्याण होगा। हम तो इसे बुढ़ापे की बात सोचते हैं।
वहां आप जिद और हठ योग में चले जाते हो — अपमान देखकर कोई फैसला ले लेते हो और उस पर टिके रहते हो, मर भी जाएं तो चलेगा। किसी की व्यक्तिगत स्थिति पर सलाह नहीं दी जा सकती, क्योंकि हो सकता है उसे भ्रम हो गया हो; फैसला वह खुद ले। पर मैं तो कहूंगा — ऐसे लोगों के बीच नहीं रहना चाहिए, उन्हें छोड़ देना चाहिए। मरना क्यों? हमें मरना नहीं चाहिए, जिंदा रहकर उन्हें करके दिखाना है कि मेरी क्षमता यह है, तुम समझ नहीं पाए, गलती तुम्हारी थी। चाहे मेल हो चाहे फीमेल, कोई फर्क नहीं पड़ता।
पुरुष भी पैदा हुआ है तो महिला से — महिला इतनी ताकतवर है। जो रखने की क्षमता पुरुष में नहीं होती, महिला उसके जैसा पैदा कर देती है; पुरुष कभी भी महिला से ताकतवर नहीं हो सकता। जिस पात्र में से कोई निकलता है, वह पात्र बड़ा है। लेकिन हमेशा महिलाओं के आत्मविश्वास को महिला के नाम से तोड़ा गया है, और उसमें अक्सर एक महिला का ही हाथ होता है — महिला ही भ्रमित होकर महिला को तोड़ती है।
चाहे कोई भी हो, अगर मेरी भावनाओं को कोई नहीं समझता, कद्र नहीं है, तो उस व्यक्ति, उस जगह का त्याग कर दो — त्याग ही परम सुख है, वह त्याग आपको ऊपर उठाएगा। त्याग नहीं किया तो जलील होकर वहीं जिंदगी जियोगे, हमेशा दबे रहोगे और आपकी ऊर्जा कभी जागृत नहीं हो पाएगी। आपके अंदर ताकत है, पर वह तब जागृत होगी जब उनको छोड़ोगे — जहां दबाए जा रहे हो, वहां निर्भर रहोगे तो ताकत हमेशा दबाई जाएगी। ऐसे लोगों के पास रहो जहां आपकी ताकत को उठाया जाए; इसलिए कहता हूं जहां दबाव-संकोच हो वहां बात मत करो।
बचपन में बड़े भाई-बहन बिना मतलब मुझे मारते थे, क्योंकि मैं सीधा और स्पष्ट बोलता था; बुरा लगता था कि एक बच्चे को प्यार, प्रेम, सहलाने की जरूरत है, गलती हो तो बताइए। 16-17 साल का हुआ तो रोक दिया, 17-18 में अपना खाना-कपड़ा खुद कमा लेता था; उनका त्याग किया और कई वर्षों में अपने आप को उस लेवल पर लाया कि आज जिस बड़े भाई ने मुझे मारा था, वह मुझे प्रणाम करता है, आसन बिछाता है, भोजन बनाता है। एक दिन में नहीं हुआ, बहुत साल लगे।
भाई का ट्रांसपोर्ट का व्यापार था, उसने मुझे मुंबई बुलाया; माल उतारने के लिए हेल्पर नहीं लिया, खुद उतारने लगा और चाहा मैं भी उतारूं — मैंने कहा मैं हेल्पर बनने नहीं आया। मुझे पैसा नहीं कमाना, जिंदगी जीना है; जिंदगी जीने के लिए पैसा और व्यवस्था चाहिए, वह कर लूंगा, लेकिन व्यवस्थाओं के लिए जिंदगी नहीं लगाऊंगा। तू मालिक है, कई गाड़ियां हैं, फिर भी पैसा बचाने के लिए हेल्पर का काम कर रहा है — एक हेल्पर लगाता तो उसे पगार मिलती; तू तो एक आदमी की पगार खा गया, तुम्हारे जैसे लोग रहे तो कई बेरोजगार हो जाएंगे।
हमें क्रियाशील बनना है — सिर्फ पढ़ना, बोलना, चर्चा करना नहीं; उसी में रहेंगे तो कुछ नहीं कर पाएंगे। स्तर उठाने वाले सामने हैं, फिर भी एक मौका छोड़ दिया तो मेरी तरफ से और मौका नहीं। इसलिए कैसे भी अपना कल्याण कर लो — ईमानदारी और सत्कर्म से जीवन जीते हुए निकल लो।
वे आपको काम के लिए रखे हैं, आपको नहीं; जब तक उन्हें लाभ है, उनका काम होगा, निकालेंगे ही नहीं, और जिस दिन काम नहीं होगा निकाल देंगे। डरना भी नहीं चाहिए — डर रहे हो, इसका मतलब अपने काम में निपुण नहीं हो। कहा गया है "काम प्यारा है, चाम नहीं" — दूध देने वाली गाय की लात भी लोग सह लेते हैं, पर कितनी भी सुंदर हो, दूध न दे तो छोड़ देते हैं। इसलिए काम के बने रहो; जिस काम के लिए रखा गया है उसमें पूरे निपुण हो, तो कोई नहीं निकालेगा।
