प्रश्नोत्तर P4-0042 · भाग 4
(लाइव) गुरु जी प्रणाम। क्या सच्चा इंसान होना ही ईमानदारी-सत्कर्म में जीना है? और क्या ईमानदार भी बेईमान बन सकता है?
नहीं। सच्चा इंसान है, तो कहीं झूठ में भी पड़ा है; सच-झूठ अलग-अलग है। सच्चा इंसान कभी झूठा भी हो जाएगा। देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में व्यक्ति अगर पूरी तरह ईमानदार बन गया, तो फिर वो ईमानदार हो गया — वो सच्चे से भी आगे निकल गया। सच्चा इंसान तो समय आने पे बदल भी सकता है; सच-झूठ हमेशा बदलता रहता है। तो सच-झूठ में जीने वाला व्यक्ति कब किस तरह पलटी मार देगा, पता नहीं। लेकिन ईमानदार व्यक्ति अगर एक बार ईमानदार हो गया, तो फिर वो सच-झूठ से परे जी रहा है। क्योंकि आप देखो — कभी कोई गलत आदमी आपके लिए सही होता है, कभी सही आदमी गलत होता है; सच-झूठ हमेशा बदलता रहता है।
बेईमान कब कहलाता है? जब आदमी सच-झूठ में पड़ा रहता है। सच-झूठ से ऊपर है ईमानदारी। ईमानदार व्यक्ति सच-झूठ से ऊपर आ गया। अब ऐसा नहीं कि आपने ईमानदारी पकड़ ली थी (तो गिर नहीं सकते) — बेईमानी करोगे तो बेईमान हो जाओगे; ये आपके ऊपर है ना, सारा खेल तो आपके ऊपर है। जिस तरफ आप यात्रा कर रहे हो, आप तो कभी वहां थे। सच-झूठ में अगर कोई जी रहा है, मतलब वो अभी ईमानदार नहीं है। सच-झूठ से आगे है ईमानदारी। आपने ईमानदारी को पूरी तरह पकड़ लिया, मतलब बेईमानी का त्याग कर दिया; तब ऐसा नहीं कि (गिरने की) संभावना नहीं — वो आपके ऊपर है। आपसे कोई बेईमानी अब करवा नहीं सकता है; लेकिन अब वो आपके ऊपर है — अगर आप बेईमानी करना चाहते हो, तो आप कभी भी जा सकते हो। गिरने की संभावना कभी भी बन सकती है; आप अपने आप को कभी भी गिरा सकते हो, नहीं तो आप गुलाम हो जाओगे ना फिर।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01