प्रश्नोत्तर P21-0053 · भाग 21
गुरु जी, कुछ लोग कहते हैं कि जिस चीज का मोह हो उसे इतना कर लो कि मोह अपने आप खत्म हो जाए — क्या यह सही है?
करने में खत्म नहीं होगा, देखने में खत्म होगा; करने में तो लिप्त हो जाओगे। जिसको आप देख रहे हो वो बदल रहा है — अगर वह स्थिर होता तो आप भी स्थिर हो जाते; रुकोगे कैसे, कहां रुकोगे? स्थिर अस्थिर में फंस गया और उससे अपने आप को पूर्ण करना चाहता है — यही उसकी अपूर्णता है; कुछ पाना ही अपूर्णता है। करने में भटकाव है, देख के करने में मुक्ति। उचित है तो करो, अनुचित है तो त्याग करो। क्या आप उम्मीद रखते हो कि कोई आपके साथ बेईमानी करे? तो आप भी मत करो — एक बेईमान भी बेईमान को पसंद नहीं करता। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श शरीर की जरूरत है, ये मुझे किसी न किसी तरीके से देना पड़ेगा — तो ईमानदारी से दो, बेईमानी से मत। अगर आप बेईमानी कर रहे हो और दूसरे भी आपसे कर रहे हैं तो उसे भी स्वीकार करो। बेईमानी में मेरा होता है और ईमानदारी में आप होते हैं; ईमानदारी अपने आप होती है, बेईमानी करना पड़ता है। खूब जियो, खूब खाओ, खूब पियो, लेकिन उसमें ईमानदारी होनी चाहिए — ईमानदारी में आपसे कभी ना कभी मिलना हो जाएगा, बेईमानी में कभी नहीं, क्योंकि बेईमानी मेरा में हो रहा है और मेरा हमेशा बदल रहा है। भोग के आप मुक्त नहीं हो सकते, समझ के मुक्त हो सकते हो, क्योंकि भोग का अंत नहीं है — जिसे भोग रहे हो वह परिवर्तनशील है। बेईमानी माया है, जगत माया थोड़ी है — महापुरुषों ने भी खाया-पिया, धन का उपयोग किया, उसे लोगों में खर्च किया। बस बेईमानी बंधन है, ईमानदारी मुक्ति है — ये पूरा सार है, इसी को पकड़ लो।
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वीडियो: ध्यान में ध्यान कैसे करें ? · 2026-07-01