ईमानदारी और सत्कर्म में अहंकार नहीं आता, बड़ा बनने में अहंकार आता है। जब आप बोलते हो कि मैं बहुत अच्छा काम करती हूं, तो उसमें अहम भाव आ जाता है, क्योंकि वह लोगों से बड़ा बनने के लिए है — ऐसा बोलना नहीं चाहिए। आपको सिद्ध करने की जरूरत नहीं, आपका काम सिद्ध करेगा; आप जिस पोस्ट पर हो उसका काम सबको दिखेगा। प्रेशर सहने से तुम मजबूत होगी — हाथी चलते हैं, कुत्ते भौंकते हैं; अब हाथी सबको जवाब देने लगे? बस काम करते रहो।
माइंड का तो कोई गेम ही नहीं है। माइंड आदान-प्रदान के लिए है, जो अच्छे-बुरे को महसूस कर सके; महसूस करने वाले आप हो, माइंड तो निमित्त बनता है। एक बिंदु के बाद जो पता नहीं चलता, उसमें आप होते हो और उसमें कुछ भी नहीं होता, तो पता क्या चले? वहां कुछ दिखता भी नहीं, बस एहसास कर सकते हो, क्योंकि पांच इंद्रियों से परे उठ गए — एहसास जिससे हो रहा है और एहसास करने वाला भी वही है।
कुछ भी हो रहा है तो उसका कारण बाहर से है, अंदर से नहीं। हॉर्मोन तब रिलीज होते हैं जब हम देख नहीं पाते, समझ नहीं पाते; अगर बाहर का निमित्त ही न बने तो गुस्सा करके दिखाओ। जब समझने लगते हैं कि "उसने ऐसा क्यों किया", तब न हॉर्मोन रिलीज होते हैं, न गुस्सा आता है — समझने में गुस्सा कहां आएगा? गुस्सा आना भी बाहर से, समझकर छूटना भी बाहर से; अंदर कोई गेम खेलने वाला नहीं, सारा गेम बाहर का है और वह "चाहिए" में है — वह भी अपने तरीके से।
जब अपने तरीके वाला हिसाब छोड़ दिया, तब न गुस्सा आता है, न कोई अच्छा बोले तो कुछ अच्छा लगता है। पहले होता था "अरे मेरे बारे में अच्छा बोला", और कोई अनाप-शनाप बोले तो बुरा — ये दोनों बाहर से हैं, दोनों गलत। उसमें तुम नहीं हो, तुम होकर भी नहीं हो, क्योंकि कामनाएं हैं।
अगर छोड़ दिया है तो गुस्सा आना ही नहीं चाहिए; आने के बाद पता चल रहा है तो मतलब छूटा नहीं। छूटने के लिए समझ थी, ज्ञान के द्वारा हटाया था, लेकिन जब अपने तरीके से कामनाएं प्रबल हुईं तो समझ की ताकत कमजोर हो गई और कामनाओं की ताकत मजबूत हो गई। अपने तरीके से कुछ चाहिए तो आप अपने को ही यूज कर रहे हो, इसलिए जीवन अशांत है — इस "अपने तरीके" को पकड़ के छोड़ दो।
अपने तरीके से छुड़ा लिया तो "चाहिए" में आ गए, फिर जरूरत में आ गए — उसमें आप और आपकी जरूरतें होती हैं, समय मिलता है, अपने को समझने का स्तर बढ़ता है, और धीरे-धीरे चाहिए से भी मुक्त हो जाते हो। पहले अपने बनाए जगत से मुक्त हुए, चाहिए से मुक्त हुए तो इस जगत से मुक्त होकर पिंड में आए, और पिंड से भी उम्मीद छूट गई तो बात खत्म — यही यात्रा है। कुछ नहीं चाहिए में आ गए तो कुछ समय में ज्ञान हो जाएगा, फिर किसी से पूछने की जरूरत नहीं; उसके बाद ब्रह्म, परम ब्रह्म, परब्रह्म की यात्रा शुरू होती है।
एक समय ऐसा आएगा कि कुछ भी नहीं चाहिए, चाहिए में भी कुछ नहीं चाहिए — सब छूट जाएगा, जो है सो है, बात खत्म। "जैसा है" वाला भी खत्म, इसके आगे-पीछे कोई सेंटेंस नहीं। उसमें स्वीकार भी खत्म, क्योंकि स्वीकार करोगे तो भाव जागेगा; स्वीकार करने वाला और अस्वीकार करने वाला दोनों गए। मानना उसे पड़ता है जो नहीं है; जो है उसमें मानना-न मानना सब खत्म — यह अंतिम स्थिति है।
देखिए आप किसमें जी रहे हो — अपने तरीके वाले में, या बस जितनी जरूरत है उसमें, या अब कुछ भी नहीं चाहिए में; अपनी स्थिति को स्वयं ही जांचो। ज्यादातर लोगों की यात्रा "अपने तरीके से चाहिए" में चल रही है, यानी अभी भटक रहे हो, अपने संसार में फंसे हो। जब यही नहीं पकड़ पाओगे कि मैं खड़ा कहां हूं, तो आगे नहीं जा सकते — जैसे चौराहे पर खड़े हो और पता ही न हो कि कहां खड़े हो, तो मंजिल तक कैसे पहुंचोगे।
