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प्रश्नोत्तर P4-0164 · भाग 4

(वही साधिका) मैंने गुरु जी से यह कहलवा लिया कि मेरे शरीर की सेवा की जिम्मेदारी भी वे लेंगे — मुझे तो पता भी नहीं था कि मैं ऐसा कर रही हूं। इससे मेरा कौन सा स्तर पता चलता है? और (बीमारी-मौत में) मेरा कौन करेगा?

अब आप लोगों को ये टेंशन हो गया कि आपका क्या होगा। लेकिन देखिए, मैं किससे पूछूं, ये बताइए — ये भी तो एक शरीर है। आपको क्या लग रहा है, हमारे घर वाले सेवा करेंगे? हम इतने कड़क बोलते हैं — कभी भी फोन आता है तो (कहता हूं) अपना भोग भोग ले; तो वो भी तो कहेंगे — तू अपना भोग भोग ले। अब बताओ, हम किससे पूछें? चलो, आप तो मुझ पे निर्भर हो गए; हम किससे पूछें कि भैया, मेरा कौन करेगा? क्योंकि तुम तो (खुद को) अपाहिज (की श्रेणी) में ले ही आए, तो तुमसे तो उम्मीद नहीं रख सकते — क्योंकि तुमने तय ही कर लिया कि मेरी सेवा की जवाबदारी होनी चाहिए, और मैंने ले लिया; तो इसका मतलब तुम अपाहिज हो, ये तुमने सिद्ध कर दिया। हम किससे उम्मीद रखें, बताओ? हम किससे कहें कि अगर हमें कल कुछ हो जाए, अगले पल हो जाए, तो मुझे कौन देखेगा? अगर (घर से) निकलने के बाद (मेरा) यही प्रश्न रहता, तो मैं यहां पहुंचता ही नहीं। तो मैं आत्मज्ञान के लिए निकला हूं कि सेवा के लिए निकला हूं? आत्मज्ञान के लिए निकला हूं, तो शरीर की बात ही कहां आ गई? ये शरीर (का जो भी हो), ये मेरे कर्म का भोग है, कर्म का सिद्धांत है। मुझे तो आत्मज्ञान चाहिए। मुझे सड़ना है तो सड़ूंगा, छटपटाना है तो छटपटाऊंगा, कीड़े पड़ेंगे तो कीड़े पड़ेंगे — क्या फर्क पड़ता है? जिसकी शरण में आए हैं, वो देखेगा। (शिष्य तो कहेगा —) मुझे तो सिर्फ आत्मज्ञान तुझसे चाहिए, मुझे कीड़े पड़ें तो पड़ने देना, मुझे बचाना मत, मुझे आत्मज्ञान के लिए (रखना)। ये भी तो एक शरीर है — तो हम किससे कहें? हम तो आपके लिए काम कर रहे हैं, और आप तो मेरे ऊपर पूरे निर्भर हो गए कि आत्मज्ञान भी और शरीर की सेवा भी; तो हम आपसे तो कह नहीं सकते। (तुम सुधर भी सकते हो, बिगड़ भी सकते हो — वो बाद की बात है, वो छोड़ दो।) तुम एक चालाक व्यक्ति हो। मैं ये कह रहा हूं कि मैं किससे कहूं? पीछे वाले तो मुझे अपना ही नहीं सकते, क्योंकि मैंने उन्हें खुद सिद्धांत समझाया कि अपने कर्म का फल भोगना; तो वो कहेंगे कि भैया, अपने कर्म का फल भोग, मेरे पास क्या आ रहा है? और सामने मेरा कोई ऐसा है नहीं। तो पहले तो मेरी फिक्र तुम्हें बतानी चाहिए थी — आपको तो मेरी फिक्र करनी चाहिए थी कि भाई, आपको कुछ हुआ तो मैं हूं; मेरा छोड़ो, क्योंकि हम तो किसी लायक नहीं हैं; आप सुरक्षित रहोगे, तो इस शरीर के द्वारा बहुत लोगों का कल्याण हो जाएगा; मैं तो किसी लायक हूं ही नहीं, मैं सड़ जाऊं, सड़ जाऊं; मैं ठीक रह के भी क्या कर रहा हूं? आपके द्वारा तो कोई कार्य हो रहा है, समाज के लाखों लोग फायदा ले रहे हैं; हमसे तो हम ही फायदा नहीं ले रहे हैं — और फिर भी उसको (अपने शरीर को) सुरक्षित रखना चाहते हैं। अभी तक इसको इतना भोग लिया शरीर के द्वारा, फिर भी हम लास्ट में भी शरीर की सुरक्षा ही चाहते हैं — इससे हमारा स्तर पता चलता है। हमें तो कभी शरीर की चिंता नहीं हुई — वो तो आप लोग इतना