प्रश्नोत्तर P3-0114 · भाग 3
संजय को भी तो दिव्य दृष्टि दी गई थी और उसने पूरी गीता धृतराष्ट्र को सुनाई — फिर संजय को ज्ञान क्यों नहीं हुआ, केवल अर्जुन को क्यों? (गीता में एक अध्याय 'संजय उवाच' क्यों?)
संजय को युद्ध देखने के लिए दृष्टि दी गई थी। अर्जुन को अलग से दिव्य दृष्टि दी थी; वह दृष्टि संजय को नहीं दी थी — देखने वाला सिर्फ अर्जुन था। अभी भी तो लोग गीता बांचकर बता रहे हैं — क्या उन्होंने यह देखा है, क्या वे उस स्तर पर हैं? पढ़कर बता दे रहे हैं। अगर ऐसा होता तो संजय को भी ज्ञान हो जाता। संजय तो 'कुछ चाहिए' में थे — युद्ध को देखकर बताना है। संजय तीन में खड़े थे; अर्जुन तीसरे से छूटकर दो में आ गए थे — एक कृष्ण और एक अर्जुन। बस परमिशन कृष्ण से लेनी थी, और फैसला सुना दिया था — नहीं करूंगा, बात खत्म; फैसला कृष्ण के बस में नहीं था। जब कोई भी फैसला कर देता है कि कुछ नहीं चाहिए, फिर वह एक हो जाता है। अर्जुन ने कृष्ण से पूछा नहीं, रख दिया। अर्जुन ने वहां अपने अलावा किसी की बात भी नहीं रखी — राम उनके पहले थे, अर्जुन ने राम की बात भी नहीं रखी; दो की बात होगी तभी उपलब्धि होगी। इसलिए मैं कहता हूं, तीसरे को हटा दो। जब अर्जुन लायक हो गए, 'कुछ नहीं चाहिए' में आ गए, तब कृष्ण बताने लगे, और बताते-बताते उस स्थिति में भी जा रहे थे।
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