किसी नाव में एक छेद है, किसी में 99 — दोनों का परिणाम एक ही, डूबेगी तो सही, कोई जल्दी कोई लेट। चाहे कम चाहे ज्यादा, अभी भी आप अपने तरीके वाले में हो; किसी को ज्यादा घुटन है, किसी को कम, पर दोनों एक ही जगह खड़े हैं। "यह सब तो छोड़ दिया" — यह बोलना भी अहम है। कैसे भी अपने आप को अपने तरीके वाले से पूरी तरह छुड़ाओ, फिर चाहिए में आओगे — उतना जितनी जरूरत।
किसलिए डांट रहे हो, यह मायने रखता है — अपने तरीके से करवाने के लिए डांट रहे हो, यह पकड़ना है। अगर उसके हित के लिए अपना तरीका अपना रहे हो तो उचित है, यह फंसाएगा नहीं। पर क्या उसकी पूरी सुनी या सिर्फ अपना तरीका थोप दिया? हो सकता है उसके पास आपसे अच्छा तरीका था, पर आपके दबाव के कारण निकल नहीं पाया — वह कमजोर, आप मजबूत, तो आपने मजबूती का गलत फायदा उठाया; किसी कमजोर की भावनाओं को ठेस पहुंचाई, तो उसका परिणाम भविष्य में भरना पड़ेगा। पहले उसका तरीका समझते, फिर अपना बताते, और जो प्लस पॉइंट हो उसे उठा लेते।
महाबलेश्वर में एक बालिका ने मेरे फटे कपड़ों के बारे में अपनी मां से पूछा तो मां ने उसे चुप करा दिया। मैंने कहा — इसे आपसे बड़ी उम्मीद है, बड़ी उम्मीद से इसने पूछा और आपने दबा दिया; ऐसे दबाती रहीं तो यह आपसे पूछना बंद कर देगी। नहीं बता सकती थीं तो कह सकती थीं "जाओ उनसे पूछ लो।" हम बचपन से अपने ही बच्चों को डराते हैं, इसलिए हम पूछने से, बात करने से भी डरते हैं और खुलकर नहीं जी पाते।
(प्रश्नकर्ता: उस उम्र में मां उसके साथ दोस्त बनकर बात करे, सही समझ दे, ताकि दूसरे उसका गलत फायदा न उठा सकें; मां नहीं बताती तो दूसरे आते हैं और बच्चियों को भुगतना पड़ता है।) गुरु जी: हम किसी को बदल नहीं सकते, लेकिन खुद को तो बदल सकते हैं — बस उतना ही सही है। अगर हम खुद को बदलेंगे तो जहां-जहां जिएंगे, वहां अपने आप बदलाव होगा; क्षणिक ही सही, पर होगा, और जिसने उस क्षण को महसूस किया, वह उस एहसास में जीने का प्रयास करेगा — शुरुआत तो हुई।
इतने सारे लेयर बच्चों पर संस्कार के नाम पर चढ़ा दिए; हकीकत में संस्कार क्या है, किसी को पता ही नहीं। हम आवरण देखकर आदमी से बात करते हैं, यही गड़बड़ी है — जरा पहुंचो कि आवरण के पीछे कौन है, फिर उसके पीछे कौन है। जब तक आवरण का प्रभाव खत्म नहीं होगा, आप अपने आप तक पहुंच ही नहीं पाओगे; हम बाहर के प्रभाव देने-लेने में फंसे हैं। यह जगत परमात्मा का है, इसमें फंसना नहीं, जीना है — फंसना तो बस तुम्हारे जगत में है, जो तुमने अपने तरीके से बनाया है।
बीज पड़े रहने से नहीं जमेंगे, आप उन्हें बो रहे हो — बोना छोड़ दो, एक समय आएगा वे पड़े-पड़े सड़ जाएंगे। कोई नहीं देख रहा, चुरा लो — पर खुद तो देख रहे हो। आठ बीज हैं: छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड — और हर वक्त आप इनमें से एक बीज बो रहे हो। संसार में बोते हो तो कुछ उगेगा, कुछ नहीं, बाद में उगेगा; पर अध्यात्म में बोओगे तो बहुत तेज रफ्तार से मिलेगा, चिथड़े उड़ जाएंगे।
अध्यात्म में बहुत संभलकर चलना, पूरी तरह ईमानदारी से चलना — नहीं तो चलो ही मत, वैसे ही रहो। अज्ञानी बनकर जियोगे तो कम सजा है; ज्ञानी बनकर जियोगे और अज्ञान वाला काम करोगे तो बहुत ज्यादा सजा है।
मान की इच्छा सबसे खतरनाक है — जिसने सब छोड़ दिया, उसका भी यह आखिरी तक पीछा करती है; सब छूटने के बाद यह छूटती है। स्वाभिमान की आड़ में अभिमान रह जाता है — "मैं कुछ हूं, कुछ जानता हूं।" कोई बोले "तुम कुछ नहीं जानते" और जो बोलना शुरू होता है, वह नहीं होना चाहिए; उसी समय रोक लो — "सही बोले, मैं कुछ नहीं हूं।" आंतरिक प्रतिक्रिया न उठे तो समझना आप अपने आप में स्थित हो; विपरीत होगा तभी आपकी स्थिति का पता चलेगा।
