आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P6-0042 · भाग 6

किसी के सानिध्य में मानकर जानकारी मिली, फिर कुछ समय बाद लगा कि यह धोखा है, अभी अधूरा है, कहीं और सुनने से लगा कि पूरा होना बाकी है। फूल में खुशबू के साथ रस और ऊर्जा भी है, यह पहले नहीं जाना था। शरीर जल जाए तो ऊर्जा वहीं की वहीं रहती है। पहले भान था कि आत्मा शरीर के अंदर है, मैं आत्मा हूं। विवेक बढ़ने पर लगा कि अपने आप को आत्मा मान लेना भी धोखा है, क्योंकि किसी के कहने से माना है, प्रत्यक्ष नहीं हुआ। बोध कैसे होगा, कोई बताता नहीं। सन् दो हजार पांच से अलग अलग महात्माओं, साधुओं और संतों के पास रहा, गृहस्थ में रहा। उन्हें पूरा ज्ञान नहीं, ऐसा वे नहीं कहते। किसी और का ज्ञान सुनकर भीतर थोड़ा विवेक जागता है, जैसे नर्सरी से एलकेजी या फर्स्ट में आ गए, फिर लगता है अभी और बाकी है। कुछ समय तृप्ति रहती है, खिलौने जैसी, फिर खिलौना लगने लगता है। ऐसे निमित्त और अधूरे लगने वाले ज्ञान को कैसे देखें?

तब समझ में आया कि आपकी समझ विकसित हुई। अगर वहां नहीं जाते तो उसने इतनी जानकारी तो दी कि यह धोखा है। इतना तो प्रत्यक्ष हुआ। शुरुआत में निमित्त वही बना। निमित्त को ठुकराओ मत। वही निमित्त बना। अगर वह निमित्त नहीं बनता तो भ्रम टूटता भी नहीं। भ्रम में यह समझ आ गई कि यह धोखा है, तो जिसने निमित्त बनाया उसे धन्यवाद है। निमित्त ही नहीं बनता तो उस भ्रम तक पहुंच नहीं होती, भ्रम नहीं टूटता, आगे का रास्ता नहीं खुलता। आत्मा किसी के द्वारा मानी है। आपको भी प्रत्यक्ष नहीं हुआ। तो उससे कहो कि मैंने आपकी बात मान तो ली, लेकिन इसका बोध मुझे कैसे होगा। उतनी समझ अगर वह व्यक्ति नहीं मिलता तो खिलौनों में ही लिप्त रहते। प्रकृति ने उसे निमित्त बनाया। आप यह देखो कि आप आगे बढ़ रहे हो। वह व्यक्ति मिला तभी पता चला कि यह खिलौना है। वह पूरा हो या अधूरा, मुझे उससे क्या। मेरा भ्रम टूटा, मैं आगे गया, उस व्यक्ति का धन्यवाद है, प्रकृति का धन्यवाद है। प्राइमरी का शिक्षक पीएचडी नहीं होता। प्राइमरी वाले को हटा दो तो पीएचडी तक पहुंच ही नहीं सकते। पीएचडी का शिक्षक ही श्रेष्ठ है, ऐसा मत सोचना। प्राइमरी का उतना महत्व है कि वह नहीं पढ़ाता तो आगे जाते ही नहीं। सबको धन्यवाद दो। वह अंत तक नहीं पहुंचाया, लेकिन कहीं तो था, तभी उसके यहां माथा टेका। चाहे वह धोखेबाज ही रहा हो, धोखे में भी वह आपसे आगे था। कम से कम इतना समझा दिया कि धोखेबाज ऐसे होते हैं, आगे ऐसे में नहीं फसोगे। कुछ दिन, कुछ महीना रहे, पता चला कि यह बेईमान है या धोखेबाज है। इतना बता दिया। वह धन्यवाद का पात्र है। उपयोग करना सीखो तो यहां सब उपयोग के लायक है, पूरी सृष्टि। उपयोग करो, दुरुपयोग करो, या शिकायत करो। शिकायत ढूंढोगे तो सबमें शिकायत ही मिलेगी। सदुपयोग करना सीखो। यह पूरा है या अधूरा, इससे क्या। इसके द्वारा कुछ तो सीखा, कि धोखेबाज ऐसे होते हैं, अब नहीं फसूंगा। पहले धोखेबाज को पहचानने की क्षमता ही नहीं थी, तभी फंसे। उस समय यह भी पता नहीं था कि धोखा कुछ होता भी है या नहीं। इसीलिए जब कोई महात्मा अपनी उपलब्धि को उपलब्ध होता है तो जितने लोग मिले, सबको धन्यवाद देता है। वह देख पाता है कि यह व्यक्ति मिला तभी मैं आगे गया। झापड़ मारने वाले को भी, गाली देने वाले को भी धन्यवाद। भोजन देने वाले को और नहीं देने वाले को, अपमान करने वाले को और मान करने वाले को, सबको धन्यवाद, क्योंकि इसने कुछ सिखाया और स्तर बढ़ा, तभी आज यहां तक पहुंचा। आप अपनी समझ विकसित करो। कौन कैसा है, यह छोड़ो। जिसके लिए निकले हो, वही करो। सब मदद करेंगे। पूरी सृष्टि सहायता करेगी। कमी निकालोगे तो पूरी सृष्टि में कमी ही दिखेगी, क्योंकि कमी आपमें है। सृष्टि में कमी नहीं है। मेरे में कमी है, खालीपन भी है। मैं जैसा रहता हूं, जैसी समझ रहती है, वैसा दिखता है। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। दृष्टि के पीछे वाला जैसा है, वैसा लेता है। दोनों सृष्टि देख रहे हैं, दोनों अलग अलग ले जा रहे हैं। जिसे जानकारी है वह इसी सृष्टि में आनंद में है। आप इसी सृष्टि में दुखी हो। दुख, सुख और आनंद सब अंदर है। उस आनंद तक कैसे पहुंचना है, उसके लिए काम करो।

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वीडियो: Sunday Q&A May 3, 2026 #Yogi · 2026-05-03