प्रश्नोत्तर P21-0097 · भाग 21
गुरु जी, आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए — तो फिर हम अपने हक के लिए क्यों लड़ें?
कुछ नहीं चाहिए — लेकिन क्या नहीं चाहिए? जरूरत के लिए तो चाहिए ना; पशु-पक्षी जरूरत में जीते हैं। कुछ नहीं चाहिए मतलब — जितनी हमें जरूरत नहीं उससे ज्यादा हमने इकट्ठा कर लिया है और उसे मेंटेन करने में परेशान हैं, वो नहीं चाहिए। घर में देखना — बर्तन, कपड़े जरूरत से ज्यादा होंगे और उसी में आप परेशान हो। जितने में मैं जी सकूं उतना ही मुझे चाहिए; तब आप अपने आप को समय दे पाओगे। मेहमान आते ही कपड़े बदलने लगते हो — आपके दो चेहरे हो गए, अपने लिए अलग, समाज के लिए अलग। प्रत्यक्ष में आ जाओ; आवरण को मत बदलो, आवरण का उपयोग करो जरूरत में। इस शरीर को हटा, बता तुझे क्या चाहिए? तू देखेगी तो तुझे कुछ नहीं चाहिए — और कुछ नहीं परमानंद है। इन वस्तुओं के लिए तू कितना गिड़गिड़ाई — मां-बाप, पति, बच्चों, दुकानदार के सामने; अब अपने लिए गिड़गिड़ा, उस परम सत्ता से प्रार्थना कर कि मेरे कल्याण के लिए मुझे क्या करना है — अकेले में उसके लिए आंसू आने चाहिए। रात को सोते समय तू सस्ता कपड़ा पहनकर चैन से सो जाती है; जरूरत से ज्यादा जैसे ही रहा, उसे संभालने में ही जिंदगी नरक हो जाती है। कोई किसी को कभी पूरी तरह खुश नहीं कर सकता — तो यह बनावटी जिंदगी छोड़ो, शरीर को जितनी जरूरत है उतना दो, तब मुक्ति और मोक्ष के रास्ते पर चल पड़ोगे।
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