इस जगत में मैंने बहुत दुख देखा; 16-17 साल में बात समझ में आ गई थी कि जिसमें हम उलझे हैं, यह कुछ है नहीं — पर यह अब पता चला कि तब समझ आ गई थी। मुझे बस करना था कि दुनिया का हर व्यक्ति मेरे काम का उपयोग करे। 2008 की मंदी में व्यापार में लॉस हुआ, सब खड़ा किया एक बार में गिर गया; एक साल बस सोया-खाया, और समझ पक्की हुई कि यहां सब एक-दूसरे को मतलब से मानते हैं। फिर ज्योतिष सीखा — नाम, शोहरत, पैसा, पर उसके आगे कुछ नहीं; संन्यासी हुआ, पर तीन दिन में आश्रम छोड़ा क्योंकि वहां भी वही चल रहा था। "कोई तो होगा जो मुझे बिना मतलब के मानेगा, कोई दुनिया होगी जहां बस प्रेम होगा" — इसी खोज में 12 साल लगे, और यहां पहुंचा जहां कुछ भी नहीं, सिर्फ मैं हूं।
बहुत लोग आश्वासन दे देते हैं, पर इसमें वही आगे बढ़ सकता है जिसे सच में कुछ नहीं चाहिए। अगर कुछ भी चाहिए — यहां तक कि आनंद भी — तो आप आगे नहीं बढ़ पाओगे, क्योंकि आपका आनंद अलग है और यहां का आनंद अलग। तुम सोच रहे हो वहां भी रस वाला आनंद होगा — रस वाला होगा तो सूख जाएगा; उस आनंद में रस नहीं। मैं लोगों को कहता हूं, मेरे पास कुछ नहीं है, यह समझकर आना — न तुम्हें देने के लिए कुछ है, न तुमसे लेने के लिए।
मेरे पास देने के लिए कुछ है ही नहीं, इसलिए सीधा लिखवा दिया — इसे पढ़ लो, समझ लो, फिर देखो क्या फैसला लेना है। इसमें पूरा सार है: शुरुआत ईमानदारी, मुक्ति है; बेईमानी, बंधन — आखिरी यही है। जिस मतलब से आते हैं वह दूसरी तरफ बेमतलब हो जाता है, और जो बेमतलब से है वह तीसरी तरफ मतलब से हो जाता है। यह लाइन याद नहीं करनी, समझनी है, उसमें डूबना है — जब तक समझ में न आए, पढ़ते रहो; कोई इसमें चला गया तो अपने आप को पाएगा, इसमें मिलेगा कुछ नहीं।
समझते-समझते इतना समझना है कि कुछ समझना नहीं — समझ-समझ के तो दिमाग खराब कर दिया है, जिसे झाड़ू-पोछा मार रहे हैं, फिर भी साफ नहीं होता; कुछ दाग रगड़-रगड़ कर साफ करने पड़ते हैं। वे जाएंगे नहीं तो आपका आपसे मिलना भी नहीं होगा। एक बोर्ड है और आप दो हाथ से लिख रही हो — एक राग (लगाव) में, एक द्वेष (नफरत) में; एक से लिख रही हो, एक से मिटा रही हो, तो कभी मिट पाएगा? पहले लिखना बंद करना पड़ेगा, फिर मिटाना पड़ेगा।
अगर आपने उसे उम्मीद दी है तो उसकी अपेक्षा गलत होगी; पर उसके लिए गलत होने से आपके लिए गलत तो नहीं होगा। रिश्ते टूटते हैं तो चिथड़े उड़ेंगे ही, क्योंकि वे कामनाओं के रिलेशन थे — इच्छाओं के, तरह-तरह की उम्मीदों के; उम्मीदों के वे सारे चिथड़े उड़ते हैं और बहुत कुछ टूटता है। जब समझ लेते हैं, तब फर्क नहीं पड़ता।
समझ में आ रहा है तो बदलाव करिए, अब उसमें जियो — उसमें जीना जरूरी है। जिन शब्दों को हम समझ रहे हैं, जब उन्हें आचरण में उतारेंगे, उनमें जिएंगे, तब उन शब्दों की ऊर्जा का उपयोग होगा और उस ऊर्जा के द्वारा आत्मानुभूति कर पाएंगे। ध्यान तो हर वक्त घटित हो रहा है, बस हम राग-द्वेष में फंसे हैं, कुछ अपने तरीके से चाहते हैं इसीलिए उलझे हैं। करना नहीं है, करने से मुक्त होना है। जो क्षणिक ध्यान घटित हो रहा है, उससे भी अपने को छुड़ाना है, क्योंकि वह "अपने तरीके से चाहिए" में घटित हो रहा है — हमारे तरीके से हुआ तो राग, नहीं हुआ तो द्वेष। तो अपने तरीके से करवाने की इच्छा का त्याग करना पड़ेगा। गलती यह कर रहे हैं कि एक ध्यान से तो वैसे परेशान हूं, ऊपर से एक ध्यान और लगा रहा हूं — हमारी परेशानी का कारण वह ध्यान ही तो है।
खोए कहां हो? खोया होता तो मंदबुद्धि होता, पागल होता या बोध होता — तीन में से एक। हमें अपनी स्थिति का पता है, लेकिन वह स्थिति सत है या असत, यह नहीं पता, क्योंकि सत ने सत-असत को, सच-झूठ को पकड़ लिया है। स्वरूप तो सत्य है, वह असत हो ही नहीं सकता — लेकिन छोड़ोगे तब ना। पकड़ा क्या है? रूप, जो परिवर्तनशील है; उसमें सुख ढूंढ लिया, उसमें हो गए — कभी सच में, कभी झूठ में, इसी में जी रहे हो। जो मेरा स्वरूप है, वह सच और झूठ के परे है, वह बना हुआ नहीं है — स्व; वहां रूप खत्म हो जाता है।
