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प्रश्नोत्तर P6-0127 · भाग 6

मन संदेशवाहक है और अंग मेरे सहायक हैं, तो मैं कौन हूं? मैं इस मैं के रोले में कई रूपों में शिफ्ट हो गया हूं। आत्मा को कैसे फील करूं? क्या आत्मज्ञान में आत्मा अलग दिखेगी, तीसरा नेत्र खुलेगा, या मैं वही रहूंगा? आत्मज्ञान के बाद बाहर के झगड़ों में उलझना चाहिए या नहीं?

वही तो खोजना है कि फिर तुम कौन हो। तुम कोई अंग नहीं हो। तुम मन नहीं हो। तो तुम कौन हो। यही खोज का विषय है। आप ही खोज सकते हो। दूसरा कैसे खोजेगा। मैं का रोला इसलिए है कि आप अपने आप को कुछ बना दिए हो, कई शिफ्ट कर दिए हो। कई लोगों में, भिन्न-भिन्न रूपों में, आपने अपने आप को शिफ्ट कर दिया है। जहां-जहां आप मोहग्रस्त हो, वहां आप मानसिक रूप से घुस गए हो। जब वहां से अपने आप को हटा दोगे, जिस दिन पूरी तरह हटा दिए और अपने आप में हो गए, तो मैं कौन हूं का जवाब आपको मिल जाएगा। जैसे मिट्टी के द्वारा घड़ा बन गया, कोई भी पात्र बन गया। असली को देखना है, तो नकली को मिटा देना पड़ेगा। मैं कौन हूं का जवाब उसी में छिपा हुआ है। उस घड़े का नाश कर दो। पूरी तरह मिटा दो। वो मिट्टी में हो जाएगा। यह बताने का विषय ही नहीं कि कैसे फील करो। अगर बता दिया जाए कि तुम ये फील करना, तो आप सब छोड़ के वही फील करना चाहोगे। उस तरीके का फील करना चाहोगे, और वो आपसे अलग होगा। आप कैसा फील करते हो, आपको पता चल जाएगा। मैं यहां आ जाऊंगा, तो मैं भी वही रहूंगा। बस मेरी पूरी ऊर्जा मुझ में होगी। मैं वहीं रहूंगा। बस मैं पहले दुखी था, अब मैं दुखी नहीं। मैं बदलूंगा नहीं, क्योंकि मैं वहां था तो भी मैं था। मैं बंट-बंट के दुखी हो गया। जब मैं सबसे निकल जाऊंगा, तो मैं दुख और सुख से परे होकर उस आनंद में आ जाऊंगा, तो भी मैं वही मैं रहूंगा। मैं टुकड़े-टुकड़ों में बिखर गया हूं। मान का, दिखाने का, कोई भी मेरा चक्कर चलता है। मेरे लिए मैं नहीं बदलता। मैं सबके लिए बदलता हूं, लेकिन मेरे लिए वही मैं रहता हूं। मैं पहले दुख में था। अब मैं दुख में नहीं हूं। बस इतना ही फर्क है। बाहर के नजारे बदल जाएंगे। देखने का भाव बदल जाएगा। आप एक आदमी को देखते हो। एक व्यक्ति आपके सामने खड़ा है, अनजान है, तो उसे अनजान की तरह देखते हो। और जैसे थोड़ी बातचीत होती है, परिचय हो जाता है, तो देखने का भाव बदल गया। मैं नहीं बदला कभी। मेरे कर्म के द्वारा मैंने जैसा अपने आप को बनाया, लोगों ने मुझे बदला हुआ देखा। मैं वही था, वही हूं, वही रहूंगा। मैं कभी नहीं बदलता। मैं अभी भी, मेरे लिए, मैं ही हूं। मैं उसमें लिप्त हूं, इसलिए उसकी वजह से मुझे दुख है। वो हट जाएगा, तो भी मैं ही रहूंगा, और मैं आनंद में रहूंगा। ऐसा भी नहीं कि कोई आपको आत्मा अलग से दिखने वाली है, क्योंकि आप ही तो वो हो। जब आप ही आप हो, तो पहले आप अपने आप को उसमें लिप्त होकर देख रहे थे। आपने कीचड़ में कूदा, तो अपने आप को कीचड़ से लिपटा हुआ देखा। नहा लिया, तो कीचड़ से मुक्त होते हुए देखा। लेकिन कीचड़ लगा था, तो भी आप वही थे। बस अब यह जानकारी होगी कि तू नहा ले, बस खत्म। पानी कहां मिलेगा, नहाना कैसे है। कीचड़ के साथ मैं घुटन में था। अब मैं कीचड़ से मुक्त होके आनंद में हूं। बस इतना ही। ऐसा नहीं कि मुझे आत्मा दिखने वाली है। मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखना है। आत्मज्ञान में ऐसा कुछ नहीं है। तीसरी नेत्र खुल जाएगी, ऐसा कुछ भी नहीं है। ज्यादा उजाला दिखेगा, ऐसा नहीं। बस आप दुख, सुख, राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मैं कर्ता के भाव से मुक्त होके, अपने आप में होकर आनंद में रहोगे। लेकिन तुम वही रहोगे। ऐसा कुछ तुम्हें अलग नहीं दिखने वाला है। पहले संसार तुम्हें रोष में, राग और द्वेष में दिख रहा था। अब नहीं। अब आप हर व्यक्ति के दोनों रूप देख पाओगे। बिगड़ा हुआ रूप, और रूप से परे वो परम रूप। स्व को भी देख पाओगे। देख के समझ पाओगे। ऐसा नहीं कि कुछ अलग दिखने लगेगा। आप वही के वही रहोगे। अभी भी वही हो, और आत्मज्ञान होने के बाद भी वही रहोगे।

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वीडियो: Sunday Q&A August 2, 2026 #Yogi · 2026-08-02