प्रश्नोत्तर P6-0003 · भाग 6
मार्ग पर मेहनत — क्या पता आगे कुछ हो ही नहीं? आत्मिक कल्याण का मतलब?
हां, जहां है वहां भी तो दुखी है। अगर आगे कुछ नहीं होगा, तो इतना तो पता चल जाएगा। वहां मैं तो मिलूंगा, अपने आप से। मैं तो हूं। मैं तो हूं। और कुछ नहीं होगा, ये डर है। लेकिन मैं कहां, किसके लिए जा रहा हूं? मैं तो अपने दुखों से मुक्त होने के लिए काम कर रहा हूं। मैं कहीं और तो नहीं जा रहा। मुक्त होने के बाद मैं तो बचूंगा। मैं अपने दुखों से बचूंगा। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मैं कर्ता, इनसे मैं परेशान हूं। इनसे मुक्त होने के लिए यात्रा कर रहा हूं। इसे पकड़ा है। छोड़ भी सकता हूं। छोड़ने के बाद तुम तो रहोगे। मैं रहूंगा। लेकिन क्या पता, आत्मिक कल्याण हो, वहां नहीं हो। मैं वही तो कह रहा हूं। आत्मिक कल्याण का क्या मतलब?
आत्मिक कल्याण का मतलब है कि जीवन में दुख नहीं हो, अशांति नहीं हो। जब ये छूट जाएगा, तो जीवन में शांति आ जाएगी, दुख खत्म हो जाएगा। इन्हीं के कारण। इनको छोड़ते ही हो गया आत्मिक कल्याण। जैसे मुझे रोग हुआ है, मैं बड़ा दुखी हूं। रोग ठीक होने के बाद क्या होगा? दुख खत्म हो जाएगा। मैं रहूंगा। मैं तो रहूंगा। बस दुख खत्म हो गया। दुख ही तो मेरी पीड़ा है। कुल मिला के इनसे छूटना, राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा से छूट जाना, यही आत्मिक कल्याण है। जैसे रोग से छूट जाना ही उपचार है। और कुछ मिलता नहीं। लेकिन रोग में रहना ठीक है, कि रोग से मुक्त होकर रहना ठीक है? मुक्त होना।
अब तुम बोलो, रोग से मुक्त हो जाऊंगा तो क्या मिलेगा? रोग से मुक्ति मिलेगी। वही तो चाहिए। हम दवा इसीलिए ले रहे हैं। और तुम बोलो, रोग से मुक्त होने के लिए भी बाहर कुछ चाहिए। क्या चाहिए? एक नया रोग चाहिए क्या? तो राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मैं कर्ता के भाव से मुक्त हो जाना ही आत्मिक कल्याण है।
होना में स्थित हो जाना, और प्रयास रहित स्थिति में हो जाना, यही आत्मकल्याण है। एकदम यही ठीक है।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 23 अगस्त 2026 #योगी · 2026-08-23