प्रश्नोत्तर P4-0165 · भाग 4
(वही साधिका) मैं आपकी बात स्वीकार करती हूं — 'आई एक्सेप्ट इट'। (इस पर) प्रत्यक्ष ज्ञान को 'स्वीकार करना' क्या है?
ये तो प्रत्यक्ष है — आप स्वीकार करो या ना करो, करना ही पड़ेगा, ये आपके बस में नहीं है। प्रत्यक्ष ज्ञान ऐसा होता है कि ये आपके बस में नहीं है — स्वीकार करना, ना करना। करोगे क्या, अस्वीकार कर दोगे क्या? आप स्वीकार करके महान मत बनो। अब आपको ये दर्शाने की जरूरत ही नहीं कि मैंने स्वीकार किया। आप अगर कह रहे हो 'मैंने स्वीकार किया', तो ये बोलने की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए — आप क्या अस्वीकार कर सकते हो? अस्वीकार करने की क्षमता है, तब आप कह सकते हो कि मैंने स्वीकार किया। जितनी भी बातें अभी हुईं, क्या आप इन्हें अस्वीकार कर सकती हैं? नहीं — तो स्वीकार की बात ही नहीं आई। फिर भी स्वीकार की बात आ रही है — कहीं ना कहीं वो जीव अपने आप को 'स्वीकार' बताकर बड़ा बनना चाहता है कि मैंने स्वीकार किया। यही बड़ापन-छोटापन है। अगर अस्वीकार करने की क्षमता थी, तब तो मैं कहता कि आपने स्वीकार किया, बहुत-बहुत धन्यवाद। आप अस्वीकार कर ही नहीं सकते, तो आप कह ही नहीं सकते कि मैंने स्वीकार किया। तो प्रत्यक्ष ज्ञान को कोई यह मत कहे कि मैं स्वीकार कर रहा हूं — प्रत्यक्ष (के लिए) तुम्हारे साइन की कोई जरूरत नहीं।
अस्वीकार और स्वीकार की बात तब आती है जब अप्रत्यक्ष रहता है — कि चलो भाई, आपने कहा तो (मैंने) स्वीकार किया, इतने दिन बाद प्रत्यक्ष होगा। लेकिन भैया, यहां तो प्रत्यक्ष है, तो स्वीकार-अस्वीकार की बात ही नहीं है। मैं तो कभी कहता भी नहीं कि आप स्वीकार करो, अस्वीकार करो — आप कौन होते हो? स्वीकार-अस्वीकार की बात तब आती है जब अप्रत्यक्ष को आप प्रत्यक्ष रूप में स्वीकार करते हैं — कि चलो भाई, आप कहते हैं तो हम मान लेते हैं, हमें समझ में नहीं आया फिर भी मान लेते हैं। जब हमें समझ में ही आ गया, तो प्रत्यक्ष हो गया। अप्रत्यक्ष तब होता है जब (समझ में नहीं) आता, तो आप कहतीं — चलो, आप गुरु योग्य हो, मैं आपकी बात मानती हूं, मुझे तो समझ में नहीं आया है, लेकिन अगर आप कहते हो तो ठीक है, करके देख लेते हैं — तब आप कहतीं कि मैं आपकी बात स्वीकार कर रही हूं, क्योंकि मुझे प्रत्यक्ष नहीं हो पा रहा है, लेकिन आप कह रहे हैं तो सही होगा; जिस दिन मुझे प्रत्यक्ष होगा, उस दिन बोलेंगे हां सही है। तो यहां तो प्रत्यक्ष है, (यहां) स्वीकार की बात नहीं आती। प्रत्यक्ष मींस — जो बोला, आप समझ गए, (मैंने) क्लियर कर दिया, आपको क्लियर हो गया। (क्लियर) होने के बाद 'मैंने स्वीकार किया' बोले, तो वो प्रत्यक्ष अहंकार है, अहम-भाव है — कि देखो, मैंने आपकी बात को स्वीकार किया, मैं एहसान जता रही हूं। प्रत्यक्ष, मींस क्लेरिटी मिलने के बाद, अगर बोल दिया कि मैं आपकी बात को स्वीकार करती हूं, तो ये मेरा अहंकार है; और आपको सबकी नजर में महान बनना है कि मैं कितनी सरल हूं, कितनी सहज हूं कि देखो, स्वीकार कर रही हूं। ये बड़प्पन (असल में) छोटापन है — आपको पता भी नहीं, लेकिन है यही।
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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30