प्रश्नोत्तर P6-0062 · भाग 6
जब साधक आत्मचिंतन के लिए बैठता है, तो क्या चिंतन करे, क्या मनन करे, क्या सोच-विचार करे, जिससे आत्मचिंतन हो, आगे उन्नति हो, आत्मकल्याण हो और तत्व का अनुभव हो जाए? वीडियो बीच में कट जाते हैं, इसलिए जो सोलह बातें बताई जाती हैं, उनका एक छोटा पैंफलेट या पुस्तक हो, जिसे जेब में रखकर बार-बार देख सकूं, तो ज्यादा लाभ हो। मैं झुंझुनू के पास से आया हूं। आज सोलहवां दिन है। ग्रंथों में पढ़ा है कि आत्मा है, पूर्ण है, पर वह ज्ञान अनुभव में कैसे उतरे? घर और संबंधों का चिंतन चलता रहता है। बैठकर ऐसा क्या सोचूं, क्या मनन करूं, कि मूल की ओर बढ़ूं और अनुभव हो जाए?
देख, जैसे तुझे कोई ऐसा रोग हो जाए जहां जिंदगी और मौत की बात हो, तो तुम्हारा हर समय चिंतन कहां होगा? कि मैं कैसे ठीक हो जाऊं। सोते-जागते, उठते-बैठते, तुम्हारा बालक बीमार हो जाए और जीवन-मौत की बात हो, तो तुम दुनिया के किसी कोने में रहो, हर सुख-सुविधा में एक ही बात का चिंतन रहेगा कि तुम्हारा बेटा कैसे ठीक हो जाए। क्या तुम उसका सुख ले सकते हो? अगर तुम्हारा एक पुत्र हो और वह हॉस्पिटल में जन्म-मृत्यु की शय्या पर लेटा हो, तो क्या तुम्हें लगता है कि दुनिया का जितना भी सुख दिया जाए, तुम उस सुख में लिप्त हो सकते हो? नहीं हो सकते। आत्मचिंतन कहां रहेगा आपका? वहां रहेगा। एक ही भाव बना रहेगा कि कैसे वह ठीक हो जाए। और जैसे वह ठीक हो जाएगा, फिर आप हर सुख लेने लगोगे।
बस एक ही बात समझ लो कि मुझे मेरा आत्मिक कल्याण करना है। और आत्मिक कल्याण के लिए मुझे राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और कर्ता के भाव से छुड़ाना है। बस यही तो आत्मिक चिंतन होगा। करना नहीं पड़ेगा। अभी आपको यह जरूरी समझना है कि मुझे मेरा आत्मिक कल्याण करना है, तो आत्मिक चिंतन होगा। तुम्हारे लिए जीवन में सबसे जरूरी क्या है, उसी पर चिंतन होगा। आपके लिए जो जरूरी होगा, उसी पर चिंतन होगा।
एक जरूरत मेरे द्वारा पैदा हुई है, एक दूसरे के द्वारा पैदा हुई है। दूसरे के द्वारा पैदा हुई जरूरत नहीं टिकेगी। जैसे दूसरे का बच्चा बीमार हो जाए तो सांत्वना तो देंगे, लेकिन चिंतन नहीं होगा। खुद का बीमार हो गया तो चिंतन ज्यादा होगा। जब अपनी समझ से तू समझ जाएगा कि मानव तन मिला है, मेरा आत्मिक कल्याण ही मेरे जीवन का उद्देश्य है, मैं इसीलिए जन्मा हूं, तो तू आत्मिक कल्याण के बिना रह ही नहीं पाएगा। आत्मिक चिंतन होगा, करना नहीं पड़ेगा। जीवन में जो हमारे लिए सबसे जरूरी होता है, उसी पर चिंतन होता है। आप चिंतन पैदा नहीं कर सकते। जो जरूरी है, वहीं आप लगे रहो। अपने आप वहीं लगे रहोगे। जबरदस्ती अपने आप को लगाना चाहोगे तो लग ही नहीं सकता।
अगर भूख लग गई तो भूख आपकी जरूरत है, भोजन के लिए चिंतन बनेगा। प्यास लग गई तो पानी के लिए चिंतन बनेगा। यह नहीं कि प्यास लगी हो और मैं भोजन के लिए चिंतन करूं। तुमने अपनी जरूरत क्या पैदा की है, वही देखो। जैसी तुम्हारी जरूरत है, उसी पर चिंतन होगा। चिंतन करना नहीं पड़ता। चिंतन करना पड़ रहा है, जबरदस्ती अपने आप को लगाना पड़ रहा है, इसका मतलब एक नया नाटक रच रहे हो, और होगा कुछ नहीं।