ख्याल रख देते हो, नहीं तो मैं कभी ख्याल भी नहीं रखता; मुझे 1% भी शरीर की सुरक्षा का कुछ नहीं है। सड़ जाए, सड़ जाए; जब तक रहेंगे, काम करेंगे। हम इसको असुरक्षित भी नहीं करेंगे, सुरक्षित भी नहीं करेंगे, सिर्फ हम काम करेंगे। तो आपको शरीर की फिक्र छोड़नी पड़ेगी। सामने वाला आपके लिए पूरी तरह एक ही काम कर सकता है ना — आपने तो दो में उलझा दिया। आपने तो उसे शरीर की जवाबदारी दे दी — तो ठीक है, अब शरीर की सेवा करवा देगा आपकी, (और) क्या करेगा? प्रार्थना-पत्र तो आपने ही डाला है ना। तो उसने तुम्हारे शरीर की जवाबदारी ले ली कि जाओ, अगर कुछ हुआ तो डरो मत, पूरी जिम्मेदारी मेरी; तुम्हारा मल-मूत्र भी साफ करना होगा तो हम करेंगे। अब आप देखिए कि आप जिसके पास आत्मिक कल्याण के लिए आए हो, उससे ये उम्मीद रखिए कि वो मेरा मल-मूत्र साफ करे — मतलब तुम कितने गिर गए, अपने गिरेपन को देखो जरा! या तो किसी से करवाएगा, या तो खुद करेगा — दो में से एक ही बात होगी ना। ये तो हॉस्पिटल वाले भी पैसे लेके कर देते हैं। देखिए ना फिर अपने स्तर को — आप जिसे गुरु कह रहे हो, उससे उम्मीद क्या लगा रहे हो! आप यहां रहोगे तो हालातों के अनुसार आपका स्तर, आपका लेवल पता चलेगा। क्योंकि बिना मेरे विचार के तो बात ही नहीं निकलती; अगर मेरे विचार में शरीर की प्राथमिकता नहीं होती, तो शब्दों में भी नहीं निकलती। इसलिए जब भी हम कह रहे थे कि आप लोग अपनी बात ना करो, बात तो सार्वजनिक ही हो रही थी — दो बार आपको सचेत किया कि आप लोग अपनी बात ना करो, क्योंकि मुझे पता था कि आप (अपनी बात) किए तो फंसे, क्योंकि मुझे आपका स्तर पता था, आपको नहीं था। तो मैं कह रहा था कि मत गिरो, अभी भी तुम्हें बचा रहा हूं। लेकिन तुम (माने) नहीं। इसीलिए तो मैं सचेत कर रहा था कि आप लोग अपनी बात तो ना करो, क्योंकि हम तो (तुम्हारी) जिम्मेदारी आंतरिक रूप से ले ही चुके हैं, तुम क्यों चिंता कर रहे हो? लेकिन अब तुमने मुझसे कहलवा दिया, तब तो बात ही खत्म हो गई — अब क्या बचा? वो तो मैं ले ही लिया था, आपको कहलवाने की जरूरत ही नहीं थी। और उम्मीद भी क्या लगाई? शरीर की सफाई करवाना! जिसे हम महान कह रहे हैं, जिसे गुरु कह रहे हैं, जिससे कहें कि आपके द्वारा मेरा आत्मिक कल्याण हो, उससे हम ये भी शर्त लगवा लिए कि भैया, देखो, वक्त आने पे मल-मूत्र भी मेरा आप ही साफ करोगे; उसने कहा — हां करेंगे, चिंता ना करो — और तब तुम्हारी चिंता खत्म हो गई कि अब मैं फ्री हो गई। (शरीर की जिम्मेदारी तो उसने ले ली —) उसके बाद तो आपको अच्छा ही लग रहा था, क्योंकि शरीर का ही एक प्रोटेक्शन चाहिए; तो अच्छा ही लगेगा। (साधिका ने कहा, हमारे लिए क्या पता कितना समय लगे —) मैं तो कह रहा हूं कि बस आप चल भी तो दो — वही चलना है, बस। आपका टारगेट भी तो हो — कम से कम गुरु स्वीकार तो कर ले, मैं उस लायक तो बनूं। ये आपने अभी कहानी सुनाई तो वो थोड़ी सोच रहा था कि मैं नाचने के बाद मुझे आत्मज्ञान हो जाएगा — बस, मेरा गुरु मुझे स्वीकार कर ले यार; क्योंकि उसे पता था कि अगर ये स्वीकार किया तो बात खत्म हो जाएगी। मेरी ताकत नहीं है कि मैं अपने आप को आत्मज्ञान करा दूं, मेरी ताकत नहीं कि मैं मूल में मिला दूं अपने आप को। मेरी ताकत है कि मैं नर्क में जरूर