प्रश्नोत्तर P4-0162 · भाग 4
(वही साधिका) आपने कहा कि नियमों में रहकर शिष्यत्व की पात्रता अपने आप आ जाती है, फिर गुरु परीक्षा लेता है। जैसे बाबूलाल भाई — वे सेवा में इतने लगे रहते हैं कि साधना में बैठ नहीं पाते, और आपने कहा था कि उन पर विशेष कृपा है, वे इसी ढंग से तर जाएंगे। पहले गुरु 12-12 साल रखते थे; अब तो आदमी की उम्र भी उतनी नहीं। तो क्या यह 12 साल का समय जरूरी है?
वो कभी भी हो सकता है। 12 साल भी तो उसने (लगभग) रखा — कि 12 साल लगभग हम तुम्हें जांचेंगे; हो सकता है कि मैं तुम्हें एक ही दिन में (स्वीकार कर लूं)। तो जांचने वाले के ऊपर है ना कि कब वो चढ़ा देगा; तो क्षमता को देख के चढ़ाएगा। और जांच वो हर वक्त रहा होगा।
अब देखिए, मैं आपको बता रहा हूं — आप लोग कहते हो (इनका) बहुत समर्पण है। अब जैसे ही बात हुई, ये सकपका गईं। जब इन्होंने मेरे पास समर्पण ही कर दिया था, तो सकपकाना ही नहीं चाहिए — शरीर का कुछ भी हो जाए, मुझे तो आत्मज्ञान चाहिए; शरीर सड़ जाए, सड़ जाए; हम तो आपकी शरण में हैं, आप जहां फेंक देंगे, वहां। लेकिन घबरा गईं — इसका मतलब पूरी तरह समर्पण नहीं हो पाया, समझ नहीं पाईं। (समर्पण होता तो कहतीं —) हम तो आपकी शरण में आ ही गए हैं, आप कह देंगे जाओ, तो हम चले जाएंगे। (भैया, समर्पण वाला कहेगा —) हमारा शरीर काम नहीं किया — बहुतों का शरीर सड़ेगा, हम उसे देखेंगे; अगर जिसके पास हम गए हैं, वो मुझे सड़ते हुए देखना चाहता है, तो उसकी खुशी में हमारी खुशी — ऐसे को समर्पण कहेंगे ना। लेकिन हमने तो प्रश्न खड़ा कर दिया कि आप मेरी सेवा भी करोगे? तो आपको आत्मज्ञान चाहिए कि मेरी सेवा चाहिए, ये बताओ पहले। दो में से एक फैसला करो — कि मैं आपके शरीर की सेवा की जिम्मेदारी लूं, या आपको आत्मज्ञान (कराने) की जिम्मेदारी लूं? कौन सी जिम्मेदारी लूं? अभी तो वो जुबान से कह रहे हो; परिस्थितियां बताती हैं। क्योंकि शरीर भी जर्जर होगा। अब उसके दिमाग में दो चीजें आपने डाल दीं — कि मुझे आत्मज्ञान की तरफ भी बढ़ाओ, और मेरे शरीर की सेवा भी आपको करनी है — अब वो क्या करेगा? इसका मतलब वो शिष्य-भाव आया ही नहीं; पहली बार परीक्षा ली और उसमें फेल हो गई। नहीं तो कहती कि आपकी शरण में हूं, आप मुझे कहेंगे वापस जाओ तो हम वापस चले जाएंगे, (चाहे) वो लोग स्वीकार ना करें, हम कहीं और जाएंगे, क्योंकि हो सकता है मुझे भेजने में ही मेरा कल्याण हो। और जो भेज रहा है, उसको भी तो मेरा हाल पता होगा ना कि मैं कहां जाऊंगा — मैं उसके पास लंबे समय से रह रहा हूं, तो उसको तो पता है कि मेरे पास्ट में क्या है। जहां वो भेज रहा है, वहां मैं चला जाऊंगा, भले वहां मेरा अपमान होगा — हो सकता है उसी में ज्ञान हो जाए, कुछ आसक्ति बची हो, वो सेवा में टूट जाए। तो ये तो पूरा उसके ऊपर छोड़ना चाहिए ना कि वो क्या करेगा। आप तो इतने चालाक हो कि पूरी सुरक्षा उससे ले ली — तो फिर आत्मज्ञान तो शब्दों में है, (असल में) बुढ़ापे का सहारा बन गया, बस। आत्मज्ञान हो जाए तो ठीक है, लेकिन शरीर की रक्षा-सेवा आपकी जिम्मेदारी — शरीर खुश होना चाहिए, (क्योंकि) हम शरीर पे टिके हैं। उस समय मैं आपके चेहरे को देखा — हम तो थोड़ा और (परीक्षा) लेते, लेकिन आप घबरा (गईं) — जाने दो, कि बर्दाश्त करने की क्षमता ही नहीं है; क्योंकि अभी हमारा कुछ फैसला ही नहीं आया था, तभी डगमगा गए।
मैं तो कहता हूं, व्यक्तिगत बात ही ना करो, सार्वजनिक बात करो। हम सार्वजनिक ही बता रहे थे, तो (अपनी बात) वहां रखनी ही नहीं चाहिए थी; ये कहलवाने की जरूरत ही नहीं थी। मुझसे कहलवा दिया, तो मैंने कहा — यार, तुम्हें इतना भी भरोसा नहीं है मुझ पे? मुझे कहना पड़ा कि हम तुम्हारी जवाबदारी लेते हैं — उस स्थिति में कहना पड़ा, जब (आप) ज्यादा डगमगा गईं, कि कहीं बेहोश ना हो जाएं। अगर मैं नहीं कहता तो आप तो घबरा जातीं — घबरा गई ही थीं। फिर आत्मज्ञान के लिए क्या आए थे?
(साधिका ने कहा, लगा फिर फैमिली की तरफ जाना पड़ेगा —) तो हो सकता है वो उस स्थिति में आपको भेजे कि जा तू वहीं, और वहीं तेरा कल्याण होगा। जैसे बुल्ले शाह — बुल्ले शाह को घर किसने भेजा था? गुरु ने ही भेजा था, और गुरु ने ही उसे दूर किया था, क्योंकि उसे पता था इस दूरी में ही इसका कल्याण हो जाएगा। मतलब जिसके हाथों में हम अपनी जिंदगी की बागडोर दे रहे हैं, उसको पता है कब डोर फेंकनी है, कब खींचनी है, कब क्या करना है — इसी का नाम समर्पण है।
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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30