प्रश्नोत्तर P3-0113 · भाग 3
गुरुदेव, आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए, और फिर यह भी बोलते हैं कि यहां 200-300 करोड़ का काम होगा, 100 रूम बनेंगे — तो क्या यह चाहने में नहीं आ गया? लोक कल्याण भी तो एक चाहत हुई?
यह चाहने में कैसे आ गया? अपने लिए थोड़े ही मांग कर रहे हैं — विश्व कल्याण के लिए, और देखने के लिए भी नहीं रुकने वाले। इस चाहत में बंधन नहीं है — हो तो ठीक, न हो तो ठीक। चाहत में बंधन नहीं, क्योंकि वह उसके लिए मांग रहा है जिसे वह जानता नहीं। जानने वाले के लिए तो लोग मांगते ही हैं — आप लोग वही कर रहे हो, अपनी पीढ़ी के लिए। जो जिसे जानता नहीं उसके लिए मांग रहा है, वह मांग अलग हो गई। वह उन लोगों की व्यवस्था में पागल की तरह लगा हुआ है जिन्हें वह जानता तक नहीं; मांग ही नहीं रहा, उनके लिए रात-दिन काम कर रहा है। हम अपने परिवार के लिए काम कर रहे हैं; वह बनाकर छोड़कर आगे निकल जाएगा, उसे नहीं पता कौन उपयोग करेगा, कितने लोगों का कल्याण होगा। इस मांग में बंधन नहीं — इच्छा होकर भी इच्छा नहीं है, उम्मीद होकर भी उम्मीद नहीं है। यह जो मांग है, वह सारी संसारी मांगों से अलग करती है।
उसके पास जितना है — धन, तन, ज्ञान — लेकर खड़ा है और अपने आप को भी इसी में खत्म कर रहा है। और मांगकर भी लोगों से नहीं मांग रहा; यहां किसी से एक बार भी नहीं कहा कि आप कुछ सहयोग या सहायता दें। ऑनलाइन मैंने इतना ही बोला कि ईमानदारी का हो तो सहयोग देना, बेईमानी का हो तो मत देना, और जांचकर देना — क्योंकि आप काम को दे रहे हो, मुझे नहीं; जांचने के जिम्मेदार आप होंगे, फॉल्ट लग रहा हो तो मत देना। मांगकर भी मांगता नहीं, बोलकर भी बोलता नहीं, कहकर भी कहता नहीं, करके भी करता नहीं। यह मांग बंधन से परे है, लोक कल्याण के लिए है — कौन आने वाला है, मालूम नहीं। बंधन तब होता है जब आपको पता है कि किसके लिए मांग रहे हो — 'मैं मेरे बच्चे के लिए कर रहा हूं', वह बंधन है। जिसे जानता नहीं उसके लिए कर रहा है, वह बंधन हो ही नहीं सकता।
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