आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P6-0073 · भाग 6

मैं घर से कुछ औषधियां आपके लिए लाई हूं। क्या आप ले लेंगे? सेवा में लगना चाहती हूं। पौधों की सेवा में क्या करूं, थोड़ा मार्ग बता दें।

ले लिया करो। और आप भी कुछ सेवा में लग जाया करो, बागवानी में। थोड़ा मार्ग देखकर चली जाया करो। वही पौधा लगा है। कभी पानी दे देना, कभी घास निकाल देना। यही सत्कर्म है। अपने शरीर को कहीं न कहीं सत्कर्म में लगा दो। एक-दो घंटा कर दिया करो। वह वृक्ष होगा। उसके लाखों-करोड़ों जीव भोजन करेंगे। कितने लोग तपोभूमि में आकर तपस्या करेंगे। तुम्हें कब तक आशीर्वाद मिलता रहेगा। आशीर्वाद से ही कल्याण होगा। और आशीर्वाद के लिए कुछ करना होगा, क्योंकि करने से उद्धार होगा। आंख बंद करके बैठने से नहीं होगा। आंख बंद करके बैठना तब है, जब मैंने कुछ किया हो। तन से, धन से, समझ से, जितना बल मेरे पास है, तब बैठने का लाभ है। जब मैं कुछ करूं। बस मैंने अपने दायरे में किया है, अपने लिए किया है। परिवार के लिए वह करना नहीं है। समाज के लिए मैंने क्या किया? एक सोसाइटी के लिए नहीं। पूरे विश्व के लिए। पता नहीं इसका उपयोग कौन करेगा। तुम सोचते हो, मैंने एक सोसाइटी के लिए किया, समाज के एक हिस्से के लिए किया। वह करना नहीं होता। एक व्यक्ति परिवार चला रहा है, एक व्यक्ति समाज का एक समूह चला रहा है। दोनों में फर्क नहीं है। और दोनों सत्कर्म नहीं हैं। सत्कर्म का मतलब है कि विश्व का कोई भी व्यक्ति आकर उसका उपयोग कर ले। वह सत्कर्म है। सामाजिक स्तर पर काम हो, कोई सोसाइटी हो, आप उसके लिए कर रहे हो, तो वह भी एक परिवार ही है। उसमें दो-चार लोग रहें या एक लाख, कोई मतलब नहीं। उसे सत्कर्म मत समझना। इसलिए जितना हो सके, लग जाया करो। जरूरी है तुम्हारे लिए। इसी से कल्याण होगा। शरीर जहां लगाना था, लगाया। अब अपने लिए लगा दो। जब वहां से खाली हो जाओ, फिर बैठना। आराम से रहकर अपने आत्मिक कल्याण में लगना। हम तो प्राण दे दें, बस तुम कल्याण करना चाहो। तुम्हारे कल्याण में हमारा प्राण भी लग जाए, तो मेरे लिए कुछ नहीं है। प्राण तो जाने वाला है। और अपने प्राण का मैंने कर लिया। जहां उपयोग करना था, अपने लिए मैंने कर लिया। अब प्राण का उपयोग समाज के लिए हो। अगर समय आए कि लोगों के कल्याण के लिए प्राण भी देना पड़े, तो मैं वह भी कर सकता हूं। मेरे प्राण का, मेरे लिए, अब कुछ करना नहीं है। अगर मेरे लिए करना होता, तो आंसू नहीं आते। कभी नहीं आते। आंसू मोह में आते हैं। इसका तो नाम भी नहीं जानता। नियम टूटा तो गुस्सा आता है, आंसू नहीं आते। भगा देते। जिस दिन पता चलता, उसी दिन भगा देता। गुस्सा आता है, अभी भी गुस्सा आता है। आंसू क्यों आए? प्रेम में आए। क्योंकि मैं देख पा रहा हूं, यह कितना गिर रहा है। यह नहीं देख पा रहा। मैं देख पा रहा हूं। अभी परिणाम नहीं आया। मैं परिणाम तक देख रहा हूं। शुरू से अभी तक यही भाव रहा है। अगर इस समाज के लिए मेरा प्राण भी लगे, तो मैं तैयार हूं। मैं इसके लिए कुछ भी कर सकता हूं। मैं तुम्हारे कल्याण के लिए कुछ भी कर सकता हूं। लेकिन देख रहा हूं, तुम ही नहीं चाह रहे। जैसे कसम खा रखी है। एक तरफ कल्याण की बात करते हो, और जब करने की बारी आती है तो पीछे हट जाते हो। तो आए ही क्यों? कहते हो, पूरी तरह तैयार हूं। जब सामने वाला तुम पर कुछ कर रहा होता है, तो पीछे हट जाते हो। तब आए क्यों? उसका कितना समय बर्बाद हुआ। मेरा यही कहना है। पूरा तैयार होकर आओ, अपने आत्मिक कल्याण के लिए।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 24 मई 2026 #योगी · 2026-05-24