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प्रश्नोत्तर P4-0090 · भाग 4

(लाइव) प्रणाम गुरु जी। अगर हम (कहीं और) सत्संग भी जाते हैं और आपका भी सत्संग सुनते हैं, तो क्या यह सही है? क्या करें, मार्ग दिखाएं।

ना सही है, ना गलत है। आप लाभ लीजिए — अपना आत्मिक कल्याण कैसे होगा। कहीं भी जाइए। प्यास बुझानी है, किसी भी नल का पानी पीजिए। ज्ञान लेना है मुझे — अगर कोई मिल गया, दे रहा है, तो ले लेंगे। और ज्ञान किसी एक का नहीं होता। जैसे पानी पृथ्वी के अंदर से आता है — पानी तो एक ही जगह से आता है, स्रोत अलग-अलग (दिखते) हैं। तो ज्ञान एक ही जगह से आता है, दो जगह से नहीं। हमें ऐसा लगता है कि मेरे नल का पानी है और ये उसके नल का; अगर देखा जाए तो दोनों के नल का स्रोत एक ही है। तो वैसे गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है; ज्ञान एक ही जगह से आता है। ज्ञान कहां से आता है, अब ये समझना है। (कोई) किताबों से भी जानकारियां उठा के दे रहा है। अब जैसे पानी पृथ्वी से भी आता है, ऊपर से भी आता है, और आपकी टंकी से आता है — तीन ही जगह से है। तो एक किताबी ज्ञान है, एक महापुरुषों की वाणियां हैं, और एक सतगुरु का ज्ञान है। अब देखिए, जमीन से (पानी) निकालो तो जब तक आपके पास ताकत है, बिजली वगैरह, तभी तक आप निकाल सकते हो। टंकी का — आपने जितना संचय किया है, उतना निकाल सकते हो। जैसे किताब से आप खूब बोलोगे, लेकिन जब तक शरीर के द्वारा पढ़ सकते हो, तभी तक बोल पाओगे; और कुछ आपने कंठस्थ किया है, फिर उतना बोल पाओगे। एक होता है आत्मज्ञान — बारिश की तरह। अगर आप किसी पेड़ की सिंचाई जमीन के पानी से करो या टंकी के पानी से, तो उसे पूरी तरह नहीं सींच सकते। लेकिन जब वर्षा होती है तो वृक्ष के कोने-कोने में जाता है। यही है सतगुरु की वाणी। (कहा है —) 'सतगुरु हमसे रीझ कर कहा एक प्रसंग, बरसा बादल प्रेम का, भीग गए सब अंग।' जब आत्मज्ञान से, आत्मा से ज्ञान निकलता है तो आपके रोम-रोम में समाता है; और जब रटा-रटाया ज्ञान निकलता है तो बस आपके कानों से जाता है, उससे बदलाव नहीं आता। इसीलिए हमें कहा गया है कि जीवंत गुरु ढूंढो — वो वर्षा की तरह आपको भिगो देगा। अब हमें वर्षा में रहना है। पता चला बारिश तो हो रही है, लेकिन हम तल्ला-मकान बना के अंदर खिड़की बंद करके बैठे हैं। भीगने के लिए उसके सानिध्य में जीना पड़ेगा, इर्द-गिर्द रहना पड़ेगा — पता नहीं कब बरसे। जैसे तानसेन संत हरिदास जी के शिष्य थे। अकबर ने कहा — तानसेन, तुम जैसा कोई नहीं। बोले — ना ना, मैं तो बस कुछ मुद्राओं के लिए गाता हूं, मान के चक्कर में; मेरे से भी आगे कोई है — मेरा गुरु। बोले उन्हें भी बुलाओ। बोले — वो तुम्हारे लिए गाएंगे ही नहीं, वो तो उस परम सत्ता के लिए गाते हैं; जब उनकी मौज होगी, तभी गाएंगे। तब वो दोनों कई दिन तक आसपास छुप के रहते हैं, और एक समय आधी रात को (सुनने को मिलता है)। इसीलिए कहा गया है कि जीवंत गुरु की शरण में जाना और रुकना। अब तुम घर से निकले, बारिश आई, तुरंत घर में चले गए — भीगे, लेकिन पूरी तरह नहीं। भीगने के लिए उसके सानिध्य में रहना पड़ेगा ना। वर्षा हो रही है तो उस वर्षा का दर्शन करने से थोड़ी भीग जाओगे। तो इसीलिए कहा गया है कि जीवंत गुरु के सानिध्य में रहो, तर जाओ। इतिहास में जितने भी जीवंत गुरु हुए, देखो — उनके पास आए तो लाखों-करोड़ों लोग, लेकिन टिका कोई-कोई, क्योंकि वहां पे रस नहीं मिलता ना। तो वो कहता है — आपकी कृपा है, और रस लेने मैं आगरा जा रहा हूं। अगर तू समझ ही गया कि इसके द्वारा मेरा कल्याण हो जाएगा, तो उससे दूर क्यों जा रहा है? क्या वो भगा रहा है? कोई विवशता है, व्यवस्था है, तो उसको पूरा करके आ, लेकिन गुरु को बोल के जा — तू रसपान करने मत जा। तो हमारे अंदर बड़ी चालाकियां हैं। जीवंत गुरु का सानिध्य बहुत लोगों को मिला है, इतिहास उठाओ, लेकिन कल्याण इक्का-दुक्का का हुआ है — जो चालाक नहीं था, उसने पकड़ लिया गुरु का सानिध्य कि भैया अब रहेंगे तो तरेंगे तुम्हारे साथ ही। और आप जिसका साथ पकड़ोगे, वो जहां पहुंचेगा, तुम भी पहुंचोगे। जैसे युधिष्ठिर के साथ कुत्ता — साथ मत छोड़ो। कहानी कहती है, जब गेट पे पहुंचे तो (कहा गया) तुम आ सकते हो, कुत्ता नहीं। (बोले) कुत्ता नहीं आया तो मैं भी नहीं आऊंगा, क्योंकि ये मेरे साथ था। तो आप जिसके साथ रहते हो ना, वो आपको अपने जैसा बना देगा; वो जहां जाएगा, आपकी एंट्री पक्की। तो साथ का असर इतना है — संगत से रंगत होती है।

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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25