जीव दो रूप में फंसा है — एक तो स्वयं, एक अनेक पिंड में; अनेक पिंड में रसपान करने के चक्कर में फंसा हुआ है। वहां से अपने को छुड़ाना है: रसपान की इच्छा छोड़नी पड़ेगी, जरूरत में जीना पड़ेगा। शरीर की जरूरत में जिएंगे, सिर्फ उतना जितनी शरीर को जरूरत है — स्वाद नहीं — तब बाहर के रूप से अपने को छुड़ा पाएंगे। जब तक स्वाद में जिएंगे, बाहर रसपान करते रहेंगे, अनेक पिंडों और वस्तुओं में उलझे रहेंगे। स्वाद क्षणिक है; स्वाद की वजह से हम अनेक पिंडों में फंसे हुए हैं, अपने आप में स्थिर नहीं हो पा रहे।
स्व इच्छा-अपेक्षा में जीवात्मा हो गया, जीव हो गया — जैसे पानी फ्रिज में रखो तो बर्फ हो जाता है। इंद्रियों के द्वारा अनुभव हो रहा है; एक ही सामान अपने अंग पर अलग-अलग जगह रखो तो अलग-अलग अनुभव होता है। उस अनुभव में वह फंस गया — कोई अच्छा लगने लगा, कोई बुरा — वह अच्छे-बुरे में फंस गया।
अगर स्व में है तो फंस नहीं सकता; प्रभु की दुनिया निराली है, वह फंसाने वाली नहीं, हम स्व से अलग हुए हैं। उसने स्वयं किया: पहले इस पिंड की जरूरत हुई, फिर वह लालच में आ गया। उसको कर्ता का अधिकार था — जो तुम चाहो बन जाओ, जैसा चाहोगे वैसा बनते चले जाओगे; देखो, बचपन से हम जैसा चाह रहे हैं, जैसा काम करते हैं, वैसा बनते जा रहे हैं। वह पूर्ण-अपूर्ण में फंस गया — जहां-जहां से उसकी जरूरत पूरी हो रही थी, उसे स्थिर करना चाह रहा है, परिवर्तनशील को स्थिर करना चाह रहा है।
बस उम्मीद छोड़ दो, बात खत्म। योग्यता से ज्यादा की इच्छा से तकलीफ है, और वह आपने पैदा की है। इच्छा व्यापक नहीं है, आपकी है — तभी तो फंसे हो; आपकी न होती तो फंसने का सवाल ही नहीं उठता। जिसकी इच्छा है, उसे न समझ पाए, इसीलिए फंसे हुए हैं।
हमारी बस जरूरत है। जब तक भूख रहती है, तभी तक स्वाद भी है; जब भूख खत्म हो जाती है तो स्वाद लेने की इच्छा भी खत्म हो जाती है — स्वाद एक भ्रम है, भ्रम ही सही लेकिन पैदा हो गया है। आवश्यकता भोजन से पूरी होती है या उसके स्वाद से? भोजन से। तकलीफ कहां है? स्वाद ले लिए। बस स्वाद लेने की इच्छा छोड़नी पड़ेगी — स्वाद आपकी जरूरत नहीं है, 1% भी नहीं; यह जरूरत आपने पैदा की है। स्वाद के ही वजह से कपड़े से लेकर भोजन तक, हर वस्तु में हमने स्वाद खोज लिया है।
आप जैसा है वैसा खाते हो, या बनाकर खाते हो? बनाकर खाते हो — क्यों बनाकर खा रहे हो, वैसा ही खाओ। संसारी खाएगा, लेकिन प्राकृतिक तरीके से नहीं खा रहा, अप्राकृतिक तरीके से खा रहा है। खाने में तकलीफ नहीं है; तकलीफ उस खाने में जो राग-द्वेष हो रहा है — "यह बहुत अच्छा, यह बहुत बुरा" — उसमें फंस गया। कोई भी वस्तु बनाकर खाइए, तकलीफ उसमें नहीं; ठीक में ग्रहण करोगे तो फंस नहीं पाओगे। अच्छा कहा तो बनाने वाले के अंदर से और आपके अंदर से भी राग निकलेगा, बुरा कहा तो द्वेष। हम वस्तुओं का उपयोग करने में नहीं फंसे, अपने तरीके से उपयोग करने में फंसे हैं।
स्वाद लोगों का अपना-अपना है — उसी वस्तु से किसी को स्वाद मिलता है, किसी को नहीं; एक कहता है मसाला कम, एक कहता है ज्यादा। शरीर पांच तत्व से बना, भोजन भी एक, तो एक जैसा लगना चाहिए — फिर अलग क्यों? जिसने अपनी वासना से जो गुण की दृष्टि डाली है, उसी में फंस गया है — तो इसी से अपने आप को निकाल लो: न अच्छे में जाओ, न बुरे में; जो भी ग्रहण कर रहे हो करो, पर राग-द्वेष में मत जाओ। भोजन शरीर के पोषण के लिए करो, स्वाद स्वाभाविक आ रहा है तो आने दो; उसे बदलना भी अप्राकृतिक है — मिर्ची को तीखा नहीं मीठा बनाना चाहते हो तो यह भी एक लड़ाई है। सहज, शरीर के लिए उपयोगी, उचित तरीके से, बिना किसी को तकलीफ दिए, ठीक में उपयोग करो — अच्छे में गए तो भी फंसोगे, बुरे में गए तो भी।
