प्रश्नोत्तर P21-0098 · भाग 21
गुरु जी, जीवन में सत्संग भी है, ईमानदारी भी है और आत्मचिंतन भी — इसके अलावा कोई और तप भी करना पड़ेगा, तब उपलब्धि होगी?
तूने ईमानदारी भी पकड़ी, सत्संग भी पकड़ा, आत्मचिंतन भी — लेकिन सत्कर्म को पकड़ा ही नहीं। पहले वो पकड़, कुछ दिन कर, फिर मिल। ये पकड़ेगी तो पक्का होगा, उपलब्धि इसी जन्म में हो जाएगी; जब वाल्मीकि जैसे, अंगुलिमाल जैसे, कालिदास जैसे महामूर्ख को हो सकता है तो तुझे क्यों नहीं होगा? जरूरतमंद की सेवा करना ही तो तप है — अगर हम किसी गिरे हुए जरूरतमंद को उठा रहे हैं, उसे ले जाने में थक जाते हैं, तो उसमें शरीर का बल खर्च हो रहा है, यही तपस्या है। जैसे बीज में वृक्ष छिपा है, फूल में सुगंध छिपी है — तोड़ोगे तो कुछ नहीं मिलेगा — वैसे ही ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग में तप छिपा हुआ है। ये तीन करेगी तो तप हो जाएगा, तप अलग से करना नहीं पड़ता।
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