सत्संग सुनकर धीरे-धीरे याद हो जाएगा। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और कर्ता के भाव से मुक्त होना है। और उसके लिए छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता और पाखंड नहीं करना है।
यह प्रत्यक्ष ज्ञान पहले उतरेगा। उतारना इतना आसान नहीं है। शब्दों में इसको किताब पर उतारना इतना आसान नहीं होता। अब तक छप जाती। जिस दिन उतरना होगा, उस दिन उतरेगी।
कहीं भी बैठ जाओ, हर वक्त बैठ जाओ, तो यही चिंतन करना ही है। हर वक्त यही याद रखना कि मैं इस दुख के भवसागर से अपने आप को कैसे निकालूं। तू पूर्ण है। पूर्ण है, अपूर्ण को धारण किया है। यह भी सही है। अगर तू यह भाव पक्का कर लेगा कि मैं इस भवसागर से अपने आप को कैसे निकालूं, तो निकालने की क्षमता आने लगेगी। क्षमतावान तुझे मिलने लगेगा। तेरी क्षमता बढ़ने लगेगी। तो तुझे बस एक ही भाव बनाना है कि मैं इस भवसागर से कैसे अपने आप को निकालूं। यह दुख का भवसागर है।
क्योंकि जितना मैंने किया, पहले मुझे समझना पड़ेगा। अभी शुरू से लेकर जब तक मैं समझने लायक हुआ, अभी तक जितना भी किया, उससे मुझे क्या मिला? दुख। दुख मिला, फंसता ही गया। यह समझना पड़ेगा कि मुझे दुख ही मिला। मैं अपने सारे सुख की खोज में गया था, लेकिन मेरा आखिरी परिणाम दुख ही मिला। तो बस इस दुख से मैं कैसे छुटकारा पाऊं, इस पर चिंतन करना है। तब तुझे मार्ग मिलता जाएगा। इस पर गहरा चिंतन करना है कि मुझे इस भवसागर से निकलना है। यह किसका भवसागर है? दुख का। दुख के भवसागर से। क्योंकि कितना दुख है, तुम्हें भी नहीं पता। इसलिए इसे भवसागर कहा गया है। इसका न आदि है, न अंत। तो मैं कैसे इससे अपने आप को निकालूं, इसके लिए चिंतन करना है।
अब इसके लिए क्या-क्या करना है, निकालने के लिए, सत्संग में बताया जाता है। लेकिन पहले निकालने वाले भाव को प्रबल करो। अगर निकालने वाले भाव को प्रबल करोगे, तो कैसे निकालना है, वह सत्संग के द्वारा समझ जाओगे। और निकालने वाला भाव अगर प्रबल नहीं होगा, तो सत्संग सुनकर भी कोई मतलब नहीं होगा। तो बस एक ही बात पर जोर दो। विशेष ध्यान दो कि मुझे इस दुख के भवसागर से अपने आप को निकालना है। मुझे अपने आप को छुड़ाना है। इस पर जोर डालो। जहां फंसा हूं, वहां से मुझे निकलना है।
अब मुझे दुख के भवसागर से निकालना है, तो फिर नया राग-द्वेष बनाना भी नहीं है। यह नहीं कि मैं एक तरफ रसपान भी ले रहा हूं, राग को बढ़ावा भी दे रहा हूं, और निकालने का नाटक कर रहा हूं। जब निकालने का भाव आ गया, तो आगे पैदावार बंद कर दो राग-द्वेष की। किसी के प्रति न राग होना चाहिए, न द्वेष होना चाहिए। जरूरत में जियो। और इस भाव को प्रबल करो। और नए राग-द्वेष बनाना बंद करो।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 24 मई 2026 #योगी · 2026-05-24