मान की इच्छा। ज्यादातर हम आवरण का उपयोग जरूरत में न करके मान के चक्कर में करते हैं, और मान का चक्कर हमें बहुत ज्यादा गिराता है। जहां भी जाते हैं, आसन से लेकर बैठने और बोलचाल तक, सब अपने तरीके से सामने वाले से उम्मीद करते हैं — लोग रिस्पेक्ट करें, इज्जत दें, अच्छा आसन मिले। मान-बढ़ाई की इच्छा जब तक रहेगी, भटकना होता रहेगा; इससे आप ही समझदारी से छुड़ा सकते हो, और कोई नहीं — तभी अपने आप में जी पाओगे। त्याग नहीं करोगे तो अनेक पिंडों में फंसे रह जाओगे, क्योंकि सबका भाव अलग-अलग है, हर जगह बर्ताव आपके तरीके से नहीं मिल पाएगा। तो शरीर के पोषण के लिए भोजन करो, स्वाद मिले न मिले, न अच्छे में जाओ न बुरे में।
पहले इच्छा की परिभाषा बताओ, क्योंकि आप कई बार कह चुके कि यह ऊपर वाले ने बनाया है। जब आपको स्व का ही नहीं पता कि वह कहां से पैदा हुआ, तो आप सृष्टि के बारे में कुछ भी नहीं बोल सकते — जो व्यक्ति अपना परिचय नहीं बता सकता, वह प्रकृति के बारे में जो बोलेगा वह एक तुक्का होगा। कृपया तुक्के वाली बात मत करो, फंस जाओगे, उलझ जाओगे।
चैतनता नहीं, चैतन्य — आप चैतन्य हो। हम चैतनता इसलिए बोलते हैं कि हमने खुद इस पिंड को चेतन नहीं किया, किसी की चैतनता की वजह से यह पिंड चेतन हुआ है; अगर मैंने किया होता तो मैं मरता नहीं। इस ब्रह्मांड में जड़, चेतन और चैतन्य हैं — जड़ वह जो अपने से चल-बोल नहीं सकती, चेतनता उसमें भी है फिर भी उसे जड़ नाम देते हैं। अभी तो स्व तक पहुंचना है — उसके लिए पहले यह बताओ कि स्व से हम बाहर कैसे गए?
ध्यान से सुनो — यहां इच्छा नहीं है, यहां जरूरत है। हम जरूरत में इस पिंड में आए, पहले जरूरत में मांग की, उसमें न राग था न द्वेष। जब जरूरत को अपने तरीके से पाने की कोशिश की, तब मैं फंस गया — जब योग्यता से ज्यादा चाहिए, सामने वाले ने दे दिया तो राग में फंसा, नहीं दिया तो द्वेष में। यही है इच्छा। भिन्न कैसे हुआ? ज्यादा पाने के चक्कर में — इस पॉइंट को जीवन में नोट कर लेना। जब तक वह जरूरत में जिया, राग-द्वेष में नहीं फंसा, अपने आप में ही था। बंधन राग-द्वेष का है, और राग-द्वेष तब पैदा होता है जब योग्यता से ज्यादा मिलता है या नहीं मिलता। तो योग्यता से ज्यादा पाने की उम्मीद का त्याग कर दो — आगे बंधन नहीं बंधेगा, और पिछला जितना किया है, उससे ईमानदारी-सत्कर्म से जीवन जिओगे तो निकल जाओगे। यह सीधा है।
फिर जा सकता है, उसकी स्वतंत्रता है — किसी ने अपराध किया, कैदखाना हुआ, छूटा; वह चाहे तो फिर अपराध करके जेल जा सकता है। यह आपके ऊपर है, आपके हाथ में है; जब चाहो अपने आप को भ्रष्ट कर दो — वह आपकी गलती है, आप करो, भोगो। सारी गलतियां हम समझ के ही तो कर रहे हैं, अभी भी — तो छोड़ दो ना। आपको कर्ता का अधिकार दिया गया है; पृथ्वी पर किसी अन्य जीव को न पाप लगता है न पुण्य, बस मानव फंसा है। इच्छा हम पैदा करते हैं — पहले जरूरत थी, बाद में इच्छा आई, इच्छा अपने आप नहीं आई; इसीलिए तो इच्छा से मुक्त होना है। कितने महापुरुष हुए, उन्होंने भी भोजन मांगा, स्वाद भी मिला होगा; पर जब योग्यता से ज्यादा चाहिए, तब इच्छा पैदा करनी पड़ती है, और अपने तरीके से मिला तो सुख, नहीं मिला तो दुख।
