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प्रश्नोत्तर P6-0041 · भाग 6

जीवात्मा का नाम इसलिए पड़ गया कि आत्मा ने जीव शरीर ग्रहण किया। कोई हृदय चक्र को आत्मा का निवास कहता है, कोई और जगह ध्यान करवाता है, कोई कपाल में बताता है। एक योगी का प्रैक्टिकल यह था कि आत्मा का शरीर में निवास स्थान नहीं है, सूरज की किरण की तरह केवल एक किरण पड़ रही है और शरीर क्रिया कर रहा है, आत्मा शरीर में है ही नहीं। इतनी बातें सुनकर उथल पुथल मचती है। असल में आत्मा कहां है? जब नाम ही नहीं दिया जा सकता तो मान लो क्यों कहा जाता है? मानना और जानना में मैं किस प्रक्रिया में हूं? मानने की अवधि कितनी है, और मांग के हिसाब से समय कितना लगता है?

यह पूरा फूल है, इसमें रस भी है। क्या रस यहीं है बस? नहीं, पूरे फूल में है। तो पूरे शरीर में जीवात्मा है। ऊर्जा ही है, पूरा ऊर्जा ही तो है। चाहे रूप से परे है। अगर रूप में होता तो दिख जाता। उसे रूप नहीं कह सकते। जो ये बता रहे हैं कि यहां है या यहां नहीं, वह ऊपरी ज्ञान है। रस कहां है? पूरे में है, सब जगह है। भंवरे की बात छोड़ो, अपने आप को देखो। यहां रस है तो यहां भी है, सब जगह रहेगा। पूरा गुलाब तभी बना है। सीधी सी बात है। जीवात्मा पूरे शरीर में है। ऐसा कोई स्थान नहीं जहां वह ना हो। बोलने को शब्द ही नहीं है, इसलिए ऊर्जा का नाम दिया जा रहा है। जब किसी को नाम नहीं दे सकते, तब कहते हैं मान लो। नाम ही नहीं दिया जा सकता। गणित पढ़ाते हुए भी शिक्षक मान लो कहता है। मानना इसलिए पड़ता है कि उसका नाम दिया ही नहीं जा सकता। मानकर पहुंचना है, क्योंकि समझना चाहते हैं। अगर मानोगे नहीं तो पहुंचोगे भी नहीं। जानने के लिए पहले मानना पड़ेगा। लेकिन मानते नहीं रहना है। जानने के बाद मानना खत्म हो जाएगा। मानना एक प्रक्रिया है, जानना दूसरी। जान गए तो बात खत्म। देखो तुम कहां हो, पहली प्रक्रिया में या दूसरी में। अगर अभी मानने में ही हो, तो किसी के द्वारा मान लिया, उसमें मेहनत नहीं हुई। मेहनत जानने में होती है। मेहनत करना नहीं चाहते, इसलिए इनसे पूछते हो, उनसे पूछते हो, काम करते नहीं, और भ्रमित हो जाते हो। भ्रम इसलिए होता है कि अपने ही गांव का रास्ता पूछो तो जितने लोग हैं, सब अलग अलग ढंग से बताएंगे। जिसकी जैसी योग्यता, जैसी क्षमता, जैसी जानकारी। अपने घर का पता पूरा परिवार आकर लिखवाए, तो भी सब अलग अलग रास्ता बताएंगे। मैच नहीं खाएगा। साधकों को देखा है, जानकारियां इकट्ठी कर रहे हैं। उस जानकारी पर काम करना पड़ेगा। मानना, फिर जानना, फिर मानना खत्म। जानने के लिए पहले मानना पड़ेगा, क्योंकि नहीं जानते तभी पूछ रहे हो। पहले उसकी बात सुननी पड़ेगी। प्रत्यक्ष बाद में होगा। अगर जानते ही हो तो मानने और पूछने की जरूरत नहीं। शुरुआत मानने से होगी। मानने की भी अवधि है, कि यह कितने समय में होगा। कोई चना मांगे तो सीधा दे सकते हो। भूंज के लाओ कहे तो कुछ समय और लगेगा। फूला हुआ चाहिए तो लगभग एक रात लगेगी। पौधा बना के लाओ कहे तो और समय। वृक्ष बना के लाओ कहे तो और समय। मांग कैसी है, यह देखना है। मैं क्या मांगने जा रहा हूं, और उसमें लगभग कितना वक्त लगता है। मैं जब इस ज्ञान की खोज में निकला तो इतिहास पढ़ा। किसी को छह साल लगे, किसी को सात, किसी को बारह। देखा तो लगा, हम भी मेहनत करेंगे तो उतने साल लगेंगे, क्योंकि लोगों ने ऐसे ऐसे परिश्रम किया था। इसलिए कहता हूं, मानो, लेकिन जानने के लिए काम करो, फिर मानना खत्म हो जाएगा। काम करना पड़ेगा। काम से परिणाम आता है, मानने से नहीं।

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वीडियो: Sunday Q&A May 3, 2026 #Yogi · 2026-05-03