अपने आप को ले जा सकता हूं — लेकिन नर्क में भी जगह जल्दी नहीं मिलेगी; नर्क में जगह मिलते ही अपने कर्म का लेखा-जोखा होगा, फिर निकलोगे ना। तो अभी तो नर्क में भी लाइन में खड़े रह जाओगे, क्योंकि स्वर्ग में तुम्हें रहना नहीं है — स्वर्ग में रहना होता तो घर-बार, इतनी अच्छी लग्जरी लाइफ छोड़ के नहीं आते; और मोक्ष की तो अभी कोई बात ही नहीं, क्योंकि शरीर के चक्कर में पड़े हो। नर्क के लिए भी बड़ी लंबी लाइन है, भीड़ लगी पड़ी है। गेट के अंदर नर्क में भी एंट्री हो जाए तो बात बन जाएगी, क्योंकि नर्क में एंट्री होते ही भोग चालू होगा, और हम कभी ना कभी पक्का निकल जाएंगे। और आप तो भोगने से अपने आप को बचा रहे हो — इसका मतलब अभी भोगने वाली लाइन में भी नहीं खड़े हो, अभी पूरी तैयारी ही नहीं है; ये बचाव की तैयारी थी। आत्मज्ञान से ज्यादा आपको शरीर की फिक्र है, तभी तो आपने वहां सबसे पहले महत्व से (उसे) रखा। नहीं तो आप कहतीं कि भैया, मुझे शरीर से मतलब नहीं, मुझे आत्मज्ञान चाहिए, शरीर का क्या होगा अपने को क्या पता। और जिससे आप हां भरवाईं — क्या आपको लगता है कि वो आपके बाद ही जाएगा? हो सकता है वो आपके पहले ही चला जाए। तो जितना जल्दी (हो), जो काम की बात है, वही कर लो। क्योंकि वो रहेगा तभी ना आपकी सेवा करेगा — उसका शरीर रहेगा तो शरीर के द्वारा सेवा करेगा; वो शरीर नहीं रहेगा, तो उसकी जिम्मेदारी थोड़ी ना होती है। जब सामने वाला व्यक्ति सुरक्षित रहेगा, तभी आपको उठ के एक गिलास पानी देगा; अगर वो सुरक्षित ही नहीं है, वो अपाहिज है, तो आपको दे ही नहीं सकता, और आप उसे दोषी भी करार नहीं दे सकते। जैसे — जब तक मैं नौकरी पे हूं, तभी तक मैं काम करूंगा; दो ऑप्शन हैं — या तो मुझे रिटायर कर दिया जाएगा, या तो मैं इस्तीफा दे दूंगा; मेरी जवाबदारी तब तक है, जब तक मैंने पद को स्वीकार किया है। लेकिन उस पद से मैं कभी भी इस्तीफा दे सकता हूं — ये मेरी स्वतंत्रता है, ये कोई छीन नहीं सकता। (इस्तीफे में कारण पूछा जाएगा; सज्जन व्यक्ति जो काम को काम के तरीके से कर रहा है, उसे कोई छोड़ना नहीं चाहेगा,) लेकिन वो छोड़ना चाहेगा, तो उसे कोई रोक नहीं सकता; और जैसे ही उसने छोड़ा, उसकी जिम्मेदारी खत्म हो गई। हम तो उस समय आप लोगों को देख रहे थे और सचेत भी कर रहे थे कि जाने दो, अपनी बात मत करो — इसलिए कि मुझे पता था मैं तो जिम्मेदारी ले ही चुका हूं; लेकिन पागल, तुम अपनी बात क्यों कर रहे हो? तुम्हारी जिम्मेदारी तो इतनी ले ली है कि अगर भोजन मिलेगा तो पहले तुम्हें खिलाऊंगा, बाद में मैं खाऊंगा। तुम्हें तो पता भी नहीं कि मैंने किस तरीके से आपकी जिम्मेदारी ली है — मुझसे ज्यादा चिंता मुझे तुम्हारी है; मेरी तो चिंता मुझे कभी हुई ही नहीं। लेकिन तुम्हें ये बात समझ ही नहीं आई, इसलिए ऐसा होता है। इस लाइन में प्रैक्टिकली पढ़ने के बाद भी हमें पता चलता है कि कितना सूक्ष्म है, क्या करना, कैसे करना — ये एजुकेशन इतनी आसान नहीं है। इसलिए ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं; (और) होने के बाद भी (यहां से) भागना नहीं — मेरी तरफ से (यही कहना है)।

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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30