जब तक स्व को पहचानता नहीं, तब तक उसकी इच्छा संपूर्ण होगी नहीं। कौन पहचानेगा? खुद पहचानेगा — लेकिन बाहर झांकने से स्व नहीं मिलेगा। स्व में आ जाएगा तो बाद में वह नहीं पकड़ सकता; और स्व में तब आएगा जब इच्छा-अपेक्षा से मुक्त होगा, उसके पहले आ ही नहीं सकता। तो अपनी इच्छा-अपेक्षा से छुड़ा लो। ध्यान रखना, बंधन एक से नहीं होता, दो से होता है — इच्छा, और बदले में रिटर्न की अपेक्षा; दो रस्सी से गांठ लगती है, एक से नहीं।
जब आ जाओगे तो पता चल जाएगा — जिसे आ जाएगा, उसे पता चलेगा। साबित करना ही नहीं है; साबित कुछ भी नहीं किया जा सकता। साबित करने की जरूरत क्या है? जिसको निकलना है, उसे हमने मार्ग बता दिया — जाना है तो जाए, नहीं तो मत जाए। साबित वो करेगा जिसे कुछ चाहिए। आपको छूटना है तो काम करो।
इच्छा-अपेक्षा आती नहीं, वह पैदा करता है — तो पैदा मत करो, पैदावार बंद करो, यह आपके बस में है। करोगे तो फंसोगे। कोई ईमानदारी अपनाकर मुक्त हो गया और कहे मैं फिर से बेईमानी करूंगा, तो फिर वहीं आओगे। कोई गटर में गिरा, उसे शुद्ध जगह स्नान करा दो और वह कहे मैं फिर गटर में जाकर नहाऊंगा — अशुद्ध हो जाओगे, कोई क्या करे? आपको निकलने का मार्ग बताया जा रहा है; निकलना है तो उपयोग करो, नहीं तो मत करो। जिसको मोक्ष चाहिए वह यह काम करेगा; कोई आपको विवश नहीं कर सकता। जितनी आपकी सामर्थ्य है उतना काम करो; सामर्थ्य से ज्यादा करोगे तो कोई सहयोग करेगा, और सहयोग होते ही राग-द्वेष में गए — सामर्थ्य में न राग होगा न द्वेष। क्यों योग्यता से ज्यादा चाहिए? जो चाहिए उसके लिए योग्य बनो, खुद मेहनत करो।
हम समाज को देखते हैं कि मेरे पास कम है, इनके पास ज्यादा — इसी चक्कर में, मान और बढ़ाई के चक्कर में इच्छा पैदा कर लेते हैं, नहीं तो हमें जरूरत नहीं है। जितने ब्रांडेड कपड़े पहनते हैं, क्या वह हमारी जरूरत है? वह लोगों की जरूरत है, क्योंकि लोगों से हमें मान चाहिए; हमें तो तन ढकने के लिए कपड़ा चाहिए। दुकान पर कभी कहा कि शरीर के लाभ के लिए कपड़ा दो? ज्यादातर आवरण को मजबूत करते हो — कपड़े, गाड़ी, घर के द्वारा अच्छा दिखना चाहते हैं, इसी में फंसे हैं। अपने लिए, बस रहने के लिए घर तो मजबूरी में झोपड़ी वाले बनाते हैं; जितने महल बनते हैं, मान के चक्कर में बनते हैं। जब हम जरूरत में जिएंगे तो फंस नहीं सकते। इसी दुनिया में लोग आनंद में जिए — इच्छा-अपेक्षा से अपने को मुक्त करा लिया, सिर्फ जरूरत में जिए और निकल लिए। इच्छा-अपेक्षा मेरी पैदावार है, तो बंद कर दो।
आपको इतना पता होना चाहिए कि मृत्यु है ही नहीं — यह तो इच्छा-अपेक्षा की मृत्यु है; न जन्म है न मृत्यु। शरीर का नाश नहीं होता, रूप का नाश होता है — शब्द एक जाल है, एकदम सोच-समझकर सुनो, बोलो और समझो। शरीर और रूप अलग-अलग हैं; यहां कुछ भी नाश नहीं किया जा सकता, बस रूप का नाश होता है — जो पहले नहीं था, अभी है, बाद में नहीं रहेगा। शरीर का तो रूपांतर हो जाएगा, उसका अस्तित्व रहेगा; रूप का अस्तित्व नहीं रहेगा। इसीलिए कहा गया जगत मिथ्या — जीव किसी शरीर में नहीं, रूप में फंसा है, मिथ्या में फंसा है। इसे गहराई से समझकर बुद्धिमानी से अपने आप को निकालो।
नहीं समझ में आए तो बोलिएगा कि कहां नहीं समझ में आ रहा — हमारा काम ही समझाना है, क्योंकि समझेंगे तभी निकल पाएंगे। किसी से पता पूछा और वह भाषा आपको नहीं आती, तो वह सही बता रहा हो तब भी आप आगे नहीं जा पाओगे — आपको आपकी भाषा वाला आदमी चाहिए। मेरे समझने से आप नहीं समझ पाओगे, आप समझोगे तभी यात्रा होगी; नहीं समझा और कह दिया समझ गए, तो अपने आप से धोखा कर रहे हो। मेरे पास समझाने के अनेक तरीके हैं — जैसे समझने के लिए तैयार हो, वैसे समझा दूंगा; तैयार नहीं हो तो मैं भी कुछ नहीं कर सकता, किसी पर थोप नहीं सकता, क्योंकि सबको कर्ता का अधिकार है, सब स्वतंत्र हैं।
इच्छा — जैसे योग्यता से ज्यादा चाहिए: दुकान पर गए, पैसे कम थे, उधार मांगा; दे दिया तो अच्छा, नहीं दिया तो बुरा — दिया तो राग, नहीं दिया तो द्वेष, बस यही है जिंदगी। जितना पैसा था उतने का सामान चाहिए होता, तो न राग न द्वेष, सामान लेकर चले आते। अपेक्षा — किसी के लिए कुछ किया और अपेक्षा बना ली कि वह भी हमारे लिए करेगा; करता है तो सुख, नहीं करता तो दुख। इन दोनों से मुक्त होना है, और यह आराम से हो सकता है, क्योंकि आपने पैदा किया है — जिंदगी जीने में इच्छा-अपेक्षा की कोई जरूरत नहीं। हां, मान-सम्मान का चक्कर रहेगा तो हर जगह इच्छा-अपेक्षा करनी पड़ेगी।
इच्छा और अपेक्षा ही सुख और दुख हैं — हमारे तरीके से हुआ तो सुख, नहीं हुआ तो दुख। न सुख है न दुख, न अच्छा न बुरा, न सच न झूठ — यह हमारी पैदावार है। हम इस जगत में नहीं फंसे; इस जगत में हमने अपना एक जगत बनाया है, उसमें फंसे हैं — सबका अपना-अपना जगत है, सब अपने-अपने जगत में रो रहे हैं, अशांत हैं। सामने से अर्थी निकल जाती है, आप कहते हो इसकी आत्मा को शांति मिले, कोई दुख नहीं होता; पर पता चले कि वह आपके परिवार का सदस्य है, तो दुख हो जाएगा। सुख-दुख "मेरा" में है, और मेरा का भाव वहीं है जहां पांच इंद्रियों — शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श — में से कुछ मिलता है। किसी अनजान व्यक्ति से बिना परिचय के सुख-दुख पैदा ही नहीं कर पाओगे; परिचय हो, उसकी आवाज या रूप मेरे तरीके से है तो सुख, नहीं तो दुख — बस इतनी-सी बात है।
मैं तो कह रहा हूं बहुत आसान है। खाने के बाद पानी पीना तो जरूरत है, अपेक्षा नहीं। रिटर्न पाने की इच्छा को अपेक्षा कहते हैं — आपने किसी के लिए कुछ किया, उसके बाद उम्मीद रख ली कि वह भी मेरे लिए करेगा। पर पानी यही होना चाहिए, ब्रांडेड होना चाहिए — यह आपको दुख देगा: मिल गया तो सुख, नहीं मिला तो दुख। बस समझ लीजिए — योग्यता से ज्यादा पाने की जरूरत क्या है? जरूरत में जियो, जितनी आपकी सामर्थ्य है उसमें जियो; कुछ चाहिए तो उसके लिए काम करो — बात खत्म। मुश्किल तो हमने बना दिया है।
जितने लोगों ने छोड़ा — हम भी तो गृहस्थ से ही आए हैं, क्या आसमान से गिरे हैं? किसी मां-बाप से मेरा जन्म हुआ, मेरे भी भाई-बहन थे, और हमने अपने आप को निकाला। बच्चे को सिखाने वाला कहता है एकदम सरल है, क्योंकि कह दो "बहुत जटिल है, तुम नहीं सीख पाओगे" तो उसका आत्मविश्वास गिर जाएगा — हमें आपके आत्मविश्वास को ऊपर उठाना है, गिराना नहीं। हां, यही माध्यम है, और कोई माध्यम नहीं; जब तक इसे नहीं छोड़ोगे, हो भी नहीं पाएगा, क्योंकि इच्छा-अपेक्षा में ही तो आप बाहर हो, अनेक पिंडों में फंसे हो — और यह आप ही कर सकते हो। तरीका आसान है: योग्यता से ज्यादा पाने की उम्मीद का त्याग करो; कुछ चाहिए तो उसके लिए काम करो, मेहनत करो। मैं यह नहीं कहता जितना है उसी में जियो — जितना चाहो उतने में जियो, लेकिन वह आपका होना चाहिए, आपकी ताकत से; कमजोरी में ज्यादा पा गए तो राग-द्वेष अपने आप हो जाएगा।
कठिन तब था जब आपको यह बताया नहीं गया था, मालूम नहीं था। मेरे लिए भी कठिन था — लोग बोलते थे मेरा, कर्ता, राग-द्वेष, इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो जाओ, लेकिन कैसे छूटे यह नहीं बताते थे। प्रत्यक्ष ज्ञान के द्वारा मैंने इसे एकदम सरल कर दिया: बता दिया कि कैसे पैदा होता है और कैसे पैदा नहीं होगा — योग्यता से ज्यादा पाने की उम्मीद का त्याग कर दो, पैदा ही नहीं होगा। मैं यह नहीं कहता राग-द्वेष छोड़ो, मैं कहता हूं पैदावार खत्म करो; पैदावार चलती रही और साथ में छुड़ाने का प्रयास भी करते रहे तो जीवन अशांत रहेगा। एक बार पैदा होना बंद कर दिया, तो आगे अपने आप छूट जाएगा।